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कोरबा

भू-विस्थापितों के वैकल्पिक रोजगार के लिए एसईसीएल की निविदा नीति में संशोधन की मांग

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रू.5 लाख की सीमा बढ़ाकर रू.20 लाख तथा वार्षिक टेंडर सीमा रू.1 करोड़ से बढ़ाकर रू.5 करोड़ करने की मांग

कोरबा। ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने एसईसीएल प्रबंधन से कोयला खनन परियोजनाओं से प्रभावित एवं विस्थापित परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर बढ़ाने हेतु वर्तमान प्रचलित नियमों एवं निविदा प्रक्रिया में आवश्यक संशोधन करने की मांग की है ।

समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने कहा कि कोयला खनन परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में परिवारों ने अपनी कृषि भूमि एवं अन्य परिसंपत्तियां गंवाई हैं। वर्तमान व्यवस्था में भूमि अधिग्रहण के एवज में मिलने वाला स्थायी रोजगार सीमित परिवारों तक ही पहुंच पाता है, जबकि बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार रोजगार एवं आजीविका के पर्याप्त साधनों से वंचित रह जाते हैं। यही स्थिति समय-समय पर रोजगार की मांग को लेकर आंदोलन धरना-प्रदर्शन एवं खदान बंदी जैसी परिस्थितियों को जन्म देती है, जिसका प्रभाव उत्पादन और कंपनी के साथ-साथ राजस्व पर भी पड़ता है ।

समिति ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए एसईसीएल द्वारा पूर्व में सकारात्मक पहल की गई है। गेवरा, दीपका एवं कुसमुंडा जैसे मेगा प्रोजेक्टों में ठेका कार्यों में भूविस्थापितों के लिए निर्धारित सीमा तक आरक्षण की व्यवस्था की गई थी लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इन प्रावधानों की सीमा बढ़ाकर भूविस्थापित परिवारों को अधिक व्यापक रोजगार अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक हो गया है ।

समिति की प्रमुख मांगें

  1. टेंडर की आरक्षित सीमा बढ़ाई जाए ।
    भूविस्थापित फर्मों एवं भूविस्थापित सहकारी समितियों के लिए वर्तमान में निर्धारित रू.5 लाख तक की टेंडर सीमा को बढ़ाकर न्यूनतम रू.20 लाख किया जाए ।
  2. वार्षिक टेंडर सीमा में वृद्धि की जाए ।
    भूविस्थापित फर्मों एवं सहकारी समितियों को एक वित्तीय वर्ष में मिलने वाली रू.1 करोड़ तक की टेंडर सीमा को बढ़ाकर रू.5 करोड़ किया जाए, ताकि सक्षम भूविस्थापित संस्थाएं बड़े स्तर पर कार्य कर सकें और स्थानीय स्तर पर रोजगार का विस्तार हो ।
  3. आउटसोर्सिंग कंपनियों में 80 प्रतिशत स्थानीय रोजगार सुनिश्चित हो ।
    वर्तमान में खनन एवं उत्पादन से जुड़े अधिकांश कार्य आउटसोर्सिंग के माध्यम से कराए जा रहे हैं, इसलिए मिट्टी एवं कोयला उत्खनन उत्पादन परिवहन तथा अन्य संबंधित कार्यों की निविदा शर्तों में यह अनिवार्य किया जाए कि संबंधित परियोजना से अर्जित गांवों एवं खदान प्रभावित क्षेत्रों के बेरोजगारों को कम से कम 80 प्रतिशत रोजगार दिया जाए ।
  4. चार पहिया वाहन संबंधी टेंडर भूविस्थापितों के लिए आरक्षित किए जाएं ।
    एसईसीएल में आवश्यकता के अनुसार चार पहिया वाहनों से संबंधित कार्यों एवं टेंडरों में भूविस्थापित परिवारों एवं उनकी पात्र संस्थाओं को प्राथमिकता/आरक्षण दिया जाए, जिससे स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर बढ़ सकें ।
  5. कोल ट्रांसपोर्टेशन में पूर्व निर्धारित 20 प्रतिशत भागीदारी पुनः प्रभावी की जाए ।
    समिति ने पूर्व में लिए गए निर्णयों का उल्लेख करते हुए मांग की है कि SECL/BSP/CAD/FD Extracts/18-19/198 दिनांक 30.05.2018 के तहत कोल ट्रांसपोर्टेशन के 20 प्रतिशत कार्य स्थानीय भूविस्थापित सहकारी समितियों के माध्यम से कराए जाने की व्यवस्था को प्रभावी रूप से पुनः लागू किया जाए तथा अन्य उपयुक्त कार्यों में भी निर्धारित प्रतिशत में भूविस्थापितों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए ।
  6. सीएसआर के माध्यम से स्वरोजगार के अवसर दिए जाएं ।
    भूविस्थापित परिवारों एवं उनकी सहकारी समितियों को एसईसीएल के सीएसआर मद से आजीविका एवं स्वरोजगार से जुड़े कार्य उपलब्ध कराए जाएं कंपनी की कॉलोनियों कार्यालयों एवं अन्य संस्थानों में आवश्यक सेवाओं के कार्यों में स्थानीय भूविस्थापितों को प्राथमिकता दी जाए ।
  7. वास्तविक भूविस्थापितों की पात्रता का सत्यापन हो ।
    निविदा प्रक्रिया में परियोजना प्रभावित प्रमाण-पत्र का दुरुपयोग रोकने के लिए पात्रता का कड़ाई से सत्यापन किया जाए। यदि किसी गैर-प्रभावित व्यक्ति द्वारा भूविस्थापितों की पात्रता का अनुचित लाभ उठाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए ताकि वास्तविक प्रभावित परिवारों का अधिकार सुरक्षित रहे ।
  8. अत्यधिक कम दर पर स्वीकृत टेंडरों की जांच हो ।
    एसईसीएल गोवरा क्षेत्र में एस्टीमेट राशि से अत्यधिक कम दर पर लिए गए अथवा स्वीकृत कार्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए ऐसे कार्यों में कार्य की गुणवत्ता श्रमिकों को भुगतान निर्धारित मानकों का पालन तथा वास्तविक लागत की जांच सुनिश्चित की जाए ।
  9. पूर्व में लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की समीक्षा हो ।
    दिनांक 08.08.2022 के SECL/BSP/CAD/326/BMExt/22-23/2310 सहित भूविस्थापितों के हित में पूर्व में लिए गए निर्णयों की समीक्षा कर यह सुनिश्चित किया जाए कि उनका वास्तविक लाभ प्रभावित परिवारों तक पहुंच रहा है ।
  10. लंबित मांगों पर समयबद्ध निर्णय लिया जाए ।
    समिति द्वारा पूर्व में प्रस्तुत मांग-पत्र तथा क्षेत्रीय सांसद एवं संबंधित विधायकों द्वारा भूविस्थापितों की मांगों के समर्थन में किए गए पत्राचार पर हुई कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध कराई जाए तथा लंबित मांगों पर समयबद्ध निर्णय लिया जाए ।

रोजगार के अवसर बढ़ाना कंपनी और भूविस्थापित दोनों के हित में

समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने कहा कि भूविस्थापितों को केवल मुआवजा देकर उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता, जिन परिवारों ने देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली कोयला परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन दी है, उनके लिए स्थायी रोजगार स्वरोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है ।

उन्होंने कहा कि यदि भूविस्थापितों को निविदाओं परिवहन आउटसोर्सिंग सेवा कार्यों एवं स्वरोजगार के पर्याप्त अवसर मिलते हैं, तो इससे प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार को लेकर होने वाले विवाद एवं आंदोलन भी कम होंगे, इसका सकारात्मक प्रभाव एसईसीएल के उत्पादन एवं कार्य व्यवस्था पर भी पड़ेगा ।

ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने एसईसीएल के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक एवं संबंधित क्षेत्रीय प्रबंधन से मांग की है कि भूविस्थापित परिवारों की वर्तमान रोजगार आवश्यकता को देखते हुए प्रचलित नियमों में आवश्यक संशोधन कर शीघ्र आदेश जारी किए जाएं तथा पूर्व में लिए गए निर्णयों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए ।

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कोरबा

कोरबा जिले में भूजल स्तर बढ़ाने के लिए बनाए जा रहे 234 बोरवेल रिचार्ज सैंड फिल्टर पिट

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विकसित भारत-जी राम जी के तहत रू1.32 करोड़ से अधिक के कार्य स्वीकृत

जल संरक्षण एवं संवर्धन के साथ ग्रामीणों को मिल रहा रोजगार, 180 से अधिक ग्राम पंचायतों में हो रहा निर्माण

मोर गांव मोर पानी अभियान के तहत जल सरंक्षण एवं संवर्धन सम्बंधी संरचनाओं को प्राथमिकता

कोरबा, 26 अक्टूबर 2026। जिले में गिरते भूजल स्तर को बढ़ाने तथा वर्षा जल के संरक्षण और पुनर्भरण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम के तहत 234 बोरवेल रिचार्ज सैंड फिल्टर पिट का निर्माण कराया जा रहा है। इन कार्यों के लिए कुल 1 करोड़ 32 लाख 97 हजार रुपये की स्वीकृति दी गई है। इन संरचनाओं के निर्माण से जहां ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं, वहीं भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देकर जल संकट की चुनौती से निपटने में भी मदद मिलेगी।

कलेक्टर कुणाल दुदावत के निर्देशन तथा मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत प्रतीक जैन के मार्गदर्शन में जिले में जल संरक्षण एवं जल संवर्धन से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। ‘मोर गांव, मोर पानी’ अभियान के तहत वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा जल स्रोतों के संरक्षण के लिए विभिन्न संरचनाओं का निर्माण कराया जा रहा है।

बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने में मिलेगी मदद

बोरवेल रिचार्ज सैंड फिल्टर पिट ऐसी संरचना है, जिसके माध्यम से वर्षा जल को रेत एवं अन्य फिल्टर सामग्री की सहायता से छानकर जमीन के भीतर पहुंचाया जाता है। इससे भूजल पुनर्भरण में मदद मिलती है तथा बोरवेल और आसपास के जलस्रोतों के जलस्तर को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। ग्राम पंचायतों, शासकीय भवनों, स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और सामुदायिक भवनों में ऐसी संरचनाएं जल संरक्षण की दृष्टि से उपयोगी हैं।

पांचों विकासखंडों में हो रहा निर्माण

जिले की 180 से अधिक ग्राम पंचायतों में मांग एवं आवश्यकता के अनुसार सामुदायिक बोरवेल रिचार्ज सैंड फिल्टर पिट का निर्माण कराया जा रहा है। विकासखंडवार स्थिति के अनुसार करतला में 64, कटघोरा में 30, कोरबा में 66, पाली में 13 तथा पोड़ी उपरोड़ा में 61 रिचार्ज पिट बनाए जा रहे हैं।

इन संरचनाओं से विशेषकर उन ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल पुनर्भरण को प्रोत्साहन मिलेगा, जहां जलस्तर में गिरावट की समस्या है। वर्षा जल का बेहतर उपयोग होने से जल उपलब्धता बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी।

विकसित भारत- जी राम जी से जिले में जल संरक्षण एवं संवर्धन के इन प्रयासों के माध्यम से रोजगार सृजन के साथ जल सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भविष्य के लिए भी जल संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके।

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वरिष्ठ पत्रकार सुभाष अग्रवाल को भ्रात शोक

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कोरबा। प्रेस क्लब के सदस्य एवं दैनिक तरूण छत्तीसगढ़ के संपादक सुभाष अग्रवाल के अनुज भ्राता (छोटे भाई) शहर के प्रतिष्ठित नागरिक एवं होटल रिलैक्स इन के संचालक सतीश अग्रवाल पिता स्वर्गीय ओमप्रकाश अग्रवाल का आज सोमवार दिनांक 26/10/2026 की देर शाम 7.30 बजे निधन हो गया। वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार कल मंगलवार दिनांक 27/10/2026 को सुबह 11 बजे स्थानीय मोती सागर पारा मुक्तिधाम में संपन्न होगा। इससे पूर्व अग्रोहा मार्ग स्थित उनके निवास से अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। उनके निधन पर कोरबा प्रेस क्लब परिवार ने शोक व्यक्त किया है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में परम शांति प्रदान करे एवं शोकाकुल परिवार को यह असह्य दुःख सहन करने की शक्ति दे।

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बेबी एलिफेंट की छठी मनाई, नाम रखा ‘काशी’:7 गांवों के ग्रामीण शामिल हुए, स्वस्थ जीवन की कामना की, जिले में 48 हाथियों की मौजूदगी

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कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा वन मंडल के करतला रेंज में 9 हाथियों का झुंड घूम रहा है। झुंड में नन्हे हाथी के जन्म की खुशी में रविवार को 7 गांवों के ग्रामीणों ने उसकी छठी मनाई और उसका नाम ‘काशी’ रखा।

कार्यक्रम काशीपानी जंगल के कारीपानी मंदिर के नीचे गौठान टिकरापारा में आयोजित किया गया। इसमें रामभाठा, लबेद, पाहराभांठा, काशीपानी, छातापाठ, जामपानी और छुईडुंगा गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए।

मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद ग्रामीणों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई। ग्रामीणों ने हाथी के बच्चे के स्वस्थ जीवन की कामना की।

बेबी एलिफेंट का नाम ‘काशी’ रखा गया है।

बेबी एलिफेंट का नाम ‘काशी’ रखा गया है।

छठी कार्यक्रम काशीपानी जंगल के कारीपानी मंदिर के नीचे गौठान टिकरापारा में आयोजित किया गया।

छठी कार्यक्रम काशीपानी जंगल के कारीपानी मंदिर के नीचे गौठान टिकरापारा में आयोजित किया गया।

रविवार को 7 गांवों के ग्रामीणों ने उसकी छठी मनाई।

रविवार को 7 गांवों के ग्रामीणों ने उसकी छठी मनाई।

जिले में 48 हाथियों की मौजूदगी

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, 9 हाथियों का झुंड फिलहाल काशीपानी के जंगल में घूम रहा है। इसके अलावा कुदमुरा रेंज में 32 हाथी और चचिया क्षेत्र में 7 हाथी मौजूद हैं। हाल के दिनों में हाथियों ने 17 किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाया है।

20 साल से जंगल में आ रहे हाथी

ग्रामीणों ने बताया कि करीब 20 साल से हाथी इस जंगल में आते हैं। वे लंबे समय तक यहां रुकने के बाद वापस चले जाते हैं। यह हाथियों का पुराना कॉरिडोर है।

SDO मणिकांत वर्मा ने ग्रामीणों से हाथियों से छेड़छाड़ नहीं करने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि फसल नुकसान के मामलों में नियमानुसार मुआवजा दिया जाता है। जनहानि रोकने के लिए सतर्क रहना जरूरी है।

साल 2000 में पहली बार आए थे हाथी

जिले में साल 2000 में पहली बार कुदमुरा रेंज के आमटिकरा गांव में हाथी आए थे। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई। कई बार जिले में हाथियों की संख्या 150 तक पहुंच चुकी है।

धिनारा गांव से शुरू हुई छठी मनाने की परंपरा

बेबी एलिफेंट की छठी मनाने की परंपरा धिनारा गांव से शुरू हुई थी। ग्रामीण अब हाथियों को लेकर जागरूक हो रहे हैं। पहले जहां हाथियों को भगवान मानकर पूजा की जाती थी, वहीं अब ग्रामीण सुरक्षित दूरी बनाए रखने पर जोर देते हैं।

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