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सऊदी-PAK के बीच रक्षा समझौता, मिलकर हमले का जवाब देंगे:दावा- एटमी हथियार का भी इस्तेमाल शामिल, भारत बोला- पहले से जानकारी थी

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रियाद,एजेंसी। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार को एक रक्षा समझौते पर साइन किए। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला दूसरे पर भी हमला माना जाएगा।

सऊदी प्रेस एजेंसी के मुताबिक, दोनों देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट में कहा कि यह समझौता दोनों देशों की सुरक्षा बढ़ाने और विश्व में शांति स्थापित करने की प्रतिबद्धता को दिखाता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच डिफेंस कॉर्पोरेशन भी डेवलप किया जाएगा।

रॉयटर्स के मुताबिक इस समझौते के तहत मिलिट्री सहयोग किया जाएगा। इसमें जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का इस्तेमाल भी शामिल है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के रक्षा समझौते पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत सरकार को इसकी जानकारी पहले से थी।

सऊदी अरब की राजधानी रियाद के यमामा पैलेस में हुई इस बैठक में क्राउन प्रिंस और शहबाज शरीफ ने चर्चा की।

सऊदी अरब की राजधानी रियाद के यमामा पैलेस में हुई इस बैठक में क्राउन प्रिंस और शहबाज शरीफ ने चर्चा की।

समझौते के वक्त पाकिस्तानी सेना प्रमुख भी मौजूद थे

शहबाज शरीफ के साथ पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसीम मुनीर, उप प्रधानमंत्री इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ, वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब और हाई लेवल डेलिगेशन सऊदी पहुंचा है।

जिस वक्त इस रक्षा समझौते पर साइन किए जा रहे थे, तब पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसीम मुनीर भी वहां मौजूद थे।

एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि यह समझौता किसी खास देश या घटना के खिलाफ नहीं हुआ है, बल्कि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चलने वाले गहरे सहयोग का आधिकारिक रूप है।

सऊदी प्रिंस सलमान के साथ शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसीम मुनीर।

सऊदी प्रिंस सलमान के साथ शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसीम मुनीर।

पाकिस्तान ने नाटो जैसी फोर्स बनाने का सुझाव दिया था

इजराइल ने 9 सितंबर को कतर की राजधानी दोहा में हमास चीफ खलील अल-हय्या को निशाना बनाकर हमला किया था। इस हमले में अल-हय्या बच तो गया था, लेकिन 6 अन्य लोगों की मौत हो गई थी।

इसके बाद 14 सितंबर को दोहा में मुस्लिम देशों के कई नेता इजराइल के खिलाफ एक खास बैठक के लिए इकट्ठा हुए थे। यहां पाकिस्तान ने सभी इस्लामी देशों को NATO जैसी जॉइंट फोर्स बनाने का सुझाव दिया था।

पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार ने एक जॉइंट डिफेंस फोर्स बनाने की संभावना का जिक्र करते हुए कहा था कि न्यूक्लियर पावर पाकिस्तान इस्लामिक समुदाय (उम्माह) के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।

रविवार को इस्लामी देशों के नेताओं ने इजराइल के खिलाफ बंद कमरे में मीटिंग की।

रविवार को इस्लामी देशों के नेताओं ने इजराइल के खिलाफ बंद कमरे में मीटिंग की।

एक्सपर्ट बोले- यह समझौता औपचारिक ‘संधि’ नहीं है

अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका के राजदूत रह चुके जलमय खलीलजाद ने भी इस समझौते पर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता हालांकि औपचारिक ‘संधि’ नहीं है, लेकिन इसकी गंभीरता को देखते हुए यह एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी मानी जा रही है।

खलीलजाद ने आगे कहा कि क्या यह समझौता कतर में इजराइल हमले के जवाब में किया गया है? या ये लंबे समय से चली आ रही अफवाहों की पुष्टि करता है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान के एटमी हथियार प्रोग्राम का अघोषित सहयोगी रहा है।

खलीलजाद ने पूछा कि क्या इस समझौते में सीक्रेट क्लॉज हैं, अगर हां, तो वे क्या हैं? क्या ये समझौता बताता है कि सऊदी अरब अब अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता है।

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और ऐसे मिसाइल सिस्टम हैं जो पूरे मिडिल ईस्ट और इजराइल तक मार कर सकते हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि पाकिस्तान ऐसे हथियार भी डेवलप कर रहा है जो अमेरिका तक पहुंच सकते हैं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बोले- भारत पर असर की जांच करेंगे

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौते पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा

यह समझौता दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संबंधों को औपचारिक रूप देता है। इससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा, इसकी जांच की जाएगी। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान ने सऊदी जैसा रक्षा समझौता किया था

पाकिस्तान ने सऊदी जैसा रक्षा समझौता अमेरिका के भी साथ किया था। 1979 में ये समझौता टूट गया था। उससे पहले भारत पाकिस्तान के बीच 2 जंग हुईं लेकिन एक में भी अमेरिका ने उसकी सीधे मदद नहीं की।

पाकिस्तान-अमेरिका का पुराना रक्षा समझौता: 1950 में कोल्ड वॉर के दौरान, अमेरिका ने सोवियत संघ के विस्तार को रोकने के लिए दक्षिण एशिया में सहयोगियों की तलाश की। इस समय पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन को अपनाया।

  • म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एग्रीमेंट (MDAA), 19 मई 1954: यह पाकिस्तान और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय समझौता था। इसमें म्यूचुअल डिफेंस के नियम थे, यानी दोनों देश एक-दूसरे को सैन्य सहायता (हथियार, प्रशिक्षण, उपकरण) देंगे। अमेरिका ने पाकिस्तान को सामूहिक सुरक्षा प्रयासों (जैसे सामान्य जंग में) में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसमें पाकिस्तान के रिसोर्स, सैनिक और रणनीतिक सुविधाएं शामिल थीं। यह समझौता अमेरिका के म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एक्ट (1949) पर बेस्ड था, जो यूरोप और एशिया में सहयोगियों को सैन्य सहायता देता था।
  • SEATO (1954) और CENTO (1955): MDAA के बाद पाकिस्तान ने साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (SEATO) और बगदाद पैक्ट (बाद में CENTO) में शामिल होकर इसे मजबूत किया। इन संगठनों के अनुच्छेदों में किसी एक पर हमले में सामूहिक प्रतिक्रिया का प्रावधान था, यानी एक सदस्य पर आक्रमण को सभी पर आक्रमण माना जाएगा (नाटो जैसा)। अमेरिका ने इनके तहत पाकिस्तान को 7 हजार करोड़ से ज्यादा की सैन्य सहायता दी, जिसमें हथियार और प्रशिक्षण शामिल थे।

1979 में समझौता क्यों टूटा?

CENTO का अंत 1979 में हुआ, हालांकि MDAA द्विपक्षीय था, लेकिन CENTO के ढांचे से जुड़ा था।

  • ईरान की क्रांति (1979): ईरान के शाह का पतन और इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने CENTO से 15 मार्च 1979 को वापसी की। ईरान CENTO का प्रमुख सदस्य था, इसलिए संगठन कमजोर हो गया।
  • पाकिस्तान की वापसी: 12 मार्च 1979 को पाकिस्तान ने भी CENTO छोड़ दिया। इसके कारण थे सोवियत आक्रमण, अफगानिस्तान (दिसंबर 1979) के बाद पाकिस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति और अमेरिका के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव (जैसे 1979 में पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर अमेरिकी प्रतिबंध)।
  • अमेरिकी सहायता पर प्रतिबंध: जिमी कार्टर प्रशासन ने पाकिस्तान के गुप्त यूरेनियम एनरिचमेंट (न्यूक्लियर हथियार कार्यक्रम) पर 1979 में सैन्य सहायता रोक दी। इससे गठबंधन प्रभावी रूप से खत्म हो गया।

समझौते के बाद भी अमेरिका ने मदद नहीं दी

CENTO 16 मार्च 1979 को पूरी तरह खत्म हुआ। हालांकि, अमेरिका-पाकिस्तान संबंध बाद में अफगान युद्ध (1979 के बाद) में फिर मजबूत हुए, लेकिन पुराना म्यूचुअल डिफेंस फ्रेमवर्क टूट चुका था।

इससे पहले 1947, 1965 और 1971 में भारत पाक जंग में भी में अमेरिका ने पाकिस्तान की सीधी सैन्य मदद नहीं की, भले ही म्यूचुअल डिफेंस प्रावधान थे। अमेरिका ने इन जंग को क्षेत्रीय विवाद माना, न कि गठबंधन के तहत सामूहिक रक्षा का मामला।

MDAA/SEATO/CENTO खासतौर पर सोवियत/कम्युनिस्ट खतरों के खिलाफ थे, न कि भारत किसी और गुट के खिलाफ। इसलिए, पाकिस्तान को अपेक्षित मदद नहीं मिली, जिससे गठबंधन पर सवाल उठे।

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सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया, ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

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दमिश्क, एजेंसी। सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को गृहयुद्ध के दौरान लाखों लोगों की हत्या और अत्याचार के मामलों में दोषी ठहराया गया।

इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सरकार गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। दोनों की गैरमौजूदगी में सजा सुनाई गई।

अतीफ नजीब को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें मंगलवार को कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में कोर्ट लाया गया।

बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।

बशर अल असद के ममेरे भाई अतीफ नजीब को पिंजरे में कोर्ट लाया गया था।

अतीफ के आदेश के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़का

अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला।

अतीफ पर आरोप है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। आदेश के बाद सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया। देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया जो 2024 तक चलता रहा। इसमें करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई।

सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।

सीरिया के इदलिब के एक रिफ्यूजी कैंप में गृहयुद्ध के दौरान घायल हुआ एक बच्चा। मार्च 2011 से 2024 तक सीरिया में 30 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी।

दिसंबर 2024 में 53 साल पुराना राज खत्म हुआ

यह बशर अल-असद के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में आया पहला फैसला है। दिसंबर 2024 में विद्रोहियों ने दमिश्क पर कब्जा कर उनकी सरकार गिरा दी थी। इसके साथ ही 1971 से सीरिया पर शासन कर रहे असद परिवार का 53 साल पुराना राज भी खत्म हो गया था।

सरकार गिरने से ठीक पहले बशर अल-असद ने देश छोड़ दिया था। इसके बाद सीरिया पर विद्रोही नेता अहमद अल-शरा का कब्जा हो गया। उनकी सरकार ने उनके शासन के दौरान लोगों पर हुए अत्याचार और हत्याओं के मामलों की जांच शुरू की।

दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।

दिसंबर 2024 में दारा शहर पर कब्जे के बाद विद्रोही लड़ाके सीरिया का झंडा लहराते हुए।

रूस और ईरान के साथ के बावजूद कैसे गिरी असद सरकार?

गृहयुद्ध के दौरान बशर अल-असद की सरकार को रूस, ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन मिलता था। इसी वजह से वह कई साल तक सत्ता में बने रहे।

साल 2024 में हालात बदल गए। इजराइल के लगातार हमलों से हिजबुल्लाह और ईरान समर्थित गुट कमजोर पड़ गए। दूसरी ओर, रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ था, इसलिए वह भी पहले जैसी सैन्य मदद नहीं कर सका।

इसी मौके का फायदा उठाकर तुर्किये के समर्थन वाले विद्रोही गुटों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत इदलिब से बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने कई शहरों पर कब्जा कर लिया और 8 दिसंबर 2024 को राजधानी दमिश्क पहुंच गए।

विद्रोहियों के दमिश्क पहुंचते ही बशर अल-असद अपने परिवार के साथ रूस भाग गए। उनकी सरकार गिर गई और असद परिवार का 53 साल से ज्यादा पुराना शासन खत्म हो गया।

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परमाणु समझौता किए बिना जंग खत्म कर सकते हैं ट्रम्प:होर्मुज दोबारा खोलने की शर्त रखी, युद्ध लंबा खिंचने पर अमेरिका का फोकस बदला

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वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के साथ बिना परमाणु समझौते के भी जंग खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, अमेरिका की एक बड़ी शर्त होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना है। अगर ईरान वहां से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों को बिना किसी रुकावट के आने-जाने देता है, तो अमेरिका जंग से पीछे हट सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प पिछले कुछ हफ्तों से इस योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने सीनियर अफसरों से कहा है कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोल देता है तो अमेरिका औपचारिक परमाणु समझौते के बिना भी संघर्ष खत्म करने को तैयार हो सकता है।

अब परमाणु समझौता नहीं, होर्मुज खोलना अमेरिका की नई प्राथमिकता

पहले अमेरिका की सबसे बड़ी शर्त ईरान के साथ नया परमाणु समझौता करना थी। लेकिन जंग लंबी खिंचने के बाद उसका फोकस बदलता दिख रहा है।

अब होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही शुरू कराना जंग खत्म करने की अहम शर्त बन सकता है। यह रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है।

ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें

होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को…

ईरान के सहयोगी गुटों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी।

जंग हमेशा के लिए खत्म करनी होगी।

ईरान की समुद्री नाकाबंदी हटानी होगी।

क्षेत्र से अपने सैनिक वापस बुलाने होंगे।

ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे।

विदेशों में रोकी गई ईरानी संपत्ति लौटानी होगी।

जंग में हुए नुकसान का मुआवजा देना होगा।

अमेरिका में बढ़ रहा जंग खत्म करने का दबाव

ईरान के साथ जंग लंबी खिंचने का असर अमेरिका में भी दिखने लगा है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने लगी हैं, जिससे आम लोगों पर असर पड़ रहा है। अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले यह ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

ऐसे में ट्रम्प पर जल्द से जल्द संघर्ष खत्म करने का दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि वे पिछले कुछ समय से लगातार कह रहे हैं कि ईरान के साथ समझौता जल्द हो सकता है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर यह संकेत भी दिया था कि अमेरिका इस जंग में अपना मकसद हासिल कर चुका है।

परमाणु समझौते के बिना भी ट्रम्प क्यों तैयार?

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प का मानना है कि उनके कार्यकाल में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा आसानी से शुरू नहीं कर पाएगा। उनका भरोसा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान की हर गतिविधि पर नजर रख सकती हैं।

ट्रम्प यह भी मानते हैं कि अगर ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करता है, तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसलिए उनके लिए औपचारिक परमाणु समझौते से ज्यादा अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से पूरी तरह खुलवाना है।

ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले अमेरिकी सैनिकों की वापसी, सभी प्रतिबंध हटाने, विदेशों में जमा अपनी संपत्ति लौटाने और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा जैसी बड़ी मांगें कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच समझौता होना आसान नहीं माना जा रहा।

अमेरिका के लिए चुनौती क्यों बना हुआ है ईरान?

3,000+ बैलिस्टिक मिसाइलें, अंडरग्राउंड ‘मिसाइल सिटी’

अमेरिकी खुफिया एजेंसी ODNI के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास 3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जिनकी मारक क्षमता 2,000 किमी तक है। इन मिसाइलों का बड़ा हिस्सा पहाड़ों के नीचे बने अंडरग्राउंड ठिकानों में रखा गया है। यहां मिसाइलें, लॉन्चर और कंट्रोल सेंटर सुरंगों के अंदर होते हैं, इसलिए हवाई हमलों में इन्हें पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं माना जाता।

दुनिया के 20% तेल का रास्ता ईरान के पास

हॉर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसका उत्तरी तट ईरान के पास है। इसलिए यहां तनाव बढ़ने और हॉर्मुज बंद होने का असर सीधे वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।

हजारों ड्रोन का बेड़ा

ईरान ने पिछले एक दशक में शाहेद जैसे हजारों ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी के हमलों और निगरानी के लिए किया जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी ईरानी ड्रोन के इस्तेमाल ने इसकी क्षमता को वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला दिया।

पश्चिम एशिया में सहयोगी सशस्त्र नेटवर्क

ईरान के समर्थन वाले समूह हिजबुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन) और इराक के कई शिया सशस्त्र गुट पश्चिम एशिया में एक्टिव हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इन्हें ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस स्ट्रटजी का हिस्सा मानते हैं, जिससे वह अपने सीमावर्ती क्षेत्र से बाहर भी दबाव बना सकता है।

होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है?

हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है।

शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी।

इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।

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ईरानी सुप्रीम लीडर मुजतबा जंग के बाद पहली बार लोगों से बात करते नजर आए, मौत होने का दावा किया जा रहा था

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तेहरान, एजेंसी। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई का जंग के बाद पहली बार वीडियो सामने आया है। ईरानी न्यूज एजेंसी मेहर ने यह वीडियो जारी किया है। इसमें मुजतबा जमीन पर बैठे लोगों के बीच उनसे बातचीत करते नजर आ रहे हैं।

सुप्रीम लीडर बनने के बाद यह उनका पहला वीडियो है। हालांकि, वीडियो कब रिकॉर्ड किया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। पिछले कुछ दिनों से मुजतबा की सेहत को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे थे। इजराइली चैनल 14 ने उनकी हालत गंभीर होने और अस्पताल में भर्ती होने का दावा किया था। यहां तक कहा गया था कि उनकी जल्द मौत हो सकती है।

अब वीडियो सामने आने के बाद इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, मुजतबा की मौजूदा सेहत को लेकर अभी भी पूरी तस्वीर साफ नहीं है।

सऊदी मीडिया का दावा- ईरान में नहीं थे मुजतबा

सऊदी मीडिया अल-हदथ ने इजराइली सुरक्षा सूत्र के हवाले से दावा किया था कि मुजतबा ईरान में नहीं थे। सूत्र ने यह भी कहा था कि मुजतबा के नाम से जारी सरकारी संदेश IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी तैयार कर रहे थे।

सुप्रीम लीडर बनने के बाद से मुजतबा सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए थे। उन्होंने कोई भाषण भी नहीं दिया था। सरकारी मीडिया ने उनके नाम से सिर्फ लिखित संदेश जारी किए थे।

ईरानी मीडिया के मुताबिक, पिता अली खामेनेई की मौत के बाद भी मुजतबा किसी मंत्री से नहीं मिले थे और पिता के अंतिम संस्कार में भी नजर नहीं आए। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने भी कहा था कि मुजतबा से सीधे संपर्क करना मुश्किल है।

पहले भी गंभीर चोट की खबरें आई थीं

मुजतबा की सेहत को लेकर पहले भी कई दावे सामने आ चुके हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया था कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल के हमले के बाद मुजतबा एक गुप्त ठिकाने पर थे और डॉक्टरों की टीम उनका इलाज कर रही थी।

रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उनके एक पैर की तीन बार सर्जरी हुई और एक हाथ का भी ऑपरेशन किया गया। चेहरे और होंठ पर चोट के कारण उन्हें बोलने में परेशानी होने की बात भी कही गई थी। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज किया था।

अमेरिका-इजराइल ने 28 फरवरी को पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के घर को निशाना बनाया था।

अमेरिका-इजराइल ने 28 फरवरी को पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के घर को निशाना बनाया था।

पिता की मौत के बाद बने सुप्रीम लीडर

अमेरिकी-इजराइली हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद 56 साल के मुजतबा खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर बने। वह लंबे समय से ईरान की सत्ता में पर्दे के पीछे प्रभावशाली माने जाते रहे हैं।

मुजतबा ने कभी चुनाव नहीं लड़ा और सरकार में कोई औपचारिक पद भी नहीं संभाला। इसके बावजूद उनके पिता के कार्यालय, IRGC और सुरक्षा तंत्र में मजबूत संपर्क माने जाते थे।

उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के आखिरी दौर में IRGC में सेवा की थी। बाद में कोम में शिया धर्मशास्त्र और इस्लामी कानून की पढ़ाई की। 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए प्रदर्शनों के दौरान भी उनका नाम सत्ता के भीतर प्रभाव रखने वाले नेताओं में सामने आया था। अमेरिका ने 2019 में उन पर प्रतिबंध लगाया था।

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