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छत्तीसगढ़

जांजगीर-चांपा में 61 लाख से अधिक का मादक पदार्थ नष्ट:गांजा, नशीली टेबलेट और सिरप को PIL भट्टी में जलाया गया

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जांजगीर-चांपा। जांजगीर चांपा जिले में 61 लाख रुपये से अधिक मूल्य के अवैध मादक पदार्थ नष्ट किए गए हैं। इनमें गांजा, नशीली टेबलेट और सिरप शामिल थे, जिन्हें प्रकाश इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड (PIL) की भट्टी में जलाकर नष्ट किया गया। यह कार्रवाई जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों में जब्त किए गए मादक पदार्थों पर की गई।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) उमेश कश्यप ने बताया कि जिला स्तरीय ड्रग डिस्पोजल समिति, जांजगीर चांपा के साथ मिलकर यह कार्रवाई की गई। पुलिस ने जिले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में अवैध मादक पदार्थ गांजा, नशीली दवाएं, टेबलेट और सिरप का परिवहन के साथ बिक्री करने वालों के खिलाफ अभियान चलाया था। इस दौरान 61 लाख रुपये से अधिक का सामान जब्त किया गया था।

गांजा, नशीली टेबलेट और सिरप भट्टी में किए नष्ट

सोमवार को PIL की भट्टी में इन मादक पदार्थों को नष्ट किया गया। नष्ट किए गए सामान में 115 किलो 452 ग्राम गांजा शामिल था, जिसकी अनुमानित कीमत 57 लाख 50 हजार रुपये है। इसके अतिरिक्त, 35 हजार 833 नग नशीली टेबलेट भी नष्ट की गईं, जिनकी कीमत 3 लाख 40 हजार रुपये थी। साथ ही, 616 नग नशीली सिरप को भी जलाया गया, जिनकी कीमत 47 हजार 608 रुपये आंकी गई थी।

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कोरबा

कोरबा में नशा मुक्ति केंद्र में युवक की संदिग्ध मौत:2 दिन पहले ही बात हुई थी, स्वस्थ था युवक, परिजनों ने जताया संदेह

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कोरबा। कोरबा के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल परिसर में नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती एक युवक सुरेंद्र राठौर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। सुरेंद्र शक्ति जिले के केसला निवासी था और उसे नशे की लत थी। परिजनों ने उसे इलाज के लिए नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया था, लेकिन उसकी अचानक मौत के बाद परिजनों ने हंगामा किया और संदेह जताया।

मृतक के पिता चुन्नी लाल राठौर ने बताया कि उन्हें मोबाइल पर ऑनलाइन जानकारी मिली थी कि कोरबा के खरमोरा में एक नशा मुक्ति केंद्र संचालित है।मोबाइल नंबर के जरिए संपर्क करने पर 26 तारीख को चार लोग एक वाहन में उनके घर आए और सुरेंद्र को नशा मुक्ति केंद्र कोरबा ले गए।

सुरेंद्र राठौर (मृतक) जिसकी नशा मुक्ति केंद्र में संदिग्ध मौत हो गई।

सुरेंद्र राठौर (मृतक) जिसकी नशा मुक्ति केंद्र में संदिग्ध मौत हो गई।

2 दिन पहले बातचीत हुई तब स्वस्थ था सुरेंद्र

परिजनों के अनुसार, वाहन किराए के रूप में दो हजार रुपये लिए गए। इसके अतिरिक्त, महीने का 12 हजार रुपये इलाज, पानी और रखरखाव के लिए और तीन हजार रुपये ब्लड टेस्ट के लिए तुरंत लिए गए। 28 तारीख को सीसीटीवी के ज़रिये से सुरेंद्र से उनकी बातचीत भी कराई गई थी, तब वह स्वस्थ दिख रहा था।

मौत पर गहरा संदेह

30 तारीख को परिजनों को फोन कर बताया गया कि सुरेंद्र की तबीयत खराब है और उन्हें आने के लिए कहा गया। जब परिजन केंद्र पहुंचे, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। परिजनों ने सुरेंद्र की मौत कब, कैसे और किन परिस्थितियों में हुई, इस पर गहरा संदेह व्यक्त किया है।

परेशान मृतक सुरेंद्र के पिता और परिजन

परेशान मृतक सुरेंद्र के पिता और परिजन

सम्भवतः झटका आने से हुई मौत:केयरटेकर

नशा मुक्ति केंद्र के केयरटेकर राजू राजपूत ने बताया कि सुरेंद्र राठौर स्वस्थ था। उन्होंने कहा कि नशा छोड़ने पर अचानक झटका आता है और संभवतः इसी झटके के कारण यह घटना हुई होगी। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती लोगों की जांच के लिए जिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर अंकित गुप्ता इलाज करते हैं।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही मौत का पता चलेगा

इस मामले में कोरबा सीएसपी प्रतीक चतुर्वेदी ने बताया कि पोड़ी बहार, खरमोरा स्थित नशा मुक्ति केंद्र में एक युवक की मौत का मामला सामने आया है, जहां मौत को लेकर संदेह है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत का वास्तविक कारण पता चल सकेगा। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है।

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छत्तीसगढ़

हाईकोर्ट बोला- संदेह मजबूत हो फिर भी कानूनी प्रमाण नहीं:1979-85 में फर्जी वेतन निकालने का था आरोप, 2002 में हुई थी सजा, अब रद्द

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बिलासपुर,एजेंसी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 24 साल पुराने बहुचर्चित फर्जी वेतन आहरण और भ्रष्टाचार के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तत्कालीन सीएमओ समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा और केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

यह मामला जगदलपुर स्थित स्वास्थ्य विभाग में वर्ष 1979 से 1985 के बीच कथित रूप से फर्जी वेतन बिल बनाकर सरकारी राशि निकालने से जुड़ा था, जिसमें करीब 42 हजार रुपए गबन का आरोप था।

दरअसल, तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरके सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर आरोप था कि, उन्होंने मिलकर तीन सफाई कर्मचारी जयसिंह, लालमणि और मयाराम के नाम पर फर्जी वेतन बिल तैयार किए।

कहा गया कि ये कर्मचारी वास्तविक रूप से काम नहीं कर रहे थे, फिर भी उनके नाम पर वेतन निकालकर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया। यह भी आरोप था कि वेतन बिलों में फर्जी हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान लगाए गए।

ट्रायल कोर्ट ने साल 2002 में सुनाई थी सजा

जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को इस मामले में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग) और 120-बी (साजिश) सहित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2-2 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने पूरे मामले के परीक्षण में पाया कि, अभियोजन के पास आरोप साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं हैं। किसी भी आरोपी के खिलाफ यह साबित नहीं हुआ कि उसने फर्जी दस्तावेज तैयार किए या उनका उपयोग किया।

हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान फर्जी होने का कोई विशेषज्ञ प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। कई दस्तावेज केवल कार्बन कॉपी थे, मूल रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए। कोर्ट ने कहा कि, ऐसे में जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप सिद्ध नहीं होते।

अधीनस्थ कर्मचारियों की भूमिका पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

मामले में महत्वपूर्ण गवाहों के बयान से यह सामने आया कि सभी कार्य तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. आरके सेन के निर्देश पर किए गए थे। कोर्ट ने माना कि अन्य आरोपी केवल अधीनस्थ कर्मचारी थे, जो अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश का पालन कर रहे थे।

उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र भूमिका या आपराधिक मंशा साबित नहीं हुई। उन्होंने केवल अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, जिसे अपराध नहीं माना जा सकता।

साजिश और भ्रष्टाचार का आरोप भी साबित नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए आपसी सहमति का ठोस प्रमाण जरूरी होता है। इस मामले में न तो कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मिला और न ही परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने मिलकर अपराध की योजना बनाई थी।

इसी तरह, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यह भी साबित नहीं हुआ कि आरोपियों ने अपने पद का दुरुपयोग कर कोई आर्थिक लाभ प्राप्त किया।

गवाहों के बयान से कमजोर हुआ केस

इस मामले में जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकाले जाने का आरोप था, उन्होंने भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि वे कब तक काम पर नहीं थे या उन्हें वेतन नहीं मिला। कई गवाहों ने कहा कि उन्हें काम के दौरान वेतन मिला और उन्होंने हस्ताक्षर कर भुगतान लिया। इससे अभियोजन का दावा कमजोर हो गया।

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छत्तीसगढ़

भू-माफियाओं पर बड़े एक्शन की तैयारी में निगम:अवैध प्लाटिंग वाली जमीन पर कार्रवाई के साथ अधिग्रहण भी करेगा नगर निगम

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रायपुर,एजेंसी। राजधानी में अवैध प्लाटिंग करने वालों पर अब और सख्त कार्रवाई की तैयारी है। नगर निगम ऐसे मामलों में जमीन अधिग्रहण तक का कदम उठा सकता है। नए नियमों के तहत भू-माफियाओं पर शिकंजा कसने की योजना बनाई जा रही है और इसे लेकर जल्द ही आधिकारिक आदेश जारी हो सकता है।

जानकारी के मुताबिक, अवैध प्लाटिंग और जमीन कब्जे के मामलों में एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार जिला प्रशासन के पास रहेगा। इससे कार्रवाई और तेज होने की संभावना है। प्रशासनिक स्तर पर ऐसे मामलों की पहचान कर सीधे कड़ी कार्रवाई करने की रणनीति बनाई जा रही है।

गौरतलब है कि रायपुर नगर निगम पिछले कुछ समय से अवैध जमीन अधिग्रहण और प्लाटिंग के खिलाफ लगातार अभियान चला रहा है। अब नए नियम लागू होने के बाद ऐसे मामलों में जमीन जब्ती जैसी बड़ी कार्रवाई भी देखने को मिल सकती है, जिससे भू-माफियाओं पर सीधा असर पड़ेगा।

इस मामले में निगम के अधिकारियों ने बताया कि जोन में अवैध प्लाटिंग पर अधिग्रहण की कार्रवाई भी की जा रही है।फिलहाल नियमों को लेकर स्थिति साफ नहीं है।

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