काठमांडू ,एजेंसी। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को पुलिस ने शनिवार सुबह गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी पिछले साल हुए GEN-Z प्रोटेस्ट के मामले में हुई है।
यह कार्रवाई उस समय हुई, जब कल ही बालेन शाह ने नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली है। पुलिस के अनुसार, ओली को शनिवार सुबह भक्तपुर के गुंडु स्थित उनके घर से पकड़ा गया। वहीं, रमेश लेखक को सुबह करीब 5 बजे सूर्यविनायक से गिरफ्तार किया गया।
यह कार्रवाई गृह मंत्रालय की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच के आधार पर की गई है। एक जांच आयोग ने सुझाव दिया था कि इन नेताओं पर लापरवाही का केस चलाया जाए। इस मामले में 10 साल तक की सजा हो सकती है।
रिपोर्ट में कई बड़े अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की बात कही गई है। पिछले साल हुए इन प्रदर्शनों में 77 लोगों की मौत हो गई थी और अरबों की संपत्ति का नुकसान हुआ था।
गिरफ्तारी के दौरान की तस्वीरें…
केपी ओली को गिरफ्तार कर मेडिकल जांच के लिए ले जाते हुए पुलिस टीम।
केपी ओली के खिलाफ जारी अरेस्ट वारंट। उनपर पिछले साल हुए प्रदर्शनों के दौरान लापरवाही बरतने का आरोप लगा है।
केपी ओली की गिरफ्तारी के कारण नेपाल में सुरक्षा इंतजाम सख्त कर दिए गए हैं।
ओली को मेडिकल जांच के बाद बटालियन में शिफ्ट किया जाएगा
ओली और रमेश लेखक को पुलिस जल्द ही आर्म्ड पुलिस फोर्स की महाराजगंज स्थित बटालियन नंबर-2 में शिफ्ट करेगी। दोनों नेताओं को गिरफ्तारी के बाद मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया है।
अधिकारियों ने बताया कि मेडिकल जांच पूरी होते ही दोनों को बटालियन में रखने की व्यवस्था कर ली गई है। यह कदम जारी कस्टडी प्रक्रिया के तहत उठाया जा रहा है।
अधिकारियों ने बताया कि महाराजगंज स्थित बटालियन नंबर-2 में दोनों नेताओं को रखने की पूरी तैयारी कर ली गई है। मेडिकल जांच के बाद उन्हें वहां शिफ्ट कर दिया जाएगा।
गिरफ्तारी से पहले PM बालेन की अध्यक्षता में बैठक हुई
इस मामले की जांच एक आयोग ने की थी, जिसकी अगुआई पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की ने की। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रदर्शन के दौरान हालात को संभालने में गंभीर लापरवाही हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने पहले से मिली चेतावनी (इंटेलिजेंस) के बावजूद सही कदम नहीं उठाए, जिससे हालात बिगड़ गए और कई लोगों की जान चली गई।
गिरफ्तारी से पहले प्रधानमंत्री बालेन शाह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस रिपोर्ट को लागू करने का फैसला लिया गया था। इसके बाद ही पुलिस ने यह बड़ा कदम उठाया।
गिरफ्तारी के दौरान काठमांडू घाटी में सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी और पुलिस की कई टीमों को तैनात किया गया।
प्रदर्शनकारियों ने 9 सितंबर को प्रधानमंत्री ओली के घर में आग लगा दी थी।
गौरी बहादुर कार्की आयोग की प्रमुख मांगें
आयोग ने कहा कि उस समय के प्रधानमंत्री केपी ओली, गृह मंत्री रमेश लेखक और पुलिस प्रमुख के खिलाफ क्रिमिनल जांच होनी चाहिए।
आरोप है कि लगभग 4 घंटे तक गोलीबारी होती रही, लेकिन इसे रोकने के लिए समय पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया।
कई बड़े अफसरों (गृह सचिव, पुलिस और जांच एजेंसी के अधिकारी) पर भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
कुछ पुलिस अधिकारियों को चेतावनी देने और विभागीय कार्रवाई करने की मांग की गई।
9 सितंबर की आगजनी, लूटपाट की दोबारा गहराई से जांच करने को कहा गया।
जांच के लिए CCTV फुटेज, मोबाइल डेटा और डिजिटल सबूत इस्तेमाल करने की सलाह दी गई।
कुछ सेना अधिकारियों पर भी सुरक्षा में चूक के लिए कार्रवाई की सिफारिश हुई है।
जिन पुलिसकर्मियों और लोगों ने बहादुरी दिखाई, उन्हें सम्मान देने की बात भी कही गई है।
नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ था GenZ प्रदर्शन
नेपाल में 8 सितंबर को सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ GenZ का प्रदर्शन शुरू हुआ, जो हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी ‘ऑफिस सिंह’ दरबार को आग के हवाले कर दिया था। यहां PM ऑफिस भी था।
हालात बिगड़ने पर काठमांडू समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगाया गया, संसद ठप हो गई और प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफे के बाद ओली को सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। वहीं, गुस्साए Gen- Z ने पूर्व पीएम समेत कई मंत्रियों को पीटा।
पुलिस ने हिंसा रोकने के लिए फायरिंग की जिसमें 70 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
केपी ओली के बारे में जानिए…
केपी ओली का जन्म 1952 में पूर्वी नेपाल में हुआ था। बचपन में ही उनकी मां की स्मॉलपॉक्स से मौत हो गई, जिसके बाद उनकी परवरिश उनकी दादी ने की। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की और कम उम्र में ही राजनीति में आ गए।
ओली कम उम्र में ही कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ गए और झापा आंदोलन का हिस्सा बने, जो बड़े जमींदारों के खिलाफ था। इसी दौरान उन पर एक हत्या का आरोप लगा और उन्हें जेल जाना पड़ा। उन्होंने करीब 14 साल जेल में बिताए, जिससे उनके राजनीतिक विचार और मजबूत हो गए।
1990 के दशक में लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद ओली एक बड़े नेता बने और 2015 में प्रधानमंत्री बने। हालांकि 2016 में सरकार गिर गई, लेकिन 2018 में वे फिर सत्ता में लौटे।
उन्होंने 15 जुलाई 2024 को चौथी बार नेपाल के पीएम के तौर पर शपथ ली थी, लेकिन Gen-Z प्रदर्शन के कारण उन्हें 14 महीने बाद यानी 9 सितंबर 2025 को इस्तीफा देना पड़ा था।
‘Gen Z’ प्रदर्शन के दौरान उनकी सरकार पर हालात संभालने में नाकामी के आरोप लगे। इन प्रदर्शनों में हिंसा और कई लोगों की मौत के बाद जनता का गुस्सा बढ़ गया, जिससे उनकी सरकार पर दबाव बना और आखिरकार उनकी सत्ता चली गई।
केपी ओली चार बार नेपाल के पीएम रह चुके हैं।
बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली
नेपाल में शुक्रवार को बालेन्द्र (बालेन) शाह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 35 साल के बालेन देश के सबसे कम उम्र के पीएम बने। सांसद पद की शपथ के कुछ घंटे पहले उन्होंने रैप गाने के जरिए पहला संदेश जारी किया, जिसमें भ्रष्टाचार, सिस्टम बदलाव और युवाओं का जिक्र किया।
उन्होंने अपने गीत में कहा कि एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और इस बार इतिहास बन रहा है।
बालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने 5 मार्च के चुनाव में जीत दर्ज की थी। कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कहा कि देश का भविष्य अब युवाओं के हाथ में है और नई सरकार से भ्रष्टाचार खत्म करने की उम्मीद है।
बालने शाह को 27 मार्च को राष्ट्रपति पौडेल ने पीएम पद की शपथ दिलाई। बीच में पूर्व PM सुशीला कार्की हैं।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका में भारतीयों की बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले 20 साल में 50 से ज्यादा इलाकों में भारतीयों की बड़ी आबादी बस चुकी है। इन्हें ‘मिनी इंडिया’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि अगले 5 साल में ऐसे इलाकों की संख्या 75 तक पहुंच सकती है।
ट्रम्प की वीजा और ग्रीन कार्ड पर सख्ती के बावजूद भारतीयों का अमेरिका जाना और वहां बसना जारी है। टेक, हेल्थकेयर और फार्मा जैसे सेक्टर में नौकरियों के मौके इसकी बड़ी वजह हैं। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा करीब 9.3 लाख भारतवंशी रहते हैं।
भारतीय परिवारों की आय अमेरिकी परिवारों से ज्यादा
‘मिनी इंडिया’ में रहने वाले भारतीय परिवारों की औसत सालाना आय करीब 1.54 करोड़ रुपए है। अमेरिकी परिवारों की औसत आय करीब 80 लाख रुपए है। अमेरिकन कम्युनिटी सर्वे और प्यू रिसर्च सेंटर रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है।
अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोग कैलिफोर्निया में रहते हैं। दूसरे नंबर पर टेक्सास है, जहां करीब 5.4 लाख भारतवंशी रहते हैं।
फ्रिस्को में 19% लोग भारतीय मूल के हैं
टेक्सास का फ्रिस्को शहर 25 साल पहले तक ज्यादातर खेतों वाला इलाका था। आज यहां की आबादी 2.5 लाख से ज्यादा है। इनमें करीब 19% लोग भारतीय मूल के हैं।
आसपास के प्लेनो और एलन शहरों में भी भारतीय मंदिर, रेस्तरां और दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के
कैलिफोर्निया के डबलिन और सैन रेमन इलाके में भारतीय आबादी करीब 18% है। डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के हैं।
यहां भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। नई पीढ़ी दिवाली भी मनाती है और वीकेंड पर क्रिकेट भी खेलती है। भारतीय खाने की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि कई जगह ड्राइव-थ्रू भारतीय फूड आउटलेट भी खुल गए हैं।
सिलिकॉन वैली में भारतीयों का असर बढ़ेगा
भास्कर एक्सपर्ट विलियम फ्रे के मुताबिक, सिलिकॉन वैली में भारतीयों की भूमिका आने वाले समय में और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि भारतीयों का यह सफर करीब 25 साल पहले शुरू हुआ था और अब इसकी रफ्तार और बढ़ रही है। आज सिलिकॉन वैली के लगभग 35% स्टार्टअप्स में कम से कम एक भारतीय मूल का सह-संस्थापक है।
विलियम का मानना है कि आईटी सेक्टर में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी के कारण अमेरिका के दूसरे राज्यों में भी नए ‘मिनी इंडिया’ विकसित होंगे। भारतीय समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहा है और किसी भी अन्य प्रवासी समुदाय की तुलना में उसकी भूमिका ज्यादा मजबूत दिखाई देती है।
ट्रम्प के आने के बाद सख्त हुए नियम
H-1B पर 1 लाख डॉलर का भुगतान
ट्रम्प सरकार ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत हर वीजा पर 1,03,265 डॉलर (करीब 98 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगेगी।
पहले यह फीस करीब 2,000-5,000 डॉलर थी। रॉयटर्स के मुताबिक, यह नियम साल के आखिर तक लागू किया जा सकता है।
H-1B और H-4 आवेदकों की सोशल मीडिया जांच
दिसंबर 2025 से H-1B और उनके H-4 डिपेंडेंट्स की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच बढ़ाई गई। आवेदकों को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल सार्वजनिक रखने को कहा गया।
वीजा इंटरव्यू के नियम सख्त
अक्टूबर 2025 से ज्यादातर नॉन-इमिग्रेंट वीजा आवेदकों के लिए इंटरव्यू भी जरूरी कर दिया गया। पहले 14 साल से कम और 79 साल से ज्यादा उम्र के आवेदकों को मिलने वाली छूट भी हटा दी गई, हालांकि कुछ मामलों में छूट जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था।
अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।
अमेरिका के खुलासे से उलटा नुकसान भी संभव
अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं।
सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं।
ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं। वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं।
विशेषज्ञों को डर है कि अमेरिका के इस खुलासे के बाद रूस और चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकते हैं। वे अमेरिकी कदम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताकर नई तकनीक और हथियार विकसित करने की वजह बता सकते हैं।
इस तरह एक देश की सैन्य तैयारी दूसरे देश को भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और तेज होने का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के कोलोराडो में पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का यूएस स्पेस कमांड जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर।
अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा
अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके।
अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत
अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है।
इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है।
अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा
अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है तो उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है।
मौसम का पता लगाने, प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने, रास्ता खोजने और दूर-दूर तक संपर्क बनाए रखने जैसे कई काम सैटेलाइट की मदद से होते हैं।
GPS जैसी सेवाओं से विमान, जहाज और ट्रक अपना रास्ता तय करते हैं। बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी सटीक समय और कम्युनिकेशन के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब हो जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है तो मोबाइल और दूसरे कम्युनिकेशन नेटवर्क, नेविगेशन, मौसम की जानकारी और कई जरूरी सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है। अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है।
1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक
अमेरिका के अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के खुलासे के बाद करीब 60 साल पुरानी आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है।
इस संधि की शुरुआत 1966 में हुई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव रखा था। इसी दौरान सोवियत संघ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सामने अपना प्रस्ताव रखा। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बातचीत शुरू हुई और दोनों देशों के मसौदों को मिलाकर संधि तैयार की गई।
27 जनवरी 1967 को अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने वॉशिंगटन, मॉस्को और लंदन में इस संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई।
इसका मुख्य मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और दूसरे सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या ऐसे दूसरे हथियार रखने पर रोक लगाई गई है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि संधि हर तरह के हथियारों को अंतरिक्ष में रखने पर रोक नहीं लगाती। इसमें पारंपरिक हथियारों पर वैसी साफ पाबंदी नहीं है, जैसी परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियारों पर है।
अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने 27 जनवरी 1967 को आउटर स्पेस ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे।
ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस
ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा अहम बना दिया है।
ट्रम्प अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी का हिस्सा है।
इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों के हमले से बचाना है। इसके लिए जमीन के साथ-साथ अंतरिक्ष में मौजूद तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मई 2025 में गोल्डन डोम प्रोजेक्ट की घोषणा की थी।
मिंक ने सोमवार को बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम बनाने पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोक सके।
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया है।
हालांकि, मिंक ने यह नहीं बताया कि यह सिस्टम कैसे काम करेगा और इसकी पूरी क्षमता क्या होगी।
सना, एजेंसी। यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं।
इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब-अल मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था।
हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब-अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं।
यमन में सरकार और हूतियों के बीच हमले तेज
यमन और सऊदी की सेना ने रविवार को लाल सागर के पास हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल से हमले करने का दावा किया।
हमले की आशंका के बीच सऊदी अरब के दो शहरों अबहा और खमिस मुशैत में सायरन बजाए गए। लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने को कहा गया।
सऊदी में यमन सीमा के पास एक प्रोजेक्टाइल गिरने से दो लोग घायल हुए। एक मस्जिद और कुछ दूसरी इमारतों को भी नुकसान पहुंचा।
यमन में हूती ठिकानों पर सऊदी के हवाई हमलों के बाद हूती विद्रोही भागते नजर आए।
यमन में 500 से ज्यादा सरकारी लड़ाके मारे गए
यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पिछले चार हफ्तों में सरकार समर्थित 500 से ज्यादा लड़ाके मारे गए हैं। सरकार के समर्थन में लड़ने वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स ने यह दावा किया है।
संगठन के मुताबिक, इसी दौरान होदेदा और ताइज प्रांतों में 1,000 से ज्यादा हूती लड़ाके भी मारे गए। हालांकि, हूतियों ने इन आंकड़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस बीच यमनी सरकार ने लाल सागर के तट पर और सैनिक भेजने का फैसला किया है। सरकार के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते की हार को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी बल फिर से इलाके में लौटेंगे।
12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई
यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है।
2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है।
सितंबर में 82 हजार से ज्यादा लोग बेघर
लड़ाई बढ़ने का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से अब तक यमन में 82 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं।
कई परिवार अचानक घर छोड़कर कैंपों और दूसरी सुरक्षित जगहों पर रहने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र ने विस्थापित लोगों की हालत को बेहद खराब बताया है।
कई परिवार इतनी जल्दी घर से निकले कि कपड़े, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें भी साथ नहीं ले जा सके। अब वे कैंपों, घरों और यहां तक कि सड़कों पर रहने को मजबूर हैं।