Connect with us

छत्तीसगढ़

रायपुर : पर्यावरण संरक्षण, विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान, ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता के लिए रोटेरियन निभाएं सक्रिय भूमिका- डेका

Published

on

पर्यावरण संरक्षण, विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान, ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता के लिए रोटेरियन निभाएं सक्रिय भूमिका-श्री डेका
पर्यावरण संरक्षण, विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान, ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता के लिए रोटेरियन निभाएं सक्रिय भूमिका-श्री डेका

रायपुर। राज्यपाल रमेन डेका से आज रोटरी क्लब ग्रेटर रायपुर के सदस्यों ने लोक भवन में सौजन्य मुलाकात एवं चर्चा की। राज्यपाल ने उन्हें समाज हित से जुडे़ विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन दिया।

चर्चा के दौरान राज्यपाल ने रोटरी क्लब द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि यह एक संगठित और सेवा भावना से कार्य करने वाला संगठन है। उन्होंने कहा कि समाज के विकास और जनकल्याण के लिए सभी संस्थाओं और नागरिकों को मिलकर कार्य करना होगा।
राज्यपाल ने पर्यावरण संरक्षण को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए कहा कि रायपुर शहर में पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट और टाइल्स का घेरा बना दिया गया है, जिससे उनकी जड़ों तक पर्याप्त पानी और हवा नहीं पहुंच पाती। उन्होंने रोटेरियन से ऐसे घेरों को हटाने और पेड़ों को पुनर्जीवन देने के लिए सहयोग करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि यदि छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण और जल स्रोतों के संवर्धन के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राज्य को संभावित गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए अभी से जल स्रोतों के पुनर्जीवन और संरक्षण की दिशा में सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने रोटरी क्लब से इस अभियान में सक्रिय सहयोग करने का आग्रह किया।

राज्यपाल ने महिलाओं में बढ़ रहे ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि रोटेरियन इस दिशा में जनजागरूकता अभियान चलाकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने राज्य के विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान और विकास में भी रोटरी क्लब के सहयोग की अपेक्षा जताई। उन्होंने कहा कि विशेष पिछड़ी जनजातियों की संस्कृति छत्तीसगढ़ की मूल पहचान और धरोहर है, जिसे संरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने रोटेरियन से विशेष पिछड़ी जनजाति बाहुल्य गांवों को गोद लेकर वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सामाजिक विकास के क्षेत्र में कार्य करने का आग्रह किया। 
राज्यपाल ने कहा कि रोटरी क्लब सामूहिक रूप से तो उत्कृष्ट कार्य करते है, लेकिन प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत स्तर पर भी ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनमें लेने की अपेक्षा देने की भावना हो। इससे जीवन में आत्मिक संतोष और आनंद प्राप्त होता है तथा समाज का भी कल्याण होता है।

राज्यपाल ने कहा कि समाज में अनेक ऐसे अनसंग हीरो और हीरोइन हैं, जो बिना किसी प्रचार-प्रसार के उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। ऐसे लोगों को सामने लाकर सम्मानित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस कार्य में रोटरी क्लब महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र में वहां के लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में शासन द्वारा अच्छे कार्य किए जा रहे है। इसकी जानकारी देने और इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने में रोटेरियन सहयोग कर सकते हैं।

बैठक में रोटरी क्लब के अध्यक्ष रितेश जिंदल ने राज्यपाल श्री डेका का स्वागत किया। क्लब की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। 
इस अवसर पर राज्यपाल के सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना, रोटरी क्लब ग्रेटर रायपुर के सचिव प्रकाश अग्रवाल, क्लब के अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित थे।

Continue Reading

कोरबा

BALCO’s Health Initiatives Make Healthcare Accessible for 1.2 Lakh Individuals

Published

on

‘Making healthcare travel the extra mile to reach the last mile’
Balconagar. As healthcare systems continue to evolve, the challenge lies not only in expanding medical infrastructure but also in ensuring that quality healthcare reaches those who need it the most. In communities, where accessing medical care once meant travelling long distances, Bharat Aluminium Company Limited (BALCO)’s Mobile Health Van (MHV) and Project Arogya are helping bridge critical healthcare gaps. Together, these initiatives have benefitted over 1.2 lakh individuals in FY 26, strengthening access to healthcare services and promoting healthier communities.

For years, persistent joint pain slowly disrupted the daily life of 60-year-old Phool Mani Ekka from Parimarh village. Diagnosed with osteoarthritis, even travelling to a healthcare facility became difficult. Accessing treatment meant overcoming distance, physical discomfort, and financial constraints, barriers that often prevent rural patients from receiving timely care.

That changed when BALCO’s MHV began visiting her village. “Travelling for treatment was not possible for me. When the Mobile Health Van started visiting our village, I finally received medical consultation near my home. Today, my treatment is regular, and every visit helps me continue my physiotherapy and exercises under proper guidance,” recalls Phool Mani Ekka.

Her story reflects a broader challenge across rural India, where access to healthcare is often constrained by geography, affordability, and the availability of specialised services. In such settings, early diagnosis, regular follow-up, and preventive care become as important as treatment itself.

Highlighting the importance of collaborative efforts in strengthening healthcare delivery, Dr S.N. Keshari, Chief Medical & Health Officer (CMHO), Korba, said, “Our commitment is towards strengthening public healthcare systems in the grassroots of Chhattisgarh. Corporates including BALCO play a crucial role in complementing this effort. Its project Arogya and Mobile Health Van initiatives have ensured that care reaches the last mile person, thereby enhancing access to medical systems across the region.”

With a focus on improving healthcare accessibility, BALCO’s MHV operates through fortnightly visits across 70 nearby communities, delivering primary healthcare services closer to people’s homes. Recognising evolving healthcare needs, BALCO has further strengthened the programme by upgrading the MHV with physiotherapy services and essential laboratory facilities. Equipped to conduct over 40 diagnostic tests on-site, the initiative enables early screening, routine health monitoring, and timely medical intervention, particularly in areas with limited diagnostic infrastructure. In FY 26, more than 27,000 individuals benefitted through this programme.

Complementing these efforts, Project Arogya focuses on preventive and community healthcare through multi-speciality mega health camps, awareness programmes, and primary healthcare interventions. These programs address key health priorities, including maternal and child healthcare, malnutrition, anaemia reduction, and awareness on HIV, tuberculosis, and de-addiction by bringing specialised medical expertise closer to communities.

For Neha Kanwar, a resident of a village near Balconagar, Project Arogya became a catalyst for improving her daughter’s health and nutrition. “When I joined the project, my daughter Kavya was 2.5 years old and weighed only 11 kg. Through nutrition counselling and guidance provided by the project, I made simple changes to our daily meals. Within two months, her weight increased by 1.5 kg, and she gradually reached the normal weight range. Today, I encourage other mothers in my community to adopt similar practices. I am grateful to BALCO for this support,” she shares.

By bringing specialized medical expertise closer to communities while promoting health awareness and preventive practices, Project Arogya has benefited over 93,000 individuals in FY 26.

Together, these initiatives reflect BALCO’s commitment to strengthening community healthcare through a continuum-of-care approach that combines doorstep medical services, preventive healthcare, awareness, and access to specialised treatment. By addressing both immediate healthcare needs and long-term health outcomes, BALCO continues to contribute towards building healthier, more resilient communities.

Continue Reading

कोरबा

बालको की स्वास्थ्य पहल से 1.2 लाख लोगों तक पहुंची बेहतर चिकित्सा सेवाएं

Published

on

बालकोनगर। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में लगातार हो रहे विकास के बीच सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएं समाज के उन लोगों तक भी पहुंचें, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। ऐसे कई ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कभी इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। वहां भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की मोबाइल हेल्थ वैन (एमएचवी) और प्रोजेक्ट आरोग्य महत्वपूर्ण बदलाव ला रहे हैं। इनके माध्यम से वित्तवर्ष 2026 में लगभग 1.2 लाख लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल चुका है।

पाढ़ीमार गांव की 60 वर्षीय फूलमणि एक्का कई वर्षों से गठिया के कारण जोड़ों के दर्द से परेशान थीं। दर्द इतना बढ़ गया था कि उनके लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना भी कठिन हो गया था। दूरी, शारीरिक परेशानी और आर्थिक चुनौतियां उनके इलाज में बड़ी बाधा थीं।

फूलमणि बताती हैं, “मेरे लिए इलाज के लिए बाहर जाना संभव नहीं था। जब बालको की मोबाइल हेल्थ वैन हमारे गांव आने लगी, तब मुझे घर के पास ही डॉक्टरों की सलाह और उपचार मिलने लगा। अब मेरा इलाज नियमित रूप से हो रहा है और हर दौरे पर मुझे फिजियोथेरेपी एवं व्यायाम संबंधी सही मार्गदर्शन भी मिलता है।”

फूलमणि की कहानी ग्रामीण भारत की उस वास्तविकता को दर्शाती है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अक्सर दूरी, संसाधनों की कमी और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं के अभाव से प्रभावित होती है। ऐसे क्षेत्रों में समय पर जांच, नियमित परामर्श और निवारक स्वास्थ्य सेवाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

कोरबा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एस. एन. केशरी कहते हैं, “छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना हमारी प्राथमिकता है। इस दिशा में बालको जैसे उद्योग महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। प्रोजेक्ट आरोग्य और मोबाइल हेल्थ वैन के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं, जिससे क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और पहुंच दोनों में सुधार हुआ है।”

स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के करीब पहुंचाने के उद्देश्य से बालको की मोबाइल हेल्थ वैन आसपास के 70 गांवों एवं समुदाय में प्रत्येक पखवाड़े नियमित रूप से पहुंचती है। बदलती स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसमें फिजियोथेरेपी सेवाएं और प्रयोगशाला जांच सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं। वैन में 40 से अधिक प्रकार की जांच मौके पर ही की जा सकती हैं, जिससे समय रहते रोगों की पहचान, नियमित स्वास्थ्य निगरानी और आवश्यक उपचार सुनिश्चित हो पाता है। वित्तीय वर्ष 2026 में इस पहल से 27,000 से अधिक लोगों को लाभ मिला।

प्रोजेक्ट आरोग्य समुदाय आधारित और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष ध्यान देता है। इसके तहत स्वास्थ्य शिविर, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम तथा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं संचालित की जाती हैं। कार्यक्रम के माध्यम से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, कुपोषण, एनीमिया नियंत्रण, एचआईवी, टीबी तथा नशा मुक्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता और चिकित्सा सहायता प्रदान की जाती है।

बालकोनगर के समीप स्थित एक गांव की निवासी नेहा कंवर के लिए प्रोजेक्ट आरोग्य उनकी बेटी के स्वास्थ्य सुधार का आधार बना। वह बताती हैं, “जब मैं इस परियोजना से जुड़ी, तब मेरी ढाई वर्ष की बेटी काव्या का वजन केवल 11 किलो था। परियोजना के तहत मिले पोषण संबंधी मार्गदर्शन के बाद मैंने घर के भोजन में कुछ बदलाव किए। केवल दो महीनों में उसका वजन 1.5 किलो बढ़ गया और वह सामान्य वजन की श्रेणी में आ गई। आज मैं अपने गांव की अन्य माताओं को भी ऐसे उपाय अपनाने के लिए प्रेरित करती हूं। इसके लिए मैं बालको की आभारी हूं।”

स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को प्रोत्साहित करने और विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं को समुदायों तक पहुंचाने के माध्यम से प्रोजेक्ट आरोग्य ने वित्तीय वर्ष 2026 में 93,000 से अधिक लोगों को लाभान्वित किया।

मोबाइल हेल्थ वैन और प्रोजेक्ट आरोग्य दोनों मिलकर बालको की उस प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं, जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के द्वार तक पहुंचाने, जागरूकता बढ़ाने और बेहतर उपचार की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। शीघ्र स्वास्थ्य आवश्यकताओं के साथ-साथ दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुधार पर ध्यान केंद्रित करते हुए बालको स्वस्थ, सशक्त और आत्मनिर्भर समुदाय के निर्माण में निरंतर योगदान दे रहा है।

Continue Reading

छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के जंगलों से मिलेगी राजस्थान को बिजली:90 लाख टन कोयले की कमी दूर होगी, ये जयपुर को डेढ़ साल रोशन करने जितना

Published

on

जयपुर/सरगुजा, एजेंसी। राजस्थान में बिजली की बढ़ती मांग और कोयले की कमी के बीच राज्य सरकार को बड़ी राहत मिली है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) को छत्तीसगढ़ (सरगुजा) के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित केंते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल ब्लॉक के लिए केंद्र सरकार से वन भूमि उपयोग की सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है।

इससे राजस्थान के छबड़ा (बारां) और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट्स के लिए कोयले की आपूर्ति बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति की सिफारिश के बाद यह मंजूरी दी गई है।

परियोजना के तहत करीब 1743 हेक्टेयर वन भूमि को खनन (माइनिंग) के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। आसान भाषा में समझें तो यह क्षेत्र 80 से 200 बड़े क्रिकेट स्टेडियमों के बराबर माना जा सकता है।

इस कोयला खदान से अगले 33 से 36 साल तक करीब 90 लाख टन कोयला निकाला जा सकेगा। इसे छह चरणों में विकसित किया जाएगा।

जयपुर की 14-17 महीने की बिजली जरूरत के बराबर है यह कोयला

केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से निकलने वाला कोयला राजस्थान के अपने बिजली संयंत्रों (पावर प्लांट) में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे छबड़ा और सूरतगढ़ जैसे बड़े थर्मल पावर प्लांटों को कोयले की बेहतर और नियमित आपूर्ति मिल सकेगी।

आसान भाषा में समझें तो यह मात्रा जयपुर शहर की करीब 14 से 17 महीने की औसत बिजली जरूरत के बराबर मानी जा सकती है। हालांकि, इस कोयले से बनने वाली बिजली सीधे सिर्फ जयपुर को नहीं मिलेगी। यह बिजली राजस्थान के पूरे पावर ग्रिड का हिस्सा होगी।

यदि कोयले की सप्लाई लगातार बनी रहती है, तो बिजलीघर पूरी क्षमता से काम कर सकेंगे और बिजली उत्पादन में स्थिरता आएगी। इसका फायदा आम उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है।

छत्तीसगढ़ का हसदेव-अरण्य क्षेत्र, जहां कोल ब्लॉक के लिए मंजूरी मिली है।

छत्तीसगढ़ का हसदेव-अरण्य क्षेत्र, जहां कोल ब्लॉक के लिए मंजूरी मिली है।

हर साल 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता

राजस्थान में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट पर निर्भर है। खासतौर पर छबड़ा और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट राज्य की बिजली व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

इन बिजली संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने के लिए हर साल करीब 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होती है। मौजूदा कोयला स्रोतों से इतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही थी। इसके कारण हर साल करीब 90 लाख टन कोयले की कमी बनी हुई थी।

इसी कमी को पूरा करने और भविष्य में बिजली उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए राजस्थान को नए कोयला ब्लॉक की जरूरत पड़ी। केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक शुरू होने के बाद राज्य के बिजलीघरों को लंबे समय तक कोयले की नियमित आपूर्ति मिल सकेगी। इससे दूसरे राज्यों या खुले बाजार से महंगा कोयला खरीदने पर निर्भरता भी कम होगी और बिजली उत्पादन अधिक स्थिर हो सकेगा।

जंगल पर बड़ा असर पड़ेगा

केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र घने साल जंगलों और जैव विविधता के लिए जाना जाता है। परियोजना के लिए कुल 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग खनन के लिए किया जाएगा। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना से जंगल पर बड़ा असर पड़ेगा। हजारों पेड़ काटे जाएंगे।

हाथियों और वन्यजीवों के क्षेत्र में होगा खनन

हसदेव-अरण्य क्षेत्र केवल जंगल नहीं बल्कि वन्यजीवों का महत्वपूर्ण इलाका है। केंते एक्सटेंशन क्षेत्र के आसपास हाथी, तेंदुआ, स्लॉथ भालू, चीतल, लकड़बग्घा, सियार और पैंगोलिन जैसी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह क्षेत्र लेमरू हाथी रिजर्व के करीब 3.625 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यही वजह है कि परियोजना में वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए विशेष योजना लागू करने की शर्त रखी गई है।

राजस्थान की बिजली कंपनी पर आएगा आर्थिक भार

केंते एक्सटेंशन परियोजना से केवल कोयला नहीं मिलेगा, बल्कि इसके साथ कई आर्थिक जिम्मेदारियां भी RVUNL पर आएंगी। वन भूमि डायवर्जन के बदले कंपनी को नियमों के अनुसार नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) का भुगतान करना होगा। यह राशि वन क्षेत्र की श्रेणी और सरकार द्वारा निर्धारित दरों के अनुसार तय होगी। इसके अलावा वन भूमि के बदले 636.557 हेक्टेयर क्षेत्र में जितने जंगल का उपयोग बदलेगा, उसकी भरपाई के लिए नए वन विकसित करने की जिम्मेदारी भी राजस्थान की कंपनी की होगी।

वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए परियोजना में करीब 16.73 करोड़ रुपए का Wildlife Mitigation Plan लागू करना होगा। खनन से मिट्टी के कटाव और जल स्रोतों पर असर कम करने के लिए करीब 15.01 करोड़ रुपए के Soil and Moisture Conservation Plan का भी प्रावधान किया गया है।

मंजूरी मिली है, लेकिन कई शर्तों के साथ

केंते एक्सटेंशन को मिली मंजूरी अभी अंतिम खनन अनुमति नहीं है। यह स्टेज-1 सैद्धांतिक वन मंजूरी है, जिसमें कई शर्तें तय की गई हैं। खनन को दो चरणों में करने की योजना है। पहले चरण में करीब 1001.95 हेक्टेयर वन भूमि पर खनन किया जाएगा।

यह अवधि अधिकतम 15 साल तक होगी। इसके बाद दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन तभी आगे बढ़ेगा, जब पहले चरण में पर्यावरणीय शर्तों, जैव विविधता प्रबंधन की स्थिति संतोषजनक होगी। RVUNL को प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की जमीन से जुड़े रिकॉर्ड, वन विभाग की औपचारिकताएं और अन्य पर्यावरणीय शर्तें तय समय में पूरी करनी होंगी।

कोयला निकालना ही नहीं, राजस्थान तक पहुंचाना भी चुनौती

खदान शुरू होने के बाद सिर्फ कोयला निकालना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे राजस्थान के बिजली संयंत्रों तक पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था, वॉशरी, रेलवे कनेक्टिविटी और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। इस पूरी प्रक्रिया में पर्यावरणीय मंजूरियां और अतिरिक्त खर्च भी जुड़े होंगे।

Continue Reading
Advertisement

Trending

Copyright © 2020 Divya Akash | RNI- CHHHIN/2010/47078 | IN FRONT OF PRESS CLUB TILAK BHAVAN TP NAGAR KORBA 495677