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भारत और कनाडा रिश्तों में नई गर्माहट, मोदी-कार्नी की नजदीकियां बनीं चर्चा का विषय

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नई दिल्ली, एजेंसी। भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस कूटर ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी  के बीच मजबूत व्यक्तिगत तालमेल दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। बातचीत में कूटर ने कहा कि पिछले दो वर्षों में आई कूटनीतिक चुनौतियों के बावजूद अब भारत और कनाडा के संबंध फिर से सकारात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं। कूटर ने बताया कि मोदी और कार्नी अब तक चार बार मुलाकात कर चुके हैं। हाल ही में दोनों नेताओं ने फ्रांस के एवियन में आयोजित G7 Summit के दौरान भी बातचीत की थी। 

उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा,  “दोनों प्रधानमंत्री कई बार मिल चुके हैं, फोन पर भी बातचीत करते हैं और शायद व्हाट्सएप पर भी संपर्क में रहते होंगे।” कूटर के अनुसार दोनों नेताओं में एक समानता है वे परिणाम चाहते हैं और तेजी से निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं। कनाडाई उच्चायुक्त ने कहा कि कनाडा अपनी वैश्विक साझेदारियों को विविध बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है और भारत इस रणनीति का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें शामिल होंगे 

  • निवेश
  • ऊर्जा सुरक्षा
  • खाद्य सुरक्षा
  • तकनीकी सहयोग
  • भू-राजनीतिक साझेदारी
  • सुरक्षा सहयोग में भी आया सुधार

भारत और कनाडा के बीच पिछले वर्षों में सुरक्षा संबंधी मुद्दों को लेकर तनाव देखने को मिला था। हालांकि कूटर का कहना है कि अब दोनों देशों ने ऐसे मुद्दों पर काम करने के लिए एक स्पष्ट और व्यवस्थित प्रक्रिया विकसित कर ली है। उन्होंने कहा,  “दोनों देशों की एजेंसियां अब एक-दूसरे के कामकाज को बेहतर समझती हैं और इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि किसी भी पक्ष को अप्रत्याशित स्थिति का सामना न करना पड़े।” कूटर ने बताया कि प्रधानमंत्री कार्नी ने हाल ही में World Economic Forum के दौरान दिए अपने भाषण में ऐसे देशों के बीच सहयोग की बात की थी जो वैश्विक महाशक्तियां नहीं हैं लेकिन अपनी संप्रभुता और हितों की रक्षा करना चाहते हैं। उनके अनुसार भारत और कनाडा इसी सोच के तहत लचीली और व्यावहारिक साझेदारी विकसित कर रहे हैं।

हाल ही में फ्रांस में आयोजित G7 Summit के इतर मोदी और कार्नी ने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की। दोनों नेताओं ने आर्थिक सहयोग बढ़ाने,  व्यापारिक अवसरों को मजबूत करने,  ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने,  खाद्य सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह सकारात्मक माहौल जारी रहता है तो भारत और कनाडा के बीच व्यापार, निवेश, शिक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों के तनाव के बाद दोनों देशों के संबंधों में यह सुधार एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव माना जा रहा है।

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सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की भारत को धमकी:रक्षामंत्री बोले- जिस पल पानी पर खतरा लगा, हम जंग शुरू कर देंगे

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इस्लामाबाद, एजेंसी। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु जल संधि स्थगित रहने को लेकर भारत को धमकी दी है। पाकिस्तानी चैनल ARY न्यूज से बातचीत में आसिफ ने कहा कि अगर पाकिस्तान को लगा कि उसकी जल सुरक्षा खतरे में है, तो वह भारत के खिलाफ जंग छेड़ सकता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह में दखल दे रहा है और रणनीतिक हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले एक साल में इस मामले में क्या नए घटनाक्रम हुए हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं है।

अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि बहाल नहीं की जाएगी।

गंभीर जल संकट का सामना कर रहा पाकिस्तान

रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। खासकर सिंध और बलूचिस्तान में पानी की कमी लगातार बढ़ रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक-

  • नॉर्थ वेस्ट कैनाल में 64.1% पानी की कमी है।
  • राइस कैनाल में 38% की कमी दर्ज की गई है।
  • दादू कैनाल में 82% तक पानी की कमी है।

पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था के अहम हिस्से सुक्कुर बैराज को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। पानी का स्तर लगातार घटने से कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

भारत-पाकिस्तान के बीच का सिंधु जल समझौता क्या है?

सिंधु नदी प्रणाली में कुल 6 नदियां हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 47% जमीन पाकिस्तान, 39% जमीन भारत, 8% जमीन चीन और 6% जमीन अफगानिस्तान में है। इन सभी देशों के करीब 30 करोड़ लोग इन इलाकों में रहते हैं।

1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था। 1947 में भारत और पाक के इंजीनियरों के बीच ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ हुआ। इसके तहत दो मुख्य नहरों से पाकिस्तान को पानी मिलता रहा। ये समझौता 31 मार्च 1948 तक चला।

1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दोनों नहरों का पानी रोक दिया। इससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की 17 लाख एकड़ जमीन पर खेती बर्बाद हो गई। दोबारा हुए समझौते में भारत पानी देने को राजी हो गया।

इसके बाद 1951 से लेकर 1960 तक वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में भारत पाकिस्तान में पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत चली और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए। इसे इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है।

सिंधु जल समझौता स्थगित करने का पाकिस्तान पर असर

पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है। पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है और इससे 68% ग्रामीण पाकिस्तानियों की जीविका चलती है। ऐसे में पाकिस्तान में आम लोगों के साथ-साथ वहां की बेहाल अर्थव्यवस्था और बदतर होने लगी है।

पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पा रहा है। इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है। साथ ही औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ेगा।

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गॉडजिला अल नीनो से भारत में सूखे का खतरा बढ़ा:NASA ने जारी की तस्वीर, समुद्र में बढ़ रही गर्मी से मानसून कमजोर हुआ

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नई दिल्ली, एजेंसी। भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में सूखे और बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। इसकी वजह अल नीनो की मजबूत स्थिति है। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के मुताबिक पश्चिमी प्रशांत महासागर में 1997 के बाद ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं।

29 साल पहले इतिहास का सबसे शक्तिशाली अल नीनो बना था, जिसे सुपर या गॉडजिला अल नीनो कहा गया। जून 2026 में वैसी ही स्थिति बनती दिख रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिछले कुछ दशकों का सबसे प्रभावशाली अल नीनो हो सकता है। नासा के सैटेलाइट ने समुद्र में जमा हो रही भारी मात्रा में गर्मी की फोटो और आंकड़े जारी किए हैं।

1997-98 के अल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में भीषण बाढ़, सूखा, फसलों को भारी नुकसान और रिकॉर्ड स्तर की गर्मी दर्ज की गई थी। मौजूदा अल नीनो भी उसी दिशा में बढ़ सकता है।

समुद्र में गर्म पानी जमा हो रहा

नासा के सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच सैटेलाइट से मिले आंकड़ों के मुताबिक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्र का जलस्तर सामान्य से ज्यादा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक-

  • यह संकेत देता है कि समुद्र की सतह के नीचे बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। जब समुद्र का पानी गर्म होता है तो वह फैलने लगता है। इससे जलस्तर बढ़ जाता है।
  • समुद्र की सतह के नीचे जमा गर्मी दुनिया के मौसम को प्रभावित करती है। गर्म पानी का भंडार बड़ा और गहरा हो जाए, तो इसका वैश्विक असर होता है। इससे कई देशों में मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है।
  • समुद्र के भीतर ‘केल्विन वेव्स’ नाम की विशाल जल-तरंगें गर्मी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचा रही हैं। जब प्रशांत महासागर की व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तब इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास जमा गर्म पानी पूर्व की ओर दक्षिण अमेरिका के तटों की तरफ बढ़ने लगता है।
  • इस कारण समुद्र की गहराई से ऊपर आने वाला ठंडा पानी कम हो जाता है और समुद्र का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। यही स्थिति अल नीनो की पहचान मानी जाती है।

दुनियाभर में सूखे-बाढ़ की आशंका

वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वी प्रशांत महासागर अभी 1997 जितना गर्म नहीं हुआ है, लेकिन नई केल्विन वेव्स लगातार उस क्षेत्र की ओर बढ़ रही हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकता है।

इतिहास बताता है कि अल नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और एशिया के कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा भीषण गर्मी, फसल उत्पादन में कमी और मौसम संबंधी आपदाओं की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं।

NOAA ने 11 जून को अल नीनो की घोषणा की थी

अमेरिका की राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने 11 जून को अल नीनो की स्थिति घोषित कर दी थी। यह घोषणा मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में लगातार कई महीनों तक सामान्य से अधिक तापमान दर्ज होने के बाद की गई।

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अमेरिका ने ईरान के तेल बेचने पर प्रतिबंध हटाया:अगले 60 दिन भारत भी खरीद सकता है, ईरान में फिर तैनात होंगे UN के न्यूक्लियर इंस्पेक्टर

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तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री पर लगी पाबंदियों में 60 दिन की ढील दे दी है। यह फैसला स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के बीच हुई बातचीत के बाद लिया गया है।

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरानी मूल के कच्चे तेल, पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के उत्पादन, डिलीवरी और बिक्री के लिए अस्थायी सामान्य लाइसेंस जारी किया है। यह छूट 21 अगस्त तक लागू रहेगी। इससे भारत समेत कई देश फिर से ईरानी तेल खरीद सकेंगे।

वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में बिना रोक-टोक आवाजाही बनाए रखने का भरोसा दिया है। इसके साथ ही ईरान UN की परमाणु एजेंसी IAEA के इंस्पेक्टर्स को दोबारा देश में काम करने की मंजूरी देने पर भी सहमति जताई है।

इस बीच स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत दूसरे दिन भी जारी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अमेरिका की कोशिश ईरान के साथ स्थायी समझौते तक पहुंचने की है और अब तक की बातचीत में अच्छी तरह आगे बढ़ी है।

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