मॉस्को,एजेंसी। रूस ने कहा कि भारत किसी भी देश से क्रूड ऑयल खरीदने के लिए पूरी तरह आजाद है। रूस के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस कभी भी भारत का एकमात्र एनर्जी पार्टनर नहीं रहा है। अगर भारत तेल की खरीद किसी और देश से करता है, तो इसे गलत नहीं माना जाना चाहिए।
पेस्कोव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर रहा है, इस तरह की कोई भी ऑफिशियल जानकारी भारत की ओर से नहीं दी गई है। उन्होंने एक दिन पहले भी यही बात कही थी कि नई दिल्ली से ऐसा कोई मैसेज नहीं आया है।
ट्रम्प का दावा- भारत रूसी तेल खरीदना बंद करेगा
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोमवार को कहा था कि भारत, अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील के तहत रूस से तेल खरीद रोकने को तैयार हो गया है।
उन्होंने कहा था कि अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौता हुआ है। इसके तहत भारतीय सामानों पर लगने वाला टैरिफ 50% से घटकर 18% हो गया है।
उन्होंने दावा किया कि इसके बदले में भारत, रूस से तेल खरीदना बंद करेगा और व्यापार से जुड़ी टैरिफ की रुकावटें भी कम करेगा।
रूसी प्रवक्ता बोलीं- तेल खरीदी दोनों देशों के लिए फायदेमंद
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने बुधवार को रूस और भारत के बीच हाइड्रोकार्बन व्यापार जारी रखने की बात कही। उन्होंने कहा
भारत की रूसी हाइड्रोकार्बन की खरीद दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है। हम अपने भारतीय साझेदारों के साथ निकट सहयोग जारी रखने के लिए तैयार हैं।
इस बीच रूस के एनर्जी एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत के लिए रूसी तेल को पूरी तरह छोड़कर किसी और देश का तेल लेना आसान नहीं है।
नेशनल एनर्जी सिक्योरिटी फंड के विशेषज्ञ इगोर युशकोव ने बताया कि अमेरिका जो तेल बेचता है, वह हल्का होता है, जबकि रूस, भारत को भारी और सल्फर वाला यूराल्स क्रूड सप्लाई करता है जिसका इस्तेमाल भारतीय रिफाइनरियां करती हैं।
उन्होंने कहा कि अगर भारत अमेरिका से हल्का तेल खरीदेगा, तो उसे दूसरे तेलों के साथ ब्लेंड (मिक्स) करना पड़ेगा, ताकि मशीनें ठीक से चल सकें। ऐसा करने पर भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी। यानी कि भारत को अमेरिकी तेल खरीदना ज्यादा महंगा पड़ेगा।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है
भारत बोला- 140 करोड़ लोगों को ध्यान में रखकर फैसला लेंगे
वहीं भारत सरकार ने गुरुवार को कहा कि देश की ऊर्जा सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है और तेल खरीद से जुड़े सभी फैसले राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर किए जाते हैं।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि सरकार के लिए 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना मेन टारगेट है। उन्होंने कहा कि भारत की एनर्जी पॉलिसी का आधार अलग-अलग देशों से तेल और गैस खरीदना है, ताकि आपूर्ति बनी रहे।
रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाजार की स्थिति और बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात को ध्यान में रखते हुए फैसले करता है। उन्होंने साफ किया कि भारत के सभी फैसले इसी सोच के तहत लिए जाते हैं।
वेनेजुएला लंबे समय से भारत का एनर्जी साझेदार
वेनेजुएला से तेल खरीद पर पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि वेनेजुएला भारत का लंबे समय से ऊर्जा साझेदार रहा है। उन्होंने बताया कि भारत 2019-20 तक वेनेजुएला से कच्चा तेल इंपोर्ट करता था, लेकिन उसके बाद इसे रोकना पड़ा।
रणधीर जायसवाल ने कहा कि 2023-24 में भारत ने वेनेजुएला से फिर से कच्चा तेल खरीदा, लेकिन जब दोबारा प्रतिबंध लगाए गए तो आयात फिर से बंद हो गया। उन्होंने बताया कि भारतीय पब्लिक सेक्टर की कंपनियां 2008 से वेनेजुएला की राष्ट्रीय तेल कंपनी PDVSA के साथ साझेदारी में काम कर रही हैं और वहां उनकी मौजूदगी बनी हुई है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की नीति साफ है और देश वेनेजुएला या किसी भी अन्य देश से तेल खरीदने के लिए तैयार है, बशर्ते वह व्यावसायिक रूप से फायदेमंद हो। भारत अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चे तेल की उपलब्धता का आकलन करता रहता है।
एक्सपर्ट बोले- रूस जितना तेल सप्लाई करना अमेरिका के लिए मुश्किल
एनर्जी एक्सपर्ट इगोर युशकोव ने यह भी कहा कि रूस भारत को रोजाना 1.5 से 2 मिलियन बैरल तक तेल भेजता है। यह बहुत बड़ी मात्रा है। अमेरिका इतनी बड़ी मात्रा में तेल आसानी से भारत को नहीं सप्लाई कर सकता। अमेरिका के पास इतनी क्षमता या तैयार सप्लाई चेन नहीं है जो इतनी जल्दी और इतने बड़े वॉल्यूम में मैच कर सके।
अगर भारत अचानक रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दे और अमेरिका या किसी और से तेल लेने की कोशिश करे, तो अमेरिका के लिए इतना ज्यादा तेल उपलब्ध करा पाना मुश्किल होगा। इससे भारत को तेल की कमी हो सकती है या कीमतें बहुत बढ़ सकती हैं।
एनर्जी एक्सपर्ट बोले- रूसी तेल बंद हुआ तो कीमतें बढ़ेंगी
युशकोव ने कहा कि भारत का रूसी तेल खरीदना कोई ‘एक झटके में’ होने वाला काम नहीं है। ट्रम्प यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी वजह से भारत रूसी तेल छोड़ देगा, लेकिन हकीकत इतनी सरल नहीं है।
युशकोव ने याद दिलाया कि 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो पश्चिमी देशों ने रूसी तेल खरीदना कम कर दिया या बंद कर दिया।
रूस ने अपने तेल को यूरोप-अमेरिका से हटाकर भारत जैसे देशों की तरफ मोड़ दिया। इस दौरान रूस ने अपना तेल उत्पादन लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन (1 मिलियन बैरल/दिन) कम कर दिया।
इस वजह से वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई में कमी आई। तेल की मांग ज्यादा और सप्लाई कम होने से दुनिया भर में क्रूड ऑयल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इससे अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं, जिससे वहां आम लोगों को तेल बहुत महंगा पड़ा।
यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद बढ़ी रूसी तेल की खरीद
फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर सैन्य हमला किया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया, जो अब तक जारी है। इस युद्ध के कारण रूस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए, खासकर उसके तेल और गैस सेक्टर पर।
इन प्रतिबंधों की वजह से रूस को अपना कच्चा तेल सस्ते दामों पर बेचने के लिए नए खरीदार ढूंढने पड़े। इसी दौरान भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना शुरू किया।
वित्त वर्ष 2024–25 में भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन इसमें बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का था। भारत ने अकेले 52.73 अरब डॉलर का कच्चा तेल रूस से खरीदा था।
तेल खरीदी बंद होने से रूस-भारत का व्यापार घट सकता है
भारत अगर रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद कर देता है, तो भारत-रूस का कुल द्विपक्षीय व्यापार घटकर 20 अरब डॉलर से भी नीचे आ सकता है।
भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पिछले महीने कहा था कि रूस से कच्चे तेल के आयात में आगे भी गिरावट आने की संभावना है। पुरी ने ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि रूस से तेल खरीद में आई कमी की वजह किसी राजनीतिक या विदेशी दबाव की वजह से नहीं, बल्कि बाजार की परिस्थितियों का नतीजा है।
उन्होंने कहा था कि भारत अब तेल आपूर्ति के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता और इसी वजह से अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाई जा रही है।
हालांकि पुरी ने रूसी तेल आयात में कटौती को लेकर किसी अमेरिकी दबाव का जिक्र नहीं किया, लेकिन ट्रम्प खुले तौर पर यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने भारत को रूस से तेल खरीदने से रोका है।
भारत रूसी तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार
दिसंबर 2025 में भारत रूस से तेल खरीदने में तीसरे नंबर पर आ गया। तुर्किये दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। तुर्किये ने 2.6 बिलियन यूरो का तेल खरीदा।
भारत ने दिसंबर में रूस से 2.3 बिलियन यूरो यानी लगभग 23,000 करोड़ रुपए का तेल खरीदा। नवंबर में भारत ने 3.3 बिलियन यूरो यानी करीब 34,700 करोड़ रुपए का तेल खरीदा था।
चीन अब भी सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, उसने दिसंबर में रूस से 6 बिलियन यूरो यानी करीब 63,100 करोड़ रुपए का तेल खरीदा। भारत की खरीद कम होने की सबसे बड़ी वजह रिलायंस इंडस्ट्रीज रही। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी ने रूस से तेल खरीद करीब आधी कर दी।
पहले रिलायंस पूरी सप्लाई रूस की कंपनी रोसनेफ्ट से लेती थी, लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से अब कंपनियां रूस से तेल कम खरीद रही हैं। रिलायंस के अलावा सरकारी तेल कंपनियों ने भी दिसंबर में रूस से तेल खरीद करीब 15% घटा दी।
रूस ने छूट घटाई, भारत को पहले जैसा फायदा नहीं
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने 20-25 डॉलर प्रति बैरल सस्ता क्रूड ऑयल बेचना शुरू किया। तब अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल थी, ऐसे में ये छूट भारत के लिए किफायती थी।
अब स्थिति बदल गई है। फरवरी 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 68 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों को रूसी उराल्स क्रूड ब्रेंट से 10-11 डॉलर प्रति बैरल (कुछ मामलों में 10 डॉलर से ज्यादा, शिपिंग और अन्य खर्चों सहित) सस्ता मिल रहा है, जो जनवरी के अंत में 9.15 डॉलर था।
यह छूट पहले के 20-25 डॉलर से कम है, इसलिए भारत को पहले जैसा बड़ा फायदा नहीं मिल रहा। इसके अलावा रूस से तेल लाने में शिपिंग, फ्रेट और बीमा का खर्च ज्यादा पड़ता है, क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण “शैडो फ्लीट” (पुराने टैंकर) का इस्तेमाल होता है, जिससे लागत बढ़ जाती है।
वहीं, सऊदी अरब, यूएई, इराक या अमेरिका जैसे स्थिर सप्लायर्स से तेल लाना सस्ता और कम रिस्क वाला है। इसी वजह से भारत अब दोबारा दूसरे सप्लायर्स से तेल खरीदने पर विचार कर रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसी। अमेरिकी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साथ पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की कई तस्वीरें वायरल हैं। ये तस्वीरे इसलिए अहम मानी जा रही हैं, क्योंकि पुरी लगातार कहते रहे हैं वे एपस्टीन से केवल प्रतिनिधिमंडल के साथ मिले, अलग से कभी मुलाकात नहीं हुई।
तस्वीरें सामने आने के बाद कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- जब पुरी ने कहा था कि वे एपस्टीन से कभी अकेले नहीं मिले, तो इन तस्वीरों के क्या मायने हैं?
TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा- पुरी कहते थे कि वे एपस्टीन से तीन-चार बार डेलिगेशन के साथ मिले थे, दोनों तस्वीरों में बाकी सदस्य कहां थे।
इन तस्वीरों को जस्टिस डिपार्टमेंट की तरफ जारी जारी दस्तावेजों के नौवें सेट में रखा गया था। इस सेट में कम से कम 11 तस्वीरें हैं। मंगलवार को यह तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा में आई।
इन तस्वीरों में दोनों लगभग एक ही स्थिति में बैठे दिखाई देते हैं। तस्वीरों के कोण में मामूली अंतर है।
इस साल फरवरी में हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में राहुल गांधी की ओर से एपस्टीन फाइलों को लेकर लगाए गए आरोपों को खारिज किया था।
पुरी ने बताया था कि वह संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत का पद छोड़ने के बाद और 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से पहले एपस्टीन से मिले थे। उन्होंने इन मुलाकातों को पूरी तरह पेशेवर बताया था और कहा था कि उनका एपस्टीन के खिलाफ लगे आपराधिक आरोपों से कोई संबंध नहीं था।
पुरी ने फरवरी में एक इंटरव्यू में कहा था कि वह इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूशन (IPI) से जुड़े एक डेलिगेशन के रूप में गए थे। उसी दौरान एपस्टीन से मिले। वे सार्वजनिक जीवन में कई तरह के लोगों से मिलते हैं, जिनमें से कुछ का आपराधिक रिकॉर्ड भी हो सकता है। पुरी के मुताबिक IPI में उनके बॉस टेर्जे रोड-लार्सन एपस्टीन को जानते थे।
पुरी ने कहा-
पहली बार मुलाकात के दौरान मुझे नहीं पता था कि एपस्टीन कौन हैं। हमने उनके बारे में गूगल पर सर्च किया। फिर हमने आपस में भी चर्चा की कि हमें उनसे मिलना चाहिए या नहीं?
नवंबर 2025 में पहली बार सामने आया नाम
निगरानी समिति की ईमेल में जिक्र: हरदीप सिंह पुरी और जेफ्री एपस्टीन के संपर्क का मामला पहली बार नवंबर 2025 में सार्वजनिक चर्चा में आया था। उस समय हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की निगरानी समिति की ओर से जारी एक ईमेल में एपस्टीन और पुरी के बीच की बातचीत का जिक्र हुआ था।
ईमेल कब के हैं: इसके बाद अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने 30 जनवरी को एपस्टीन से जुड़े लाखों पन्नों के दस्तावेज जारी किए थे। इनमें जून 2014 से जून 2017 के बीच के ईमेल शामिल हैं।
तीन मुलाकातों का जिक्र: ईमेल के मुताबिक पुरी 4 फरवरी 2015, 6 जनवरी 2016 और 19 मई 2017 को न्यूयॉर्क में एपस्टीन के घर गए थे।
एपस्टीन यौन अपराधी साबित हो चुका था: 2008 में एपस्टीन यौन अपराध के मामले में दोषी ठहराया जा चुका था। यानी पुरी की बताई गई मुलाकातें उस समय हुईं, जब एपस्टीन का आपराधिक रिकॉर्ड पहले से मौजूद था।
‘एक्जॉटिक आइलैंड’ का जिक्र: एक ईमेल में पुरी ने एपस्टीन के ‘एक्जॉटिक आइलैंड’ यानी अनोखे द्वीप का जिक्र किया और उसे ‘हैव फन’ कहा, जिसका मतलब है ‘मौज करो’। पुरी ने बाद में कहा कि ‘हैव फन’ उनके बोलने का आम तरीका है।
हरदीप सिंह पुरी और एपस्टीन से जुड़ा ईमेल
यह ईमेल हरदीप सिंह पुरी ने 24 दिसंबर 2014 को जेफ्री एपस्टीन को भेजा था।
इसमें लिखा है-प्रिय जेफ, त्योहारों की शुभकामनाएं। जब आप अपने द्वीप से वापस आएं, तो मुझे जरूर बताइएगा।मैं आपसे बातचीत करने के लिए मिलना चाहूंगा। साथ ही, भारत में रुचि जगाने के लिए आपको कुछ किताबें भी देना चाहूंगा।
करोड़पति फाइनेंसर था यौन अपराधी एपस्टीन
जेफ्री एपस्टीन न्यूयॉर्क का करोड़पति फाइनेंसर था। उसकी बड़े नेताओं और सेलिब्रिटीज से दोस्ती थी।
उस पर 2005 में नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। 2008 में उसे नाबालिग से सेक्स की मांग करने का दोषी ठहराया गया।
उसे 13 महीने की जेल हुई। 2019 में जेफ्री को सेक्स ट्रैफिकिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया गया। लेकिन मुकदमे से पहले ही उसने जेल में आत्महत्या कर ली।
उसकी पार्टनर घिसलीन मैक्सवेल को 2021 में उसकी मदद करने के आरोपों में दोषी करार दिया गया। वह 20 साल की सजा काट रही है।
पेशावर, एजेंसी। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर की दिर कॉलोनी में एक निजी स्कूल की छत गिरने से कई बच्चों की मौत हो गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई। बचाव दल मलबा हटाकर उसमें दबे बच्चों और स्कूल कर्मचारियों को निकालने में जुटे हैं। इस दर्दनाक हादसे में कम से कम 28 बच्चों और एक शिक्षिका की मौत हो गई। तीन दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, कुछ घायलों की हालत गंभीर है।आपातकालीन सेवाओं के प्रवक्ता बिलाल फैजी ने बताया कि हादसे के बाद कई बच्चे मलबे के नीचे फंसे हुए थे। बचावकर्मी मलबा हटाकर उन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। अस्पताल के प्रवक्ता मोहम्मद आसिम ने मृतकों और घायलों की जानकारी की पुष्टि की।
अस्पताल के प्रवक्ता के मुताबिक, हादसे में मारे गए और घायल हुए सभी बच्चे 13 वर्ष या उससे कम उम्र के थे। घायलों को उपचार के लिए सरकारी लेडी रीडिंग अस्पताल पहुंचाया गया, जहां घायलों की संख्या और उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए आपातकाल घोषित कर दिया गया। चिकित्साकर्मी घायलों के इलाज में जुटे रहे। हादसे में मृतकों की अंतिम संख्या अभी स्पष्ट नहीं है और बचाव अभियान के दौरान इसमें बदलाव हो सकता है।
बीजिंग/नई दिल्ली, एजेंसी। चीन ने लद्दाख की 28 जगहों पर अपना बताया है। चीन ने मंगलवार को इन जगहों के नाम तय करने के भारत के फैसले पर आपत्ति भी जताई। चीन ने कहा- ये इलाके हमारे हैं और भारत के नाम बदलने या नया नाम रखने से जमीन पर मालिकाना हक नहीं बदलेगा।
भारत ने 2 अक्टूबर को इन जगहों के नाम आधिकारिक तौर पर तय किए थे। इनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग जैसे इलाके भी शामिल हैं, जहां 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव हुआ था।
चीन बोला- लद्दाख को भारत का UT नहीं मानते
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को कहा कि चीन लद्दाख को भारत की ओर से बनाया गया केंद्र शासित प्रदेश नहीं मानता। चीन ने भारत के इस कदम को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि सीमा के पश्चिमी हिस्से के ये इलाके उसके हैं।
माओ के मुताबिक, भारत के इस फैसले से सीमा के पश्चिमी हिस्से में उन इलाकों पर चीन का दावा नहीं बदल सकता, जिन्हें वह अपना क्षेत्र मानता है।
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को भारत के लद्दाख के इलाकों का नाम तय करने या बदलने का विरोध किया।
भारत बोला- लद्दाख हमारा हिस्सा, इनकार करने से हकीकत नहीं बदलेगी
चीन की आपत्ति पर भारत ने भी जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि लद्दाख भारत का हिस्सा है। चीन के इनकार करने से यह हकीकत नहीं बदलेगी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इन जगहों के नाम सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शे में दर्ज किए गए हैं। यह काम लद्दाख प्रशासन और स्थानीय लोगों से सलाह लेकर किया गया है।
जायसवाल ने कहा कि इन जगहों के नाम नक्शे में दर्ज करने का मकसद उनकी सही पहचान करना और लोगों को उनके बारे में जानकारी देना है।
भारत ने 28 जगहों के नाम क्यों तय किए?
भारत के गृह मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को आधिकारिक तौर पर लद्दाख की 28 जगहों और क्षेत्रों के नाम तय किए थे।
भारत का फैसला 2023 में चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के नाम बदलने के जवाब में उठाया गया था। चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘जांगनान’ यानी दक्षिणी तिब्बत कहता रहा है।
गोगरा और हॉट स्प्रिंग पूर्वी लद्दाख के संवेदनशील इलाके
भारत ने जिन जगहों के नाम तय किए, इनमें गोगरा और हॉट स्प्रिंग भी शामिल हैं। ये पूर्वी लद्दाख के संवेदनशील इलाके हैं, जहां भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीमा पर तनाव रहा है। इन जगहों पर भारतीय सैनिक गश्त भी करते हैं।
मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद बढ़ गया था। 5 मई को पैंगोंग झील के पास दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी।
2020 के जून में गलवान घाटी में भी दोनों सेनाओं के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था। इसके बाद दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने और सैनिकों को पीछे हटाने के लिए बातचीत शुरू की। सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई।
लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर पैंगोंग झील के इलाके में दोनों देशों के सैन्य अधिकारी मिले थे। तस्वीर 10 फरवरी 2022 की है।
28 जगहों में कौन-कौन से नाम शामिल हैं?
भारत की ओर से तय किए गए 28 नामों में पहाड़, दर्रे, ग्लेशियर, जमीन के हिस्से, घाटियां और जल स्रोत शामिल हैं।
दर्रे-ग्लेशियर: चापचिंगल दर्रा, शाचमिरिक दर्रा, पारपिक ग्लेशियर और स्कामरी ग्लेशियर।
जमीन के इलाके: ब्रांगसा, कुकसेल, देहरा कम्पास, गोगरा, कुमारायण पॉइंट, पंगलुंग और शमाल लुंगपा।
घाटी-जल स्रोत: श्कोर्गा घाटी, गुरु रिनपोछे झील, यांगपा नदी और हॉट स्प्रिंग।
इन जगहों के नाम तय करके सरकारी नक्शे में शामिल करने का मकसद उनकी सही पहचान बताना है।
गलवान में भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प हुई थी
जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीमा विवाद को लेकर हिंसक झड़प हुई थी। भारत के मुताबिक, 6 जून को दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति बनी थी, लेकिन 15 जून की रात फिर टकराव हो गया।
इस दौरान सैनिकों के बीच पत्थरों और डंडों से लड़ाई हुई। झड़प में भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई थी। चीन ने फरवरी 2021 में अपने 4 सैनिकों की मौत की बात स्वीकार की थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी गई।
जून 2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर झड़प के दौरान आमने-सामने खड़े दोनों देशों के सैनिक।
अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद
भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद है। चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है और इसे ‘जांगनान’ यानी दक्षिणी तिब्बत कहता है।
इसी दावे के तहत चीन 2017 से कई बार अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नाम जारी कर चुका है। 2023 में चीन ने 11 और 2024 में करीब 30 जगहों के नाम जारी किए थे। भारत हर बार इसका विरोध करता रहा है।
भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका अभिन्न हिस्सा है और चीन के नाम बदलने से जमीन पर स्थिति नहीं बदल सकती। भारत की नजर में यह सिर्फ नामों का मामला नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र पर चीन के दावे से जुड़ा विवाद है।