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नॉर्वे के बड़े नेता का बयान:‘ दुनिया में PM मोदी जैसा लोकप्रिय नेता कोई नहीं, पश्चिमी देशों को उनसे सीखना चाहिए’

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ओस्लो, एजेंसी। नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की नॉर्वे यात्रा से पहले पूर्व नॉर्वेजियन मंत्री और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के पूर्व प्रमुख  एरिक सोल्हेम (Erik Solheim) ने उनकी नेतृत्व क्षमता और पर्यावरण दृष्टि की खुलकर सराहना की है।  नॉर्वे के अखबार में लिखे लेख में सोलहेम ने कहा कि दुनिया के किसी भी बड़े देश में ऐसा नेता नहीं है जिसे अपने देश में उतना समर्थन और प्यार मिलता हो जितना प्रधानमंत्री मोदी को मिलता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के नेताओं को मोदी के लगातार “हरित विकास” संदेश से बहुत कुछ सीखना चाहिए।

सोलहेम ने प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक नेता बताते हुए कहा कि उनकी स्वीकृति दर करीब 70 प्रतिशत के आसपास है। उन्होंने भारत की तेज आर्थिक प्रगति का भी उल्लेख किया और कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग सात प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज मानी जा रही है। सोलहेम ने प्रधानमंत्री मोदी के साधारण परिवार से निकलकर देश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने की यात्रा को प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह मेहनत और नेतृत्व क्षमता से हासिल की गई सफलता है। पूर्व संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने भारत में तेजी से बन रहे आधुनिक हवाई अड्डों, सड़कों और अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं की भी प्रशंसा की।

उन्होंने गुजरात में बन रहे विशाल सौर ऊर्जा पार्क और आंध्र प्रदेश की बड़ी सौर, पवन और जलविद्युत परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अब हरित ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनता जा रहा है। सोलहेम ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी पर्यावरण संरक्षण को त्याग या बोझ के रूप में नहीं बल्कि विकास और गरीबी हटाने के साधन के रूप में पेश करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और नॉर्वे के बीच मजबूत संबंध दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित हो सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी 18 से 19 मई तक नॉर्वे की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगे, जहां नॉर्डिक-भारत शिखर बैठक भी आयोजित की जाएगी।

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ईरान ने एक और इजरायली को दी मौत, जासूसी के आरोप में फांसी पर चढ़ाया

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तेहरान, एजेंसी। ईरान ने इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद  के लिए कथित तौर पर काम करने वाले एक व्यक्ति को फांसी दे दी है। ईरानी न्यायपालिका की वेबसाइट के अनुसार एहसान अफरेशतेह नाम के इस व्यक्ति पर इजरायल को संवेदनशील और गोपनीय जानकारी बेचने का आरोप था।  रिपोर्ट में दावा किया गया कि उसे नेपाल में मोसाद की ओर से प्रशिक्षण दिया गया था।ईरान के अनुसार आरोपी को “जासूसी और यहूदी शासन के साथ सहयोग” के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में अदालत ने उसे दोषी ठहराया और देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी सजा को बरकरार रखा।

इसके बाद बुधवार सुबह उसे फांसी दे दी गई।  यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। फरवरी 2026 के बाद से ईरान में जासूसी और सुरक्षा मामलों में फांसी की घटनाएं बढ़ी हैं। कुछ दिन पहले भी ईरान ने एक एयरोस्पेस इंजीनियरिंग छात्र को फांसी दी थी, जिस पर अमेरिका और इजरायल के लिए जासूसी करने का आरोप था।

मानवाधिकार संगठनों के अनुसार चीन के बाद ईरान दुनिया में सबसे अधिक फांसी देने वाले देशों में शामिल है। इस बीच पश्चिम एशिया में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। इजरायली सेना ने दावा किया है कि उसने दक्षिणी लेबनान में एक संदिग्ध हवाई लक्ष्य को मार गिराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव आने वाले समय में क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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ट्रंप के चीन पहुंचने से पहले जिनपिंग ने दिखाए तेवर, कहा-‘ये चार लाल रेखाएं पार मत करना’

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वाशिंगठन/बीजिंग, एजेंसी। चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा से पहले साफ संदेश देते हुए कहा है कि दोनों देशों के संबंधों में मौजूद “चार लाल रेखाओं” को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। अमेरिका में स्थित चीनी दूतावास ने सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि चीन-अमेरिका संबंधों में कुछ मुद्दे बेहद संवेदनशील हैं और उन्हें पार नहीं किया जाना चाहिए। बीजिंग ने जिन चार मुद्दों को “लाल रेखा” बताया है, उनमें ताइवान का प्रश्न, लोकतंत्र और मानवाधिकार, राजनीतिक व्यवस्था और चीन के विकास का अधिकार शामिल हैं।

चीनी दूतावास ने यह भी कहा कि दोनों देशों को आपसी सम्मान, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और सहयोग के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। इसी बीच  ट्रंप ने कहा कि वह चीन यात्रा के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग पर विशेष जोर देंगे। ट्रंप ने बताया कि कई बड़े अमेरिकी उद्योगपति भी उनके साथ चीन जा रहे हैं। इनमें एलोन मस्क, टिम कुक और जेन्सेन हुआंग जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। ट्रंप ने कहा कि वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग  से चीन के बाजार को और खोलने की मांग करेंगे ताकि अमेरिकी कंपनियों को अधिक अवसर मिल सकें।  

उन्होंने शी  को “बेहद प्रभावशाली नेता” बताते हुए कहा कि यह यात्रा बहुत महत्वपूर्ण और उत्साहजनक रहने वाली है।  ईरान मुद्दे पर भी ट्रंप ने सख्त रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि ईरान सैन्य रूप से कमजोर पड़ चुका है और या तो समझौता करेगा या फिर अमेरिका कार्रवाई पूरी करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि  दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच होने वाली यह वार्ता आने वाले समय में वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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अमेरिका का ईरान पर नया दांवः IRGC के गुप्त नेटवर्क पर गढ़ाई नजर, जानकारी देने वाले को मिलेगा 1.5 करोड़ डॉलर का ईनाम

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वाशिंगठन, एजेंसी। अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाते हुए उसकी सैन्य संस्था Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के वित्तीय नेटवर्क की जानकारी देने वालों के लिए 1.5 करोड़ डॉलर तक के इनाम की घोषणा की है।  अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि यह कदम ईरान के कथित अवैध तेल कारोबार और उससे जुड़े वित्तीय तंत्र को निशाना बनाने के लिए उठाया गया है। अमेरिका के अनुसार IRGC और उसकी विभिन्न शाखाएं तेल बिक्री, फर्जी कंपनियों और गुप्त वित्तीय चैनलों के जरिए धन जुटाती हैं, जिसका इस्तेमाल क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों और सहयोगी संगठनों को समर्थन देने में किया जाता है।

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा कि ट्रंप प्रशासन “आर्थिक प्रहार” नीति के तहत ईरान पर दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने ईरानी तेल की बिक्री और ढुलाई से जुड़े एक नेटवर्क तथा आईआरजीसी के तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका का आरोप है कि ये अधिकारी तेल कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन का समन्वय कर रहे थे। इनाम योजना के तहत अमेरिका ऐसी जानकारी मांग रहा है जिससे आईआरजीसी के वित्तीय ढांचे, प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क, फर्जी कंपनियों, गुप्त बैंकिंग चैनलों और दोहरे उपयोग वाली तकनीकों की खरीद प्रणाली को बाधित किया जा सके।

अमेरिका ने यह भी कहा कि ईरान की जनता आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रही है, जबकि शासन अपने संसाधनों का उपयोग हथियार कार्यक्रमों और क्षेत्रीय संघर्षों में कर रहा है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और अमेरिका-ईरान संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह रणनीति ईरान की आर्थिक ताकत और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और पश्चिम एशियाई राजनीति पर भी पड़ सकता है।

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