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दुर्लभ खनिज ऑक्साइड निर्यात पर पुनर्विचार, भारत-जापान समझौते की नई शर्तों पर मंथन
मुंबई, एजेंसी। भारत सरकार जापान के साथ 2012 में हुए दुर्लभ खनिज ऑक्साइड निर्यात समझौते की शर्तों पर नए सिरे से विचार कर रही है। यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है जब घरेलू उद्योगों को चीन से मैग्नेट की आपूर्ति में रुकावट के चलते कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
समझौते के तहत, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई IREL इंडिया लिमिटेड जापान की टोयोटा त्सुशो को दुर्लभ खनिज ऑक्साइड निर्यात करती है, जिसे बाद में परिष्कृत कर मैग्नेट के रूप में जापान को आपूर्ति किया जाता है। इन मैग्नेट का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, एयरोस्पेस और रक्षा उपकरणों में होता है।
सूत्रों के मुताबिक, अब भारत इस समझौते को अधिक संतुलित और पारस्परिक लाभकारी बनाना चाहता है। सरकार से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, “हमने सालों से निर्यात किया है, लेकिन बदले में कुछ खास नहीं मिला। अब हमारी मांग है कि अगर जापान हमारे दुर्लभ खनिज ले रहा है, तो वह बदले में हमें मैग्नेट की आपूर्ति करे या तकनीक साझा करे।”
घरेलू उद्योगों की मांग और रणनीतिक दबाव
वाहन उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “भारत मैग्नेट उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है और हमारी लगभग 30-40% जरूरतें आयात से पूरी होती हैं। जापान इस मामले में हम पर निर्भर है, इसलिए हमें एक ऐसी साझेदारी चाहिए जिसमें तकनीकी सहयोग और स्थानीय उत्पादन दोनों शामिल हों।
भारत सरकार की योजना है कि जापान के साथ मिलकर मैग्नेट निर्माण का संयुक्त ढांचा तैयार किया जाए। प्रस्ताव यह भी है कि जापान कुछ मैग्नेट खुद बनाए और शेष का उत्पादन भारत में किया जाए।
भविष्य की संभावनाएं और उत्पादन क्षमता
भारत में दुर्लभ खनिजों का मुख्य स्रोत मोनाजाइट रेत है, जो आंध्र प्रदेश, केरल, ओडिशा और तमिलनाडु में पाई जाती है। विशेष रूप से केरल की रेत अत्यधिक समृद्ध मानी जाती है। मोनाजाइट में नियोडिमियम और प्रेजोडिमियम जैसे खनिज मौजूद होते हैं, जो उच्च गुणवत्ता के मैग्नेट के लिए जरूरी हैं।
फिलहाल भारत का वार्षिक मोनाजाइट उत्पादन लगभग 5,000 टन है, जबकि IREL की परिष्कृत करने की क्षमता 10,000 टन तक है। सरकार ने 2032 तक इस क्षमता को 5 करोड़ टन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।
जापान की प्रतिक्रिया
जापानी दूतावास के एक अधिकारी ने इस विषय पर कहा, “हम भारत से कच्चा माल आयात कर उसे परिष्कृत करते हैं और मैग्नेट बनाते हैं। हम भारत को भी मैग्नेट निर्यात करते हैं, हालांकि मात्रा अभी सीमित है। यह विषय हमारी सरकार के साथ विचाराधीन है।”
संभावित समझौता: भारत के लिए रणनीतिक अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अब रणनीतिक बढ़त है क्योंकि जापान के पास दुर्लभ खनिजों का अपना स्रोत नहीं है। अगर भारत समझदारी से बातचीत करता है, तो यह देश के लिए तकनीकी सहयोग, स्थानीय उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रमुख स्थान पाने का अवसर हो सकता है।
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Indian Currency: RBI के फैसलों से रुपए ने भरी उड़ान, डॉलर के मुकाबले जोरदार उछला
मुंबई, एजेंसी। रुपया शुक्रवार को 81 पैसे के उछाल के साथ 94.93 (अस्थायी) प्रति डॉलर पर रहा। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के विदेशी पूंजी प्रवाह को समर्थन देने और विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत करने के लिए कदम उठाने के बाद घरेलू मुद्रा को समर्थन मिला। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 95.72 प्रति डॉलर पर खुला। कारोबार के दौरान 94.89 के उच्च स्तर तक पहुंचा और अंततः 94.93 (अस्थायी) पर बंद हुआ जो पिछले बंद स्तर से 81 पैसे की मजबूती है। रुपया बृहस्पतिवार को दो पैसे की बढ़त के साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.74 पर बंद हुआ था।

चालू वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने सर्वसम्मति से नीतिगत दर रेपो को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने और तटस्थ रुख बनाए रखने का निर्णय लिया है। कोटक सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख (जिंस एवं मुद्रा) अनिंद्य बनर्जी ने कहा, ”रेपो दर को तटस्थ रुख के साथ 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने और चालू वित्त वर्ष के लिए मुद्रास्फीति अनुमान को बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत करने से आरबीआई ने स्पष्ट कर दिया है कि दर नीति का उपयोग महंगाई नियंत्रण के लिए होगा और रुपए की रक्षा पूंजी खाते के माध्यम से की जाएगी।”
इस बीच, दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक 0.19 प्रतिशत की गिरावट के साथ 99.22 पर रहा। घरेलू शेयर बाजारों में सेंसेक्स 116.67 अंक टूटकर 74,243.34 अंक पर जबकि निफ्टी 49.85 अंक फिसलकर 23,366.70 अंक पर बंद हुआ। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 0.29 प्रतिशत की गिरावट के साथ 94.75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बृहस्पतिवार को शुद्ध बिकवाल रहे और उन्होंने 4,447.06 करोड़ रुपए के शेयर बेचे।
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Indian Economy के लिए अच्छी खबर, GDP ग्रोथ उम्मीदों से बेहतर
मुंबई, एजेंसी। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत अच्छी खबर आई है। देश की आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। भारत की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो 2024-25 के आंकड़े 7.1 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह जानकारी शुक्रवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों में दी गई।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की जनवरी-मार्च तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
मंत्रालय ने कहा कि स्थिर कीमतों पर जीडीपी का आकार वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 323.12 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है, जो 2024-25 के पहले संशोधित अनुमान 299.89 लाख करोड़ रुपए से अधिक है। वहीं, मौजूदा कीमतों पर जीडीपी का आकार 2025-26 में 346.36 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है, जो 2024-25 के 318.07 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले 8.9 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
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Polymer Currency: देश में जल्द दिखेंगे प्लास्टिक के नोट, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा का पॉलीमर करेंसी पर दिया ये बड़ा बयान
मुंबई, एजेंसी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गर्वनर संजय मल्होत्रा ने पॉलीमर करेंसी को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। संजय ने कहा केंद्रीय बैंक भारत में कागजी नोटों की जगह पॉलीमर (प्लास्टिक) के करेंसी नोट पेश करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसी के साथ उन्होंने यह भी साफ किया है कि यह योजना अभी अपने शुरुआती चरण में है।

2012 में भी किया गया था ट्रायल
जानकारी के लिए बता दें कि देश में साल 2012 में 5 शहरों जयपुर, कोच्चि, शिमला, मैसूर और भुवनेश्वर में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक पायलट प्रोजेक्ट (टेस्ट) शुरू किया था। उस समय पर ATM और नोट गिनने वाली मशीनों में तकनीकी दिक्कतें आने के कारण इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया जा सका था।
क्या होती है पॉलीमर करेंसी?
पारंपरिक कागजी नोट कपास से तैयार किए जाते हैं, जबकि पॉलीमर नोट एक पतले और लचीले प्लास्टिक सबस्ट्रेट से बनते हैं। इसे BOPP (Bi-axially Oriented Polypropylene) कहा जाता है। इन्हें कागजी नोट की तरह आसानी से मोड़ा जा सकता है और जेब में रखा जा सकता है।
पॉलीमर करेंसी की खासियत
आरबीआई का इस तकनीक की ओर झुकाव होने के पीछे कई मुख्य कारण हैं:
- कागजी नोटों के कंपेरिजन में ये ज्यादा देर तक चलते हैं।
- यह नोट साफ- सुथरे होते हैं यानि की इन पर नमी, पानी या गंदगी का कोई असर नहीं होता, जिससे ये साफ-सुथरे बने रहते हैं।
- लंबी उम्र के कारण इन्हें बार-बार छापने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे सरकार और आरबीआई का छपाई खर्च कम होता है।
दुनिया के कई देशों में है इसका चलन
भारत से पहले ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और रोमानिया में ये प्लास्टिक मुद्रा सफलतापूर्वक चल रही है।
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