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G7 समिट में PM मोदी एंट्री; ट्रंप भी पहुंचे सम्मेलन में, दोनों की मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजर

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पेरिस, एजेंसी। एवियन-ले-बैंस (फ्रांस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) मंगलवार को फ्रांस के खूबसूरत शहर Évian-les-Bains पहुंच गए, जहां वह 52वें जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। यह सम्मेलन 15 से 17 जून तक आयोजित किया जा रहा है और इसमें दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के नेता वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा कर रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) के विशेष निमंत्रण पर पहुंचे मोदी का सम्मेलन स्थल पर औपचारिक स्वागत किया जाएगा। जी7 देशों के अलावा भारत सहित कई साझेदार देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं।

#WATCH | Prime Minister Narendra Modi arrives in Evian, France. He will participate in the #G7Summit here.

(via ANI) pic.twitter.com/DWJSGTj6jS

— Hindustan Times (@htTweets) June 16, 2026

सम्मेलन में  राष्ट्रपति.डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) भी पहुंच चुके हैं। दुनिया की निगाहें अब मोदी और ट्रंप के बीच होने वाली बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय बैठक पर टिकी हैं, जिसे सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद यह उनका पहला बड़ा बहुपक्षीय मंच है, जहां वह दुनिया के प्रमुख नेताओं के साथ वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकात को लेकर कूटनीतिक हलकों में काफी उत्सुकता है, क्योंकि दोनों नेताओं के बीच व्यापार, रक्षा सहयोग, वीजा नीति, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

🚨 Formidable US President Trump arrive at the G7 summit meeting venue accompanied by France’s Macron and Ukrainian Zelenskyy.

Remember that time Trump pushed through other leaders to stand at the forefront?

Who has that video? Share below. 😂 pic.twitter.com/Dzn2VelCNg

— Wolf Brief (@wolfbrief_) June 16, 2026

ट्रंप से मुलाकात पर सबसे ज्यादा नजर
फ्रांस पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह विश्व नेताओं के साथ अहम वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि भारत एक अधिक टिकाऊ, समृद्ध और समावेशी विश्व व्यवस्था के लिए सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस सम्मेलन का सबसे चर्चित पहलू प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump)के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक है। दोनों नेताओं की यह करीब 16 महीनों में पहली आमने-सामने मुलाकात होगी। माना जा रहा है कि दोनों नेता व्यापार, वीजा, ऊर्जा सहयोग, रक्षा, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक साझेदारी जैसे विषयों पर चर्चा कर सकते हैं।

इन मुद्दों पर होगा वैश्विक मंथन
जी7 सम्मेलन में जिन प्रमुख विषयों पर चर्चा होनी है, उनमें शामिल हैं 

  • वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
  • पश्चिम एशिया की स्थिति और अमेरिका-ईरान समझौता
  • रूस-यूक्रेन युद्ध
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का नियमन
  • महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति
  • ऊर्जा सुरक्षा
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती
  • सतत विकास और जलवायु चुनौतियां

अन्य नेताओं से भी मुलाकात
जी7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान  के साथ भी द्विपक्षीय बैठकें प्रस्तावित हैं। गौरतलब है कि जब दुनिया यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, ऊर्जा सुरक्षा और एआई शासन जैसे मुद्दों से जूझ रही है, भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है। जी7 मंच पर मोदी की मौजूदगी भारत की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक ताकत का भी संकेत मानी जा रही है।

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कमजोर मानसून से बढ़ी महंगाई की चिंता, टमाटर से लेकर दाल-चावल तक महंगे होने के संकेत

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मुंबई, एजेंसी। देश के कई हिस्सों में जुलाई के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज होने के बाद खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मानसून की रफ्तार नहीं सुधरी तो खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका सीधा असर सब्जियों, दालों और अनाज की उपलब्धता पर पड़ेगा, जिससे बाजार में कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि, अंतिम स्थिति मानसून के आगामी चरण और फसल की प्रगति पर निर्भर करेगी।

मौसम में बदलाव का सबसे तेज प्रभाव जल्दी खराब होने वाली सब्जियों पर दिखाई देता है। टमाटर, हरी सब्जियां, मिर्च और अन्य ताजी उपज की आपूर्ति बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि वर्षा कम होती है तो उत्पादन घटने के साथ मंडियों में आवक भी कम हो जाती है। ऐसे में मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा होने से कीमतों में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगले कुछ सप्ताह में सब्जियों के दाम में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

दाल और चावल की कीमतों पर भी बन सकता है दबाव

कमजोर मानसून का असर केवल सब्जियों तक सीमित नहीं रहता। खरीफ सीजन में धान और कई प्रकार की दालों की खेती भी पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती है। यदि बुआई का रकबा घटता है या फसल को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में आने वाले महीनों में चावल और दाल की कीमतों पर भी दबाव बनने की आशंका है। खाद्यान्न महंगे होने से आम परिवारों के मासिक रसोई बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

मानसून की चाल पर टिकी किसानों और बाजार की नजर

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार कई क्षेत्रों में अब तक सामान्य से कम वर्षा हुई है। किसान भी अच्छी बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि फसलों की बुआई समय पर पूरी हो सके। कृषि क्षेत्र में उत्पादन और बाजार में आपूर्ति का सीधा संबंध मौसम से होता है। यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश होती है तो स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रहने पर खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

महंगाई पर पड़ सकता है व्यापक असर

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश की खुदरा महंगाई दर पर भी पड़ता है। सब्जियां, दाल और अनाज उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनकी कीमतें बढ़ने पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, जिससे आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होती है। ऐसे समय में सरकार और संबंधित एजेंसियां भी आपूर्ति की निगरानी तथा आवश्यक कदम उठाने पर ध्यान देती हैं।

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EPFO ने लागू की नई EDLI योजना, कर्मचारियों को मिलेगा बड़ा सुरक्षा कवच

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नई दिल्ली, एजेंसी। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के करोड़ों सदस्यों और उनके परिवारों के लिए केंद्र सरकार ने कर्मचारी निक्षेप सहबद्ध बीमा योजना-2026 (EDLI Scheme 2026) लागू कर दी है। सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के तहत अधिसूचित यह नई योजना 29 जून से पूरे देश में प्रभावी हो चुकी है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों के परिवारों को पहले से अधिक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है।

नई योजना के तहत पहले की तरह अधिकतम 7 लाख रुपए का बीमा कवर जारी रहेगा। इसके अलावा पहली बार पीएफ खाते के औसत बैलेंस के आधार पर अधिकतम 1 लाख रुपए तक का अतिरिक्त एश्योरेंस बेनिफिट भी दिया जाएगा। यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है और उसके पीएफ खाते का औसत बैलेंस 50 हजार रुपए से अधिक है, तो नॉमिनी को 50 हजार रुपए की निश्चित राशि के साथ अतिरिक्त रकम का लाभ मिलेगा। यह अतिरिक्त लाभ अधिकतम 1 लाख रुपए तक सीमित रहेगा।

सरकार ने बीमा दावे के नियमों को भी आसान बनाया है। यदि किसी कर्मचारी का अंतिम पीएफ अंशदान जमा होने के छह महीने के भीतर निधन हो जाता है, तो उसके परिवार को भी 7 लाख रुपए तक के बीमा कवर का लाभ मिलेगा।

20 दिन में होगा क्लेम सेटलमेंट

नई व्यवस्था में क्लेम निपटान की समय-सीमा भी तय कर दी गई है। सभी जरूरी दस्तावेज मिलने के बाद बीमा दावा 20 दिनों के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा। तय समय सीमा से देरी होने पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा और विशेष परिस्थितियों में इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी पर भी तय की जा सकती है।

पूरी तरह डिजिटल हुआ सिस्टम

इसके अलावा पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है। अब नियोक्ताओं को बीमा अंशदान और प्रशासनिक शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा, जबकि क्लेम दाखिल करने और उसके निपटान की प्रक्रिया भी पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संचालित की जाएगी। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से पारदर्शिता बढ़ेगी और कर्मचारियों के परिवारों को समय पर आर्थिक सहायता मिल सकेगी।

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भारतीय कंपनियों का बॉन्ड निर्गम जून में 28% बढ़कर 1.33 लाख करोड़ रुपए पर

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मुंबई, एजेंसी। सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में गिरावट आने, उधारी लागत में कमी और बाजार धारणा में सुधार के बीच जून में कॉरपोरेट बॉन्ड के जरिए धन जुटाने में सालाना आधार पर 28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने जून में कॉरपोरेट बॉन्ड जारी कर 1.33 लाख करोड़ रुपए जुटाए, जो एक साल पहले इसी महीने के 1.04 लाख करोड़ रुपए और मई के 93,675 करोड़ रुपए से अधिक है। 

रॉकफोर्ट एलएलपी के प्रबंध साझेदार वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा, “अप्रैल और मई में सुस्त रहने के बाद जून में बाजार परिस्थितियां अनुकूल होने से कॉरपोरेट बॉन्ड के निर्गम में तेज वृद्धि हुई। इसका सबसे बड़ा कारण मानक सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) के प्रतिफल में उल्लेखनीय गिरावट रही, जिससे कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में उधारी लागत कम हुई।” चॉइस वेल्थ के उपाध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब आने से मुद्रास्फीति और राजकोषीय दबाव की चिंताएं कम होने से बॉन्ड निर्गम में तेजी आई। उच्च प्रतिफल, वैश्विक स्तर पर अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण अधिकांश कंपनियों ने अप्रैल और मई में उधारी योजनाएं टाल दी थीं। 

हालांकि, जून में अनिश्चितता घटने के बाद कंपनियों ने कम ब्याज दरों पर बॉन्ड बाजार से धन जुटाने की कोशिश की। ईरान-अमेरिका के बीच अंतरिम शांति समझौता होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट आई, जिससे भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में भी तेज नरमी देखी गई। श्रीनिवासन ने कहा कि बॉन्ड बाजार में तेजी को जी-सेक में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के मजबूत निवेश, ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड सूचकांक में भारत के शामिल होने की संभावना, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, मानसून की प्रगति और ब्याज दर बढ़ोतरी पर जल्दबाजी नहीं करने संबंधी टिप्पणियों का भी समर्थन मिला। 

सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में नरमी का असर कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार पर भी पड़ा, जिससे उच्च रेटिंग वाली कंपनियों के लिए उधारी दरें कम हुईं और उन्हें अप्रैल-मई की तुलना में सस्ती दरों पर धन जुटाने में मदद मिली। पांडेय ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के हाल के कदमों, मजबूत घरेलू मांग और बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश प्रवाह ने जून में व्यापक स्तर पर बॉन्ड बाजार में तेजी को समर्थन दिया। भविष्य के परिदृश्य पर श्रीनिवासन ने कहा कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही तक प्राथमिक बाजार की गतिविधियां मजबूत रहने की उम्मीद है, हालांकि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बॉन्ड निर्गम अवसरवादी हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक मुद्रास्फीति, अमेरिकी मौद्रिक नीति और विदेशी निवेश प्रवाह आने वाले महीनों में घरेलू बॉन्ड प्रतिफल और निर्गम गतिविधि को प्रभावित करेंगे।

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