वॉशिंगटन डीसी,एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में पहली बार विदेशी सामानों पर टैरिफ लगाने का ऐलान किया। इसका सीधा असर अमेरिका के शेयर बाजार पर पड़ा।
डाउ जोंस, S&P और नैस्डैक जैसे मार्केट इंडेक्स में 2 दिन में 10% से ज्यादा की गिरावट आई। बाजार की हालत बिगड़ती देख ट्रम्प सरकार ने टैरिफ को 90 दिनों के लिए टाल दिया।
अब ट्रम्प ने एक बार फिर से 9 अगस्त से दुनियाभर के देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। अमेरिकी एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे अमेरिकी मार्केट को फिर नुकसान हो सकता है और दुनियाभर में मंदी आने का खतरा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प 2 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस के रोज गार्डन में 69 देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान करते हुए।
हर अमेरिकी को साल में 2 लाख ज्यादा खर्च करना होगा
अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के बजट लैब के अनुमान के मुताबिक अमेरिका में औसत टैरिफ रेट 18.3% हो चुका है। इससे पहले 1909 में अमेरिका में औसत टैरिफ रेट 21% था। यानी मौजूदा टैरिफ 100 साल में सबसे ज्यादा है।
बढ़े हुए टैरिफ की वजह से अमेरिकी परिवारों को इस साल औसतन 2400 डॉलर (2 लाख रुपए) का एक्स्ट्रा खर्च उठाना पड़ेगा। पहले वे जो विदेशी सामान 100 डॉलर में खरीद रहे थे, अब उसके लिए उन्हें 118.3 डॉलर चुकाने होंगे।
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री वेंडोंग झांग का कहना है कि आने वाले समय में अमेरिका में उन चीजों की कीमतें और बढ़ेंगी, जिनमें स्टील और एल्युमीनियम का इस्तेमाल होता है, जैसे रेफ्रिजरेटर या वॉशिंग मशीन।
अमेरिका की GDP को 11.6 लाख करोड़ का नुकसान
बजट लैब के मुताबिक टैरिफ से अमेरिका की GDP 0.5% गिर सकती है। इसका मतलब है कि अमेरिका की 28 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी को एक साल में 140 बिलियन डॉलर का नुकसान होगा। भारतीय रुपए में यह 11.6 लाख करोड़ है।
टैक्स फाउंडेशन का कहना है कि टैरिफ का असर खाने-पीने की चीजों पर भी पड़ेगा। अमेरिका में केला और कॉफी पर्याप्त मात्रा में नहीं उगाई जाती है, इसलिए इनकी कीमत बढ़ेगी। मछली, बीयर और शराब पर भी महंगाई का असर पड़ेगा।
चीजें ज्यादा महंगी होंगी तो लोग कम खरीदेंगे। हालांकि, ट्रम्प का दावा है कि टैरिफ से अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे महंगाई बढ़ेगी और नौकरियां घटेंगी।
हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में सिर्फ 73,000 नई नौकरियां जुड़ीं। सरकार के अनुमान के मुताबिक 1.09 लाख नई नौकरियां बढ़ने की उम्मीद थीं। मई और जून में भी नौकरियों में गिरावट आई। इससे एक तिमाही में औसतन 35,000 प्रति महीने नौकरियां जुड़ीं। यह 2010 के बाद सबसे कम आंकड़ा है।
इस आंकड़े से नाराज होकर ट्रम्प ने 1 अगस्त को ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स की कमिश्नर एरिका मैकएंटरफर को नौकरी से निकाल दिया। ट्रम्प ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट में ‘राजनीतिक मकसद’ से हेराफेरी की गई थी।
ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स की कमिश्नर एरिका मैकएंटरफर। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एरिका को 2024 में नियुक्त किया था। (फाइल फोटो)
जवाबी टैरिफ से शुरू हो सकती है ट्रेड वॉर
जब अमेरिका जैसा बड़ा देश टैरिफ लगाता है, तो दूसरे देश भी जवाबी टैरिफ लगा सकते हैं। इससे देशों के बीच ट्रेड वॉर शुरू हो जाती है। अभी कई देश अमेरिकी सामानों पर जवाबी टैरिफ से बच रहे हैं, लेकिन वे अमेरिका पर दबाव डालने के लिए जवाबी टैरिफ लगा सकते हैं।
उदाहरण के लिए 2018-19 के टैरिफ वॉर में जब ट्रम्प ने चीन पर ज्यादा टैरिफ लगाए थे, तो चीन ने भी सोयाबीन, ऑटोमोबाइल्स और कई अमेरिकी सामानों पर टैक्स लगाया था।
अमेरिकी सोयाबीन की चीन में काफी खपत है। चीन के टैरिफ लगाने से सोयाबीन की कीमत 25% ज्यादा महंगी हो गई, जिससे निर्यात में 50% की गिरावट आई। इससे अमेरिकी किसानों को बहुत नुकसान हुआ था।
तब किसानों की मदद के लिए अमेरिकी सरकार को सोयाबीन के किसानों के लिए 7.3 बिलियन डॉलर का राहत पैकेज जारी करना पड़ा था।
दुनिया पर मंदी आने का खतरा बढ़ा
डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति के कारण दुनिया में मंदी आने का खतरा बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और आर्थिक विशेषज्ञों ने इस पर चेतावनी दी है कि अगर टैरिफ वॉर आगे बढ़ा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो सकती है।
IMF ने 22 अप्रैल को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा कि अगर अमेरिका और अन्य देश टैरिफ वॉर में उलझते हैं, तो वैश्विक विकास दर 2025 में 3.3% से घटकर 3.0% हो सकती है।
ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) ने 3 जून को अपनी रिपोर्ट में कहा कि ट्रम्प के टैरिफ से जुड़े फैसलों का असर न सिर्फ अमेरिका, बल्कि यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा।
इससे मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट्स में कमी आ सकती है, जिसके चलते पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में एक साथ सिंक्रोनाइज्ड स्लोडाउन (मंदी) का खतरा पैदा हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक मंदी का असर सबसे ज्यादा अमेरिका और फिर चीन, भारत, कनाडा, इटली और आयरलैंड पर पड़ेगा।
अमेरिका की सॉफ्ट पावर का असर घटा
ट्रम्प के टैरिफ का असर ये हुआ है कि अमेरिका के कई नजदीकी देश ही अब उससे नाराज हो गए हैं। कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस जैसे देश जो अमेरिका के काफी नजदीकी हैं, अब अपने संबंधों पर फिर से विचार करने लगे हैं।
ट्रम्प की टैरिफ नीतियों का असर अमेरिका के पुराने सहयोगियों और मित्र देशों के साथ संबंधों पर पड़ा है। ऐसे में उनका अमेरिका पर भरोसा घटने लगा है। कनाडा और अमेरिका के संबंध हमेशा से बेहद करीबी रहे हैं, लेकिन ट्रम्प के दौर में इनमें काफी तनाव आ गया।
एशिया में भी स्थिति अलग नहीं है। जापान और साउथ कोरिया, जो सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं, अब खुद को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि भविष्य में अमेरिका पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।
जापान को शुरू में उम्मीद थी कि वह ट्रम्प की मांगों को पूरा करके अमेरिका के और करीब आ सकेगा। उसने अपने रक्षा बजट में काफी बढ़ोतरी भी की थी, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने और ज्यादा मांगें रख दीं। टोक्यो ने इससे नाराज होकर जुलाई में अमेरिका और जापान के रक्षा व विदेश मंत्रियों की बैठक को ही रद्द कर दिया।
हालांकि, बाद में अमेरिका और जापान ने एक व्यापार समझौते पर दस्तखत किए, लेकिन यह सिर्फ ऊपर से सामान्य स्थिति दिखाने की कोशिश है। असल में जापान अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर न रहने के रास्ते तलाश रहा है, क्योंकि उसे ट्रम्प के फैसलों की अनिश्चितता का डर है।
वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने भी अमेरिका की नई मांगों की खुलकर आलोचना की। इसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने AUKUS नामक एक अहम रक्षा समझौते की समीक्षा की घोषणा कर दी, जिसे ऑस्ट्रेलिया के लिए अमेरिका की सुरक्षा गारंटी का सबसे अहम संकेत माना जाता था।
अमेरिका की ‘सॉफ्ट पावर’ यानी अपने प्रभाव से दुनिया को जोड़ने की क्षमता में भी गिरावट आई है। यह गिरावट दक्षिण प्रशांत देशों में साफ दिख रही है, जहां चीन और अमेरिका में सीधी प्रतिस्पर्धा है।
नई दिल्ली, एजेंसी। BRICS समिट में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दोनों भारत आएंगे। चीन के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को जिनपिंग के भारत दौरे की पुष्टि की। इससे दो दिन पहले रूस ने भी पुतिन के भारत आने की पुष्टि की थी।
जिनपिंग का यह 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत का पहला दौरा होगा। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होने की भी उम्मीद है।
15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों के मारे जाने की बात मानी थी।
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को BRICS समिट आयोजित होगा। इसमें चीन और रूस समेत 11 सदस्य देशों के नेता शामिल होंगे।
जिनपिंग ने आखिरी बार अक्टूबर 2019 में भारत का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में मोदी से मुलाकात की थी।
गलवान हिंसा के बाद बिगड़े थे भारत-चीन के रिश्ते
भारत और चीन के रिश्ते 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद बुरी तरह बिगड़ गए थे। इस झड़प में दोनों देशों के सैनिक मारे गए थे। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव काफी बढ़ गया।
हालांकि, इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी की कई मौकों पर मुलाकात हुई है। दोनों नेता दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के दौरान आमने-सामने आए हैं। पिछले साल चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO की बैठक के दौरान भी दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी।
इस बार नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक होने की उम्मीद है।
भारत और चीन के अधिकारी पिछले कई महीनों से दोनों देशों के रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल 24 अगस्त को चीन गए थे।
NSA अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच 25 अगस्त को सीमा विवाद समेत कई मुद्दों पर बातचीत हुई थी।
सीमा विवाद समेत कई मुद्दे भारत के एजेंडे में
भारत और चीन के बीच सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी बातचीत का हिस्सा हैं। भारत चीन के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करना चाहता है।
इसके अलावा रेयर अर्थ मैगनेट और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जैसे जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर भी भारत अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।
BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है भारत
इस साल BRICS की कमान भारत के पास है। BRICS दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, ईरान, इथियोपिया, UAE और इंडोनेशिया भी शामिल हैं।
भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्रीस्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं।
भारत का फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन मजबूत करने पर है। यानी BRICS को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश है।
नोएडा, एजेंसी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नोएडा के मजिस्ट्रेट को फटकार लगाई। बुधवार को CJI सूर्यकांत ने कहा, ‘जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी FIR रद्द कर दी हैं। विरोध प्रदर्शनों को लेकर किसी भी छात्र के खिलाफ भविष्य में जबरदस्ती की कार्रवाई पर रोक लगाई है। ऐसे में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? कोई भी मजिस्ट्रेट उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।’
दरअसल, 4 सितंबर को नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट आर के सिसोदिया ने दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) प्रदर्शन में शामिल छात्र अक्षत त्रिपाठी के खिलाफ नोटिस जारी किया था। इसमें 5 लाख रुपए का बॉन्ड और इतनी ही रकम के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया था। इसके बाद छात्र ने मंगलवार को वीडियो जारी कर कहा था- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मुझे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए धमकाया जा रहा है।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट विश्वजीत भट्टाचार्य ने मौखिक रूप से CJI की अध्यक्षता वाली बेंच को यह बात बताई। उन्होंने बताया कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने एक छात्र को नोटिस जारी कर पूछा कि शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपए का पर्सनल बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए। बाद में नोटिस वापस ले लिया गया।
यह वह नोटिस है, जिसे नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्यालय ने छात्र को जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट बोला- जिला मजिस्ट्रेट से जवाब मांगेंगे
वकील भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- यह भारत के छात्रों के साथ एक प्रयोग किया जा रहा है। इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। पहले अवमानना की गई और फिर उसे वापस लिया गया। इस अवमानना को इस तरह सुधारा नहीं जा सकता।
यह कोर्ट की गरिमा की अवमानना है। नोएडा और यूपी के अधिकारी छात्रों के मन में डर का माहौल नहीं बना सकते हैं। इस पर CJI सूर्यकांत ने भरोसा दिलाते हुए कहा- हम जिला मजिस्ट्रेट से इस पर जवाब मांगेंगे।
तस्वीर छात्र अक्षत त्रिपाठी की है। मंगलवार को उन्होंने वीडियो जारी करके कहा था- मैं छात्र हूं। ऐसे में इतनी बड़ी राशि की शर्त मेरे लिए कैसे व्यावहारिक है
4 सितंबर को नोटिस दिया, अगले दिन रद्द कर दिया
छात्र अक्षत त्रिपाठी प्रयागराज के झूंसी के रहने वाले हैं। वह गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) से BA-LLB कर रहे हैं। अक्षत त्रिपाठी स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ( SFI) की उत्तर प्रदेश स्टेट कमेटी के सदस्य भी हैं। 4 सितंबर 2026 को उनके खिलाफ नोएडा कमिश्नरेट के थर्ड एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कार्यालय की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया।
कोर्ट ने नोटिस में कहा गया था- यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों को CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। वह छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक सूचनाएं फैला रहे थे। ऐसी गतिविधियों से तनाव पैदा हो सकता है। सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अक्षत त्रिपाठी से पूछा गया था कि क्यों न उन्हें 6 महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पाबंद किया जाए। इसके लिए उनसे 5 लाख रुपए का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने को कहा जाए। मामले में सुनवाई के लिए 5 सितंबर की तारीख तय की गई थी।
ACP रवि शंकर ने बताया-
जांच के दौरान अक्षत त्रिपाठी का नाम सामने आया था। पता चला था कि वह जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट में शामिल होने गया था। पुलिस ने वॉट्सऐप के जरिए छात्र को नोटिस भेजा था। 5 सितंबर को नोटिस कैंसिल कर दिया गया। छानबीन में पता चला कि छात्र उस दौरान वहां मौजूद नहीं था।
ACP ने बताया कि इससे पहले नवंबर में छात्र ने आत्महत्या करने की बात कहते हुए वीडियो बनाया था, जो वायरल हो गया था। वीडियो वायरल होने के बाद वह गायब हो गया था, जिसके बाद पुलिस ने उसे तलाशा था।
छात्र ने वीडियो जारी करके कहा- क्या सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना जुर्म
छात्र ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट किया। इसमें कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद CJP प्रदर्शन में शामिल होने के लिए धमकाया जा रहा है। क्या लोकतंत्र में सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना या पेपर लीक जैसे मुद्दों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध है? इसी मामले में ग्रेटर नोएडा मजिस्ट्रेट की तरफ से मुझे नोटिस मिला है। इसमें 5 लाख रुपए का निजी बॉन्ड देने को कहा गया है। मैं छात्र हूं और मेरी कोई व्यक्तिगत आय नहीं है। ऐसे में इतनी बड़ी राशि की शर्त मेरे लिए कैसे व्यावहारिक है?
नोटिस में आरोप है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन में शामिल होकर मैंने विश्वविद्यालय के छात्रों को सरकार के खिलाफ भड़काया। सवाल है कि सरकार की नीति की आलोचना करना, सरकार से सवाल पूछना या पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाना भड़काना कैसे हो गया? मुझ पर लगाए गए आरोपों का आधार और प्रमाण क्या है?
मैं 3 महीने से विश्वविद्यालय गया ही नहीं हूं। 20 जुलाई के प्रदर्शन से करीब डेढ़ महीने पहले ही अपने घर इलाहाबाद आ चुका था। ऐसे में मैंने विश्वविद्यालय के छात्रों को भड़काया कैसे? मैं इस कार्रवाई की निंदा करता हूं और निष्पक्ष जांच की मांग करता हूं।
9 दिन पहले SC जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की सभी FIR रद्द की थीं
सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से जुड़ी सभी FIR को रद्द कर दिया। यह आदेश देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज मामलों पर लागू होगा। कोर्ट ने साफ किया था कि जिन प्रदर्शनकारियों का आपराधिक रिकॉर्ड है, उन पर केस चलता रहेगा। ये FIR 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के बाद दर्ज की गई थीं।
रायबरेली, एजेंसी। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने रायबरेली में बुधवार को बैठक में कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय को अपने मोबाइल पर टूटी सड़कें दिखाईं। राहुल ने डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कोऑर्डिनेटिंग कमेटी (दिशा) की मीटिंग में जर्जर सड़कों और गड्ढों की तस्वीरें दिखाकर PWD अधिकारियों और डीएम से पूछा कि सड़कों की हालत ऐसी क्यों है?
राहुल ने कहा कि जब सरकार फंड दे रही है तो काम क्यों नहीं हो रहा है? आप लोग क्या कर रहे हैं? इस मीटिंग में ऊंचाहार से BJP विधायक मनोज पांडेय, एमएलसी और राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह भी मौजूद थे।
कलेक्ट्रेट में करीब ढाई घंटे बैठक से पहले राहुल ने सुबह जनता दरबार लगाया, जहां महिला कांग्रेस नेता ने उन्हें राखी बांधी। राहुल ने यहां सपा नेताओं ने भी मुलाकात की।
कार्यक्रमों के बाद राहुल लखनऊ रवाना हो गए, जहां से वे दिल्ली जाएंगे। 2024 में सांसद बनने के बाद राहुल का यह 8वां रायबरेली दौरा था। इससे पहले वे 19-20 मई को दो दिवसीय दौरे पर आए थे।
राहुल मंगलवार दोपहर दिल्ली से एयर इंडिया की फ्लाइट से लखनऊ पहुंचे थे। पहली बार में विमान लैंड नहीं कर पाया था। 25 मिनट हवा में चक्कर लगाने के बाद दूसरे प्रयास में विमान ने लैंडिंग की थी।
रायबरेली में सर्राफा कारोबारी के घर बैठक के दौरान राहुल ने बच्ची से हाथ मिलाया। महिलाओं ने उन्हें बुके दिया।
रायबरेली में राहुल गांधी के जनता दरबार के दौरान भुएमऊ गेस्ट हाउस पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ी।
रायबरेली में राहुल गांधी ने 3 करोड़ की योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इनमें बारात घर, ट्रांसफॉर्मर और सड़कें शामिल हैं।
सपा विधायकों ने प्रदर्शन किया, पोस्टर लहराए
रायबरेली में सपा विधायक राहुल लोधी, श्याम सुंदर भारती ने दिशा की मीटिंग के दौरान हॉल के बाहर प्रदर्शन किया। हालांकि, राहुल के पहुंचने से पहले पुलिस ने उनसे पोस्टर और बैनर छीन लिए।
पोस्टर पर लिखा था- स्कूल बंद, फर्जी मुकदमे लिखे जा रहे, जमीनों पर कब्जे हो रहे हैं। जिले में आम लोगों की समस्याएं जस की तस हैं, तो ऐसे में दिशा की बैठक का क्या औचित्य है?
रायबरेली में हरचंदपुर से सपा विधायक राहुल लोधी और बछरावां से सपा विधायक श्याम सुंदर भारती ने पोस्टर-बैनर लेकर दिशा बैठक हॉल के बाहर प्रदर्शन किया।
सांसद-जनप्रतिनिधि अफसरों से सरकारी योजनाओं को लेकर सवाल करते हैं। जनता को योजनाओं का फायदा मिल रहा है या नहीं, काम में देरी को लेकर जवाब मांगते हैं।
‘दिशा’ (DISHA) बैठक की अध्यक्षता क्षेत्र के सांसद करते हैं। इसमें जिले के सभी विधायक, डीएम, एसपी और सभी सरकारी विभागों के बड़े अफसर एक साथ बैठते हैं।
राहुल ने मंत्री के सामने दिखाए खराब सड़कों के वीडियो
दिशा बैठक के दौरान अपने मोबाइल में राहुल गांधी ने रायबरेली की सड़कों के गड्ढे दिखाए। इस दौरान कैबिनेट मंत्री मनोज पांडे भी वीडियो देखते रहे। राहुल गांधी ने PWD विभाग के अधिकारियों और डीएम से इन सड़कों की बदहाली को लेकर सवाल पूछा। राहुल ने पूछा कि जिले की सड़कें इतनी खराब क्यों हैं? जब सरकार फंड दे रही है तो सड़कों पर काम क्यों नहीं हो रहा है। पूरे जिले के मुख्स मार्ग और ग्रामीण लिंक रोड बहुत खराब हैं। इसे लेकर क्या कर रहे हैं?