तेल अवीव/तेहरान/वॉशिंगटन डीसी,एजेंसी। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी से जुड़े IRGC नेवी चीफ अलीरेजा तंगसीरी की मौत की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। वे पिछले हफ्ते इजरायली एयरस्ट्राइक में गंभीर रूप से घायल हुए थे और बाद में उनकी मौत हो गई।
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के मुताबिक, तंगसीरी हमले के समय कोस्टल डिफेंस और मैरीटाइम ऑपरेशंस से जुड़े थे। उन्हें होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की नाकेबंदी का प्रमुख चेहरा माना जाता था, जिसके जरिए ईरान ने वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बनाया।
ईरान ने उनकी मौत के बावजूद साफ किया है कि उसके सैन्य ऑपरेशंस पर कोई असर नहीं पड़ेगा और रणनीति पहले की तरह जारी रहेगी। गौरतलब है कि इजराइल के रक्षा मंत्री ने 26 मार्च को दावा किया था कि एक एयरस्ट्राइक में तंगसीरी को मार गिराया गया।
जंग से जुड़ी तस्वीरें…
कुवैत में बिजली और पानी के प्लांट पर हुए हमले के बाद आग लग गई थी। हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई है।
ईरान ने रविवार को दक्षिणी इजराइल के केमिकल प्लांट रामत होवाव पर मिसाइल से हमला किया।
ईरान ने रविवार को वीडियो जारी कर इजराइल के इंडस्ट्रियल इलाके में मिसाइल हमलों को दिखाया।
लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी इलाके में सोमवार सुबह इजराइली हवाई हमले के बाद वहां से धुआं उठता देखा गया।
ट्रम्प ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों को तबाह करने की धमकी दी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट तुरंत नहीं खोला गया और समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका उसके ऊर्जा ठिकानों को तबाह कर देगा।
सोशल मीडिया पर जारी बयान में ट्रम्प ने कहा कि पावर प्लांट, ऑयल वेल और खार्ग आइलैंड को पूरी तरह उड़ा दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर डीसैलिनेशन प्लांट्स को भी निशाना बनाया जा सकता है।
ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिका एक नए और ज्यादा समझदार शासन के साथ बातचीत कर रहा है और इसमें प्रगति हो रही है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई तेज की जाएगी।
उन्होंने कहा कि यह कदम अमेरिकी सैनिकों और अन्य लोगों की मौत का बदला लेने के लिए उठाया जाएगा, जिनके लिए उन्होंने ईरान को जिम्मेदार ठहराया।
ईरान बोला-कुवैत के डीसैलिनेशन प्लांट पर इजराइल ने हमला किया
ईरान ने आरोप लगाया है कि कुवैत के डीसैलिनेशन प्लांट पर इजराइल ने हमला किया है। ईरानी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई ईरान को बदनाम करने और उस पर आरोप डालने की साजिश के तहत की गई।
तस्नीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, ईरान ने इस हमले को ‘जायनिस्ट शासन’ (इजराइल) की क्रूर कार्रवाई बताया है और कहा है कि इसके गंभीर नतीजे होंगे।
ईरान ने अमेरिका और इजराइल को चेतावनी देते हुए कहा कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकाने, उनके सैनिक और हित अब निशाने पर रहेंगे। साथ ही, इजराइल की सैन्य, सुरक्षा और आर्थिक संरचनाओं को भी टारगेट करने की बात कही गई है।
फारस की खाड़ी में भारत के 18 जहाज और 485 क्रू मौजूद
ईरान जंग के बीच फारस की खाड़ी में भारत के 18 जहाज और 485 भारतीय क्रू मौजूद हैं और सभी सुरक्षित हैं। पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय ने बताया कि पिछले 24 घंटों में किसी भी तरह की समुद्री घटना नहीं हुई है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
भारत सरकार के मुताबिक, हाल ही में दो भारतीय LPG कैरियर BW TYR और BW ELM सफलतापूर्वक होर्मुज स्ट्रेट पार कर भारत की ओर बढ़ चुके हैं। इसके अलावा, पिछले 24 घंटों में 8 भारतीय नाविकों को सुरक्षित भारत वापस लाया गया है।
स्पेन ने अमेरिका के लिए एयरस्पेस बंद किया
स्पेन ने ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। साथ ही, मिलिट्री बेस के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई है।
स्पेन की रक्षा मंत्री मार्गारीटा रोब्लेस ने कहा कि देश न तो अपने एयरस्पेस और न ही सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईरान से जुड़े किसी भी सैन्य अभियान के लिए करने देगा।
इस फैसले के बाद अमेरिकी विमानों को अपने रूट बदलने पड़ेंगे, हालांकि मानवीय और आपातकालीन उड़ानों को छूट दी गई है।
स्पेन के अर्थव्यवस्था मंत्री कार्लोस कुएर्पो ने कहा कि यह फैसला एकतरफा और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध का समर्थन न करने के आधार पर लिया गया है।
स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज पहले ही अमेरिका-इजराइल सैन्य अभियान की आलोचना कर चुके हैं। वहीं, डोनाल्ड ट्रम्प ने इस फैसले के जवाब में व्यापारिक कार्रवाई की धमकी दी है। इस निर्णय के बाद अमेरिका और स्पेन के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ने की संभावना है।
ईरान बोला- लेबनान में राजदूत अपना काम जारी रखेगा
ईरान ने लेबनान के निष्कासन आदेश को ठुकराते हुए कहा है कि उसका राजदूत बेरूत में ही अपना काम जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि राजदूत अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता रहेगा।
दरअसल, लेबनान ने पिछले हफ्ते ईरान के राजदूत मोहम्मद रजा शिबानी को पर्सोना नॉन ग्राटा घोषित कर 29 मार्च तक देश छोड़ने का निर्देश दिया था।
हालांकि, तय समयसीमा गुजरने के बाद भी राजदूत बेरूत में ही मौजूद हैं, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया है।
ईरान का अमेरिका से सीधी बातचीत से इनकार
ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की सीधी बातचीत से इनकार किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि अब तक दोनों देशों के बीच सिर्फ मध्यस्थों के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है।
उन्होंने बताया कि अमेरिका ने बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन उसकी ओर से भेजी गई शर्तें अतार्किक हैं। बघाई ने कहा कि ईरान का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है, जबकि अमेरिका बार-बार अपनी स्थिति बदल रहा है।
ईरान ने यह भी कहा कि उसे पूरी तरह पता है कि वह किस ढांचे में बातचीत पर विचार करेगा। प्रवक्ता ने अमेरिकी कूटनीति पर तंज करते हुए कहा कि वहां खुद लोग उसके दावों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
पाकिस्तान में हुई बैठकों पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान ने कहा कि ये उनकी अपनी पहल है और तेहरान इसमें शामिल नहीं हुआ। उसने मिडिल-ईस्ट के देशों से कहा कि वे युद्ध खत्म करने की कोशिश करें, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि संघर्ष की शुरुआत किसने की थी।
हिजबुल्लाह बोला- इजराइल के हाइफा नेवल बेस पर मिसाइलें दागीं
हिजबुल्लाह ने दावा किया है कि उसने इजराइल के उत्तरी शहर हाइफा में नेवल बेस पर मिसाइलें दागी हैं। संगठन के मुताबिक, यह हमला इजराइल के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई का हिस्सा है।
इस हमले के बाद हाइफा की एक ऑयल रिफाइनरी में आग लगने की खबर भी सामने आई है। हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि आग सीधे मिसाइल हमले से लगी या गिरते मलबे के कारण।
हिजबुल्लाह का दावा-114 इजराइली टैंकों को निशाना बनाया
लेबनान के हथियारबंद संगठन हिजबुल्लाह ने दावा किया है कि मौजूदा संघर्ष की शुरुआत से अब तक उसने 114 इजराइली टैंकों को निशाना बनाया है। यह जानकारी अल मायादीन चैनल के हवाले से सामने आई है। हालांकि, इजराइली सेना की ओर से भी इस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
ईरानी स्पीकर बोले- ट्रम्प के बयानों पर तुरंत भरोसा न करें
ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने निवेशकों को सलाह दी है कि ट्रम्प के बयानों पर तुरंत भरोसा करके फैसला न लें। उनका कहना है कि जब अमेरिकी बयान से बाजार तेजी से ऊपर-नीचे हो, तो उसी दिशा में चलने के बजाय उल्टा सोचकर कदम उठाना बेहतर हो सकता है।
उन्होंने कहा कि ट्रम्प के बयान का फायदा बाजार के बड़े खिलाड़ी उठा रहे हैं। ट्रम्प ने 22 मार्च को कहा था कि ईरान के साथ अच्छी बातचीत और उसके एनर्जी ठिकानों पर हमले टाल दिए गए हैं। इससे बाजार में राहत आई, अमेरिकी शेयर बाजार चढ़े और तेल की कीमतें गिर गईं।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद हालात बदल गए। ट्रम्प ने फिर सख्त बयान दिए, इजराइल ने तेहरान पर हमले किए और सऊदी अरब में ड्रोन इंटरसेप्शन की खबरें आईं। इसके बाद बाजार पलट गया। शेयर गिरे और तेल की कीमतें फिर बढ़ गईं।
कुछ ट्रेडर्स का कहना है कि बड़े एलान से पहले ही बाजार में अचानक ज्यादा खरीद-फरोख्त होने लगती है, जिससे लगता है कि कुछ लोगों को खबर पहले से मिल जाती है।
गालिबाफ ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी सेना ईरान में घुसती है, तो उसे कड़ा जवाब मिलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका सार्वजनिक रूप से बातचीत की बात करता है, लेकिन अंदर ही अंदर सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका में भारतीयों की बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले 20 साल में 50 से ज्यादा इलाकों में भारतीयों की बड़ी आबादी बस चुकी है। इन्हें ‘मिनी इंडिया’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि अगले 5 साल में ऐसे इलाकों की संख्या 75 तक पहुंच सकती है।
ट्रम्प की वीजा और ग्रीन कार्ड पर सख्ती के बावजूद भारतीयों का अमेरिका जाना और वहां बसना जारी है। टेक, हेल्थकेयर और फार्मा जैसे सेक्टर में नौकरियों के मौके इसकी बड़ी वजह हैं। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा करीब 9.3 लाख भारतवंशी रहते हैं।
भारतीय परिवारों की आय अमेरिकी परिवारों से ज्यादा
‘मिनी इंडिया’ में रहने वाले भारतीय परिवारों की औसत सालाना आय करीब 1.54 करोड़ रुपए है। अमेरिकी परिवारों की औसत आय करीब 80 लाख रुपए है। अमेरिकन कम्युनिटी सर्वे और प्यू रिसर्च सेंटर रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है।
अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोग कैलिफोर्निया में रहते हैं। दूसरे नंबर पर टेक्सास है, जहां करीब 5.4 लाख भारतवंशी रहते हैं।
फ्रिस्को में 19% लोग भारतीय मूल के हैं
टेक्सास का फ्रिस्को शहर 25 साल पहले तक ज्यादातर खेतों वाला इलाका था। आज यहां की आबादी 2.5 लाख से ज्यादा है। इनमें करीब 19% लोग भारतीय मूल के हैं।
आसपास के प्लेनो और एलन शहरों में भी भारतीय मंदिर, रेस्तरां और दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के
कैलिफोर्निया के डबलिन और सैन रेमन इलाके में भारतीय आबादी करीब 18% है। डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के हैं।
यहां भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। नई पीढ़ी दिवाली भी मनाती है और वीकेंड पर क्रिकेट भी खेलती है। भारतीय खाने की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि कई जगह ड्राइव-थ्रू भारतीय फूड आउटलेट भी खुल गए हैं।
सिलिकॉन वैली में भारतीयों का असर बढ़ेगा
भास्कर एक्सपर्ट विलियम फ्रे के मुताबिक, सिलिकॉन वैली में भारतीयों की भूमिका आने वाले समय में और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि भारतीयों का यह सफर करीब 25 साल पहले शुरू हुआ था और अब इसकी रफ्तार और बढ़ रही है। आज सिलिकॉन वैली के लगभग 35% स्टार्टअप्स में कम से कम एक भारतीय मूल का सह-संस्थापक है।
विलियम का मानना है कि आईटी सेक्टर में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी के कारण अमेरिका के दूसरे राज्यों में भी नए ‘मिनी इंडिया’ विकसित होंगे। भारतीय समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहा है और किसी भी अन्य प्रवासी समुदाय की तुलना में उसकी भूमिका ज्यादा मजबूत दिखाई देती है।
ट्रम्प के आने के बाद सख्त हुए नियम
H-1B पर 1 लाख डॉलर का भुगतान
ट्रम्प सरकार ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत हर वीजा पर 1,03,265 डॉलर (करीब 98 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगेगी।
पहले यह फीस करीब 2,000-5,000 डॉलर थी। रॉयटर्स के मुताबिक, यह नियम साल के आखिर तक लागू किया जा सकता है।
H-1B और H-4 आवेदकों की सोशल मीडिया जांच
दिसंबर 2025 से H-1B और उनके H-4 डिपेंडेंट्स की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच बढ़ाई गई। आवेदकों को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल सार्वजनिक रखने को कहा गया।
वीजा इंटरव्यू के नियम सख्त
अक्टूबर 2025 से ज्यादातर नॉन-इमिग्रेंट वीजा आवेदकों के लिए इंटरव्यू भी जरूरी कर दिया गया। पहले 14 साल से कम और 79 साल से ज्यादा उम्र के आवेदकों को मिलने वाली छूट भी हटा दी गई, हालांकि कुछ मामलों में छूट जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था।
अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।
अमेरिका के खुलासे से उलटा नुकसान भी संभव
अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं।
सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं।
ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं। वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं।
विशेषज्ञों को डर है कि अमेरिका के इस खुलासे के बाद रूस और चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकते हैं। वे अमेरिकी कदम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताकर नई तकनीक और हथियार विकसित करने की वजह बता सकते हैं।
इस तरह एक देश की सैन्य तैयारी दूसरे देश को भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और तेज होने का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के कोलोराडो में पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का यूएस स्पेस कमांड जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर।
अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा
अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके।
अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत
अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है।
इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है।
अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा
अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है तो उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है।
मौसम का पता लगाने, प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने, रास्ता खोजने और दूर-दूर तक संपर्क बनाए रखने जैसे कई काम सैटेलाइट की मदद से होते हैं।
GPS जैसी सेवाओं से विमान, जहाज और ट्रक अपना रास्ता तय करते हैं। बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी सटीक समय और कम्युनिकेशन के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब हो जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है तो मोबाइल और दूसरे कम्युनिकेशन नेटवर्क, नेविगेशन, मौसम की जानकारी और कई जरूरी सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है। अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है।
1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक
अमेरिका के अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के खुलासे के बाद करीब 60 साल पुरानी आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है।
इस संधि की शुरुआत 1966 में हुई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव रखा था। इसी दौरान सोवियत संघ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सामने अपना प्रस्ताव रखा। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बातचीत शुरू हुई और दोनों देशों के मसौदों को मिलाकर संधि तैयार की गई।
27 जनवरी 1967 को अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने वॉशिंगटन, मॉस्को और लंदन में इस संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई।
इसका मुख्य मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और दूसरे सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या ऐसे दूसरे हथियार रखने पर रोक लगाई गई है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि संधि हर तरह के हथियारों को अंतरिक्ष में रखने पर रोक नहीं लगाती। इसमें पारंपरिक हथियारों पर वैसी साफ पाबंदी नहीं है, जैसी परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियारों पर है।
अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने 27 जनवरी 1967 को आउटर स्पेस ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे।
ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस
ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा अहम बना दिया है।
ट्रम्प अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी का हिस्सा है।
इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों के हमले से बचाना है। इसके लिए जमीन के साथ-साथ अंतरिक्ष में मौजूद तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मई 2025 में गोल्डन डोम प्रोजेक्ट की घोषणा की थी।
मिंक ने सोमवार को बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम बनाने पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोक सके।
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया है।
हालांकि, मिंक ने यह नहीं बताया कि यह सिस्टम कैसे काम करेगा और इसकी पूरी क्षमता क्या होगी।
सना, एजेंसी। यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं।
इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब-अल मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था।
हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब-अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं।
यमन में सरकार और हूतियों के बीच हमले तेज
यमन और सऊदी की सेना ने रविवार को लाल सागर के पास हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल से हमले करने का दावा किया।
हमले की आशंका के बीच सऊदी अरब के दो शहरों अबहा और खमिस मुशैत में सायरन बजाए गए। लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने को कहा गया।
सऊदी में यमन सीमा के पास एक प्रोजेक्टाइल गिरने से दो लोग घायल हुए। एक मस्जिद और कुछ दूसरी इमारतों को भी नुकसान पहुंचा।
यमन में हूती ठिकानों पर सऊदी के हवाई हमलों के बाद हूती विद्रोही भागते नजर आए।
यमन में 500 से ज्यादा सरकारी लड़ाके मारे गए
यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पिछले चार हफ्तों में सरकार समर्थित 500 से ज्यादा लड़ाके मारे गए हैं। सरकार के समर्थन में लड़ने वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स ने यह दावा किया है।
संगठन के मुताबिक, इसी दौरान होदेदा और ताइज प्रांतों में 1,000 से ज्यादा हूती लड़ाके भी मारे गए। हालांकि, हूतियों ने इन आंकड़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस बीच यमनी सरकार ने लाल सागर के तट पर और सैनिक भेजने का फैसला किया है। सरकार के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते की हार को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी बल फिर से इलाके में लौटेंगे।
12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई
यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है।
2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है।
सितंबर में 82 हजार से ज्यादा लोग बेघर
लड़ाई बढ़ने का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से अब तक यमन में 82 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं।
कई परिवार अचानक घर छोड़कर कैंपों और दूसरी सुरक्षित जगहों पर रहने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र ने विस्थापित लोगों की हालत को बेहद खराब बताया है।
कई परिवार इतनी जल्दी घर से निकले कि कपड़े, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें भी साथ नहीं ले जा सके। अब वे कैंपों, घरों और यहां तक कि सड़कों पर रहने को मजबूर हैं।