विदेश
ट्रम्प का जापान पर अमेरिकी चावल खरीदने का दबाव:नाराज जापानी डेलीगेशन ने दौरा रद्द किया, भारत पर भी मांसाहारी दूध खरीदने का दबाव था
टोक्यो,एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जापान पर अमेरिकी चावल के लिए बाजार खोलने का दबाव बना रहे हैं। इस वजह से जापान के मुख्य वार्ताकार रयोसेई अकाजावा ने अमेरिका दौरा रद्द कर दिया है।
निक्केई एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अकाजावा 28 अगस्त को वॉशिंगटन डीसी का दौरा करने वाले थे, लेकिन ट्रम्प के अमेरिकी चावल खरीदने के दबाव के बाद उन्हें यह यात्रा रद्द करनी पड़ी।
अमेरिका ने इसी तरह का दबाव भारत पर भी बनाया था। अमेरिका चाहता था कि भारत उनकी मांसाहारी गायों का दूध खरीदे। साथ ही उनके किसानों के लिए भारत अपना मार्केट ओपन करे। लेकिन भारत ने इससे साफ इनकार कर दिया था।
इससे बाद अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिया था, जो बाद में बढ़कर 50% तक पहुंच गया।

अमेरिका-जापान में कुछ मुद्दों पर अभी सहमति नहीं बन पाई है, इस वजह से जापानी वार्ताकार रयोसेई अकाजावा का अमेरिका दौरा रद्द हो गया।
अमेरिका से टैरिफ घटने की उम्मीद नहीं, इसलिए यात्रा रद्द
निक्की एशिया के मुताबिक अकाजावा चाहते थे कि उनकी यात्रा से अमेरिका से यह लिखित वादा मिल जाए कि जापानी उत्पादों पर टैरिफ घटेगा, लेकिन जब यह साफ हो गया कि ऐसा नहीं होगा, तो उन्होंने यात्रा रद्द कर दी।
कई सरकारी अधिकारियों ने निक्केई एशिया से कहा कि ट्रम्प ने जापान पर दबाव डालकर पहले उससे टैरिफ कम कराया और फिर कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाने की शर्त रखी।
इसके बदले में जापान को उम्मीद थी कि अमेरिका ऑटोमोबाइल पर टैरिफ का बोझ कम करेगा, लेकिन ट्रम्प की तरफ से इसे लेकर कोई ठोस भरोसा नहीं मिला।
जापान का कहना है कि अमेरिका का रवैया उसकी घरेलू नीतियों में हस्तक्षेप है।
अकाजावा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अभी कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर अधिकारियों के स्तर पर और बातचीत की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि जब तक वार्ता आगे बढ़ती रहेगी, वे अमेरिका की यात्रा टाल रहे हैं, लेकिन संभव है कि भविष्य में फिर से जाएं।
दावा- जापान चावल कोटा में 75% बढ़ोतरी पर सहमति दे चुका है
रिपोर्ट के मुताबिक अगर जापान, अमेरिका से चावल की खरीद बढ़ाता है तो इससे उसके किसानों को नुकसान हो सकता है। इससे कृषि समुदाय नाराज भी हो सकता है।
इस बीच व्हाइट हाउस ने दावा किया कि जापान ने जुलाई में ही अमेरिकी चावल के आयात कोटा में 75% बढ़ोतरी पर सहमति दे दी थी। बाद में जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने साफ कहा कि उनका देश अमेरिकी दबाव में अपने किसानों के हितों का बलिदान नहीं करेगा।
अमेरिका-जापान को एक दूसरे पर भरोसा नहीं
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान और अमेरिका की बातचीत में मुख्य समस्या एक-दूसरे पर भरोसा न करना है। अमेरिका चाहता है कि जापान अपने 550 अरब डॉलर के इन्वेस्टमेंट के वादे को लिखित समझौते में बदले।
वहीं, जापान कह रहा है कि अगर उसे लिखित गारंटी चाहिए तो अमेरिका को भी यह लिखकर देना होगा कि जापानी ऑटो पर 15% टैरिफ तुरंत लागू नहीं होगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान और अमेरिका करीबी सहयोगी बने हुए हैं। 1951 में हुई सुरक्षा संधि के तहत अमेरिका जापान की रक्षा की जिम्मेदारी निभाता है, जबकि जापान एशिया में अमेरिकी रणनीतिक उपस्थिति का अहम हिस्सा है।
अमेरिका ने जापान से 148 अरब डॉलर का इम्पोर्ट किया
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका ने 2024 में जापान से लगभग 148 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि जापान ने अमेरिका से सिर्फ 80 अरब डॉलर का निर्यात किया।
जापान का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र कार और ऑटो पार्ट्स है, जो अमेरिकी ऑटोमोबाइल बाजार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रखते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और एडवांस तकनीक से जुड़े उत्पाद भी जापानी निर्यात का अहम हिस्सा हैं।
जापान की अर्थव्यवस्था कई मामलों में अमेरिका पर निर्भर है। प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा इसे ‘राष्ट्रीय संकट’ बता चुके हैं। जापान ने अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात कही, लेकिन सैन्य गठबंधन के कारण मजबूरन बातचीत कर रहा है।
भारत-अमेरिका में भी डेयरी प्रोडक्ट को लेकर मतभेद
जापान की तरह ही अमेरिका भारत में अपने डेयरी प्रोडक्ट्स (जैसे दूध, पनीर, घी आदि) को बेचने की इजाजत मांग रहा है। अमेरिकी कंपनियां दावा करती हैं कि उनका दूध स्वच्छ और गुणवत्ता वाला है और वो भारतीय बाजार में सस्ता भी पड़ सकता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और इस सेक्टर में करोड़ों छोटे किसान लगे हुए हैं। भारत सरकार को डर है कि अगर अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारत में आएंगे, तो वे स्थानीय किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसके अलावा, धार्मिक भावना भी जुड़ी हुई है। भारत में ज्यादातर लोग शुद्ध शाकाहारी दूध उत्पाद चाहते हैं, जबकि अमेरिका में कुछ डेयरी उत्पादों में जानवरों की हड्डियों से बने एंजाइम (जैसे रैनेट) का इस्तेमाल होता है।
इसलिए भारत की शर्त है कि कोई भी डेयरी उत्पाद तभी भारत में बिक सकता है जब वह यह प्रमाणित करे कि वह पूरी तरह शाकाहारी स्रोत से बना हो।

विदेश
ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट खोला, कमर्शियल जहाज गुजर सकेंगे
लेबनान में सीजफायर के बाद फैसला, ट्रम्प बोले- शुक्रिया, लेकिन ईरान की नाकाबंदी जारी रहेगी
तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन डीसी,एजेंसी। ईरान ने सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खोल दिया है। विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने X पर पोस्ट कर बताया कि सभी कमर्शियल जहाजों को गुजरने की इजाजत होगी। यह फैसला लेबनान में सीजफायर के बाद लिया गया है।

उन्होंने बताया कि जहाज एक सुरक्षित रास्ते से गुजरेंगे, जिसे ईरान के पोर्ट्स और मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन ने पहले से तय कर रखा है, ताकि सफर के दौरान कोई खतरा न हो। अराघची ने कहा कि इस दौरान जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी, ताकि समुद्री व्यापार प्रभावित न हो।
इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर ईरान को शुक्रिया कहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही होर्मजु स्ट्रेट खुल गया है लेकिन ईरान पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी और यह सिर्फ ईरान पर लागू होगी।

बिज़नस
आर्थिक स्थिति के सामान्य होने में अधिक समय लग सकता है: मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन
वाशिंगटन,एजेंसी। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर तेल की बढ़ती कीमतों के प्रभाव के बारे में बुधवार को चेताया और कहा कि स्थिति के सामान्य होने में अधिक समय लग सकता है। नागेश्वरन ने यहां ‘यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम’ द्वारा आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि वैश्विक संघर्ष का प्रभाव चार व्यापक क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता है – ऊर्जा की उच्च कीमतें, अन्य वस्तुओं की आपूर्ति में व्यवधान, रसद और बीमा लागत में वृद्धि तथा आपूर्ति प्रवाह में गिरावट।

नागेश्वरन ने यूएस-इंडिया इकोनॉमिक फोरम 2026 को संबोधित करते हुए कहा, ”इसलिए मुझे लगता है कि हमें संघर्ष की समाप्ति और आर्थिक गतिविधियों की सामान्य बहाली के लिए अधिक धैर्य रखने की आवश्यकता है।” उन्होंने कहा कि संघर्ष से उत्पन्न अनिश्चितता के व्यापक दायरे को समझना आवश्यक है, विशेष रूप से दक्षिण एशिया में और सामान्य तौर पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में। नागेश्वरन ने कहा, ”यह केवल तेल की कीमत का मामला नहीं है… यह उन वस्तुओं के बारे में है जो मायने रखती हैं।”

बिज़नस
IEA प्रमुख की चेतावनी, यूरोप के पास बचा सिर्फ 6 हफ्ते का ईंधन, फ्लाइट्स पर खतरा
पेरिस, एजेंसी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल ने बृहस्पतिवार को कहा कि यूरोप के पास ”संभवत: करीब छह हफ्ते का विमान ईंधन ही बचा है” और यदि ईरान युद्ध के कारण तेल आपूर्ति बाधित रहती है तो जल्द ही उड़ानें रद्द हो सकती हैं। आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने ‘एसोसिएटेड प्रेस’ (एपी) के साथ साक्षात्कार में पश्चिम संकट के वैश्विक प्रभावों की गंभीर स्थिति बयां करते हुए इसे ”अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट” करार दिया।

होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये तेल, गैस एवं अन्य महत्वपूर्ण आपूर्ति के बाधित होने से यह ऊर्जा संकट” उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, ”पहले ‘डायर (भयानक) स्ट्रेट्स’ नाम का एक समूह था। अब यह सचमुच एक ‘डायर स्ट्रेट’ बन गया है और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। यह जितना लंबा चलेगा, वैश्विक आर्थिक वृद्धि और महंगाई के लिए उतना ही खराब होगा।”
महंगा हो सकता है तेल-गैस
बिरोल ने कहा कि इसका प्रभाव “पेट्रोल (गैसोलीन) की ऊंची कीमतें, गैस की बढ़ती कीमतें और बिजली की महंगी दरों” के रूप में दिखाई देगा जबकि दुनिया के कुछ हिस्से दूसरों की तुलना में अधिक प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा, ”सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा” जो पश्चिम एशिया से ऊर्जा पर निर्भर हैं जिनमें जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल हैं।
बिरोल ने कहा, ”इसके बाद इसका प्रभाव यूरोप और अमेरिका पर पड़ेगा।” उन्होंने आगाह किया कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा नहीं खुलता है, तो ‘जल्द ही हम यह खबर सुन सकते हैं कि विमान ईंधन की कमी के कारण एक शहर से दूसरे शहर के लिए उड़ानें रद्द की जा सकती हैं।’

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