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छत्तीसगढ़

हर साल 40 लाख सर्पदंश की घटनाएं…50 हजार मौतें:कोबरा-रसेल वाइपर 4 खतरनाक सांपों को पहचानें, काटने पर अस्पताल जाएं, जल्द एंटीवेनम लगवाएं

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रायपुर,एजेंसी। छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग ने एक एडवाइजरी जारी की है। आम लोगों के लिए स्नेक बाइट को लेकर दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। दरअसल बारिश के मौसम में सांप काटने के मामले बढ़ जाते हैं। ऐसे में विभाग ने अपील की है कि इस स्थिति में झाड़ फूंक ना करें सीधे पीड़ित को अस्पताल लेकर जाएं।

विभाग की ओर से कहा गया है कि सर्प दंश में ओझा- बैगा के झाड़-फूंक पर विश्वास कर समय गंवाने से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। सर्प दंश की स्थिति में सीधे नजदीकी अस्पताल पहुंचकर इलाज कराना जरूरी है।

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, जहरीले सांपों के काटने का इलाज अस्पतालों में उपलब्ध एंटीवेनम से ही होता है। किसी प्रकार के झाड़-फूंक करवाने से यह ठीक नहीं हो सकता, बल्कि इसमें समय गंवा देने पर अक्सर पीड़ित व्यक्ति गंभीर हो जाता है और बाद में अस्पताल लाने पर डॉक्टरों को उस मरीज पर बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

कई प्रकरणों में जहर पूरे शरीर में फैल जाता है जिस कारण जान बचाना भी काफी मुश्किल रहता है। इसलिए ऐसे प्रकरणों में तुरंत अस्पताल आना ही सही है जहां इसका निःशुल्क इलाज किया जाता है।

हर साल देश भर में 30-40 लाख लोग सर्पदंश का शिकार

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल 30-40 लाख लोग सर्पदंश का शिकार बनते हैं, जिसमें से 50 हजार से ज्यादा की जान चली जाती है। यह आंकड़ा दुनिया भर के सर्पदंश से होने वाली मौतों का आधे से ज्यादा है।

चौंकाने वाली बात ये है कि सिर्फ 30% पीड़ित ही हॉस्पिटल पहुंच पाते हैं। सांप काटने के अधिकांश मामले मानसून में ही सामने आते हैं।

जहरीले सांप को पहचाने

भारत में 4 सांप ऐसे हैं, जो सबसे ज्यादा मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें कोबरा का न्यूरोटॉक्सिक जहर सांस लेने की प्रक्रिया को रोक देता है। वहीं रसेल वाइपर का हीमोटॉक्सिक जहर खून को जमाता है और अंदरूनी ब्लीडिंग की वजह बन सकता है। आइए भारत के 4 सबसे जहरीले सांपों के बारे में जानते हैं…

सांप काटने के लक्षण

सांप के काटने के बाद शरीर में कई तरह के लक्षण दिख सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि सांप जहरीला है या नहीं। जहरीले सांप के काटने पर आमतौर पर कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

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कोरबा

बालको ने डिजिटल कंट्रोल टावर्स के माध्यम से प्रचालन को बनाया अधिक स्मार्ट

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बालकोनगर, 31 अगस्त 2026। वेदांता एल्यूमिनियम मेटल लिमिटेड की कंपनी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) ने अपने लॉजिस्टिक्स और प्रचालन को अधिक स्मार्ट और कनेक्टेड बनाने की दिशा में पांच एआई-सक्षम डिजिटल कंट्रोल टावर्स को एकीकृत किया है। ये कंट्रोल टावर्स कोयला लॉजिस्टिक्स, फिनिश्ड प्रोडक्ट, फ्लाई फ्लाई ऐश प्रबंधन, आंतरिक वाहनों और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े संचालन को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाते हैं। इससे महत्वपूर्ण प्रचालन गतिविधियों की रियल-टाइम निगरानी, बेहतर समन्वय और डेटा आधारित निर्णय लेने में मदद मिल रही है। यह पहल तकनीक-सक्षम और मजबूत घरेलू विनिर्माण मूल्य श्रृंखला विकसित करने की भारत की व्यापक दिशा के अनुरूप है।

इस डिजिटल व्यवस्था में जीपीएस, आईओटी आधारित वाहन ट्रैकिंग, एआई आधारित वीडियो टेलीमैटिक्स, जियो-फेंसिंग और रियल-टाइम एनालिटिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया है। इनके माध्यम से लॉजिस्टिक्स गतिविधियों की शुरुआत से अंत तक निगरानी और बेहतर प्रबंधन संभव हो रहा है। एजेंटिक एआई से लैस ये कंट्रोल टावर्स उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर प्रचालन के रुझानों को समझने, संभावित आवश्यकताओं की पहचान करने और समय पर कार्रवाई के लिए सुझाव देने में मदद करते हैं। इससे संसाधनों के बेहतर उपयोग, प्रक्रियाओं में अनुशासन और प्रचालन की प्रभावशीलता को बढ़ावा मिलता है।

कोयला लॉजिस्टिक्स कंट्रोल टावर कोयले के परिवहन की डिजिटल ट्रैकिंग और मूवमेंट प्लानिंग में मदद करता है। इससे कोयले की आवाजाही की निगरानी और आपूर्ति श्रृंखला में बेहतर समन्वय सुनिश्चित होता है। फिनिश्ड प्रोडक्ट कंट्रोल टावर प्लांट के भीतर तैयार उत्पादों की आवाजाही को डिजिटल रूप से प्रबंधित करता है। इसमें डिजिटल प्रूफ ऑफ डिलीवरी, जियो-फेंसिंग आधारित रूटिंग और ट्रैफिक मैनेजमेंट जैसी सुविधाएं शामिल हैं, जो उत्पादों की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित बनाती हैं। फ्लाई ऐश मैनेजमेंट कंट्रोल टावर राख की आवाजाही और निर्धारित मार्गों की रियल-टाइम निगरानी करता है। इससे राख के परिवहन की बेहतर ट्रैकिंग, संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन और पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन में सहायता मिलती है। वेस्ट मैनेजमेंट कंट्रोल टावर अपशिष्ट पदार्थों की आवाजाही और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुपालन की निगरानी करता है, जिससे बेहतर ट्रेसबिलिटी और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

वहीं, इंटरनल व्हीकल कंट्रोल टावर प्लांट परिसर में संचालित तकनीकी और उपयोगिता वाहनों की केंद्रीकृत निगरानी करता है। इसमें मीडियम टैक्टिकल व्हीकल्स (एमटीवी), लाइट मीडियम टैक्टिकल व्हीकल्स (एलटीवी), फोर्कलिफ्ट, हाइड्रा, कैंपर और बस जैसे वाहन शामिल हैं। इन सभी वाहनों को साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने से उनकी गतिविधियों की निगरानी और प्रबंधन अधिक सुव्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है।

ये कंट्रोल टावर्स बालको की व्यापक डिजिटलाइजेशन रणनीति का हिस्सा हैं। वाहनों, मार्गों, आवाजाही और अन्य प्रचालन गतिविधियों से प्राप्त आंकड़ों को एकीकृत कर यह व्यवस्था टीमों को महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स कार्यों की समग्र जानकारी उपलब्ध कराती है। इससे प्रचालन में होने वाले बदलावों की पहचान, प्रदर्शन का विश्लेषण और आवश्यक कार्रवाई तेजी से करने में मदद मिलती है।

कंट्रोल टावर्स के माध्यम से कच्चे माल, फिनिश्ड प्रोडक्ट, आंतरिक वाहनों और विनियमित अपशिष्ट की आवाजाही में बेहतर निगरानी और समन्वय स्थापित हुआ है। इससे जवाबदेही, संसाधनों के बेहतर उपयोग और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती को बढ़ावा मिल रहा है।

एल्यूमिनियम उद्योग तेजी से तकनीक आधारित और कनेक्टेड विनिर्माण व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इस दिशा में बालको आधुनिक तकनीकों और औद्योगिक अनुभव के संयोजन से अपनी डिजिटल क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है। पांच डिजिटल कंट्रोल टावर्स का एकीकरण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो बालको के प्रचालन को अधिक एकीकृत, प्रभावी और भविष्य के लिए तैयार बनाने में योगदान दे रहा है।

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छत्तीसगढ़

कमर तक पानी में शव लेकर श्मशान पहुंचे ग्रामीण:रास्ता गड्ढे-कीचड़ में बदला, फिसल कर गिरे लोग, कहा- बरसात में किसी की मौत न हो

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दुर्ग-भिलाई,एजेंसी। दुर्ग जिले के सेमरिया गांव का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में कई ग्रामीण एक शव को कंधे पर लेकर कमर भर पानी और कीचड़ से भरे रास्ते से गुजरते दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, बारिश में बागडूमर से सेमरिया तक करीब 4 किलोमीटर रास्ते में जगह-जगह बड़े गड्ढे और पानी भर जाता है।

श्मशान घाट तक पहुंचने वाले अंतिम डेढ़ किलोमीटर रास्ते की हालत सबसे ज्यादा खराब है। हाल ही में एक शव को श्मशान घाट ले जाने के दौरान करीब 30-40 ग्रामीणों को कंधा लगाना पड़ा। कीचड़ में कई लोग फिसले, जबकि कुछ ग्रामीण रास्ते में ही पीछे रह गए।

सेमरिया गांव दुर्ग जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर और भिलाई स्टील प्लांट से करीब 20 किलोमीटर दूर है। यह अहिवारा विधानसभा क्षेत्र के धमधा जनपद पंचायत अंतर्गत बागडूमर ग्राम पंचायत का आश्रित गांव है।

बारिश में अंतिम यात्रा के लिए शव को श्मशान घाट तक जाने के लिए कमर तक पानी को पार करना पड़ता है।

बारिश में अंतिम यात्रा के लिए शव को श्मशान घाट तक जाने के लिए कमर तक पानी को पार करना पड़ता है।

सेमरिया गांव में बारिश के दिनों में सड़क की बदहाली लोग परेशान

सेमरिया गांव में बारिश के दिनों में सड़क की बदहाली लोग परेशान

श्मशान घाट तक पहुंचने का लगभग डेढ़ किलोमीटर का रास्ता कीचड़ से भरा

श्मशान घाट तक पहुंचने का लगभग डेढ़ किलोमीटर का रास्ता कीचड़ से भरा

नाले के पास कमर भर पानी

ग्रामीणों के अनुसार, गांव से श्मशान घाट तक का लगभग डेढ़ किलोमीटर का रास्ता पूरी तरह कीचड़ से भरा रहता है। नाले के पास पानी का स्तर काफी बढ़ जाता है, जिसके कारण हालिया अंतिम यात्रा में शव को कमर तक पानी के बीच से पार कराना पड़ा था।

लोग बोले- बरसात में किसी की मौत न हो

ग्रामीण तन्नू सोरी ने कहा कि हाल ही में शव ले जाते समय दाह संस्कार में शामिल होने आए कई लोग कीचड़ में गिर गए। कमर भर पानी पार कर शव को श्मशान घाट तक ले जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि कई सालों से ग्रामीण इस रास्ते की परेशानी देख रहे हैं और सड़क बनवाने के लिए लगातार मांग कर रहे हैं।

उन्होंने मीडिया के माध्यम से प्रशासन से सड़क बनाने की अपील की। उनका कहना है कि गांव वालों को ऐसी सड़क चाहिए, जिससे कम से कम किसी व्यक्ति को अंतिम विदाई देने के लिए इस तरह संघर्ष न करना पड़े।

श्मशान घाट में शेड, लेकिन पहुंचने का रास्ता नहीं

ग्रामीणों के अनुसार श्मशान घाट में शेड बनाया गया है, लेकिन वहां तक पहुंचने का रास्ता ही सबसे बड़ी समस्या है। बारिश में कीचड़ और पानी के कारण शेड तक शव ले जाना मुश्किल हो जाता है।

रामअवतार यादव ने बताया कि उन्होंने करीब 2 दिन पहले अंतिम यात्रा का वीडियो बनाया था। उनके मुताबिक गांव से शव को लेकर लोग सामान्य तरीके से आगे बढ़े, लेकिन श्मशान घाट के रास्ते में स्थिति इतनी खराब हो गई कि शव उठाने के लिए करीब 30 से 40 लोगों की जरूरत पड़ी।

यादव ने बताया कि कुछ लोग गिरते-पड़ते श्मशान घाट तक पहुंचे, जबकि कुछ लोग रास्ते की कठिनाई के कारण वहां तक नहीं पहुंच सके। उनका कहना है कि बारिश के दौरान कई बार शेड होने के बावजूद रास्ते की समस्या के कारण खुले में अंतिम संस्कार करने की स्थिति बन जाती है।

‘बचपन बीत गया, सड़क नहीं बदली’

यादव ने कहा कि उनकी उम्र करीब 32 वर्ष हो चुकी है और बचपन से गांव की यही बदहाल स्थिति देखते आ रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से गांव की सड़क और विकास कार्यों पर ध्यान देने की मांग की।

उन्होंने बताया कि दुर्ग जिला पंचायत की अध्यक्ष सरस्वती बंजारे इसी क्षेत्र से जिला पंचायत की सदस्य हैं और विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा इस विधानसभा क्षेत्र की विधायक हैं।

सिर्फ श्मशान घाट नहीं, गांव तक पहुंचना भी मुश्किल

सेमरिया की आबादी करीब 500 है और यहां आदिवासी गोंड समाज के लोगों की बहुलता है। ग्रामीणों के मुताबिक बागडूमर से गांव तक आने वाला करीब 4 किलोमीटर का रास्ता भी बारिश में बेहद खराब हो जाता है।

तन्नू सोरी (22) ने बताया कि गांव के युवा अहिवारा जाकर कंप्यूटर क्लास करते हैं, लेकिन बरसात में सड़क की हालत के कारण वहां जाना मुश्किल हो जाता है। साइकिल पंचर होने और रास्ते में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं।

उन्होंने बताया कि कई बार नेताओं से सड़क बनाने की मांग की गई। उनका कहना है कि अगर बस्तर और अन्य वन क्षेत्रों में सड़कें बन सकती हैं तो उनके गांव तक सड़क क्यों नहीं पहुंच सकती।

‘यह बस्तर नहीं, भिलाई से 20 किलोमीटर दूर है’

ग्रामीणों की सबसे बड़ी नाराजगी इसी बात को लेकर है कि सेमरिया किसी दूरस्थ जंगल या सुदूर इलाके में नहीं है। भिलाई इस्पात संयंत्र से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद गांव की सड़क व्यवस्था इतनी खराब है कि बारिश में सामान्य आवागमन तक मुश्किल हो जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ शहरों में सड़क, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के विकास की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके गांव में अंतिम यात्रा के लिए भी कीचड़ और पानी से जूझना पड़ रहा है।

कलेक्टर बोले- 2 सड़कों की समस्या सामने आई

दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह ने बताया कि इस सड़क के लिए प्रस्ताव शासन को पहले ही भेजा जा चुका है। वहीं श्मशान घाट तक जाने वाली सड़क के लिए ग्रामीण सड़क योजना के अभियंता को सर्वे करने के निर्देश दिए गए हैं। सर्वे के बाद इसे योजना के नेटवर्क में शामिल करने के लिए प्रस्ताव जल्द भेजा जाएगा।

उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सड़क की समस्या को देखते हुए उच्च स्तर पर विशेष रूप से बात कर इसे स्वीकृत कराने का प्रयास किया जाएगा।

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छत्तीसगढ़

झीरम हमले में अब 5 सितंबर को आएगा फैसला:11 आरोपियों पर हुआ ट्रायल, 1 की मौत, 101 गवाहों के बयान और दस्तावेज बने आधार

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जगदलपुर,एजेंसी। झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में फैसला अब 5 सितंबर को आएगा। NIA कोर्ट ने फैसला पांच दिन के लिए टाल दिया है। पहले आज (31 अगस्त) फैसला आने की उम्मीद थी।

इस मामले में 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली थी। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है, जबकि बाकी 10 आरोपियों पर फैसला आना है। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में 101 गवाहों के बयान और दस्तावेज पेश किए हैं।

10 अगस्त को मामले में अंतिम बहस हुई थी। इसके बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अभियोजन पक्ष ने सबूतों के आधार पर आरोप साबित होने की दलील दी, जबकि बचाव पक्ष ने आरोपों को चुनौती दी है।

2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था।

2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था।

10 अगस्त को हुई अंतिम बहस

स्पेशल NIA अदालत ने मामले में 10 अगस्त की तारीख अंतिम बहस के लिए तय की थी। इसी दिन दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। इसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। बता दें कि झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित मामलों में से एक है।

सालों से पीड़ित परिवारों और पूरे प्रदेश की नजर इस मामले के फैसले पर बनी हुई है। अंतिम बहस के बाद अदालत का फैसला आने से इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचेगी।

दरअसल, 2013 के आखिर में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने थे। रमन सिंह मुख्यमंत्री थे। 10 साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जीत के लिए जोर लगा रही थी। पार्टी पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा शुरू करने वाली थी। 25 मई को सुकमा में परिवर्तन रैली की गई।

रैली के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर जा रहा था। इसमें करीब 25 गाड़ियां थीं। इन गाड़ियों में 200 नेता-कार्यकर्ता थे। सबसे आगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा थे।

कांग्रेस की पूरी टॉप लीडरशिप एक काफिले में थी

साथ ही उनके पीछे महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी थी। उनके पीछे बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार चल रहे थे। यानी छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी टॉप लीडरशिप इस काफिले में थी। दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी में पहुंचा।

यहीं नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता बंद कर दिया। गाड़ियां रुकते ही 200 से ज्यादा नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। हमले में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई। करीब डेढ़ घंटे तक फायरिंग होती रही।

महेंद्र कर्मा को नक्सलियों ने मारी थी 100 गोलियां

शाम करीब 5:30 बजे नक्सली पहाड़ों से उतरकर नीचे आए और एक-एक गाड़ी चेक की। एक गाड़ी में उन्हें सलवा जुडूम आंदोलन शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा मिल गए। आंदोलन की वजह से नक्सली महेंद्र कर्मा को दुश्मन समझते थे। उन्होंने बेरहमी से महेंद्र कर्मा की हत्या कर दी। उन्हें करीब 100 गोलियां मारी गईं।

चश्मदीदों के मुताबिक, नक्सलियों ने कुछ नेताओं को नाम लेकर पहचाना और उन्हें गोली मारी। हमला पूरी योजना के साथ किया गया। नक्सलियों ने जगह का चुनाव, बम लगाने और भागने तक की पूरी तैयारी कर रखी थी। खुफिया एजेंसियों को हमले की कोई भनक नहीं थी।

झीरम घाटी में हमले के दौरान IED ब्लास्ट से एक गाड़ी का हिस्सा उड़कर नदी में जा गिरा था। ये 12 साल बाद भी वहीं फंसा हुआ है।

झीरम घाटी में हमले के दौरान IED ब्लास्ट से एक गाड़ी का हिस्सा उड़कर नदी में जा गिरा था। ये 12 साल बाद भी वहीं फंसा हुआ है।

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