देश
क्या आपके पुराने रू.50-रू.100 के नोट बन सकते हैं बड़ी कमाई का जरिया? जानिए पूरी सच्चाई
मुंबई, एजेंसी। घर में रखे पुराने रू.50 या रू.100 के नोट आपके लिए अच्छी कमाई का मौका बन सकते हैं। अगर नोट अच्छी हालत में है और उसका सीरियल नंबर खास या दुर्लभ है, तो कई करेंसी कलेक्टर उसके लिए सामान्य कीमत से कहीं ज्यादा रकम देने को तैयार हो सकते हैं। दरअसल, करेंसी कलेक्टर अच्छी तरह से संरक्षित, दुर्लभ या विशिष्ट नंबरों वाले नोटों के लिए अच्छी कीमत चुका रहे हैं।

खास सीरियल नंबर से बढ़ती है कीमत
मांग बढ़ाने वाली सबसे बड़ी वजहों में से एक है खास या सांस्कृतिक रूप से अहम सीरियल नंबर। 786 जैसे नंबरों की बहुत ज़्यादा कीमत होती है और ये नोट की कीमत को उसके असली मूल्य (फेस वैल्यू) से कई गुना ज़्यादा बढ़ा सकते हैं। कलेक्टर अक्सर रू.5, रू.10, रू.20 और रू.100 जैसे आम नोटों के आखिरी तीन अंकों पर ध्यान देते हैं; 786 या ऐसे ही खास नंबरों पर खत्म होने वाले नोटों में अक्सर लोगों की बहुत दिलचस्पी होती है।
पुराने रू.50 के नोटों की चर्चा
पुराने डिज़ाइन वाले रू.50 के नोटों की मांग बहुत ज़्यादा है क्योंकि नई सीरीज़ उनकी जगह ले रही है और उनकी सप्लाई कम हो रही है। दुर्लभ सीरियल नंबर या छपाई की गलती वाला एकदम नया (बिना इस्तेमाल हुआ) पुराना रू.50 का नोट कुछ हज़ार से लेकर कई लाख रुपये तक में बिक सकता है, और कुछ खास मामलों में तो करोड़ों रुपये तक में भी। खरीदार ऐसे नोट पसंद करते हैं जो फटे न हों, जिन पर दाग न हों या जो ज़्यादा मुड़े हुए न हों। नोट जितना दुर्लभ होता है, खरीदार उसके लिए उतनी ही ज़्यादा कीमत देने को तैयार होते हैं।

ऑनलाइन बिक्री के दौरान सतर्क रहें
आज कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और कलेक्टर समूह पुराने नोटों की खरीद-बिक्री का माध्यम बने हुए हैं। लेकिन इसी के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले भी बढ़े हैं। अगर कोई व्यक्ति बिना जांच के बहुत बड़ी रकम देने का दावा करे, पहले पैसे जमा कराने को कहे या आपकी बैंकिंग जानकारी मांगे, तो सतर्क रहें। किसी भी स्थिति में अपनी बैंक डिटेल, OTP या अन्य गोपनीय जानकारी साझा न करें और किसी अनजान व्यक्ति को एडवांस भुगतान न करें। विश्वसनीय प्लेटफॉर्म का उपयोग करें और किसी भी सौदे से पहले खरीदार की पहचान तथा भुगतान प्रक्रिया की अच्छी तरह पुष्टि कर लें।
सच में मिलते हैं लाखों रुपये, क्या है सच्चाई?
कुछ बेहद दुर्लभ नोट वाकई संग्रहकर्ताओं के बीच ऊंची कीमत पर बिक सकते हैं, लेकिन ऐसे मामले बहुत कम होते हैं। अधिकांश पुराने नोटों की कीमत उनकी वास्तविक स्थिति और बाजार की मांग के अनुसार ही तय होती है। इसलिए किसी भी नोट को बेचने से पहले उसकी सही जांच और मूल्यांकन कराना बेहतर रहेगा।
Disclaimer: पुराने करेंसी नोटों की कीमत निश्चित नहीं होती। यह पूरी तरह उनकी दुर्लभता, स्थिति, प्रमाणिकता और बाजार में मौजूद खरीदारों की मांग पर निर्भर करती है।

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कमजोर मानसून से बढ़ी महंगाई की चिंता, टमाटर से लेकर दाल-चावल तक महंगे होने के संकेत
मुंबई, एजेंसी। देश के कई हिस्सों में जुलाई के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज होने के बाद खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मानसून की रफ्तार नहीं सुधरी तो खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका सीधा असर सब्जियों, दालों और अनाज की उपलब्धता पर पड़ेगा, जिससे बाजार में कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि, अंतिम स्थिति मानसून के आगामी चरण और फसल की प्रगति पर निर्भर करेगी।

मौसम में बदलाव का सबसे तेज प्रभाव जल्दी खराब होने वाली सब्जियों पर दिखाई देता है। टमाटर, हरी सब्जियां, मिर्च और अन्य ताजी उपज की आपूर्ति बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि वर्षा कम होती है तो उत्पादन घटने के साथ मंडियों में आवक भी कम हो जाती है। ऐसे में मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा होने से कीमतों में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगले कुछ सप्ताह में सब्जियों के दाम में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
दाल और चावल की कीमतों पर भी बन सकता है दबाव
कमजोर मानसून का असर केवल सब्जियों तक सीमित नहीं रहता। खरीफ सीजन में धान और कई प्रकार की दालों की खेती भी पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती है। यदि बुआई का रकबा घटता है या फसल को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में आने वाले महीनों में चावल और दाल की कीमतों पर भी दबाव बनने की आशंका है। खाद्यान्न महंगे होने से आम परिवारों के मासिक रसोई बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
मानसून की चाल पर टिकी किसानों और बाजार की नजर
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार कई क्षेत्रों में अब तक सामान्य से कम वर्षा हुई है। किसान भी अच्छी बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि फसलों की बुआई समय पर पूरी हो सके। कृषि क्षेत्र में उत्पादन और बाजार में आपूर्ति का सीधा संबंध मौसम से होता है। यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश होती है तो स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रहने पर खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
महंगाई पर पड़ सकता है व्यापक असर
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश की खुदरा महंगाई दर पर भी पड़ता है। सब्जियां, दाल और अनाज उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनकी कीमतें बढ़ने पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, जिससे आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होती है। ऐसे समय में सरकार और संबंधित एजेंसियां भी आपूर्ति की निगरानी तथा आवश्यक कदम उठाने पर ध्यान देती हैं।

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EPFO ने लागू की नई EDLI योजना, कर्मचारियों को मिलेगा बड़ा सुरक्षा कवच
नई दिल्ली, एजेंसी। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के करोड़ों सदस्यों और उनके परिवारों के लिए केंद्र सरकार ने कर्मचारी निक्षेप सहबद्ध बीमा योजना-2026 (EDLI Scheme 2026) लागू कर दी है। सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के तहत अधिसूचित यह नई योजना 29 जून से पूरे देश में प्रभावी हो चुकी है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों के परिवारों को पहले से अधिक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है।

नई योजना के तहत पहले की तरह अधिकतम 7 लाख रुपए का बीमा कवर जारी रहेगा। इसके अलावा पहली बार पीएफ खाते के औसत बैलेंस के आधार पर अधिकतम 1 लाख रुपए तक का अतिरिक्त एश्योरेंस बेनिफिट भी दिया जाएगा। यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है और उसके पीएफ खाते का औसत बैलेंस 50 हजार रुपए से अधिक है, तो नॉमिनी को 50 हजार रुपए की निश्चित राशि के साथ अतिरिक्त रकम का लाभ मिलेगा। यह अतिरिक्त लाभ अधिकतम 1 लाख रुपए तक सीमित रहेगा।
सरकार ने बीमा दावे के नियमों को भी आसान बनाया है। यदि किसी कर्मचारी का अंतिम पीएफ अंशदान जमा होने के छह महीने के भीतर निधन हो जाता है, तो उसके परिवार को भी 7 लाख रुपए तक के बीमा कवर का लाभ मिलेगा।
20 दिन में होगा क्लेम सेटलमेंट
नई व्यवस्था में क्लेम निपटान की समय-सीमा भी तय कर दी गई है। सभी जरूरी दस्तावेज मिलने के बाद बीमा दावा 20 दिनों के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा। तय समय सीमा से देरी होने पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा और विशेष परिस्थितियों में इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी पर भी तय की जा सकती है।
पूरी तरह डिजिटल हुआ सिस्टम
इसके अलावा पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है। अब नियोक्ताओं को बीमा अंशदान और प्रशासनिक शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा, जबकि क्लेम दाखिल करने और उसके निपटान की प्रक्रिया भी पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संचालित की जाएगी। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से पारदर्शिता बढ़ेगी और कर्मचारियों के परिवारों को समय पर आर्थिक सहायता मिल सकेगी।

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भारतीय कंपनियों का बॉन्ड निर्गम जून में 28% बढ़कर 1.33 लाख करोड़ रुपए पर
मुंबई, एजेंसी। सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में गिरावट आने, उधारी लागत में कमी और बाजार धारणा में सुधार के बीच जून में कॉरपोरेट बॉन्ड के जरिए धन जुटाने में सालाना आधार पर 28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने जून में कॉरपोरेट बॉन्ड जारी कर 1.33 लाख करोड़ रुपए जुटाए, जो एक साल पहले इसी महीने के 1.04 लाख करोड़ रुपए और मई के 93,675 करोड़ रुपए से अधिक है।

रॉकफोर्ट एलएलपी के प्रबंध साझेदार वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा, “अप्रैल और मई में सुस्त रहने के बाद जून में बाजार परिस्थितियां अनुकूल होने से कॉरपोरेट बॉन्ड के निर्गम में तेज वृद्धि हुई। इसका सबसे बड़ा कारण मानक सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) के प्रतिफल में उल्लेखनीय गिरावट रही, जिससे कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में उधारी लागत कम हुई।” चॉइस वेल्थ के उपाध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल के करीब आने से मुद्रास्फीति और राजकोषीय दबाव की चिंताएं कम होने से बॉन्ड निर्गम में तेजी आई। उच्च प्रतिफल, वैश्विक स्तर पर अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण अधिकांश कंपनियों ने अप्रैल और मई में उधारी योजनाएं टाल दी थीं।
हालांकि, जून में अनिश्चितता घटने के बाद कंपनियों ने कम ब्याज दरों पर बॉन्ड बाजार से धन जुटाने की कोशिश की। ईरान-अमेरिका के बीच अंतरिम शांति समझौता होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट आई, जिससे भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में भी तेज नरमी देखी गई। श्रीनिवासन ने कहा कि बॉन्ड बाजार में तेजी को जी-सेक में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के मजबूत निवेश, ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड सूचकांक में भारत के शामिल होने की संभावना, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, मानसून की प्रगति और ब्याज दर बढ़ोतरी पर जल्दबाजी नहीं करने संबंधी टिप्पणियों का भी समर्थन मिला।
सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में नरमी का असर कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार पर भी पड़ा, जिससे उच्च रेटिंग वाली कंपनियों के लिए उधारी दरें कम हुईं और उन्हें अप्रैल-मई की तुलना में सस्ती दरों पर धन जुटाने में मदद मिली। पांडेय ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के हाल के कदमों, मजबूत घरेलू मांग और बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश प्रवाह ने जून में व्यापक स्तर पर बॉन्ड बाजार में तेजी को समर्थन दिया। भविष्य के परिदृश्य पर श्रीनिवासन ने कहा कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही तक प्राथमिक बाजार की गतिविधियां मजबूत रहने की उम्मीद है, हालांकि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बॉन्ड निर्गम अवसरवादी हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक मुद्रास्फीति, अमेरिकी मौद्रिक नीति और विदेशी निवेश प्रवाह आने वाले महीनों में घरेलू बॉन्ड प्रतिफल और निर्गम गतिविधि को प्रभावित करेंगे।

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