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दावा- डोभाल की बैकडोर बातचीत के बाद अमेरिकी ट्रेड डील:विदेश मंत्री से कहा था- भारत झुकेगा नहीं, ट्रम्प के हटने का इंतजार करेंगे
नई दिल्ली/वॉशिंगटन,एजेंसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल सितंबर की शुरुआत में चीन गए थे, जहां उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से दोस्ताना मुलाकात की थी। इसके कुछ ही दिनों बाद भारत ने अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों को संभालने की कोशिशें तेज कर दीं।
इसी सिलसिले में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल को वॉशिंगटन भेजा गया। वहां उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाकात की। यह जानकारी अमेरिकी मीडिया ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से दी है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बातचीत में डोभाल ने साफ कहा कि भारत अमेरिका के साथ चल रही कड़वाहट को खत्म करना चाहता है और दोबारा ट्रेड डील पर बातचीत शुरू करने के लिए तैयार है। हालांकि, डोभाल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत किसी भी तरह के दबाव में नहीं आएगा।
उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी टीम सख्त रुख अपनाती है, तो भारत मौजूदा सरकार के कार्यकाल के खत्म होने का इंतजार भी कर सकता है। भारत इससे पहले भी अमेरिका की मुश्किल सरकारों का सामना कर चुका है।

पीएम मोदी पिछले साल सितंबर में चीन दौरे पर गए थे, वहां उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी।
डोभाल ने कहा था- ट्रम्प भारत के खिलाफ बयान देना बंद करें
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, डोभाल ने यह भी कहा था कि भारत चाहता है कि ट्रम्प और उनके सहयोगी भारत के खिलाफ खुलेआम बयान देना बंद करें, ताकि रिश्ते दोबारा पटरी पर आ सकें।
उस वक्त भारत ट्रम्प के बयानों से नाराज था, क्योंकि अगस्त में ट्रम्प ने भारतीय सामान पर 50% टैक्स लगा दिया था। ट्रम्प ने भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड’ (मरी हुई) कहा था और आरोप लगाया था कि भारत रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध में मदद कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डोभाल की इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद हालात बदलते दिखने लगे। 16 सितंबर को ट्रम्प ने पीएम मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनके काम की तारीफ की। इसके बाद साल के अंत तक दोनों नेताओं के बीच चार बार और फोन पर बातचीत हुई। इसी दौरान दोनों देश टैक्स कम करने वाले समझौते की तरफ बढ़ते रहे।
ट्रम्प ने दो दिन पहले भारत पर टैरिफ घटाया
ट्रम्प ने सोमवार यानी 2 फरवरी को अचानक सोशल मीडिया पर बताया कि उन्होंने PM मोदी से फोन पर बातचीत की है और भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो गई है। इसके तहत भारतीय सामान पर अमेरिका का टैक्स घटाकर 18% कर दिया गया है। रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगाया गया 25% अतिरिक्त टैक्स भी हटा लिया गया है।
ट्रम्प ने कहा कि इसके बदले भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा, वेनेजुएला से तेल लेगा और अमेरिकी सामान पर टैक्स पूरी तरह खत्म करेगा। हालांकि भारत सरकार ने इन बातों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और कोई लिखित समझौता भी सामने नहीं आया है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऐलान से नई दिल्ली में कई बड़े अधिकारी भी चौंक गए। यहां तक कि जो लोग ट्रेड बातचीत में शामिल थे, उन्हें भी उस दिन मोदी और ट्रम्प की कॉल के बारे में पहले से जानकारी नहीं थी।
भारत को विकसित देश बनने के लिए अमेरिकी मदद चाहिए
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत लगातार अमेरिका से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा था। डोभाल की सितंबर वाली मुलाकात इसी कोशिश का हिस्सा थी। भारत का मानना है कि अमेरिका उसके लिए लंबे समय का अहम साथी है और रिश्तों को ज्यादा खराब नहीं होने दिया जा सकता।
भारत को लगता है कि चीन से मुकाबले और 2047 तक देश को विकसित बनाने के लिए अमेरिका की तकनीक, पैसा और सैन्य सहयोग बहुत जरूरी है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि ट्रम्प एक अस्थायी दौर हैं, लेकिन भारत-अमेरिका रिश्ता लंबे समय का है।
भारत-पाक संघर्ष पर ट्रम्प के बयान से बिगड़े थे रिश्ते
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के रिश्ते इसलिए भी खराब हुए थे क्योंकि ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव सुलझाने का दावा किया था, जिसे मोदी ने साफ नकार दिया। इसके बाद मोदी ने व्हाइट हाउस जाने से भी इनकार कर दिया और एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ट्रम्प से मिलने से बचते नजर आए।
दिसंबर में अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर के भारत आने के बाद रिश्तों में फिर से सुधार दिखने लगा। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच मतभेद असली दोस्तों जैसे हैं और इन्हें सुलझा लिया जाएगा। उन्होंने भारत को अमेरिका के एक नए सप्लाई चेन गठबंधन में शामिल करने की बात भी कही।
गोर और जयशंकर की मुलाकात से घटी तल्खी
रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल ही में गोर और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुलाकात में रक्षा, व्यापार और खनिज जैसे मुद्दों पर खुलकर बात हुई। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच पिछले छह महीनों की तल्खी अब खत्म होती दिख रही है।
इसके बावजूद भारत पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसी वजह से भारत ने रूस के साथ रिश्ते मजबूत रखे हैं, साथ ही यूरोप और ब्रिटेन के साथ भी ट्रेड डील की है। भारत दूसरे देशों से भी अपने आर्थिक रिश्ते बढ़ा रहा है।
फिर भी अमेरिका भारत के लिए बहुत अहम देश बना हुआ है। भारत के निर्यात का करीब पांचवां हिस्सा अमेरिका जाता है। अमेरिका की बड़ी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। जानकारों का कहना है कि भारत और अमेरिका को जोड़ने वाले बड़े कारण आज भी मजबूत हैं और आने वाले समय में यह रिश्ता और आगे बढ़ सकता है।
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Major Decision: कंपनियों को बड़ी राहत, भारत सरकार ने चीन से उपकरण खरीद पर दी ढील
मुंबई, एजेंसी। वैश्विक सप्लाई चेन में दबाव और घरेलू परियोजनाओं में देरी को देखते हुए भारत सरकार ने चीन से जरूरी औद्योगिक उपकरणों की खरीद पर आंशिक ढील देने का फैसला किया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस कदम के तहत कई सरकारी कंपनियों को सीमित दायरे में चीन से क्रिटिकल उपकरण आयात करने की अनुमति दी गई है।
इस फैसले का सबसे ज्यादा फायदा भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) जैसी कंपनियों को होगा। BHEL को चीन से 21 प्रकार के महत्वपूर्ण उपकरण खरीदने की मंजूरी मिली है, जबकि SAIL को भी अपने प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी कंपोनेंट्स आयात करने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कुछ अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कोल गैसीफिकेशन से जुड़े उपकरण खरीदने की छूट दी गई है।

2020 में किए थे सख्त नियम लागू
दरअसल, वर्ष 2020 में सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद भारत ने चीन से आयात और निवेश पर सख्त नियम लागू कर दिए थे लेकिन हाल के महीनों में कई इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परियोजनाओं में देरी और उपकरणों की कमी सामने आने के बाद सरकार ने इन नियमों में आंशिक ढील देने का निर्णय लिया है। नए आदेश के तहत अब सरकारी ठेकों में शामिल चीनी कंपनियों को पहले की तरह हर बार राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी के लिए अलग से रजिस्ट्रेशन कराने की आवश्यकता नहीं होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार में हो रहे बदलावों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति का हिस्सा है। खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने और सप्लाई चेन में बदलाव के चलते भारत अपने औद्योगिक हितों को ध्यान में रखते हुए लचीला रुख अपना रहा है।

सहयोग बढ़ाने के लिए उठाए गए अहम कदम
हाल के समय में दोनों देशों के बीच संबंधों में भी कुछ नरमी देखी गई है। नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच मुलाकात के बाद द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके तहत डायरेक्ट फ्लाइट्स बहाल करने और बिजनेस वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। सरकार का यह कदम जहां एक ओर घरेलू परियोजनाओं को गति देने में मदद करेगा, वहीं दूसरी ओर भारत-चीन आर्थिक संबंधों में संतुलन बनाने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।
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3 सरकारी बैंकों पर चला RBI का डंडा, लगाया भारी जुर्माना
मुंबई, एजेंसी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग नियमों का पालन न करने पर चार संस्थाओं पर मौद्रिक जुर्माना लगाया है। इसमें तीन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक—यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया—के साथ-साथ फिनटेक कंपनी पाइन लैब्स शामिल है।
आरबीआई द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया पर 95.40 लाख रुपए, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर 63.60 लाख रुपए, बैंक ऑफ इंडिया पर 58.50 लाख रुपए और पाइन लैब्स पर 3.10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है।

बैंकों पर क्यों हुई कार्रवाई
केंद्रीय बैंक ने बताया कि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ग्राहकों से जुड़े अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन के मामलों में निर्धारित समय सीमा के भीतर राशि वापस करने में विफल रहा। साथ ही, बैंक ने 24×7 शिकायत सुविधा उपलब्ध नहीं कराई और कुछ मामलों में सिस्टम आधारित प्रक्रियाओं में मैन्युअल हस्तक्षेप भी पाया गया।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर केवाईसी नियमों के उल्लंघन के चलते कार्रवाई की गई। बैंक समय पर ग्राहकों के केवाईसी रिकॉर्ड केंद्रीय रजिस्ट्री में अपलोड नहीं कर पाया और कुछ ग्राहकों के लिए एक से अधिक बेसिक सेविंग्स खाते खोले गए। वहीं, बैंक ऑफ इंडिया पर प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण खातों में अतिरिक्त शुल्क वसूलने और कुछ सावधि जमा पर समय पर ब्याज भुगतान न करने के कारण जुर्माना लगाया गया है।
इसके अलावा, पाइन लैब्स को बिना पूर्ण केवाईसी प्रक्रिया पूरी किए प्रीपेड भुगतान उपकरण (PPI) जारी करने के लिए दंडित किया गया। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करने और बैंकिंग व फिनटेक सिस्टम में पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से की गई है।

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iPhone यूजर्स को झटका! Apple ने हटाया बड़ा डिस्काउंट सपोर्ट
मुंबई, एजेंसी। भारत में स्मार्टफोन खरीदारों के लिए एक बड़ा बदलाव सामने आया है। Apple ने अपने लोकप्रिय iPhone मॉडल्स की कीमतों को अप्रत्यक्ष रूप से महंगा करने का फैसला लिया है। कंपनी ने रिटेलर्स और चैनल पार्टनर्स को मिलने वाला ‘डिमांड जेनरेशन (DG) सपोर्ट’ बंद करने का निर्णय लिया है, जिससे iPhone 16 और iPhone 15 जैसे मॉडल अब ग्राहकों के लिए करीब 5,000 रुपए तक महंगे पड़ सकते हैं।

क्या करता है DG सपोर्ट
DG सपोर्ट एक तरह का बैकएंड इंसेंटिव होता है, जिसकी मदद से रिटेलर्स बिना MRP बदले ग्राहकों को आकर्षक डिस्काउंट दे पाते थे। इस वजह से iPhone 15 और iPhone 16 जैसे मॉडल मिड-प्रीमियम सेगमेंट में काफी प्रतिस्पर्धी बने हुए थे लेकिन अब इस सपोर्ट के हटने के बाद रिटेलर्स पहले जितनी छूट नहीं दे पाएंगे, जिससे ग्राहकों को अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
किन ग्राहकों पर पड़ेगा ज्यादा असर
इससे पहले कंपनी कैशबैक ऑफर्स में भी बड़ी कटौती कर चुकी है। जहां पहले ग्राहकों को 6,000 रुपए तक का कैशबैक मिलता था, उसे घटाकर 1,000 रुपए कर दिया गया है। लगातार कम हो रहे इन फायदों का सीधा असर खरीदारों की जेब पर पड़ने वाला है।
रिटेलर्स के अनुसार, यह बदलाव तुरंत प्रभाव से लागू हो सकता है और मौजूदा कीमतों पर खरीदारी करने का मौका सीमित समय के लिए ही बचा है। खासतौर पर उन ग्राहकों पर इसका ज्यादा असर पड़ेगा, जो पुराने iPhone मॉडल्स की कीमतों में गिरावट का इंतजार कर रहे थे।

कई एंड्रॉइड ब्रांड्स बढ़ा चुके हैं दाम
हालांकि, कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला नए iPhone 17 लाइनअप पर लागू नहीं होगा और केवल मौजूदा या पुराने मॉडल्स तक ही सीमित रहेगा। भारत में iPhone की मांग मजबूत बनी रहने की उम्मीद है, खासकर EMI विकल्पों के चलते, जो बढ़ी हुई कीमत के असर को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।
इसी बीच, Samsung, Xiaomi और Motorola जैसे कई एंड्रॉइड ब्रांड्स भी बढ़ती उत्पादन लागत के कारण अपने स्मार्टफोन्स की कीमतें पहले ही बढ़ा चुके हैं, जिससे पूरे बाजार में कीमतों का दबाव बना हुआ है।
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