Connect with us

बिज़नस

कनाडाई राजनयिक की चेतावनीः कनाडा को चीन के साथ व्यापार पड़ेगा भारी, झेलना पड़ सकता अमेरिका का गुस्सा

Published

on

ओटावा, एजेंसी। कनाडा का चीन के साथ व्यापार बढ़ाने का फैसला अब बड़े आर्थिक और कूटनीतिक जोखिम के रूप में देखा जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम कनाडा की आर्थिक सुरक्षा को कमजोर कर सकता है और उसके सबसे बड़े साझेदार  अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है। पूर्व कनाडाई राजनयिक माइकल कोवरिग (Michael Kovrig) ने इस नीति को “रिस्की प्ले” बताया है। उनका कहना है कि चीन, अमेरिका के साथ कनाडा की समस्याओं का समाधान नहीं है। अगर कनाडा चीन के साथ ज्यादा नजदीकी बढ़ाता है, तो वॉशिंगटन की नजर में वह एक “अविश्वसनीय सहयोगी” बन सकता है, जिससे भविष्य के व्यापार समझौतों पर असर पड़ सकता है।

आंकड़ों के अनुसार, कनाडा का लगभग 75% निर्यात अमेरिका को जाता है, जबकि चीन का हिस्सा सिर्फ करीब 4% है। इसका मतलब है कि कनाडा की अर्थव्यवस्था अभी भी काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर है। ऐसे में चीन की ओर झुकाव संतुलन बिगाड़ सकता है। प्रधानमंत्री Mark Carney की सरकार ने चीन के साथ एक नई डील की है। इस समझौते के तहत सीमित संख्या में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का आयात किया जाएगा और कुछ कनाडाई कृषि उत्पादों पर टैरिफ में राहत दी जाएगी। सरकार का लक्ष्य 2030 तक चीन को निर्यात 50% तक बढ़ाना है। हालांकि विशेषज्ञों ने इस डील को लेकर कई चिंताएं जताई हैं। उनका कहना है कि चीन इस समय “बेचने” की स्थिति में है, यानी वह अपने उत्पाद दुनिया भर में ज्यादा से ज्यादा निर्यात करना चाहता है, जबकि खरीदने में उसकी रुचि कम है। इससे कनाडा के बाजार में सस्ते चीनी सामान की भरमार हो सकती है, जो स्थानीय उद्योगों को नुकसान पहुंचा सकती है।

माइकल कोवरिग ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बड़े रिटेल स्टोर छोटे दुकानदारों को खत्म कर देते हैं, वैसे ही सस्ते आयात घरेलू उद्योग को कमजोर कर सकते हैं। इससे धीरे-धीरे कनाडा की चीन पर निर्भरता बढ़ सकती है।  कृषि क्षेत्र को लेकर भी चिंता जताई गई है। कनाडा के कैनोला, पोर्क और सीफूड जैसे सेक्टर पहले से ही चीन पर काफी निर्भर हैं। अगर भविष्य में चीन किसी कारण से इन उत्पादों का आयात बंद कर देता है, तो इन सेक्टरों को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है और हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन आर्थिक दबाव का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकता है। जैसे-जैसे कनाडा की निर्भरता बढ़ेगी, चीन अपने बाजार में ज्यादा पहुंच या ज्यादा कोटा मांग सकता है, जिससे कनाडा की नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।

 हालांकि, कोवरिग ने यह नहीं कहा कि चीन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। उनका सुझाव है कि कनाडा को चीन के साथ व्यापार जरूर करना चाहिए, लेकिन बहुत सावधानी और सख्त नियंत्रण के साथ, ताकि किसी तरह का दुरुपयोग न हो। कुल मिलाकर, कनाडा का यह कदम एक तरफ नए आर्थिक अवसर खोल सकता है, लेकिन दूसरी तरफ यह अमेरिका के साथ उसके संबंधों और घरेलू उद्योगों के लिए खतरा भी बन सकता है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा को संतुलन बनाकर और सोच-समझकर आगे बढ़ना होगा।

Continue Reading

देश

खाने के तेल की कीमतों में हलचल, दो हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पाम ऑयल

Published

on

मुंबई, एजेंसी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाने के तेल, खासकर पाम ऑयल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। बायोफ्यूल की बढ़ती मांग और मजबूत ग्लोबल संकेतों के चलते मलेशियाई बाजार में पाम ऑयल के दाम दो हफ्तों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। फिलहाल इसकी कीमत 4,600 रिंग्गित प्रति टन के पार निकल चुकी है।

कमोडिटी एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप की बायोफ्यूल नीतियों के कारण वेजिटेबल ऑयल की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। यही वजह है कि जून महीने में भी कीमतों में बड़ी नरमी की उम्मीद कम नजर आ रही है।

उत्पादन और सप्लाई का असर

मलेशिया और इंडोनेशिया वैश्विक पाम ऑयल सप्लाई के सबसे बड़े केंद्र माने जाते हैं। अप्रैल में पाम ऑयल की कीमतें 4,800 रिंग्गित प्रति टन तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में मुनाफावसूली के कारण थोड़ी गिरावट आई लेकिन निचले स्तरों पर मजबूत खरीदारी ने बाजार को फिर सहारा दिया।

मलेशियन पाम ऑयल बोर्ड (MPOB) के अनुसार, जून में कच्चे पाम ऑयल की कीमतें औसतन 4,400 रिंग्गित प्रति टन के आसपास रह सकती हैं। मार्च से अक्टूबर का समय पाम ऑयल उत्पादन के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है, जिससे सप्लाई में कुछ बढ़ोतरी भी देखने को मिल रही है।

सोयाबीन तेल महंगा, पाम ऑयल को फायदा

अमेरिका और यूरोप में बायोफ्यूल सेक्टर की मांग बढ़ने से सोयाबीन तेल की कीमतें नवंबर 2022 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे पाम ऑयल अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ता और प्रतिस्पर्धी विकल्प बनकर उभरा है।

  • सोयाबीन तेल, रेपसीड तेल से लगभग 145 डॉलर प्रति टन महंगा है
  • पाम ऑयल के मुकाबले इसकी कीमत करीब 110 डॉलर प्रति टन अधिक बनी हुई है
  • सूरजमुखी तेल से भी सोयाबीन तेल करीब 45 डॉलर प्रति टन महंगा है

भारतीय बाजार के लिए राहत

भारतीय आयातकों और उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि पाम ऑयल अभी भी सबसे किफायती वेजिटेबल ऑयल बना हुआ है। मलेशिया से आने वाला पाम ओलिन, अर्जेंटीना के सोयाबीन तेल से सस्ता पड़ रहा है, जिसके चलते भारतीय खरीदार पाम ऑयल को प्राथमिकता दे रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, 2026 के शुरुआती चार महीनों में मलेशिया का पाम ऑयल निर्यात 25.5% बढ़कर 5.38 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो 2019 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।

Continue Reading

देश

19 May/Petrol-Diesel Price: एक हफ्ते में दूसरी बार महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, देखें दिल्ली समेत प्रमुख शहरों में नए रेट

Published

on

नई दिल्ली, एजेंसी। मंगलवार को पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में लगभग 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। यह एक हफ़्ते से भी कम समय में ईंधन की दरों में दूसरी बढ़ोतरी है, जो सरकारी तेल कंपनियों द्वारा कीमतों में बदलाव पर लगभग चार साल से लगी रोक हटाने के बाद हुई है।

दिल्ली में नई कीमतें
पेट्रोल
: रू.97.77 से बढ़कर रू.98.64 प्रति लीटर
डीजल: रू.90.67 से बढ़कर रू.91.58 प्रति लीटर

इससे पहले शुक्रवार को, 4 साल से भी ज़्यादा समय में पहली बार पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। ईरान युद्ध के बाद वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण, सरकारी ईंधन खुदरा विक्रेताओं को महीनों तक प्रमुख राज्यों के चुनावों के दौरान कीमतें स्थिर रखने के बाद, अपने बढ़ते नुकसान का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना पड़ा।

वैल्यू-एडेड टैक्स (VAT) में अंतर के कारण अलग-अलग राज्यों में कीमतें अलग-अलग होती हैं।
15 मई को, दिल्ली और मुंबई सहित कई शहरों में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) की कीमतों में भी 2 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की गई थी। रविवार को, CNG की कीमतों में फिर से 1 रुपया प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की गई।

क्यों बढ़ रही कीमतें ?
28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों और उसके जवाब में तेहरान की जवाबी कार्रवाई के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से भी ज़्यादा का उछाल आया है। इन घटनाओं ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाले तेल प्रवाह को बाधित कर दिया है, जो वैश्विक तेल शिपमेंट के लिए एक प्रमुख मार्ग है।

इस उछाल के बावजूद, खुदरा ईंधन की कीमतें दो साल पुराने स्तर पर ही स्थिर रखी गई थीं। सरकार का कहना था कि यह कीमत के प्रति संवेदनशील उपभोक्ताओं को वैश्विक ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी से बचाने का एक प्रयास था। लेकिन विपक्षी दलों ने इस कदम के पीछे राजनीतिक मकसद देखा, क्योंकि उस समय प्रमुख राज्यों में चुनाव हो रहे थे।

शुक्रवार को हुई 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी चुनावों के संपन्न होने के बाद की गई थी। इन चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पश्चिम बंगाल सहित 5 में से 3 राज्यों में जीत हासिल करके अपना प्रभाव बढ़ाया था। यह बढ़ोतरी, लागत के बराबर कीमतें लाने के लिए ज़रूरी कुल बढ़ोतरी का केवल 5वां हिस्सा ही थी।

2022 से कीमतें स्थिर बनी हुई थीं
सोमवार को, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने बताया था कि 15 मई को की गई बढ़ोतरी से नुकसान में एक-चौथाई की कमी आई है, लेकिन तेल कंपनियों को अभी भी प्रतिदिन लगभग 750 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। मंगलवार को हुई बढ़ोतरी के बाद, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें अब मई 2022 के बाद से सबसे ज़्यादा हो गई हैं।

अप्रैल 2022 से कीमतें स्थिर बनी हुई थीं, सिवाय मार्च 2024 में लोकसभा चुनावों से ठीक पहले पेट्रोल और डीज़ल पर प्रति लीटर 2 रुपये की एक बार की कटौती के। कीमतों में आखिरी बढ़ोतरी अप्रैल 2022 में हुई थी।

मुंबई में अब पेट्रोल की कीमत 107.59 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की कीमत 94.08 रुपये प्रति लीटर है। 
-कोलकाता में अब पेट्रोल की कीमत 109.70 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की 96.07 रुपये है, 
चेन्नई में पेट्रोल की कीमतें बढ़कर 104.49 रुपये और डीज़ल की 96.11 रुपये हो गईं।

इंडस्ट्री के सूत्रों ने बताया कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के मुकाबले यह मूल्य वृद्धि मामूली है और खुदरा विक्रेताओं को अभी भी काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

क्रिसिल के अनुसार, 15 मई की बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल पर लगभग 10 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल पर 13 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा था।
कीमतों में ये दोनों बढ़ोतरी मार्च में घोषित एक्साइज़ ड्यूटी में कटौती के बाद हुई हैं, और ऐसे समय में आई हैं जब सरकार ईंधन की खपत को कम करने और देश के तेल आयात बिल को नियंत्रित करने के उपाय लागू कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ़्ते ईंधन बचाने, घर से काम करने (work-from-home) और यात्रा कम करने का आग्रह किया था, क्योंकि बढ़ती ऊर्जा कीमतें भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रही हैं और लगातार तीसरे वर्ष चालू खाता घाटे को बढ़ाने का खतरा पैदा कर रही हैं।

कुछ राज्य सरकारों ने पहले ही अपने विभागों को यात्रा सीमित करने, आमने-सामने की बैठकों से बचने और कम कर्मचारियों के साथ काम करने के निर्देश दिए हैं।

निजी ईंधन खुदरा विक्रेताओं ने पहले ही पंप की कीमतें बढ़ा दी थीं। देश की सबसे बड़ी निजी ईंधन खुदरा विक्रेता, नायरा एनर्जी ने मार्च में पेट्रोल की कीमतें 5 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ाई थीं, जबकि शेल ने 1 अप्रैल से पेट्रोल की कीमतें 7.41 रुपये और डीज़ल की 25 रुपये प्रति लीटर बढ़ाई थीं। बेंगलुरु में, शेल पेट्रोल 119.85 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 123.52 रुपये प्रति लीटर बेच रहा है।

LPG की कीमतें 60 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ोतरी
घरेलू रसोई गैस (LPG) की कीमतें मार्च में 60 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाई गई थीं, लेकिन वे अभी भी वास्तविक लागत से काफी कम हैं। तेल कंपनियों को 14.2 किलोग्राम वाले LPG सिलेंडर पर 674 रुपये का नुकसान हो रहा है। इंडस्ट्री के सूत्रों ने बताया कि कीमतों में यह बढ़ोतरी सोच-समझकर की गई लगती है – यह तेल कंपनियों पर मार्जिन के दबाव को कुछ हद तक कम करने के लिए काफी है, लेकिन इससे महंगाई का कोई बड़ा झटका नहीं लगेगा।

हालांकि, उन्होंने कहा कि इस बढ़ोतरी का महंगाई पर कुछ असर ज़रूर पड़ेगा। भारत की खुदरा महंगाई दर, जिसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से मापा जाता है, मार्च के 3.40 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल 2026 में 3.48 प्रतिशत हो गई। वहीं, थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो 42 महीनों का उच्चतम स्तर है। इसकी मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में आई तेज़ बढ़ोतरी है।

Continue Reading

देश

GDP Growth Outlook: दो बड़ी एजेंसियों ने घटाया भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान

Published

on

मुंबई, एजेंसी। भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ती दिख रही है। India Ratings and Research और ICRA ने पश्चिम एशिया संकट, महंगे कच्चे तेल, कमजोर वैश्विक मांग और रुपए में गिरावट के बीच भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान घटा दिया हैं।

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने चालू वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.7% रहने का अनुमान जताया है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 6.9% अनुमान से कम है। एजेंसी के मुताबिक मांग और आपूर्ति दोनों में सुस्ती, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितताएं अर्थव्यवस्था पर दबाव बना सकती हैं।

‘अल नीनो’ के असर से कृषि उत्पादन प्रभावित 

रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है। साथ ही 2026 के मध्य से ‘अल नीनो’ के असर से कृषि उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। एजेंसी ने FY27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है। उसके अनुसार तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से आर्थिक वृद्धि दर पर करीब 0.44 प्रतिशत अंक का नकारात्मक असर पड़ सकता है।

इंडिया रेटिंग्स की निदेशक (अर्थशास्त्र) मेघा अरोड़ा ने कहा कि ऊंची महंगाई, कमजोर पूंजी प्रवाह, रुपए में गिरावट, सरकार के पूंजीगत व्यय में संभावित कमी, धीमा वैश्विक व्यापार और कमजोर औद्योगिक उत्पादन प्रमुख चुनौतियां हैं। एजेंसी ने यह भी कहा कि यदि सरकारी पूंजीगत व्यय में 10% की कटौती होती है तो वृद्धि दर करीब 6% तक फिसल सकती है।

4.4% रह सकती है खुदरा मुद्रास्फीति

एजेंसी का अनुमान है कि खुदरा मुद्रास्फीति 4.4% रह सकती है, जो RBI के लक्ष्य दायरे में होगी। वहीं रुपया औसतन 94.28 प्रति डॉलर रह सकता है। मंगलवार को रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 96.47 तक पहुंच गया।

ICRA का क्या है अनुमान

दूसरी ओर, ICRA ने FY2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.5% से घटाकर 6.2% कर दिया है। एजेंसी ने इसके लिए पश्चिम एशिया संकट और महंगे कच्चे तेल को प्रमुख कारण बताया है।

इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री Aditi Nayar ने कहा कि अब FY27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है, जबकि पहले यह 85 डॉलर प्रति बैरल आंकी गई थी। उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र की सुस्ती, निर्यात में गिरावट और पश्चिम एशिया संकट से बढ़े लागत दबाव का असर औद्योगिक गतिविधियों पर दिखाई दे रहा है।

इक्रा ने FY2025-26 की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7% रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले तीन तिमाहियों का निचला स्तर होगा। एजेंसी के अनुसार औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, हालांकि कृषि क्षेत्र में मामूली सुधार की उम्मीद बनी हुई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक वृद्धि में नरमी और पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण शिपिंग बाधाओं का असर भारत के निर्यात पर पड़ा है। मार्च तिमाही में वस्तु निर्यात सालाना आधार पर 2.8% घट गया, जबकि दिसंबर तिमाही में इसमें 1.4% की मामूली वृद्धि दर्ज की गई थी। 

Continue Reading
Advertisement

Trending

Copyright © 2020 Divya Akash | RNI- CHHHIN/2010/47078 | IN FRONT OF PRESS CLUB TILAK BHAVAN TP NAGAR KORBA 495677