वॉशिंगटन डी सी,एजेंसी। दुनियाभर के देशों को टैरिफ से डरा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत के दो पड़ोसी देशों पर खासे मेहरबान हैं। ट्रम्प ने पाकिस्तान पर 19% तो बांग्लादेश पर 20% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है।
इसके उलट भारत पर दो बार में 25-25% टैरिफ लगाने का आदेश दिया है। साथ ही सेकेंडरी सैंक्शन्स की धमकी भी दी है।
भारत की तरह ही ब्राजील पर ट्रम्प ने 50% टैरिफ लगा दिया है। वहीं, चीन पर फिलहाल 30% टैरिफ लगाया जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर टैरिफ दर बढ़ती है, तो चीन की GDP लगभग 1% तक घट सकती है।
स्टोरी में जानिए कैसे ट्रम्प के टैरिफ से फायदे में हैं पाकिस्तान और बांग्लादेश, और क्यों नुकसान में है चीन…
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प 2 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस के रोज गार्डन में 69 देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान करते हुए।
देश जिन्हें टैरिफ से सबसे ज्यादा फायदा
1. पाकिस्तान: साउथ एशियाई देशों के मुकाबले सबसे कम टैरिफ
ट्रम्प ने पाकिस्तान पर 19% टैरिफ लगाया है। साउथ एशिया के किसी भी देश पर यह सबसे कम अमेरिकी टैरिफ है। इससे पहले ट्रम्प ने अप्रैल में पाकिस्तान पर 29% टैरिफ लगाने की बात कही थी।
नए आदेश में ट्रम्प ने पाकिस्तान को 10% की रियायत दी है। ट्रम्प ने पाकिस्तान के साथ ऑयल डील भी की है। इसके तहत अमेरिका, पाकिस्तान में तेल की खोज, प्रोसेसिंग और स्टोरेज बनाने में मदद करेगा।
पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र उसका कपड़ा उद्योग (80%) है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा खरीदार है। कम टैरिफ से इसकी अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी बढ़ सकती है।
अमेरिका की पाकिस्तान के साथ डील, भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव ला सकती है। इससे पाकिस्तान, अमेरिका के साथ मिलकर अपनी क्षेत्रीय स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा।
अमेरिका की मदद से पाकिस्तान को वर्ल्ड बैंक और IMF से वित्तीय सहायता भी मिल सकती है।
2. बांग्लादेश: 4 महीने में 17% टैरिफ कम करवाया
अमेरिका ने बांग्लादेश पर 20% टैरिफ लगाया है। इससे पहले अप्रैल में बांग्लादेश पर 37% टैरिफ लगाया गया था। बांग्लादेश 4 महीने में अमेरिका से 17% टैरिफ कम कराने में कामयाब रहा।
बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक है। भारत पर ज्यादा टैरिफ से इसका कपड़ा निर्यात बढ़ सकता है। 2024 में इसका निर्यात 8 अरब डॉलर (70 हजार करोड़ रुपए) था, जो 2026 तक 10 अरब डॉलर (88 हजार करोड़ रुपए) हो सकता है।
कम टैरिफ से बांग्लादेश अमेरिकी बाजार में अपनी 9% हिस्सेदारी बनाए रख सकता है। FBCCI के मुताबिक इससे देश की GDP में 2026 तक 0.2% तक बढ़ोतरी हो सकती है।
3. वियतनाम: टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बढ़त
अमेरिका ने वियतनाम पर 20% टैरिफ लगाया है, लेकिन यह भारत (50% टैरिफ) और चीन (30%) की तुलना में कम है। इससे वियतनाम के सामानों को अमेरिकी बाजारों में आसानी से पहुंच मिलेगी।
वियतनाम को सेमीकंडक्टर सेक्टर में पहले ही बड़ी कंपनियों की ‘चाइना-प्लस-वन’ पॉलिसी (चीन के अलावा एक और साझेदार) का लाभ मिल रहा है।
एपल और सैमसंग जैसी कंपनियां चीन से अपनी सप्लाई चेन को वियतनाम ट्रांसफर कर रही हैं। दूसरे देशों की तुलना में कम टैरिफ होने से वियतनाम का अमेरिका को निर्यात बढ़ सकता है।
अमेरिका के कम टैरिफ का फायदा वियतनाम की टेक्सटाइल इंडस्ट्री खासकर सस्ते कपड़ों और रेडीमेड गारमेंट्स को होगा। 2013-2023 के बीच वियतनाम का कपड़ा निर्यात 82% बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपए हो गया।
4. मेक्सिको: कई सामानों पर 0% टैरिफ
मेक्सिको पर अमेरिका ने 25% टैरिफ लगा रखा है। हालांकि मेक्सिको USMCA (United States-Mexico-Canada Agreement) के तहत व्यापार करता है। जिसके तहत कुछ छूट का लाभ उठा सकता है। USMCA के नियमों का पालन करने वालों सामानों पर अमेरिका ने मेक्सिको को 0% टैरिफ की छूट दी है।
मेक्सिको अमेरिका के साथ ट्रेड करने में पहले स्थान पर है। 2024 में अमेरिका के साथ व्यापार में मेक्सिको की भागीदारी 16% थी। ये अब और बढ़ सकती है।
मेक्सिको, अमेरिका को कारें, ट्रक और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसे इंजन, ट्रांसमिशन का निर्यात करता है। मेक्सिको के ऑटोमोबाइल पार्ट्स के कुल निर्यात का लगभग 90% हिस्सा अमेरिका जाता है।
मेक्सिको, अमेरिका को कृषि उत्पाद (टमाटर, एवोकाडो, बेरीज नींबू, सब्जियां) निर्यात करता है। मेक्सिको अमेरिका का सबसे बड़ा एवोकाडो सप्लायर है। USMCA के तहत इन पर 0% टैरिफ लगता है, जिससे इस सेक्टर को फायदा होगा।
अमेरिका कुल स्टील निर्यात का 15-20% हिस्सा मेक्सिको से लेता है। ये कनाडा और ब्राजील के बाद तीसरे नंबर पर है। ब्राजील पर 50% टैरिफ होने के कारण अमेरिका मेक्सिको से स्टील निर्यात बढ़ा सकता है।
देश जिन्हें टैरिफ से सबसे ज्यादा नुकसान…
1. भारत- 25 से 30 लाख नौकरियां खतरे में
अमेरिका ने भारत पर 6 अगस्त को 25% एक्स्ट्रा टैरिफ लगा दिया। इससे भारत का कुल टैरिफ 25% से बढ़कर 50% हो गया है। ये एक्स्ट्रा टैरिफ 27 अगस्त से शुरू होगा। ट्रम्प ने टैरिफ बढ़ाने का कारण रूस से तेल खरीद को बताया।
अमेरिका ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अमेरिका को लगभग 7.35 लाख करोड़ रुपए का सामान निर्यात किया। 50% टैरिफ से भारत के प्रोडक्ट अमेरिकी बाजार में महंगे होंगे, जिससे मांग में कमी आएगी।
अमेरिका 15% टेक्सटाइल भारत से आयात करता है। टैरिफ बढ़ने से इसमें गिरावट आ सकती है, जिसका असर भारत में टेक्सटाइल प्रोडक्शन पर पड़ सकता है।
हाई टैरिफ का असर रोजगार पर भी पड़ेगा। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, MSME (छोटे और मध्यम उद्योग) क्षेत्र में 25-30 लाख नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।
भारत ने 2024 में 11 बिलियन डॉलर (₹91 हजार करोड़) का रत्न और ज्वेलरी निर्यात किए। टैरिफ से कीमतें बढ़ने पर मांग कम हो सकती है। इसका असर भारत के ज्वेलरी बाजार सूरत के डायमंड और पॉलिशिंग हब पर पड़ेगा।
2. ब्राजील: GDP में 2.7% तक की गिरावट का अनुमान
अमेरिका ने भारत की तरह ब्राजील पर भी 50% टैरिफ लगा रखा है। इसके पीछे ट्रम्प ने पूर्व राष्ट्रपति जायरे बोल्सोनारो पर मुकदमा चलाए जाने को वजह बताया है। राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने इसके खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शिकायत भी की है।
ब्राजील, अमेरिका को स्टील बेचने में तीसरे नंबर पर है। ब्राजील ने 2024 में अमेरिका को 10 बिलियन डॉलर (₹87 हजार करोड़) का स्टील और एल्यूमीनियम निर्यात किया था। टैरिफ लगने से इसे सबसे ज्यादा नुकसान होगा।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, ब्राजील की GDP में 2.7% तक की गिरावट और 1 लाख से ज्यादा नौकरियां छिन सकती हैं।
बढ़ें टैरिफ का असर कॉफी उत्पादन पर भी पड़ेगा। 2024 में ब्राजील ने अमेरिका को 4.4 बिलियन डॉलर (₹38 हजार करोड़) की 4.40 लाख करोड़ किलो कॉफी निर्यात की।
3. चीन की GDP 1% तक गिरने का खतरा
अमेरिका ने मई में चीन पर 145% टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद चीन ने अमेरिका पर 125% जवाबी टैरिफ लगाया। बातचीत के बाद दोनों ने एक दूसरे पर टैरिफ कम किया। अभी अमेरिका ने चीन पर 30% और चीन ने अमेरिका पर 10% टैरिफ लगाया है।
अमेरिका ने चीन को ट्रेड डील के लिए अलग से 12 अगस्त तक की मोहलत दी है। चीन पर अमेरिका के हाई टैरिफ का सीधा असर उसके निर्यात और इंडस्ट्री पर पड़ेगा।
चीन अमेरिका को लगभग 500 अरब डॉलर (43 लाख करोड़ रुपए) से अधिक का सामान निर्यात करता है। Apple जैसे ब्रांड चीन में बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन करते हैं। उन्हें मंहगाई का सामना करना पड़ेगा।
फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के व्यापक टैरिफ उपायों के बावजूद चीन का आर्थिक प्रभाव सीमित रहा है। यदि टैरिफ दर बढ़ती है, तो इससे चीन की GDP 1% तक घट सकती है।
दमिश्क, एजेंसी। सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को गृहयुद्ध के दौरान लाखों लोगों की हत्या और अत्याचार के मामलों में दोषी ठहराया गया।
इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सरकार गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। दोनों की गैरमौजूदगी में सजा सुनाई गई।
अतीफ नजीब को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें मंगलवार को कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में कोर्ट लाया गया।
बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।
अतीफ के आदेश के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़का
अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला।
अतीफ पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। आदेश के बाद सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया। देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया जो 2024 तक चलता रहा। इसमें करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई।
सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।
दिसंबर 2024 में 53 साल पुराना राज खत्म हुआ
यह बशर अल-असद के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में आया पहला फैसला है। दिसंबर 2024 में विद्रोहियों ने दमिश्क पर कब्जा कर उनकी सरकार गिरा दी थी। इसके साथ ही 1971 से सीरिया पर शासन कर रहे असद परिवार का 53 साल पुराना राज भी खत्म हो गया था।
सरकार गिरने से ठीक पहले बशर अल-असद ने देश छोड़ दिया था। इसके बाद सीरिया पर विद्रोही नेता अहमद अल-शरा का कब्जा हो गया। उनकी सरकार ने उनके शासन के दौरान लोगों पर हुए अत्याचार और हत्याओं के मामलों की जांच शुरू की।
दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।
रूस और ईरान के साथ के बावजूद कैसे गिरी असद सरकार?
गृहयुद्ध के दौरान बशर अल-असद की सरकार को रूस, ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन मिलता था। इसी वजह से वह कई साल तक सत्ता में बने रहे।
साल 2024 में हालात बदल गए। इजराइल के लगातार हमलों से हिजबुल्लाह और ईरान समर्थित गुट कमजोर पड़ गए। दूसरी ओर, रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ था, इसलिए वह भी पहले जैसी सैन्य मदद नहीं कर सका।
इसी मौके का फायदा उठाकर तुर्किये के समर्थन वाले विद्रोही गुटों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत इदलिब से बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने कई शहरों पर कब्जा कर लिया और 8 दिसंबर 2024 को राजधानी दमिश्क पहुंच गए।
विद्रोहियों के दमिश्क पहुंचते ही बशर अल-असद अपने परिवार के साथ रूस भाग गए। उनकी सरकार गिर गई और असद परिवार का 53 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के साथ बिना परमाणु समझौते के भी जंग खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, अमेरिका की एक बड़ी शर्त होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना है। अगर ईरान वहां से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने देता है, तो अमेरिका जंग से पीछे हट सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प पिछले कुछ हफ्तों से इस योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने सीनियर अफसरों से कहा है कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोल देता है तो अमेरिका औपचारिक परमाणु समझौते के बिना भी संघर्ष खत्म करने को तैयार हो सकता है।
अब परमाणु समझौता नहीं, होर्मुज खोलना अमेरिका की नई प्राथमिकता
पहले अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त ईरान के साथ नया परमाणु समझौता करना थी। लेकिन जंग लंबी खिंचने के बाद उसका फोकस बदलता दिख रहा है।
अब होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही शुरू कराना जंग खत्म करने की अहम शर्त बन सकता है। यह रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है।
ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें
होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को…
ईरान के सहयोगी गुटों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी।
जंग हमेशा के लिए खत्म करनी होगी।
ईरान की समुद्री नाकाबंदी हटानी होगी।
क्षेत्र से अपने सैनिक वापस बुलाने होंगे।
ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे।
विदेशों में रोकी गई ईरानी संपत्ति लौटानी होगी।
जंग में हुए नुकसान का मुआवजा देना होगा।
अमेरिका में बढ़ रहा जंग खत्म करने का दबाव
ईरान के साथ जंग लंबी खिंचने का असर अमेरिका में भी दिखने लगा है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने लगी हैं, जिससे आम लोगों पर असर पड़ रहा है। अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले यह ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
ऐसे में ट्रम्प पर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करने का दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि वे पिछले कुछ समय से लगातार कह रहे हैं कि ईरान के साथ समझौता जल्द हो सकता है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर यह संकेत भी दिया था कि अमेरिका इस जंग में अपना मकसद हासिल कर चुका है।
परमाणु समझौते के बिना भी ट्रम्प क्यों तैयार?
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प का मानना है कि उनके कार्यकाल में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा आसानी से शुरू नहीं कर पाएगा। उनका भरोसा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान की हर गतिविधि पर नजर रख सकती हैं।
ट्रम्प यह भी मानते हैं कि अगर ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करता है, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसलिए उनके लिए औपचारिक परमाणु समझौते से ज्यादा अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से पूरी तरह खुलवाना है।
ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले अमेरिकी सैनिकों की वापसी, सभी प्रतिबंध हटाने, विदेशों में जमा अपनी संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा जैसी बड़ी मांगें कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच समझौता होना आसान नहीं माना जा रहा।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी ODNI के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास 3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जिनकी मारक क्षमता 2,000 किमी तक है। इन मिसाइलों का बड़ा हिस्सा पहाड़ों के नीचे बने अंडरग्राउंड ठिकानों में रखा गया है। यहां मिसाइलें, लॉन्चर और कंट्रोल सेंटर सुरंगों के अंदर होते हैं, इसलिए हवाई हमलों में इन्हें पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं माना जाता।
दुनिया के 20% तेल का रास्ता ईरान के पास
हॉर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसका उत्तरी तट ईरान के पास है। इसलिए यहां तनाव बढ़ने और हॉर्मुज बंद होने का असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।
हजारों ड्रोन का बेड़ा
ईरान ने पिछले एक दशक में शाहेद जैसे हजारों ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी के हमलों और निगरानी के लिए किया जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी ईरानी ड्रोन के इस्तेमाल ने इसकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया।
पश्चिम एशिया में सहयोगी सशस्त्र नेटवर्क
ईरान के समर्थन वाले समूह हिजबुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) और इराक के कई शिया सशस्त्र गुट पश्चिम एशिया में एक्टिव हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इन्हें ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस स्ट्रटजी का हिस्सा मानते हैं, जिससे वह अपने सीमावर्ती क्षेत्र से बाहर भी दबाव बना सकता है।
होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है?
हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है।
शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी।
इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।
तेहरान, एजेंसी। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई का जंग के बाद पहली बार वीडियो सामने आया है। ईरानी न्यूज एजेंसी मेहर ने यह वीडियो जारी किया है। इसमें मुजतबा जमीन पर बैठे लोगों के बीच उनसे बातचीत करते नजर आ रहे हैं।
सुप्रीम लीडर बनने के बाद यह उनका पहला वीडियो है। हालांकि, वीडियो कब रिकॉर्ड किया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। पिछले कुछ दिनों से मुजतबा की सेहत को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे थे। इजराइली चैनल 14 ने उनकी हालत गंभीर होने और अस्पताल में भर्ती होने का दावा किया था। यहां तक कहा गया था कि उनकी जल्द मौत हो सकती है।
अब वीडियो सामने आने के बाद इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, मुजतबा की मौजूदा सेहत को लेकर अभी भी पूरी तस्वीर साफ नहीं है।
सऊदी मीडिया का दावा- ईरान में नहीं थे मुजतबा
सऊदी मीडिया अल-हदथ ने इजराइली सुरक्षा सूत्र के हवाले से दावा किया था कि मुजतबा ईरान में नहीं थे। सूत्र ने यह भी कहा था कि मुजतबा के नाम से जारी सरकारी संदेश IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी तैयार कर रहे थे।
सुप्रीम लीडर बनने के बाद से मुजतबा सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए थे। उन्होंने कोई भाषण भी नहीं दिया था। सरकारी मीडिया ने उनके नाम से सिर्फ लिखित संदेश जारी किए थे।
ईरानी मीडिया के मुताबिक, पिता अली खामेनेई की मौत के बाद भी मुजतबा किसी मंत्री से नहीं मिले थे और पिता के अंतिम संस्कार में भी नजर नहीं आए। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने भी कहा था कि मुजतबा से सीधे संपर्क करना मुश्किल है।
पहले भी गंभीर चोट की खबरें आई थीं
मुजतबा की सेहत को लेकर पहले भी कई दावे सामने आ चुके हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया था कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के हमले के बाद मुजतबा एक गुप्त ठिकाने पर थे और डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनके एक पैर की तीन बार सर्जरी हुई और एक हाथ का भी ऑपरेशन किया गया। चेहरे और होंठ पर चोट के कारण उन्हें बोलने में परेशानी होने की बात भी कही गई थी। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज किया था।
अमेरिका-इजराइल ने 28 फरवरी को पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के घर को निशाना बनाया था।
पिता की मौत के बाद बने सुप्रीम लीडर
अमेरिकी-इजराइली हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद 56 साल के मुजतबा खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर बने। वह लंबे समय से ईरान की सत्ता में पर्दे के पीछे प्रभावशाली माने जाते रहे हैं।
मुजतबा ने कभी चुनाव नहीं लड़ा और सरकार में कोई औपचारिक पद भी नहीं संभाला। इसके बावजूद उनके पिता के कार्यालय, IRGC और सुरक्षा तंत्र में मजबूत संपर्क माने जाते थे।
उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के आखिरी दौर में IRGC में सेवा की थी। बाद में कोम में शिया धर्मशास्त्र और इस्लामी कानून की पढ़ाई की। 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए प्रदर्शनों के दौरान भी उनका नाम सत्ता के भीतर प्रभाव रखने वाले नेताओं में सामने आया था। अमेरिका ने 2019 में उन पर प्रतिबंध लगाया था।