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Trump के रवैये से दुनिया परेशानः शांति का संदेश और नाकेबंदी पर सख्ती, हॉर्मुज से फिर लौटाए 38 जहाज

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तेहरान/तेल अवीव/वाशिंगठन, एजेंसी। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच अमेरिकी राष्टेरपति डोनाल्ड ट्रम्प का रवैया दुनिया के लिए समझ से बाहर होता जा रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वह ईरान के साथ संघर्ष को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर अमेरिका के कदम बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं।  अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी समुद्री कार्रवाई को और सख्त कर दिया है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, अमेरिकी सेना इस समय ईरानी बंदरगाहों के आसपास कड़ी निगरानी रख रही है और जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित कर रही है। इस कार्रवाई के तहत अब तक 38 जहाजों को वापस लौटने के लिए मजबूर किया गया है।

यह नाकेबंदी ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखने और गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन इसका सीधा असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ रहा है। इस पूरी कार्रवाई का सबसे बड़ा असर  हॉर्मुज स्ट्रेट पर पड़ रहा है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। यहां सख्ती बढ़ाने से न सिर्फ ईरान पर दबाव पड़ रहा है, बल्कि वैश्विक तेल और गैस सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रहा है। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका एक तरफ शांति वार्ता की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ ऐसे कदम उठाता है जो हालात को और बिगाड़ते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है या फिर वह दबाव की राजनीति के जरिए अपने हित साधना चाहता है।

इस बीच, ईरान कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है और उसने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को शांति प्रस्ताव भी भेजा है। लेकिन अमेरिका का सख्त रवैया इन प्रयासों को कमजोर कर सकता है। खासकर जब    ट्रम्प पहले ही पाकिस्तान में होने वाली अहम वार्ता को रद्द कर चुके हैं। हालांकि, इसके बावजूद कुछ नई उम्मीदें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अमेरिका को एक नया प्रस्ताव दिया है, जिसमें हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और युद्ध खत्म करने की बात कही गई है। इसके साथ ही ईरान ने सुझाव दिया है कि फिलहाल परमाणु वार्ता को टाल दिया जाए और पहले शांति और स्थिरता पर ध्यान दिया जाए। कुल मिलाकर, एक तरफ जहां अमेरिका की सख्त सैन्य कार्रवाई से दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक स्तर पर समाधान खोजने की कोशिशें भी जारी हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह संकट और गहराएगा या किसी समझौते की ओर बढ़ेगा।

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अमेरिका ने अब चीन पर निकाला गुस्साः सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कर दी बैन, 40 शिपिंग कंपनियां-तेल टैंकर भी बनाए निशाना

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वाशिंगठन/बीजिंग, एजेंसी। मध्य पूर्व में ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच, अमेरिका ने अब चीन के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने चीन की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी, हेंगली पेट्रोकेमिकल पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। इसके अलावा, लगभग 40 शिपिंग कंपनियों और तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया गया है। अमेरिका का आरोप है कि चीन लगातार ईरान से तेल खरीद रहा था, जबकि अमेरिका ने पहले ही तेहरान के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखे थे। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग का कहना है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की आय के मुख्य स्रोत तेल निर्यात को पूरी तरह से रोकना है, ताकि उस देश पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके।

हेंगली पेट्रोकेमिकल चीन की सबसे बड़ी रिफाइनरियों में से एक है, जो प्रतिदिन लगभग 400,000 बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करती है। अमेरिका का दावा है कि यह रिफाइनरी लंबे समय से ईरानी तेल का इस्तेमाल कर रही थी, और इसी वजह से इसे सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है। इस कार्रवाई के बाद चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। बीजिंग ने साफ तौर पर कहा है कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध करता है और अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। चीन द्वारा अपनाए गए इस रुख से दोनों देशों के बीच बढ़ रहा टकराव और भी गहरा सकता है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने चेतावनी दी है कि ईरानी तेल के व्यापार में शामिल किसी भी देश, कंपनी या जहाज के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि यह कदम मध्य पूर्व में ईरान की आक्रामकता को रोकने और उसके परमाणु कार्यक्रम पर दबाव डालने के लिए उठाया गया है। यह कार्रवाई उन जहाजों और कंपनियों को भी निशाना बनाती है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे ईरान के तथाकथित “शैडो फ्लीट” (गुप्त बेड़े) का हिस्सा हैं। यह नेटवर्क गुप्त रूप से तेल की खेप भेजने में मदद करता है, जिससे ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचते हुए अपने व्यापारिक कार्यों को जारी रख पाता है। कुल मिलाकर, अमेरिका का यह कदम केवल ईरान तक ही सीमित नहीं है; बल्कि इसने अमेरिका-चीन संबंधों में भी तनाव बढ़ा दिया है। इस घटनाक्रम के परिणाम निकट भविष्य में वैश्विक तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देने की संभावना है।

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एक और युद्धविराम खटाई मेंः लेबनान में स्ट्राइक बाद हिज़्बुल्ला का बड़ा ऐलान, इजरायल संग सीधी बातचीत से इंकार

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यरूशलेम, एजेंसी। मध्य पूर्व में तनाव कम होने के बजाय, एक बार फिर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। हिज़्बुल्लाह के उप-प्रमुख नईम कासिम ने यह साफ कर दिया है कि उनका संगठन इज़रायल के साथ किसी भी तरह की सीधी बातचीत के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि “सीधी बातचीत का तो सवाल ही नहीं उठता” और हिज़्बुल्लाह अपने हथियार नहीं डालेगा। कासिम ने यह भी  कहा कि उनका संगठन इजरायली “आक्रामकता” का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। लेबनानी सरकार की आलोचना करते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि उसने कुछ फ़ैसले जल्दबाज़ी में लिए हैं और उसे सीधी बातचीत के बजाय अप्रत्यक्ष बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए था।

दूसरी ओर, इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने दक्षिणी लेबनान में कई सैन्य अभियान चलाने का दावा किया है। इजरायली सेना के अनुसार, उनके सैनिकों ने तीन ऐसे लोगों को निशाना बनाया जिनसे उन्हें “तत्काल खतरा” था, और उन्हें एक हवाई हमले में मार गिराया गया। IDF ने आगे बताया कि उसने हिज़्बुल्लाह के कई ठिकानों पर हमले किए, जिनमें बिंत जबील सेक्टर में संगठन का मुख्यालय भी शामिल है। इन हमलों के बाद वहां दूसरे धमाके भी हुए, जो इस बात का संकेत हैं कि उन जगहों पर हथियारों के जखीरे मौजूद थे।

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी हिज़्बुल्लाह पर संघर्ष-विराम का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि हिज़्बुल्लाह की गतिविधियों से संघर्ष-विराम कमजोर पड़ रहा है और इजरायल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाना जारी रखेगा। यह ध्यान देने योग्य है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष-विराम को तीन हफ़्ते के लिए बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। कुल मिलाकर, जहाँ एक ओर हिज़्बुल्लाह बातचीत करने से इनकार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इजरायल सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए है। इन परिस्थितियों में, यह साफ है कि संघर्ष-विराम के बावजूद इस क्षेत्र में स्थायी शांति अभी भी एक दूर की संभावना बनी हुई है।

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अंधेरे में रोशनी की किरणः अमेरिका-ईरान युद्ध अब अंत की ओर, दोनों देशों ने दिए सकारात्मक संकेत

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तेहरान/तेल अवीव/वाशिंगठन, एजेंसी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में कुछ सकारात्मक संकेत नजर आने लगे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष (indirect) बातचीत में प्रगति हो रही है और अब हालात ऐसे हैं कि “टनल के अंत में रोशनी” दिखाई देने लगी है। यह बातचीत सीधे नहीं, बल्कि तीसरे देशों के जरिए हो रही है। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान एक अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने हाल ही में पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक नया प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में मुख्य तौर पर दो बड़ी बातें शामिल हैं पहली, Strait of Hormuz को फिर से खोलना और दूसरी, चल रहे युद्ध को खत्म करना।

यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है। अगर इसे खोल दिया जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट में बड़ी राहत मिल सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान चाहता है कि पहले इस क्षेत्र में तनाव कम किया जाए और समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाया जाए, उसके बाद ही आगे की बातचीत हो। इस योजना के तहत ईरान ने यह भी सुझाव दिया है कि फिलहाल परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत को टाल दिया जाए। यानी पहले युद्धविराम या स्थायी शांति स्थापित की जाए और फिर न्यूक्लियर डील जैसे जटिल मुद्दों पर चर्चा की जाए। यह ईरान की एक रणनीतिक चाल मानी जा रही है, जिससे वह पहले अपने ऊपर लगे दबाव को कम करना चाहता है।

अमेरिका की तरफ से भी कुछ संकेत मिले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने कहा है कि अगर ईरान बातचीत करना चाहता है, तो वह सीधे संपर्क कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि यह संघर्ष जल्द खत्म हो सकता है, लेकिन उन्होंने यह साफ कर दिया कि कोई भी समझौता अमेरिका के हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा। रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक लिखित संदेश भेजा है, जिसमें अपनी “रेड लाइन्स” यानी स्पष्ट शर्तें बताई गई हैं। इनमें खास तौर पर हॉर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस पर ज्यादा टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है और इसे संवेदनशील मामला बताया है। यह नई पहल ऐसे समय में आई है जब पहले की बातचीत लगभग ठप हो चुकी थी। हाल ही में Donald Trump ने अपने विशेष दूतों की पाकिस्तान यात्रा भी रद्द कर दी थी। इसके बावजूद अब जो नए संकेत सामने आ रहे हैं, वे यह दिखाते हैं कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच अभी सीधी बातचीत नहीं हो रही है, लेकिन परोक्ष रूप से चल रही बातचीत में कुछ सकारात्मक प्रगति जरूर हुई है। अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो आने वाले समय में पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक स्तर पर भी इसका असर दिखाई देगा।

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