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नायब सैनी ही रहेंगे हरियाणा के CM:शाह की मौजूदगी में नाम तय; राजभवन पहुंचकर सरकार बनाने का दावा पेश किया, शपथ कल

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चंडीगढ़/पंचकूला,एजेंसी। हरियाणा में नायब सिंह सैनी ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। बुधवार (16 अक्टूबर) को पंचकूला में BJP विधायक दल की मीटिंग में उन्हें नेता चुना गया। मीटिंग में विधायक कृष्ण बेदी ने नायब सैनी के नाम का प्रस्ताव रखा। जिसका अनिल विज और आरती राव ने समर्थन किया। फिर सभी विधायकों ने नायब सैनी के नाम पर सहमति दे दी।

इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने नायब सैनी के सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा की। शाह ने कहा- हरियाणा की स्थापना से लेकर अब तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार तीसरी बार सफल नहीं हुआ। युवा नायब सैनी के नेतृत्व में हम तीसरी बार चुनाव जीत पाए हैं। शाह के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी ऑब्जर्वर के तौर पर मौजूद रहे।

इसके बाद नायब सैनी ने अमित शाह के साथ राजभवन जाकर गवर्नर बंडारू दत्तात्रेय के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया। इस दौरान 3 निर्दलीय विधायकों ने भी BJP को समर्थन का पत्र सौंपा।

कल गुरुवार को 11 बजे पंचकूला के शालीमार ग्राउंड में शपथ ग्रहण समारोह होगा। इसमें PM नरेंद्र मोदी समेत भाजपा और NDA के सहयोगी दलों के शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत 37 नेता मौजूद रहेंगे।

हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 48 सीटें जीती थीं।

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तमिलनाडु में बड़ा सियासी उलटफेर, फेमस डायरेक्टर उदयकुमार समेत इन दिग्गज नेताओं ने थामा TVK का दामन

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चेन्नई, एजेंसी। फिल्म निर्देशक आर वी उदयकुमार और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) की पूर्व मंत्री गोमती श्रीनिवासन सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के कई पदाधिकारी शनिवार को यहां तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) में शामिल हो गए। 

अन्नाद्रमुक में करीब 25 साल तक रहे उदयकुमार ने 16 जून को पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 1990 के दशक में मुख्यधारा के व्यावसायिक सिनेमा में अहम भूमिका निभाने वाले उदयकुमार ने ‘चिन्ना गौंडर’, ‘यजमान’, ‘सिंगारवेलन’ और ‘किझक्कू वासल’ जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी हैं। वह अन्नाद्रमुक के कला प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे। तमिलनाडु के इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में टीवीके का दामन थामने वाले अन्य प्रमुख चेहरों में गोमती श्रीनिवासन शामिल हैं, जिन्होंने पूर्व में एमजीआर के मंत्रिमंडल में कार्य किया था। 

इसके अलावा तिरुवैयारु के पूर्व विधायक एम जी एम सुब्रमणियन, ‘तमिलनाडु पॉटर्स एंड अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स यूनियन’ के प्रदेश अध्यक्ष सेमा नारायणन और पूर्व में टीवीके से जुड़े रहे नेता जगन्नाथ मिश्रा भी पार्टी में शामिल हुए हैं। पार्टी नेताओं के मुताबिक, अन्नाद्रमुक साहित्य प्रकोष्ठ के प्रदेश उप सचिव आई.सी. सेकर तथा 2021 के विधानसभा चुनाव में नाथम सीट से चुनाव लड़ चुके अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम (एएमएमके) के ए.एन. राजा भी टीवीके से जुड़ गए हैं। इन सभी प्रमुख नेताओं ने पार्टी के महासचिव ‘बुस्सी’ एन. आनंद, आधव अर्जुन तथा अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी में टीवीके की सदस्यता ग्रहण की।

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60 Kg Silver Missing: राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दौरान भेंट की गई 60 किलो चांदी गायब, SIT जांच तेज

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अयोध्या, एजेंसी। अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े दान विवाद में एक नया मोड़ सामने आया है। जांच के दौरान पता चला है कि मंदिर को दान में मिली करीब 60 किलो चांदी का कोई साफ रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है। इस मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) अब दान में मिले नकद, सोना-चांदी और अन्य कीमती वस्तुओं के रिकॉर्ड की गहन पड़ताल कर रही है।

 प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान भेंट की गई 60 किलो चांदी गायब  
जानकारी के अनुसार, यह चांदी रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान भेंट की गई थी। दानदाताओं का दावा है कि इस चांदी का उपयोग मंदिर की नींव से जुड़े कार्यों में किया जाना था, लेकिन जांच एजेंसियों को अब तक इसके इस्तेमाल या सुरक्षित रखे जाने से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज नहीं मिले हैं।

सूत्रों के मुताबिक, SIT पिछले कई दिनों से मंदिर में प्राप्त दान, उनके भंडारण और उपयोग से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है। अब तक जांच में 60 किलो चांदी की प्राप्ति, रखरखाव और उपयोग से जुड़ी कोई स्पष्ट ऑडिट ट्रेल सामने नहीं आई है।

ज्वेलर्स एसोसिएशन का दान का दावा
इस बीच, ज्वेलर्स एसोसिएशन ने दावा किया है कि उनके पास चांदी मंदिर ट्रस्ट को सौंपने की आधिकारिक रसीद मौजूद है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि यह चांदी देशभर के सर्राफा व्यापारियों के सहयोग से दान की गई थी। हालांकि, सवाल यह उठ रहे हैं कि यदि चांदी मंदिर को सौंपी गई थी तो उसका उल्लेख मंदिर के रिकॉर्ड में क्यों नहीं है और नींव निर्माण में इसके उपयोग के प्रमाण क्यों नहीं मिल रहे हैं।

जांच के दौरान दान और भेंट प्रबंधन से जुड़े कई लोगों से पूछताछ की गई है। इनमें कुछ पुजारी और मंदिर प्रशासन से जुड़े कर्मचारी भी शामिल हैं। जांच अधिकारियों ने उन व्यक्तियों से भी सवाल किए हैं जो मंदिर में आने वाली भेंट और कीमती वस्तुओं के प्रबंधन से जुड़े रहे हैं।

बताया जा रहा है कि जांच केवल चांदी तक सीमित नहीं है। सोना, चांदी, हीरे के आभूषण, हार और चरण पादुका समेत कई अन्य दान की गई वस्तुओं की भी जांच की जा रही है। कुछ आरोपों में यह भी कहा गया है कि मूल दान की गई वस्तुओं की जगह दूसरी वस्तुएं रखी गईं या रिकॉर्ड में गड़बड़ी हुई।

SIT खंगाल रही दस्तावेज और रिकॉर्ड
यह विवाद तब सामने आया जब मंदिर को मिले करोड़ों रुपये के दान और कीमती सामानों के गायब होने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून को तीन सदस्यीय SIT का गठन कर मामले की जांच के आदेश दिए थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि जांच मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर शुरू की गई है और पूरी जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। उन्होंने लोगों से जांच पूरी होने तक धैर्य रखने की अपील की है। फिलहाल SIT दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और दान से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि कथित रूप से गायब 60 किलो चांदी और अन्य कीमती दान की गई वस्तुओं का वास्तविक स्थिति क्या है।

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छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के जंगलों से मिलेगी राजस्थान को बिजली:90 लाख टन कोयले की कमी दूर होगी, ये जयपुर को डेढ़ साल रोशन करने जितना

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जयपुर/सरगुजा, एजेंसी। राजस्थान में बिजली की बढ़ती मांग और कोयले की कमी के बीच राज्य सरकार को बड़ी राहत मिली है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) को छत्तीसगढ़ (सरगुजा) के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित केंते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल ब्लॉक के लिए केंद्र सरकार से वन भूमि उपयोग की सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है।

इससे राजस्थान के छबड़ा (बारां) और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट्स के लिए कोयले की आपूर्ति बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति की सिफारिश के बाद यह मंजूरी दी गई है।

परियोजना के तहत करीब 1743 हेक्टेयर वन भूमि को खनन (माइनिंग) के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। आसान भाषा में समझें तो यह क्षेत्र 80 से 200 बड़े क्रिकेट स्टेडियमों के बराबर माना जा सकता है।

इस कोयला खदान से अगले 33 से 36 साल तक करीब 90 लाख टन कोयला निकाला जा सकेगा। इसे छह चरणों में विकसित किया जाएगा।

जयपुर की 14-17 महीने की बिजली जरूरत के बराबर है यह कोयला

केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से निकलने वाला कोयला राजस्थान के अपने बिजली संयंत्रों (पावर प्लांट) में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे छबड़ा और सूरतगढ़ जैसे बड़े थर्मल पावर प्लांटों को कोयले की बेहतर और नियमित आपूर्ति मिल सकेगी।

आसान भाषा में समझें तो यह मात्रा जयपुर शहर की करीब 14 से 17 महीने की औसत बिजली जरूरत के बराबर मानी जा सकती है। हालांकि, इस कोयले से बनने वाली बिजली सीधे सिर्फ जयपुर को नहीं मिलेगी। यह बिजली राजस्थान के पूरे पावर ग्रिड का हिस्सा होगी।

यदि कोयले की सप्लाई लगातार बनी रहती है, तो बिजलीघर पूरी क्षमता से काम कर सकेंगे और बिजली उत्पादन में स्थिरता आएगी। इसका फायदा आम उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है।

छत्तीसगढ़ का हसदेव-अरण्य क्षेत्र, जहां कोल ब्लॉक के लिए मंजूरी मिली है।

छत्तीसगढ़ का हसदेव-अरण्य क्षेत्र, जहां कोल ब्लॉक के लिए मंजूरी मिली है।

हर साल 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता

राजस्थान में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट पर निर्भर है। खासतौर पर छबड़ा और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट राज्य की बिजली व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

इन बिजली संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने के लिए हर साल करीब 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होती है। मौजूदा कोयला स्रोतों से इतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही थी। इसके कारण हर साल करीब 90 लाख टन कोयले की कमी बनी हुई थी।

इसी कमी को पूरा करने और भविष्य में बिजली उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए राजस्थान को नए कोयला ब्लॉक की जरूरत पड़ी। केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक शुरू होने के बाद राज्य के बिजलीघरों को लंबे समय तक कोयले की नियमित आपूर्ति मिल सकेगी। इससे दूसरे राज्यों या खुले बाजार से महंगा कोयला खरीदने पर निर्भरता भी कम होगी और बिजली उत्पादन अधिक स्थिर हो सकेगा।

जंगल पर बड़ा असर पड़ेगा

केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र घने साल जंगलों और जैव विविधता के लिए जाना जाता है। परियोजना के लिए कुल 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग खनन के लिए किया जाएगा। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना से जंगल पर बड़ा असर पड़ेगा। हजारों पेड़ काटे जाएंगे।

हाथियों और वन्यजीवों के क्षेत्र में होगा खनन

हसदेव-अरण्य क्षेत्र केवल जंगल नहीं बल्कि वन्यजीवों का महत्वपूर्ण इलाका है। केंते एक्सटेंशन क्षेत्र के आसपास हाथी, तेंदुआ, स्लॉथ भालू, चीतल, लकड़बग्घा, सियार और पैंगोलिन जैसी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह क्षेत्र लेमरू हाथी रिजर्व के करीब 3.625 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यही वजह है कि परियोजना में वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए विशेष योजना लागू करने की शर्त रखी गई है।

राजस्थान की बिजली कंपनी पर आएगा आर्थिक भार

केंते एक्सटेंशन परियोजना से केवल कोयला नहीं मिलेगा, बल्कि इसके साथ कई आर्थिक जिम्मेदारियां भी RVUNL पर आएंगी। वन भूमि डायवर्जन के बदले कंपनी को नियमों के अनुसार नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) का भुगतान करना होगा। यह राशि वन क्षेत्र की श्रेणी और सरकार द्वारा निर्धारित दरों के अनुसार तय होगी। इसके अलावा वन भूमि के बदले 636.557 हेक्टेयर क्षेत्र में जितने जंगल का उपयोग बदलेगा, उसकी भरपाई के लिए नए वन विकसित करने की जिम्मेदारी भी राजस्थान की कंपनी की होगी।

वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए परियोजना में करीब 16.73 करोड़ रुपए का Wildlife Mitigation Plan लागू करना होगा। खनन से मिट्टी के कटाव और जल स्रोतों पर असर कम करने के लिए करीब 15.01 करोड़ रुपए के Soil and Moisture Conservation Plan का भी प्रावधान किया गया है।

मंजूरी मिली है, लेकिन कई शर्तों के साथ

केंते एक्सटेंशन को मिली मंजूरी अभी अंतिम खनन अनुमति नहीं है। यह स्टेज-1 सैद्धांतिक वन मंजूरी है, जिसमें कई शर्तें तय की गई हैं। खनन को दो चरणों में करने की योजना है। पहले चरण में करीब 1001.95 हेक्टेयर वन भूमि पर खनन किया जाएगा।

यह अवधि अधिकतम 15 साल तक होगी। इसके बाद दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन तभी आगे बढ़ेगा, जब पहले चरण में पर्यावरणीय शर्तों, जैव विविधता प्रबंधन की स्थिति संतोषजनक होगी। RVUNL को प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की जमीन से जुड़े रिकॉर्ड, वन विभाग की औपचारिकताएं और अन्य पर्यावरणीय शर्तें तय समय में पूरी करनी होंगी।

कोयला निकालना ही नहीं, राजस्थान तक पहुंचाना भी चुनौती

खदान शुरू होने के बाद सिर्फ कोयला निकालना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे राजस्थान के बिजली संयंत्रों तक पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था, वॉशरी, रेलवे कनेक्टिविटी और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। इस पूरी प्रक्रिया में पर्यावरणीय मंजूरियां और अतिरिक्त खर्च भी जुड़े होंगे।

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