काठमांडू,एजेंसी। नेपाल में प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने छात्र राजनीति पर पूरी तरह रोक लगा दी है। इसके साथ ही कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए पारंपरिक परीक्षाएं भी खत्म कर दी गई हैं और स्कूलों-कॉलेजों को अपने विदेशी नाम बदलकर नेपाली में रखने का आदेश दिया गया है।
सरकार ने शनिवार रात को जारी आदेश में कहा कि यह सभी फैसले अपने 100 दिन के एक्शन प्लान के तहत लिए हैं, जिसका मकसद शिक्षा को राजनीति से दूर रखना और इसे बेहतर बनाना है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब स्कूल और कॉलेजों में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि नहीं होगी। सभी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों को 60 दिनों के अंदर अपने दफ्तर कॉलेज कैंपस से हटाने होंगे।
इनकी जगह सरकार 90 दिनों के भीतर ‘स्टूडेंट काउंसिल’ या ‘वॉयस ऑफ स्टूडेंट्स’ जैसे नए प्लेटफॉर्म शुरू करेगी, जो पूरी तरह गैर-राजनीतिक होंगे और सिर्फ छात्रों की समस्याओं पर काम करेंगे।
ग्रेजुएशन तक पढ़ाई के लिए नेपाली नागरिकता जरूरी नहीं
सरकार ने साफ कहा है कि अब स्कूल और कॉलेज राजनीति के अड्डे नहीं होंगे, बल्कि सिर्फ पढ़ाई के लिए काम करेंगे। लंबे समय से शिक्षा संस्थानों में चल रही राजनीतिक दखल को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
छात्रों के लिए कुछ और अहम बदलाव भी किए गए हैं। अब ग्रेजुएशन तक पढ़ाई के लिए नेपाली नागरिकता जरूरी नहीं होगी, ताकि दस्तावेजों की कमी के कारण किसी की पढ़ाई न रुके।
सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि जिन स्कूलों और कॉलेजों के नाम विदेशी हैं, जैसे ऑक्सफोर्ड, पेंटागन या सेंट जेवियर्स, उन्हें इस साल के भीतर अपने नाम बदलने होंगे।
परीक्षा के रिजल्ट तय समय पर जारी करने के आदेश
इसके अलावा, यूनिवर्सिटीज को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे परीक्षा के रिजल्ट तय समय के भीतर ही जारी करें। सरकार का कहना है कि अब तक रिजल्ट में देरी की वजह से छात्रों का भविष्य प्रभावित होता रहा है और कई बार उन्हें पढ़ाई छोड़कर विदेश जाना पड़ता है।
सरकार का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में देरी और गड़बड़ी की बड़ी वजह राजनीतिक दखल रही है। नए नियमों के जरिए अब पढ़ाई का शेड्यूल तय समय पर लागू किया जाएगा।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शनिवार को अपनी कैबिनेट के साथ बैठक की।
नेताओं-अफसरों की संपत्ति की जांच की जाएगी
नेपाल सरकार के प्लान के मुताबिक बड़े नेताओं और अफसरों की संपत्ति की जांच की जाएगी। इसके लिए 15 दिनों के अंदर एक कमेटी बनाई जाएगी, जो 2006 के बाद बड़े पद पर रहे लोगों की संपत्ति की जांच करेगी। इसके बाद 1991 से 2006 के बीच के मामलों को भी देखा जाएगा।
सरकार चाहती है कि सरकारी कामकाज साफ-सुथरा और जिम्मेदारी से हो। इसके लिए हर मंत्रालय को अपना काम तय समय में पूरा करना होगा। किसे क्या करना है और कब तक करना है, यह पहले से तय रहेगा और इसकी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को देनी होगी।
सरकार संविधान में बदलाव को लेकर भी तैयारी कर रही है। इसके लिए 7 दिनों के अंदर एक पेपर तैयार किया जाएगा, ताकि इस पर खुलकर बात हो सके।
सरकार ने यह भी कहा है कि जिन लोगों के साथ पहले अन्याय या भेदभाव हुआ है, उसे 15 दिनों के अंदर स्वीकार किया जाएगा। इसके बाद उनके लिए मदद और सुधार की योजना बनाई जाएगी।
काठमांडू में पिछले साल हजारों शिक्षकों ने प्रदर्शन किया था
काठमांडू में पिछले साल हजारों शिक्षक सड़कों पर उतर आए थे। मामला इतना बढ़ गया था कि देशभर के करीब 29 हजार सरकारी स्कूल बंद करने पड़े। लाखों छात्रों की पढ़ाई अचानक रुक गई और पूरा सिस्टम जैसे थम सा गया।
असल में, यह विरोध संसद में लाए गए एक शिक्षा बिल को लेकर था। शिक्षकों को डर था कि सरकार स्कूलों का कंट्रोल लोकल लेवल पर दे रही है, जिससे उनकी नौकरी दिक्कत में पड़ सकती थी।
उनका कहना था कि अगर स्कूलों का कंट्रोल लोकल सरकारों के पास चला गया, तो वहां राजनीति का असर और बढ़ जाएगा और उनके अधिकार कम हो जाएंगे।
प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने सड़कों पर उतरकर नारेबाजी की, संसद की ओर जाने वाले रास्ते जाम कर दिए और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की
नेपाल में पिछले साल हजारों शिक्षकों ने स्कूलों का कंट्रोल लोकल लेवल पर देने का विरोध किया था।
नेपाल का एजुकेशन सिस्टम लंबे वक्त से अस्थिर
नेपाल की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से अस्थिर रही है, जहां कभी छात्र संगठन आंदोलन करते हैं तो कभी शिक्षक सड़कों पर उतर आते हैं। इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ता था।
सबसे बड़ी समस्या यही थी कि शिक्षा में राजनीति का दखल बहुत ज्यादा था। स्कूल और कॉलेज कई बार पढ़ाई के बजाय राजनीतिक एक्टिविटी का सेंटर बन जाते थे। इसी वजह से क्लासेस रुकती थीं, परीक्षाएं टलती थीं और रिजल्ट में भी देरी होती थी।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे।
इसके बदले में अमेरिका यमन में हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य मदद नहीं करेगा।
अमेरिकी अधिकारियों और हूती नेताओं के बीच यह बातचीत पिछले हफ्ते ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को पुष्टि की कि अमेरिका हूतियों के सीधे संपर्क में है।
सऊदी के जहाजों को अब भी निशाना बनाएंगे हूती
हूतियों ने कहा है कि लाल सागर में सऊदी के जहाजों और सऊदी का तेल ले जाने वाले जहाजों को वे अब भी टारगेट करेंगे।
हूतियों की दलील है कि यमन पर सऊदी अरब की नाकेबंदी और सैन्य कार्रवाई के चलते उसके जहाजों को निशाना बनाना उनका अधिकार है। मामले से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, 2025 में अमेरिका और हूतियों के बीच हुआ सीजफायर कायम है।
हूतियों से सऊदी को अकेले लड़ना पड़ सकता है
पिछले हफ्ते हूतियों ने यमन के पश्चिमी हिस्से में लाल सागर के किनारे का बड़ा इलाका अपने कब्जे में ले लिया।
सऊदी अरब को उम्मीद थी कि अमेरिका उसके साथ खड़ा होगा। लेकिन अमेरिका ने अब तक हूतियों के खिलाफ सऊदी के समर्थन में कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं की है।
अमेरिका ने जरूर कहा है कि हूतियों की गतिविधियां बाब अल-मंदब स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही के लिए खतरा हैं।
अमेरिका पहले से ईरान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है। ईरान हूतियों का समर्थन करता है। ऐसे में अगर अमेरिका यमन में सीधे उतरता है तो उस पर एक और सैन्य मोर्चे का दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी का आरोप- हूतियों ने मक्का पर ड्रोन से हमला किया
सऊदी अरब ने आरोप लगाया है कि हूतियों ने मक्का की तरफ ड्रोन भेजकर हमला करने की कोशिश की। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह उसके लिए ‘रेड लाइन’ है। सऊदी डिफेंस फोर्सेस ने ड्रोन नष्ट करने का दावा किया है।
सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्किये अल-मलिकी के मुताबिक, ड्रोन को स्थानीय समयानुसार मंगलवार शाम करीब 6:50 बजे मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के पास रोका गया।
यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और 57 देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने भी कथित हमले की निंदा की है।
जेद्दा पर हूती हमले के बाद मिसाइलों को मार गिराने की कोशिश करती सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है।
हूतियों ने सऊदी के आरोप को ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताया
हूतियों ने मक्का पर ड्रोन हमले के आरोप को खारिज किया है। हूती लीडरशिप ने इसे ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताया और कहा कि सऊदी अरब पहले भी ऐसे दावे करता रहा है।
हूती उप विदेश मंत्री अब्दुल वहीद अबू रास ने पलटवार करते हुए सऊदी अरब पर ही मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों की गरिमा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।
हूतियों ने सऊदी F-15 गिराने का भी दावा किया
हूतियों ने दावा किया कि उन्होंने मारिब के पास सऊदी अरब का F-15 लड़ाकू विमान गिराया है। साथ ही लाल सागर के बंदरगाह शहर यानबू में सऊदी तेल कंपनी अरामको के एक संयंत्र पर हमला करने का दावा किया।
हूती वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद अब्दुल सलाम ने कहा कि F-15 गिराने की बात इसलिए बताई गई है, ताकि पश्चिमी देश सऊदी की बातों में न आएं।
हूतियों ने यह फुटेज जारी करते हुए सऊदी के F-15 को निशाना बनाने का दावा किया।
हूती नेता बोले- पाकिस्तान-तुर्किये से मदद मांग रहा सऊदी
हूती पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-फराह ने कहा कि सऊदी अरब यमन में मुश्किल स्थिति में फंस गया है। उनके मुताबिक, युद्ध और नाकेबंदी के बावजूद सऊदी अरब अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया।
अल-फराह ने कहा कि अब सऊदी अरब पाकिस्तान, तुर्किये, अमेरिका, इजराइल और मिस्र से मदद मांग रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मक्का पर हमले का मुद्दा उठाकर सऊदी अरब मुस्लिम देशों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है
अमेरिका-इजराइल और अरब देशों ने भी सीक्रेट बैठक की
इजराइली अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका, इजराइल और कई अरब देशों के सैन्य प्रमुखों ने पिछले हफ्ते जर्मनी में सीक्रेट बैठक की। यह बैठक अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने बुलाई थी।
एक्सियोस के पत्रकार बराक रैविड के मुताबिक, बैठक में इजराइल, सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के सैन्य प्रमुख शामिल हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद यह इस तरह की पहली बैठक थी।
इजराइल पहले हूती हमलों का निशाना रहा है। अब वह सऊदी अरब की मदद के लिए यमन में हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करने की पेशकश कर रहा है।
यमन में 500 से ज्यादा सरकारी लड़ाके मारे गए
यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पिछले चार हफ्तों में सरकार समर्थित 500 से ज्यादा लड़ाके मारे गए हैं। सरकार के समर्थन में लड़ने वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स ने यह दावा किया है।
संगठन के मुताबिक, इसी दौरान होदेदा और ताइज प्रांतों में 1,000 से ज्यादा हूती लड़ाके भी मारे गए। हूतियों ने इस पर प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस बीच यमन सरकार ने लाल सागर के तट पर और सैनिक भेजने का फैसला किया है। सरकार के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते की हार को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी बल फिर से इलाके में लौटेंगे।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका में भारतीयों की बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले 20 साल में 50 से ज्यादा इलाकों में भारतीयों की बड़ी आबादी बस चुकी है। इन्हें ‘मिनी इंडिया’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि अगले 5 साल में ऐसे इलाकों की संख्या 75 तक पहुंच सकती है।
ट्रम्प की वीजा और ग्रीन कार्ड पर सख्ती के बावजूद भारतीयों का अमेरिका जाना और वहां बसना जारी है। टेक, हेल्थकेयर और फार्मा जैसे सेक्टर में नौकरियों के मौके इसकी बड़ी वजह हैं। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा करीब 9.3 लाख भारतवंशी रहते हैं।
भारतीय परिवारों की आय अमेरिकी परिवारों से ज्यादा
‘मिनी इंडिया’ में रहने वाले भारतीय परिवारों की औसत सालाना आय करीब 1.54 करोड़ रुपए है। अमेरिकी परिवारों की औसत आय करीब 80 लाख रुपए है। अमेरिकन कम्युनिटी सर्वे और प्यू रिसर्च सेंटर रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है।
अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोग कैलिफोर्निया में रहते हैं। दूसरे नंबर पर टेक्सास है, जहां करीब 5.4 लाख भारतवंशी रहते हैं।
फ्रिस्को में 19% लोग भारतीय मूल के हैं
टेक्सास का फ्रिस्को शहर 25 साल पहले तक ज्यादातर खेतों वाला इलाका था। आज यहां की आबादी 2.5 लाख से ज्यादा है। इनमें करीब 19% लोग भारतीय मूल के हैं।
आसपास के प्लेनो और एलन शहरों में भी भारतीय मंदिर, रेस्तरां और दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के
कैलिफोर्निया के डबलिन और सैन रेमन इलाके में भारतीय आबादी करीब 18% है। डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के हैं।
यहां भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। नई पीढ़ी दिवाली भी मनाती है और वीकेंड पर क्रिकेट भी खेलती है। भारतीय खाने की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि कई जगह ड्राइव-थ्रू भारतीय फूड आउटलेट भी खुल गए हैं।
सिलिकॉन वैली में भारतीयों का असर बढ़ेगा
भास्कर एक्सपर्ट विलियम फ्रे के मुताबिक, सिलिकॉन वैली में भारतीयों की भूमिका आने वाले समय में और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि भारतीयों का यह सफर करीब 25 साल पहले शुरू हुआ था और अब इसकी रफ्तार और बढ़ रही है। आज सिलिकॉन वैली के लगभग 35% स्टार्टअप्स में कम से कम एक भारतीय मूल का सह-संस्थापक है।
विलियम का मानना है कि आईटी सेक्टर में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी के कारण अमेरिका के दूसरे राज्यों में भी नए ‘मिनी इंडिया’ विकसित होंगे। भारतीय समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहा है और किसी भी अन्य प्रवासी समुदाय की तुलना में उसकी भूमिका ज्यादा मजबूत दिखाई देती है।
ट्रम्प के आने के बाद सख्त हुए नियम
H-1B पर 1 लाख डॉलर का भुगतान
ट्रम्प सरकार ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत हर वीजा पर 1,03,265 डॉलर (करीब 98 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगेगी।
पहले यह फीस करीब 2,000-5,000 डॉलर थी। रॉयटर्स के मुताबिक, यह नियम साल के आखिर तक लागू किया जा सकता है।
H-1B और H-4 आवेदकों की सोशल मीडिया जांच
दिसंबर 2025 से H-1B और उनके H-4 डिपेंडेंट्स की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच बढ़ाई गई। आवेदकों को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल सार्वजनिक रखने को कहा गया।
वीजा इंटरव्यू के नियम सख्त
अक्टूबर 2025 से ज्यादातर नॉन-इमिग्रेंट वीजा आवेदकों के लिए इंटरव्यू भी जरूरी कर दिया गया। पहले 14 साल से कम और 79 साल से ज्यादा उम्र के आवेदकों को मिलने वाली छूट भी हटा दी गई, हालांकि कुछ मामलों में छूट जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था।
अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।
अमेरिका के खुलासे से उलटा नुकसान भी संभव
अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं।
सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं।
ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं। वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं।
विशेषज्ञों को डर है कि अमेरिका के इस खुलासे के बाद रूस और चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकते हैं। वे अमेरिकी कदम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताकर नई तकनीक और हथियार विकसित करने की वजह बता सकते हैं।
इस तरह एक देश की सैन्य तैयारी दूसरे देश को भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और तेज होने का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के कोलोराडो में पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का यूएस स्पेस कमांड जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर।
अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा
अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके।
अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत
अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है।
इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है।
अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा
अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है तो उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है।
मौसम का पता लगाने, प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने, रास्ता खोजने और दूर-दूर तक संपर्क बनाए रखने जैसे कई काम सैटेलाइट की मदद से होते हैं।
GPS जैसी सेवाओं से विमान, जहाज और ट्रक अपना रास्ता तय करते हैं। बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी सटीक समय और कम्युनिकेशन के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब हो जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है तो मोबाइल और दूसरे कम्युनिकेशन नेटवर्क, नेविगेशन, मौसम की जानकारी और कई जरूरी सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है। अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है।
1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक
अमेरिका के अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के खुलासे के बाद करीब 60 साल पुरानी आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है।
इस संधि की शुरुआत 1966 में हुई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव रखा था। इसी दौरान सोवियत संघ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सामने अपना प्रस्ताव रखा। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बातचीत शुरू हुई और दोनों देशों के मसौदों को मिलाकर संधि तैयार की गई।
27 जनवरी 1967 को अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने वॉशिंगटन, मॉस्को और लंदन में इस संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई।
इसका मुख्य मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और दूसरे सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या ऐसे दूसरे हथियार रखने पर रोक लगाई गई है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि संधि हर तरह के हथियारों को अंतरिक्ष में रखने पर रोक नहीं लगाती। इसमें पारंपरिक हथियारों पर वैसी साफ पाबंदी नहीं है, जैसी परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियारों पर है।
अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने 27 जनवरी 1967 को आउटर स्पेस ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे।
ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस
ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा अहम बना दिया है।
ट्रम्प अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी का हिस्सा है।
इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों के हमले से बचाना है। इसके लिए जमीन के साथ-साथ अंतरिक्ष में मौजूद तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मई 2025 में गोल्डन डोम प्रोजेक्ट की घोषणा की थी।
मिंक ने सोमवार को बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम बनाने पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोक सके।
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया है।
हालांकि, मिंक ने यह नहीं बताया कि यह सिस्टम कैसे काम करेगा और इसकी पूरी क्षमता क्या होगी।