विदेश
ईद से पहले पाकिस्तान में ट्रांसपोर्ट सिस्टम ध्वस्त; बसें कम और किराया डबल, यात्रा बनी लोगों के लिए मुसीबत
इस्लामाबाद,एजेंसी। ईद-उल-अजहा से पहले पाकिस्तान में ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। रावलपिंडी और इस्लामाबाद के बड़े बस अड्डों पर हजारों यात्री घंटों तक फंसे रहे। लोगों को बसों की भारी कमी, महंगे किराए और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, पिरवधाई बस टर्मिनल समेत कई प्रमुख ट्रांसपोर्ट हब पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। ईद की छुट्टियों से पहले लोग अपने घरों को लौटना चाहते थे, लेकिन पर्याप्त बसें उपलब्ध नहीं थीं। मुल्तान, मियांवाली, लैय्या और कोट अड्डू जैसे रूटों पर हालात सबसे ज्यादा खराब रहे। परिवारों को कई-कई घंटे बसों का इंतजार करना पड़ा। यात्रियों ने आरोप लगाया कि ट्रांसपोर्टर खुलेआम तय किराए से लगभग दोगुना पैसा वसूल रहे थे।

एक मजदूर करीम ने बताया कि वह कई घंटों से बस का इंतजार कर रहा है और किराया सामान्य से लगभग दोगुना लिया जा रहा है। वहीं अफजल नाम के यात्री ने कहा कि उनका 10 लोगों का परिवार सुबह 4 बजे से पिरवधाई टर्मिनल पर मौजूद था, लेकिन दोपहर तक भी कोई बस नहीं मिली। यात्रियों ने यह भी आरोप लगाया कि ट्रांसपोर्ट कंपनियां ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए बसों और वैगनों में जरूरत से ज्यादा लोगों को भर रही थीं। लोगों का कहना है कि ओवरलोडिंग से हादसों का खतरा काफी बढ़ गया है। इस पूरे मामले ने पाकिस्तान में खराब ट्रांसपोर्ट प्लानिंग और प्रशासनिक लापरवाही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हर साल ईद और अन्य त्योहारों के दौरान ऐसी शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन हालात में सुधार नहीं दिखता।
ट्रांसपोर्टरों ने सफाई देते हुए कहा कि बसें आते ही तुरंत रवाना की जा रही हैं, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि वाहनों की भारी कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। बढ़ती शिकायतों के बाद रीजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, मोटरवे पुलिस और सिटी ट्रैफिक पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। अधिकारियों ने ओवरलोडिंग और ज्यादा किराया वसूलने वाले ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ अभियान चलाया। मोटरवे पुलिस के प्रवक्ता साकिब वहीद ने बताया कि अतिरिक्त वसूले गए करीब 26 लाख रुपये यात्रियों को वापस कराए गए। इसके अलावा ओवरलोडिंग, ओवरचार्जिंग और अधूरे दस्तावेजों से जुड़े मामलों में 9 हजार से ज्यादा चालान काटे गए। हालांकि लोगों का कहना है कि प्रशासन की कार्रवाई बहुत देर से शुरू हुई और इससे पहले हजारों यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी।
विदेश
ईरान पर हमलों खिलाफ अमेरिका में बगावतः सीनेटर बोले- वादे तोड़कर देश को नए अंतहीन युद्ध में झोंक रहे ट्रंप
वाशिंगठन, एजेंसी। अमेरिका में ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेटर मार्क वार्नर (Mark Warner0 ने ट्रंप पर नया “फॉरएवर वॉर” यानी अंतहीन युद्ध शुरू करने का आरोप लगाया है। मार्क वॉर्नर, जो अमेरिकी सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी के उपाध्यक्ष भी हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि युद्ध खत्म होने वाला है, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका अब भी ईरान पर हमले कर रहा है। वॉर्नर ने कहा कि ट्रंप अपने वादे तोड़ रहे हैं, नए अंतहीन युद्ध शुरू कर रहे हैं और आम लोगों के खर्च बढ़ा रहे हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है।

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बातचीत धीमी गति से आगे बढ़ रही है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका में जनता भी लंबे सैन्य अभियान के पक्ष में नहीं दिख रही। एक सर्वे में केवल 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अमेरिकी सैन्य अभियान तब तक जारी रहना चाहिए जब तक अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल न कर ले। वहीं 61 प्रतिशत लोगों ने सीमित समय के भीतर अभियान खत्म करने का समर्थन किया। एक अन्य सर्वे में 52 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं भी हो पाता है, तब भी अमेरिका को सैन्य कार्रवाई बंद कर देनी चाहिए। केवल 37 प्रतिशत लोग ही आगे सैन्य अभियान जारी रखने के पक्ष में दिखे।
इस बीच अमेरिकी सेना ने हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरानी मिसाइल लॉन्च साइट्स और बारूदी सुरंग बिछाने की कोशिश कर रही नौकाओं पर हमले किए थे। अमेरिकी सेना ने इन्हें “आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई” बताया। इसके जवाब में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरान का कहना है कि होर्मुज क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते के मसौदे में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों की भाषा को लेकर अब भी विवाद बना हुआ है। इसी कारण समझौते को अंतिम रूप देने में देरी हो रही है।
देश
भारत-नेपाल के बीच अब चाय बनी दरार, सख्ती के बाद शुरू हो गया नया विवाद
नई दिल्ली/काठमांडू, एजेंसी। भारत-नेपाल के बीच इन दिनों चाय को लेकर नया विवाद बढ़ता दिखाई दे रहा है। नेपाल का आरोप है कि भारत लगातार नेपाली चाय के आयात पर सख्ती बढ़ा रहा है, जबकि भारत का कहना है कि दार्जिलिंग चाय के नाम और गुणवत्ता की सुरक्षा जरूरी है। अब इस पूरे विवाद को दोनों देशों के बीच “चाय की जंग” कहा जाने लगा है।

क्या है पूरा मामला?
नेपाल बड़ी मात्रा में ऑर्थोडॉक्स चाय भारत को निर्यात करता है। नेपाल की बड़ी चाय मंडियां झापा और इलाम क्षेत्रों में हैं। नेपाल का दावा है कि उसकी करीब 80 प्रतिशत चाय भारतीय बाजार में बिकती है। हर साल लगभग 10 मिलियन किलोग्राम चाय भारत भेजी जाती है। लेकिन भारत ने हाल के वर्षों में नेपाली चाय पर कई नियम और टेस्टिंग सख्त कर दिए हैं। अप्रैल 2024 में भारतीय अधिकारियों ने नेपाली चाय की 100 प्रतिशत सैंपल टेस्टिंग अनिवार्य कर दी। यानि हर खेप की जांच के बाद ही उसे भारतीय बाजार में प्रवेश मिल सकता है। इसके बाद मई 2026 से कुछ नए प्रतिबंध भी लागू किए गए। ममता बैनर्जी Mamata Banerjee ने भी कहा था कि नेपाल से बिना शुल्क आने वाली चाय दार्जिलिंग ब्रांड को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से नेपाली चाय को दी गई कर छूट वापस लेने की मांग की थी।
दार्जिलिंग चाय क्यों बनी विवाद ?
Darjeeling tea दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चायों में गिनी जाती है। इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और ब्रांड वैल्यू बहुत बड़ी है। भारतीय पक्ष का आरोप है कि कुछ व्यापारी नेपाली चाय को दार्जिलिंग चाय के नाम से बेचते हैं, जिससे असली दार्जिलिंग ब्रांड की पहचान कमजोर होती है। इसी वजह से भारत गुणवत्ता और ब्रांड सुरक्षा के नाम पर सख्ती कर रहा है। नेपाल के चाय कारोबारी और अधिकारी भारत के कदमों को “व्यापारिक दबाव” बता रहे हैं। उनका कहना है कि भारत जानबूझकर देरी करता है। बार-बार टेस्टिंग से व्यापार प्रभावित होता है और यह नेपाल-भारत व्यापार संधि की भावना के खिलाफ है। नेपाल के कारोबारी उदय चपागाईं का कहना है कि अगर भारत को वास्तव में गुणवत्ता की चिंता होती, तो वह सीमा पर आधुनिक लैब बना सकता था। उनके अनुसार भारत का असली मकसद नेपाली चाय की प्रतिस्पर्धा को रोकना है।
असली विवाद बाजार हिस्सेदारी
नेपाल टी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के नेताओं का मानना है कि असली विवाद बाजार हिस्सेदारी का है। विशेषज्ञों के अनुसार दार्जिलिंग चाय का उत्पादन सीमित है और वैश्विक मांग बहुत ज्यादा है। नेपाली ऑर्थोडॉक्स चाय सस्ती और ज्यादा उपलब्ध है। ऐसे में नेपाली चाय अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से जगह बना रही है।नेपाल का मानना है कि भारत को डर है कि नेपाली चाय की अलग पहचान बनने से दार्जिलिंग चाय का बाजार कमजोर पड़ सकता है।
नेपाल की भारत पर बड़ी निर्भरता
नेपाल की चाय इंडस्ट्री काफी हद तक भारत पर निर्भर है। नेपाल के नेशनल टी एंड कॉफी डेवलपमेंट बोर्ड के अनुसार नेपाल हर साल 27.5 मिलियन किलोग्राम चाय पैदा करता है जिससे करीब 60,000 लोगों को रोजगार मिलता है। 20,000 हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती होती है। नेपाल के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है, इसलिए भारतीय प्रतिबंध वहां के किसानों और निर्यातकों के लिए बड़ी चिंता बन गए हैं।
बढ़ सकता तनाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह विवाद बढ़ता है तो दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। नेपाली किसानों को बड़ा नुकसान हो सकता है। दार्जिलिंग और नेपाली चाय के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। हालांकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा और गहरे आर्थिक संबंधों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाएगा।
विदेश
पाकिस्तान का ट्रंप को करारा जवाबः अब्राहम समझौते से किया साफ इंकार, कहा-इजराइल से दोस्ती कभी नहीं
इस्लामाबाद,एजेंसी। पाकिस्तान ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपील को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अब्राहम समझौते में शामिल होकर इजराइल से रिश्ते सामान्य करने से इनकार करते हुए कहा कि यह पाकिस्तान की “मूल विचारधारा” के खिलाफ है। फिलिस्तीन मुद्दे पर अपना पुराना रुख दोहराते हुए पाकिस्तान ने साफ संकेत दिया कि वह इजराइल से दोस्ती के लिए फिलहाल तैयार नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि वह इस्लामाबाद के अब्राहम समझौते में शामिल होकर इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के पक्ष में नहीं हैं।

उनकी यह टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ शांति वार्ता में शामिल देशों से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने को कहा था। यह समझौता इजराइल और अरब देशों के बीच कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित करने को लेकर है। सोमवार रात ‘समा टीवी’ पर एक साक्षात्कार के दौरान आसिफ ने कहा, ”व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि हमें किसी ऐसे समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी मूल विचारधारा के खिलाफ हो।” वार्ताकारों में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन पहले से ही इस समझौते के सदस्य हैं, और ट्रंप को सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र और जॉर्डन के भी इस पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि उनका देश लंबे समय से इस रुख पर कायम है कि 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना होने तक वह इज़राइल को मान्यता नहीं देगा।
उन्होंने कहा, ”हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि यह हमें स्वीकार नहीं है।” मंत्री ने विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा, ”आप उन लोगों के साथ कैसे बैठेंगे जिनके शब्द पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं किया जा सकता?” उन्होंने पाकिस्तान के पासपोर्ट का भी जिक्र किया, जिस पर लिखा है कि यह इजराइल की यात्रा के लिए वैध नहीं है। आसिफ उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के किसी भी विचार का कड़ा विरोध करते हैं। पिछले माह उन्होंने इजराइल को ”मानवता के लिए अभिशाप” बताया था और उस पर क्षेत्र में नरसंहार करने का आरोप लगाया था।
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