नरेंद्र मोदी :भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी की 100 वीं जयंती पर विशेष लेख
पीएम पद पर रहते हुए उन्होंने विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब हमेशा बेहतरीन तरीके से दिया। वो ज्यादातर समय विपक्षी दल में रहे, लेकिन नीतियों का विरोध तर्कों और शब्दों से किया। एक समय उन्हें कांग्रेस ने गद्दार तक कह दिया था, उसके बाद भी उन्होंने कभी असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं…लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? अटल जी के ये शब्द कितने साहसी हैं…कितने गूढ़ हैं। अटल जी, कूच से नहीं डरे…उन जैसे व्यक्तित्व को किसी से डर लगता भी नहीं था। वो ये भी कहते थे… जीवन बंजारों का डेरा आज यहां, कल कहां कूच है..कौन जानता किधर सवेरा…आज अगर वो हमारे बीच होते, तो वो अपने जन्मदिन पर नया सवेरा देख रहे होते। मैं वो दिन नहीं भूलता जब उन्होंने मुझे पास बुलाकर अंकवार में भर लिया था…और जोर से पीठ में धौल जमा दी थी। वो स्नेह…वो अपनत्व…वो प्रेम…मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा है।
आज 25 दिसंबर का ये दिन भारतीय राजनीति और भारतीय जनमानस के लिए एक तरह से सुशासन का अटल दिवस है। आज पूरा देश अपने भारत रत्न अटल को, उस आदर्श विभूति के रूप में याद कर रहा है, जिन्होंने अपनी सौम्यता, सहजता और सहृदयता से करोड़ों भारतीयों के मन में जगह बनाई। पूरा देश उनके योगदान के प्रति कृतज्ञ है। उनकी राजनीति के प्रति कृतार्थ है।
21वीं सदी को भारत की सदी बनाने के लिए उनकी एनडीए सरकार ने जो कदम उठाए, उसने देश को एक नई दिशा, नई गति दी। 1998 के जिस काल में उन्होंने पीएम पद संभाला, उस दौर में पूरा देश राजनीतिक अस्थिरता से घिरा हुआ था। 9 साल में देश ने चार बार लोकसभा के चुनाव देखे थे। लोगों को शंका थी कि ये सरकार भी उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाएगी। ऐसे समय में एक सामान्य परिवार से आने वाले अटल जी ने, देश को स्थिरता और सुशासन का मॉडल दिया। भारत को नव विकास की गारंटी दी।
वो ऐसे नेता थे, जिनका प्रभाव भी आज तक अटल है। वो भविष्य के भारत के परिकल्पना पुरुष थे। उनकी सरकार ने देश को आईटी, टेलीकम्यूनिकेशन और दूरसंचार की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ाया। उनके शासन काल में ही, एनडीए ने टेक्नॉलजी को सामान्य मानवी की पहुंच तक लाने का काम शुरू किया। भारत के दूर-दराज के इलाकों को बड़े शहरों से जोड़ने के सफल प्रयास किये गए। वाजपेयी जी की सरकार में शुरू हुई जिस स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने भारत के महानगरों को एक सूत्र में जोड़ा वो आज भी लोगों की स्मृतियों पर अमिट है। लोकल कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए भी एनडीए गठबंधन की सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसे कार्यक्रम शुरू किए। उनके शासन काल में दिल्ली मेट्रो शुरू हुई, जिसका विस्तार आज हमारी सरकार एक वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के रूप में कर रही है। ऐसे ही प्रयासों से उन्होंने ना सिर्फ आर्थिक प्रगति को नई शक्ति दी, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों को एक दूसरे से जोड़कर भारत की एकता को भी सशक्त किया।
जब भी सर्व शिक्षा अभियान की बात होती है, तो अटल जी की सरकार का जिक्र जरूर होता है। शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मानने वाले वाजपेयी जी ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहां हर व्यक्ति को आधुनिक और गुणवत्ता वाली शिक्षा मिले। वो चाहते थे भारत के वर्ग, यानि ओबीसी, एससी, एसटी, आदिवासी और महिला सभी के लिए शिक्षा सहज और सुलभ बने।
उनकी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई बड़े आर्थिक सुधार किए। इन सुधारों के कारण भाई-भतीजावाद में फंसी देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिली। उस दौर की सरकार के समय में जो नीतियां बनीं, उनका मूल उद्देश्य सामान्य मानवी के जीवन को बदलना ही रहा।
उनकी सरकार के कई ऐसे अद्भुत और साहसी उदाहरण हैं, जिन्हें आज भी हम देशवासी गर्व से याद करते है। देश को अब भी 11 मई 1998 का वो गौरव दिवस याद है, एनडीए सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद पोकरण में सफल परमाणु परीक्षण हुआ। इसे ‘ऑपरेशन शक्ति’ का नाम दिया गया। इस परीक्षण के बाद दुनियाभर में भारत के वैज्ञानिकों को लेकर चर्चा होने लगी। इस बीच कई देशों ने खुलकर नाराजगी जताई, लेकिन तब की सरकार ने किसी दबाव की परवाह नहीं की। पीछे हटने की जगह 13 मई को न्यूक्लियर टेस्ट का एक और धमाका कर दिया गया। 11 मई को हुए परीक्षण ने तो दुनिया को भारत के वैज्ञानिकों की शक्ति से परिचय कराया था। लेकिन 13 मई को हुए परीक्षण ने दुनिया को ये दिखाया कि भारत का नेतृत्व एक ऐसे नेता के हाथ में है, जो एक अलग मिट्टी से बना है।
उन्होंने पूरी दुनिया को ये संदेश दिया, ये पुराना भारत नहीं है। पूरी दुनिया जान चुकी थी, कि भारत अब दबाव में आने वाला देश नहीं है। इस परमाणु परीक्षण की वजह से देश पर प्रतिबंध भी लगे, लेकिन देश ने सबका मुकाबला किया।
वाजपेयी सरकार के शासन काल में कई बार सुरक्षा संबंधी चुनौतियां आईं। करगिल युद्ध का दौर आया। संसद पर आतंकियों ने कायरना प्रहार किया। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले से वैश्विक स्थितियां बदलीं, लेकिन हर स्थिति में अटल जी के लिए भारत और भारत का हित सर्वोपरि रहा।
जब भी आप वाजपेयी जी के व्यक्तित्व के बारे में किसी से बात करेंगे तो वो यही कहेगा कि वो लोगों को अपनी तरफ खींच लेते थे। उनकी बोलने की कला का कोई सानी नहीं था। कविताओं और शब्दों में उनका कोई जवाब नहीं था। विरोधी भी वाजपेयी जी के भाषणों के मुरीद थे। युवा सांसदों के लिए वो चर्चाएं सीखने का माध्यम बनतीं।
कुछ सांसदों की संख्या लेकर भी, वो कांग्रेस की कुनीतियों का प्रखर विरोध करने में सफल होते। भारतीय राजनीति में वाजपेयी जी ने दिखाया, ईमानदारी और नीतिगत स्पष्टता का अर्थ क्या है।
संसद में कहा गया उनका ये वाक्य… सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए…आज भी मंत्र की तरह हम सबके मन में गूंजता रहता है।
वो भारतीय लोकतंत्र को समझते थे। वो ये भी जानते थे कि लोकतंत्र का मजबूत रहना कितना जरुरी है। आपातकाल के समय उन्होंने दमनकारी कांग्रेस सरकार का जमकर विरोध किया, यातनाएं झेली। जेल जाकर भी संविधान के हित का संकल्प दोहराया। NDA की स्थापना के साथ उन्होंने गठबंधन की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया। वो अनेक दलों को साथ लाए और NDA को विकास, देश की प्रगति और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बनाया।
पीएम पद पर रहते हुए उन्होंने विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब हमेशा बेहतरीन तरीके से दिया। वो ज्यादातर समय विपक्षी दल में रहे, लेकिन नीतियों का विरोध तर्कों और शब्दों से किया। एक समय उन्हें कांग्रेस ने गद्दार तक कह दिया था, उसके बाद भी उन्होंने कभी असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।
उन में सत्ता की लालसा नहीं थी। 1996 में उन्होंने जोड़-तोड़ की राजनीति ना चुनकर, इस्तीफा देने का रास्ता चुन लिया। राजनीतिक षड्यंत्रों के कारण 1999 में उन्हें सिर्फ एक वोट के अंतर के कारण पद से इस्तीफा देना पड़ा। कई लोगों ने उनसे इस तरह की अनैतिक राजनीति को चुनौती देने के लिए कहा, लेकिन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी शुचिता की राजनीति पर चले। अगले चुनाव में उन्होंने मजबूत जनादेश के साथ वापसी की।
संविधान के मूल्य संरक्षण में भी, उनके जैसा कोई नहीं था। डॉ. श्यामा प्रसाद के निधन का उनपर बहुत प्रभाव पड़ा था। वो आपात के खिलाफ लड़ाई का भी बड़ा चेहरा बने। इमरजेंसी केबाद 1977 के चुनाव से पहले उन्होंने ‘जनसंघ’ का जनता पार्टी में विलय करने पर भी सहमति जता दी। मैं जानता हूं कि ये निर्णय सहज नहीं रहा होगा, लेकिन वाजपेयी जी के लिए हर राष्ट्रभक्त कार्यकर्ता की तरह दल से बड़ा देश था, संगठन से बड़ा, संविधान था।
हम सब जानते हैं, अटल जी को भारतीय संस्कृति से भी बहुत लगाव था। भारत के विदेश मंत्री बनने के बाद जब संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देने का अवसर आया, तो उन्होंने अपनी हिंदी से पूरे देश को खुद से जोड़ा। पहली बार किसी ने हिंदी में संयुक्त राष्ट्र में अपनी बात कही। उन्होंने भारत की विरासत को विश्व पटल पर रखा। उन्होंने सामान्य भारतीय की भाषा को संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पहुंचाया।
राजनीतिक जीवन में होने के बाद भी, वो साहित्य और अभिव्यक्ति से जुड़े रहे। वो एक ऐसे कवि और लेखक थे, जिनके शब्द हर विपरीत स्थिति में व्यक्ति को आशा और नव सृजन की प्रेरणा देते थे। वो हर उम्र के भारतीय के प्रिय थे। हर वर्ग के अपने थे।
मेरे जैसे भारतीय जनता पार्टी के असंख्य कार्यकर्ताओं को उनसे सीखने का, उनके साथ काम करने का, उनसे संवाद करने का अवसर मिला। अगर आज बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है तो इसका श्रेय उस अटल आधार को है, जिसपर ये दृढ़ संगठन खड़ा है।
उन्होंने बीजेपी की नींव तब रखी, जब कांग्रेस जैसी पार्टी का विकल्प बनना आसान नहीं था। उनका नेतृत्व, उनकी राजनीतिक दक्षता, साहस और लोकतंत्र के प्रति उनके अगाध समर्पण ने बीजेपी को भारत की लोकप्रिय पार्टी के रूप में प्रशस्त किया। श्री लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों के साथ, उन्होंने पार्टी को अनेक चुनौतियों से निकालकर सफलता के सोपान तक पहुंचाया।
जब भी सत्ता और विचारधारा के बीच एक को चुनने की स्थितियां आईं, उन्होंने इस चुनाव में विचारधारा को खुले मन से चुन लिया। वो देश को ये समझाने में सफल हुए कि कांग्रेस के दृष्टिकोण से अलग एक वैकल्पिक वैश्विक दृष्टिकोण संभव है। ऐसा दृष्टिकोण वास्तव में परिणाम दे सकता है।
आज उनका रोपित बीज, एक वटवृक्ष बनकर राष्ट्र सेवा की नव पीढ़ी को रच रहा है। अटल जी की 100वीं जयंती, भारत में सुशासन के एक राष्ट्र पुरुष की जयंती है। आइए हम सब इस अवसर पर, उनके सपनों को साकार करने के लिए मिलकर काम करें। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जो सुशासन, एकता और गति के अटल सिद्धांतों का प्रतीक हो। मुझे विश्वास है, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के सिखाए सिद्धांत ऐसे ही, हमें भारत को नव प्रगति और समृद्धि के पथ पर प्रशस्त करनें की प्रेरणा देते रहेंगे।
प्रयागराज, एजेंसी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूलों में हिजाब पहनने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने सोमवार को कहा स्कूल में यूनिफॉर्म के नियम का पालन करना जरूरी है। इससे बच्चों में बराबरी की भावना रहती है। स्कूल की अपनी पहचान भी बनती है।
हाईकोर्ट ने कहा, यूनिफॉर्म की बदौलत बिना किसी धार्मिक भेदभाव वाला माहौल बना रहता है। इसलिए कोई भी छात्र या छात्रा स्कूल के तय किए गए ड्रेस कोड को बदलने की जिद नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कहा-
स्कूल में व्यक्तिगत आधार पर हिजाब पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह यूनिफॉर्म के विचार के खिलाफ होगा। इससे स्कूल के अनुशासन को तय करने का अधिकार संस्थान के बजाय अलग-अलग छात्रों के हाथ में चला जाएगा।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिविजन बेंच ने इसके साथ ही नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी। इसमें स्कूल के तय ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी गई थी।
स्कूलों में हिजाब विवाद कर्नाटक से शुरू हुआ
कर्नाटक में हिजाब विवाद जनवरी 2022 में उडुपी के एक सरकारी कॉलेज से शुरू हुआ। कुछ मुस्लिम छात्राओं ने हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की मांग की, जबकि कॉलेज प्रशासन ने इसे यूनिफॉर्म नियम के खिलाफ बताया। इसके बाद विरोध दूसरे कॉलेजों तक पहुंचा और कुछ जगह भगवा शॉल पहनकर जवाबी प्रदर्शन हुए।
15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने छात्राओं की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और स्कूल के तय ड्रेस कोड का पालन कराया जा सकता है।
हिजाब पर सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी पेंडिंग
हिजाब विवाद पर 13 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच का फैसला एकमत नहीं था। दोनों जजों की राय अलग रही।
जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। उनके मुताबिक स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होता है और हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं किया गया।
वहीं जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि इस मामले में यह तय करना जरूरी ही नहीं है कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं। उनके मुताबिक छात्रा की आस्था और पसंद को अनुच्छेद 19 और 25 के तहत देखा जाना चाहिए।
अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की आजादी देता है। पहनावे को भी अभिव्यक्ति से जोड़कर अधिकार का दावा किया जा सकता है, लेकिन इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 25: धर्म मानने और उसका पालन करने की आजादी देता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है।
इसके बाद मामले को CJI की बैंच में भेजा गया था। हालांकि, 4 साल से सुनवाई नहीं हुई है।
इस्लाम में हिजाब की बात कहां से आई?
कुरान में महिलाओं के पहनावे और पर्दे से जुड़ी सबसे अहम बातें सूरह अन-नूर की आयत 31 और सूरह अल-अहजाब की आयत 59 में मिलती हैं।
सूरह अन-नूर 24:31: महिलाओं से निगाहें नीची रखने, पाकदामनी की हिफाजत करने और अपनी सजावट न दिखाने को कहा गया है। इसी आयत में ‘खुमुर’ यानी सिर ढंकने वाले कपड़े को सीने पर डालने की बात कही गई है।
कुरान में इसके पीछे की वजह क्या थी?
1. पहचान और सुरक्षा
सूरह अल-अहजाब 33:59 में बाहरी कपड़ा डालने की वजह यह बताई गई है कि महिलाओं को पहचाना जाए और उन्हें परेशान न किया जाए। कुरान 33:59
2. निजी जीवन की मर्यादा
सूरह अल-अहजाब 33:53 में पैगंबर की पत्नियों से बात या कुछ मांगने के लिए पर्दे की आड़ रखने की बात कही गई है। इसी आयत में इसे दिलों की पवित्रता के लिए बेहतर बताया गया है। कुरान 33:53
3. सिर्फ महिलाओं के लिए नियम नहीं
कुरान की सूरह अन-नूर 24:30 में पहले पुरुषों को निगाहें नीची रखने और अपनी पाकदामनी की हिफाजत करने का निर्देश दिया गया है।
अब सिलसिलेवार पूरा मामला–
याचिका लगाने वाली छात्रा ने प्रयागराज के एक निजी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ती है। उसने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। छात्रा का तर्क था कि वह कक्षा 6 से 10 तक हिजाब पहनकर ही स्कूल में पढ़ाई करती रही है। कभी कोई आपत्ति नहीं जताई गई। छात्रा ने याचिका के साथ पुराने पहचान पत्र और स्कूल की ग्रुप फोटो भी लगाई थी।
छात्रा ने कहा- वह 11वीं कक्षा में भी हिजाब पहनकर ही स्कूल जाना चाहती है, लेकिन परमिशन नहीं मिल रही। हमने डीएम से भी शिकायत की, जिस पर जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ने रिपोर्ट मांगी। स्कूल प्रिंसिपल ने साफ किया कि यह शिक्षा संस्थान है, जहां सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड है। किसी एक छात्रा को अलग छूट देने से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित होगी।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि हिजाब पहनना उसकी धार्मिक मान्यता से जुड़ा है। इसे पहनने से उसे निजता, व्यक्तिगत आजादी और बोलने की आजादी जैसे मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं। ऐसे में स्कूल को निर्देश दिया जाए कि उसे हिजाब पहनने से न रोके।
कोर्ट बोला- ड्रेस तय करने का हक सिर्फ स्कूल प्रशासन के पास
कोर्ट ने कहा- जब तक स्कूल का ड्रेस कोड सभी बच्चों के लिए एक जैसा है, सही मंशा से बनाया गया है और किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, तब तक ड्रेस क्या होगी यह तय करने का पूरा हक सिर्फ स्कूल प्रशासन के पास है। अगर स्कूल ने पहले कभी हेडस्कार्फ (हिजाब) पहनने की छूट दी भी थी, तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह छात्राओं का हमेशा के लिए पक्का अधिकार बन गया। स्कूल प्रशासन अपने नियमों में बदलाव करने के लिए स्वतंत्र है। वह पुरानी छूट को जारी रखने के लिए मजबूर नहीं है।
कोर्ट ने कहा- हिजाब पहनना इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं
कोर्ट ने कहा- जहां भी यह मुद्दा उठा है, हाईकोर्ट की राय एक रही है कि महिलाओं के लिए हिजाब पहनना इस्लाम का कोई जरूरी हिस्सा नहीं है। ऐसा नहीं है कि इसके बिना धर्म खतरे में पड़ जाएगा या इसे न पहनने पर महिला धर्म से बाहर हो जाएगी। इसे साबित करने के लिए कोई तथ्य या सबूत भी पेश नहीं किए गए हैं।
कोर्ट ने कहा- आस्था पर रोक नहीं, नियमों के पालन की उम्मीद कर रहे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केरल, बॉम्बे और कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने फैसले का जिक्र किया। ‘फातिमा तस्नीम बनाम केरल राज्य’ के मामले में कोर्ट ने कहा था कि एक तरफ छात्र या छात्रा का अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है, तो दूसरी तरफ स्कूल या संस्था का अपना नियम-कानून चलाने का अधिकार है। जब इन दोनों अधिकारों के बीच टकराव या विवाद होता है, तो व्यक्तिगत पसंद के बजाय संस्था के बड़े हित और अनुशासन को ज्यादा महत्व दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में ‘आयशा शिफा बनाम कर्नाटक राज्य’ मामले में दो जजों की राय बंटी हुई थी, इसलिए इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। कोर्ट ने कहा कि स्कूल छात्रा की आस्था पर कोई रोक नहीं लगा रहा, बल्कि केवल संस्थागत अनुशासन और यूनिफॉर्म के पालन की अपेक्षा कर रहा है। इसके बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
भोपाल/पटना/जयपुर/लखनऊ, एजेंसी। दिल्ली-NCR में मंगलवार सुबह लगातार दूसरे दिन तेज बारिश हुई है। एम्स फ्लाईओवर, कनॉट प्लेस, ITO और आरके पुरम समेत कई इलाकों में 3-4 फीट तक पानी भर गया। मौसम विभाग ने रेड अलर्ट जारी किया है।
दिल्ली-गुरुग्राम को जोड़ने वाले NH-48 पर महिपालपुर के पास ट्रैफिक जाम लगा। दिल्ली एयरपोर्ट ने यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी की। सोमवार को करीब 390 फ्लाइट्स लेट हुईं, 15 डायवर्ट और 26 कैंसिल की गईं।
गुरुग्राम में कई जगह 3 फीट तक पानी भरने के बाद मंगलवार को सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में वर्क फ्रॉम होम लागू किया गया। सोमवार को कई स्कूल बसें 3-6 घंटों तक पानी में फंसी रहीं।
यूपी के अयोध्या समेत 15 शहरों में बारिश हो रही है। वाराणसी में सोमवार रात 8 बजे से बारिश जारी है और स्कूल बंद कर दिए गए हैं। बारिश से जुड़ी घटनाओं में 4 लोगों की मौत हुई। मथुरा में सड़कें और रिहायशी इलाके जलमग्न हैं।
मध्य प्रदेश के भोपाल समेत कई जिलों में भी तेज बारिश हुई। विदिशा के बाजार में पानी भर गया और भोपाल में ट्रैफिक प्रभावित हुआ। प्रदेश में अब तक 28.75 इंच बारिश हुई है।
मौसम विभाग ने 27 अगस्त तक एमपी, यूपी, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, उत्तराखंड और केरल समेत 15 राज्यों में भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है।
सैटेलाइट मैप में देखें मानसूनी बादलों की स्थिति
देशभर से मौसम की तस्वीरें
दिल्ली के संगम विहार इलाके में सड़कों पर घुटनों तक पानी भर गया। स्कूली बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।
हरियाणा के गुरुग्राम में मूसलाधार बारिश में सुभाष चौक पर फंसी स्कूल बस में मौजूद बच्चे।
उत्तरकाशी में खरादी झूला पुल के पास यमुना नदी के तेज बहाव में फंसे व्यक्ति का रेस्क्यू किया गया।
राजस्थान के करौली में पानी भरने से व्यापारियों ने दुकानें बंद कर दी थीं।
बिहार में भागलपुर में राघोपुर-नरकटिया तटबंध टूट गया है। इससे करीब 10 हजार की आबादी प्रभावित हुई है।
पटना, एजेंसी। BPSC TRE-4 में PT-मेन, नेगेटिव मार्किंग हटाने और 100% डोमिसाइल की मांग को लेकर पटना के गर्दनीबाग में छात्रों का आंदोलन जारी है। मंगलवार को ऑल बिहार स्टूडेंट यूनियन (ABSU) के छात्र CM हाउस का घेराव करने निकले।
छात्रों को रोकने के लिए जेपी गोलंबर पर पुलिस के साथ-साथ CRPF जवानों को भी तैनात किया गया, लेकिन छात्र बैरिकेडिंग तोड़ते हुए डाकबंगला पहुंच गए। इस दौरान छात्रों की CRPF जवानों के साथ धक्का-मुक्की हुई।
प्रदर्शन के दौरान एक छात्र का सिर फट गया, जबकि एक छात्रा बेहोश हो गई। पुलिस ने छात्रों को रोकने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। पानी की बौछार के बीच प्रदर्शन कर रहे छात्र शैंपू लगाकर नहाते भी दिखे।
कुछ छात्रों ने पुलिस की ओर पत्थरबाजी भी की, जिसमें टाउन DSP कामाख्या नारायण सिंह घायल हो गए। कई पुलिसकर्मियों को भी चोट लगी है। हालात बिगड़ता देख पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। कुछ छात्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया।
पुलिस ने कुछ छात्रों को हिरासत में भी लिया है। छात्रों के प्रदर्शन के बीच बख्तरबंद गाड़ी भी बुलाई गई। इस गाड़ी का इस्तेमाल आमतौर पर नक्सल प्रभावित इलाकों में किया जाता है। पटना के गर्दनीबाग में छात्र 18 अगस्त से धरने पर बैठे हैं।
छात्रों के CM हाउस घेराव की तस्वीरें…
छात्र को घसीटकर ले जाती पुलिस।
छात्रों के प्रदर्शन के बीच बंकर गाड़ी बुलाई गई है।
डाकबंगला चौराहे पर लोहे की शील्ड लगाकर छात्रों को रोका गया।
छात्रों पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया।
पानी की बैछार के दौरान छात्र शैंपू लगाकर नहाने लगे।
जेपी गोलंबर पर छात्र बैरिकेडिंग लेकर भागने लगे।
जेपी गोलंबर पर छात्र बैरिकेडिंग पर चढ़ गए।
‘हाथी चले बाजार..कुत्ते भौंके हजार’, बयान पर BPSC ने माफी मांगी
सोमवार को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राजेश कुमार सिंह से गर्दनीबाग में छात्रों के प्रदर्शन को लेकर कहा था कि “एक कहावत आपने सुना होगा, हाथी चले बाजार तो कुत्ते भौंके हजार।”
उनके इस बयान के बाद प्रदर्शन कर रहे छात्र भड़क गए। एक बार कॉकरोच बोला गया था, तो प्रधान जी चले गए। अब सचिव की नौकरी जाएगी। विवाद बढ़ने के बाद BPSC एग्जाम कंट्रोलर ने वीडियो जारी कर माफी मांग ली है।
वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने BPSC के एग्जाम कंट्रोलर राजेश कुमार सिंह को सस्पेंड करने के निर्देश दिए हैं।