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CSR के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव, अब छोटे शहरों में 55 प्रतिशत बढ़ा खर्च

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नई  दिल्ली,एजेंसी। पिछले कई वर्षों से भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का खर्च एक तय पैटर्न पर चलता रहा है। ज़्यादातर फंड बड़े शहरों और उनके आसपास के इलाकों में खर्च होते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि कंपनियों के ऑफिस वहीं होते हैं, काम करने की सुविधा वहां बेहतर होती है और प्रोजेक्ट्स के नतीजों को मापना भी आसान होता है। दूसरी तरफ, छोटे शहरों और औद्योगिक जिलों में काफी आर्थिक गतिविधि होने के बावजूद, उन्हें CSR का कम हिस्सा मिलता था।

सत्वा कंसल्टिंग की रिपोर्ट “CSR’s Next Act” बताती है कि अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। कंपनी के डेटा और जिला स्तर के आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट दिखाती है कि सीएसआर का पैसा अब छोटे शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और कुछ ज़रूरतमंद इलाकों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, बड़े शहरों का असर अभी भी बना हुआ है।

भारत में सीएसआर का नियम कंपनी अधिनियम 2013 के तहत लागू हुआ था, जिसके अनुसार योग्य कंपनियों को अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत सामाजिक कामों पर खर्च करना होता है। समय के साथ यह एक बड़ा फंड बन गया है। आज 4,000 से ज़्यादा कंपनियां मिलकर हर साल करीब रू.30,000 करोड़ सीएसआर पर खर्च करती हैं, जो विकास के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

बड़े शहरों को मिला सीएसआर का लाभ 

कई सालों तक बड़े शहरों को लगभग एक-तिहाई सीएसआर फंड मिलता रहा। कंपनियां आमतौर पर उन जगहों पर पैसा लगाती थीं जहां उनका ऑफिस होता है या जहां पहले से भरोसेमंद पार्टनर मौजूद होते हैं। साथ ही, रिपोर्टिंग और परिणाम दिखाने की ज़रूरत ने भी बड़े शहरों में सीएसआर को सीमित रखा। लेकिन अब इसमें बदलाव दिख रहा है। पिछले 3 सालों में छोटे  शहरों में सीएसआर खर्च 55 प्रतिशत बढ़ा है। वहीं, औद्योगिक जिलों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है। मदुरै, वाराणसी, मैसूर और वडोदरा जैसे शहरों में सीएसआर फंड में अच्छा खासा इजाफा हुआ है, जिससे पता चलता है कि अब सीएसआर का फैलाव बढ़ रहा है।

औद्योगिक जिलों का हिस्सा अब काफी बढ़ गया है। FY22 से FY24 के बीच इन इलाकों में सीएसआर फंड 120 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुल सीएसआर खर्च में 30 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। इन जिलों का कुल सीएसआर में हिस्सा 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.4 प्रतिशत हो गया है। ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले को लगभग रू.549 करोड़ मिले, जबकि रायगढ़, जामनगर और बल्लारी को रू.295 से रू.402 करोड़ के बीच फंड मिला। यह ज़्यादातर मेटल, माइनिंग और एनर्जी कंपनियों के कारण हुआ है, जो अपने काम के आसपास सीएसआरकरती हैं।

सीएसआर प्रोजेक्ट्स अब ज़्यादा स्थानीय स्तर पर भी केंद्रित हो रहे हैं। FY22 से FY24 के बीच करीब 85 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स सिर्फ एक जिले पर केंद्रित थे और कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं पर हुआ। इसका मतलब है कि कंपनियां अब एक जगह पर लगातार काम करने पर ज़ोर दे रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, फिर भी, लगभग 75 प्रतिशत सीएसआर खर्च 200 से कम जिलों में ही हो रहा है, और इनमें से कई जगहों पर गरीबी कम है। जबकि ज़्यादा गरीब जिलों को अभी भी कम फंड मिल रहा है। सीएसआर फैल तो रहा है, लेकिन ज़रूरत के हिसाब से अभी सही तरीके से नहीं पहुंच रहा।

भारत के जिलों तक गहराई से पहुंच
आकांक्षी जिलों में सीएसआर निवेश धीरे-धीरे बढ़ रहा है। FY15 में जहां इनका हिस्सा 1.3 प्रतिशत था, वहीं FY24 में यह बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गया है। इस बदलाव में सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने अपने सीएसआर का लगभग 11 प्रतिशत इन जिलों में खर्च किया है, जो निजी कंपनियों से काफी ज़्यादा है।

₹10 करोड़ से ज़्यादा सीएसआर बजट वाली बड़ी कंपनियां भी अब इन इलाकों में निवेश बढ़ा रही हैं। FY24 में उनके कुल सीएसआर का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा आकांक्षी जिलों में गया। सेक्टर के हिसाब से BFSI, एनर्जी और माइनिंग कंपनियों ने इसमें सबसे ज़्यादा योगदान दिया है।

कंपनी का आकार भी सीएसआर खर्च को प्रभावित करता है। छोटी कंपनियां ज़्यादातर अपने राज्य या मुख्यालय के आसपास ही खर्च करती हैं, जबकि बड़ी कंपनियां कई राज्यों और जिलों में काम करती हैं।

सीएसआर के काम करने के तरीके में भी बदलाव आया है। पहले NGOs मुख्य भूमिका निभाते थे, लेकिन अब विश्वविद्यालय, अस्पताल, इनक्यूबेटर और कॉर्पोरेट फाउंडेशन जैसी संस्थाओं को भी ज़्यादा फंड मिल रहा है। FY24 में लगभग 20 प्रतिशत सीएसआर फंड ऐसे संस्थानों के जरिए खर्च हुआ। कुल मिलाकर, सीएसआर का स्वरूप बदल रहा है। अब यह सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और औद्योगिक इलाकों तक पहुंच रहा है।

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ममता बनर्जी का बड़ा दावा- EC की मदद से BJP ने भवानीपुर में मेरी उम्मीदवारी रद्द कराने की कोशिश की

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कोलकाता,एजेंसी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उनके खिलाफ दो झूठे मामले दर्ज कराने की कोशिश कर निर्वाचन आयोग की मदद से दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट से उनकी उम्मीदवारी रद्द कराने का प्रयास किया लेकिन तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने उसकी यह कोशिश विफल कर दी। बनर्जी ने पश्चिम मेदिनीपुर जिले के केशियारी में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए भाजपा पर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से 90 लाख मतदाताओं के नाम ”जबरन” हटवाने का आरोप भी लगाया। बनर्जी के सामने अपनी भवानीपुर सीट बरकरार रखने के लिए विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की चुनौती है।

बनर्जी ने अधिक ब्योरा दिए बिना कहा, ”भाजपा ने निर्वाचन आयोग की मदद से मेरे खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराने की कोशिश कर भवानीपुर से मेरी उम्मीदवारी रद्द कराने का प्रयास किया लेकिन हमने उसकी साजिश नाकाम कर दी।” उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि उसमें ”लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ने और जीतने का साहस नहीं है, इसलिए वह फर्जी तरीकों से जबरन वोट कब्जाने की साजिश रच रही है।” निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी को “भाजपा की मुख्य वॉशिंग मशीन” बताते हुए बनर्जी ने कहा, ”इसीलिए वे मतदाताओं के नाम हटा रहे हैं। वे परिणाम अपने पक्ष में करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में भी छेड़छाड़ की योजना बना रहे हैं।” मुख्यमंत्री ने कहा कि विधानसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार और बाद में दिल्ली में उसके सत्ता से बेदखल होने के बाद न्याय देर-सवेर अवश्य मिलेगा। उन्होंने कहा, ”एसआईआर प्रक्रिया के कारण 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। हटाए गए 90 लाख मतदाताओं में 60 लाख हिंदू और 30 लाख मुस्लिम हैं… क्या बांग्ला बोलने से हम भारतीय नहीं रह जाते? क्या हमें बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने की जरूरत है?”

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बनर्जी ने कहा, “एसआईआर एक दिन बड़ा घोटाला साबित होगा।” पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के भाजपा के वादे पर बनर्जी ने कहा कि पार्टी यूसीसी के जरिए लोगों पर अपना फरमान थोपना चाहती है। उन्होंने कहा, “यूसीसी के जरिए वे आपके धार्मिक आस्था का पालन करने और परंपराओं के अनुसार रीति-रिवाज निभाने के अधिकार छीनना चाहते हैं। वे सभी धार्मिक प्रथाओं को एक जैसा करना चाहते हैं।” मुख्यमंत्री ने कहा, “यूसीसी का मतलब एक भाजपा, एक नियम है। जब हम चुनाव में व्यस्त हैं, तब ऐसे विधेयक संसद में क्यों लाए जा रहे हैं? जब आप दिल्ली की सत्ता में नहीं रहेंगे, तो हम ऐसे कठोर कानूनों को निरस्त कर देंगे। हम पश्चिम बंगाल में इसे लागू नहीं होने देंगे।” भाजपा पर ईवीएम में हेराफेरी की साजिश का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, “वे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं चाहते। मतगणना के दिन वे उन सीट के नतीजे पहले घोषित करने की कोशिश करेंगे, जहां भाजपा आगे होगी, जबकि जहां तृणमूल आगे होगी, वहां गिनती धीमी की जाएगी।” उन्होंने कहा, “इसके बाद वे लाइट बंद कर जनादेश के साथ छेड़छाड़ करेंगे।

भाजपा को एक इंच भी जगह मत दीजिए—ईवीएम की पूरी तरह और बारीकी से जांच कीजिए।” झाड़ग्राम में एक अन्य रैली में बनर्जी ने चुनाव के दौरान काले धन के इस्तेमाल के प्रयासों का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “चुनाव के समय वे महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात करते हैं, लेकिन अपनी पार्टी में महिलाओं का प्रतिनिधित्व क्या है? उन्होंने यह वादा पहले क्यों नहीं निभाया?” उन्होंने दावा किया कि तृणमूल ने महिलाओं को 37 प्रतिशत से अधिक प्रतिनिधित्व दिया है और कई क्षेत्रों में यह 50 प्रतिशत तक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि वे केवल चुनाव के समय ही राज्य में आते हैं। बनर्जी ने कहा, “वे प्रवासी पक्षियों की तरह हैं। प्राकृतिक आपदाओं के समय वे क्यों नहीं दिखते?” भाजपा पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, “महिला पहलवानों का क्या हुआ? उन्नाव और हाथरस में क्या हुआ?”

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मतदान के दिन झारखंड से लोगों को लाए जाने की आशंका जताते हुए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर सतर्कता बरतने को कहा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय इलाकों से परिचित अधिकारियों का तबादला कर उनकी जगह बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया है ताकि “भाजपा को मदद मिल सके।” भाजपा शासित राज्यों में खान-पान पर पाबंदियों का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, “किसने उन्हें हमारे मांस, मछली और अंडे खाने के तरीके पर अपना हुक्म थोपने का अधिकार दिया?” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन के पीछे भाजपा का “असली एजेंडा” लोगों को निरुद्ध शिविरों में भेजना है। बनर्जी ने कहा, “वे सभी को धमका रहे हैं। बंगाल से करीब 500 प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला किया गया है, लेकिन इससे हमारी किसी भी सामाजिक कल्याण योजना में देरी नहीं हुई है।”

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अमित शाह ने बंगाल में जारी किया BJP का ‘संकल्प पत्र’, जनता से किए ये वादे

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कोलकाता,एजेंसी। पश्चिम बंगाल में चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियां जोरों- शोरों से तैयारियां कर रही हैं। BJP  ने आज राज्य में अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में ‘संकल्प पत्र’ के रूप में जनता के सामने रखा। इस दौरान उन्होंने राज्य की कानून-व्यवस्था, रोजगार और महिला सुरक्षा को लेकर पार्टी का रोडमैप पेश किया।

संकल्प पत्र के मुख्य बिंदु

घोषणापत्र में मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है:

  1. कानून-व्यवस्था: राज्य में शांति बहाली और हिंसा मुक्त चुनाव का वादा।
  1. रोजगार: बेरोजगार युवाओं के लिए नई योजनाओं और अवसरों का रोडमैप।
  2. महिला सशक्तिकरण: महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कदम और विशेष योजनाएं।

ममता सरकार पर किया तीखा हमला

घोषणापत्र जारी करते हुए अमित शाह ने सत्तारूढ़ TMC पर जमकर निशाना साधा। शाह ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में बंगाल की जनता ने जिन उम्मीदों के साथ ममता बनर्जी को सत्ता सौंपी थी, वे अब पूरी तरह टूट चुकी हैं। राज्य के लोग अब डर के साये में हैं और मन से बदलाव चाहते हैं। उन्होंने इस मेनिफेस्टो को ‘निराशा से बाहर निकलने’ और ‘भय से मुक्ति’ का रास्ता बताया। शाह ने दावा किया कि भाजपा की सरकार बनने पर महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के लिए रोजगार सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। भाजपा ने अपने वादों की फेहरिस्त में भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और सरकारी कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान को भी प्रमुखता दी है।

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DA Hike News: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पेंशनर्स और कर्मचारियों में भेदभाव खत्म करेगी सरकार, मिलेगा बराबर DA HIKE

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नई दिल्ली,एजेंसी।  सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के हित में एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि महंगाई भत्ता (DA) बढ़ाते समय राज्य सरकारें नौकरी कर रहे कर्मचारियों और रिटायर हो चुके पेंशनभोगियों के बीच कोई फर्क नहीं कर सकतीं।

क्या है पूरा मामला?
यह विवाद साल 2021 में तब शुरू हुआ जब केरल सरकार और केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए पेंशनभोगियों को कम महंगाई राहत (DR) देने का निर्णय लिया।

भेदभाव: उस समय काम कर रहे कर्मचारियों को 14% DA दिया गया, जबकि पेंशनर्स को मात्र 11% DR थमा दिया गया। केरल सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि वित्तीय संकट के कारण वे दोनों वर्गों को समान भुगतान नहीं कर सकते और यह उनका एक ‘पॉलिसी मैटर’ (नीतिगत मामला) है।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने सरकार की सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट की मुख्य बातें निम्नलिखित रहीं:

-पेंशनर्स और सेवारत कर्मचारियों के बीच भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 (Right to Equality) का सीधा उल्लंघन है। 
-कोर्ट ने साफ कहा कि महंगाई की मार एक कामकाजी कर्मचारी और एक पेंशनभोगी, दोनों पर “समान रूप से” पड़ती है। खाने-पीने और रहने की चीजें दोनों के लिए एक ही रेट पर महंगी होती हैं। 
-अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि “आर्थिक तंगी” का हवाला देकर किसी के संवैधानिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।

हजारों पेंशनर्स को मिलेगा फायदा
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के पुराने फैसले को बरकरार रखा है। अब KSRTC को अपने हजारों रिटायर्ड कर्मचारियों को उसी दर से एरियर और महंगाई राहत देनी होगी, जो वर्तमान कर्मचारियों को मिल रही है। हालांकि इससे निगम पर करोड़ों रुपये का वित्तीय बोझ बढ़ेगा, लेकिन बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए यह जीत एक बड़ी राहत लेकर आई है। 

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