देश
बिहार के सीवान में गंडक नहर पर बना ब्रिज गिरा:पिलर के धंसते ही ढह गया 30 फीट लंबा पुल; 5 दिन पहले अररिया में टूटा था ब्रिज
सीवान, एजेंसी। बिहार में 5 दिनों में दूसरा पुल ढह गया। शनिवार सुबह सीवान के महाराजगंज अनुमंडल के पटेढ़ा और गरौली गांव के बीच गंडक नहर पर बना पुल अचानक टूट गया। एक पिलर के धंसते ही पुल भर-भराकर नहर में समा गया।हादसे का लाइव वीडियो भी सामने आया है, जिसमें साफ दिख रहा है कि पिलर अपनी जगह से खिसकता है, धीरे-धीरे पुल धराशायी हो जाता है। पुल के टूटने से दो गांव के बीच का आवागमन पूरी तरह से ठप हो गया है।
ग्रामीणों ने बताया कि विभाग ने नहर की सफाई कराई थी। नहर की मिट्टी काटकर बांध पर फेंकी गई थी। इस वजह से पुल का पिलर काफी कमजोर हो गया था, जिसके कारण टूट गया।इससे 5 दिन पहले अररिया के सिकटी में बकरा नदी पर बना पुल उद्घाटन से पहले मंगलवार को नदी में समा गया था। पुल 31 करोड़ रुपए की लागत से बना था। पिछले 13 साल में यह पुल तीसरी बार बन रहा था।
30 साल पहले बना था पुल
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि नहर की सफाई के दौरान विभाग ने सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया, जिससे पुल के पिलर पर अतिरिक्त भार पड़ गया और यह हादसा हो गया। इस पुल की चौड़ाई लगभग 30 फीट थी। लगभग 30 साल पहले इस पुल का निर्माण कराया गया था।
हालांकि, इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है, लेकिन पुल के टूटने से आवागमन पूरी तरह से बाधित हो गया है। इससे ग्रामीणों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। बच्चों का स्कूल जाना, किसानों का खेतों तक पहुंचना और मरीजों का अस्पताल जाना भी मुश्किल हो गया है।
स्थानीय बलराम साह ने बताया कि यह पुल गांव के ही लोगों ने 1990 में बनवाया था। चंदा जमा करके नींव और 3 खंभे बनाए गए थे। बाद में तब के विधायक उमाशंकर सिंह ने लोगों की मांग पर पुल की ढलाई का काम कराया था। हाल में गंडक विभाग के लोगों ने नहर की सफाई करने के दौरान पिलर के पास की मिट्टी निकाल दी। आज पानी आया और कमजोर हो गया पिलर टूट गया।
ग्रामीणों में आक्रोश
ग्रामीणों का कहना है कि घटना के बाद से अभी तक कोई भी सरकारी अधिकारी स्थिति का जायजा लेने नहीं पहुंचा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की इस अनदेखी के कारण उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि पुल के टूटने से संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी से संपर्क नहीं हो पाया।
इस घटना से ग्रामीणों में काफी आक्रोश है। उनका कहना है कि प्रशासन को तुरंत इस मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए और पुल की मरम्मत का कार्य जल्द से जल्द शुरू करना चाहिए। इसके साथ ही ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि इस घटना की जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
इधर, घटना की जानकारी मिलने के बाद महाराजगंज के भूमि सुधार उप समाहर्ता (DCLR) श्रीराम रंजन सिंह मौके पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि आवागमन बाधित नहीं हुआ है। यहां से एक किलोमीटर दूर दूसरा पुल है, उससे लोग आवाजाही कर रहे हैं। पुल गिरने के कारणों पर उन्होंने कहा कि इसके बारे में स्थानीय लोग ही बता सकेंगे। उन्हीं के सहयोग से 1991 में पुल बना था।

देश
देशभर में LPG की किल्लत, एजेंसी के बाहर लंबी लाइनें:UP-बिहार में पुलिस सुरक्षा में सिलेंडर बंट रहे, अयोध्या में राम रसोई बंद
नई दिल्ली,एजेंसी। अमेरिका-इजराइल की ईरान से जंग की वजह से देशभर में LPG की किल्लत हो रही है। गैस सिलेंडर लेने के लिए एजेंसियों पर लंबी लाइनें लगी हैं।
दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत कई राज्यों ने कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई पर रोक से होटलों और रेस्टोरेंट्स में खाना नहीं बन पा रहा है।
वहीं, LPG सिलेंडर की किल्लत के चलते अयोध्या में राम रसोई को बंद कर दिया गया है। 8 साल में पहला मौका है जब राम रसोई बंद की गई है।
दिल्ली: हाई कोर्ट की कैंटीन में मेन कोर्स बनाना बंद
दिल्ली हाई कोर्ट की वकीलों की कैंटीन में भी LPG गैस सिलेंडर न होने की वजह से मेन कोर्स का खाना देना कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया है। कैंटीन प्रबंधन ने बताया कि उनके पास LPG सिलेंडर नहीं हैं और यह भी साफ नहीं है कि गैस सप्लाई कब तक बहाल होगी।
दिल्ली हाई कोर्ट में वकीलों की कैंटीन के मैनेजर मोहर सिंह ने कहा, ‘गैस नहीं आई तो हमने लंच में दाल-चावल, कढ़ी-चावल, राजमा-चावल, छोले-चावल, चिकन, बिरयानी ये सब बंद कर दिया है। आगे से गैस नहीं आ रही है। हमने काफी जगह कोशिश की लेकिन गैस नहीं आया।’
मध्य प्रदेश: कैटरर्स बोले- ये इमरजेंसी जैसी स्थिति
कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई ठप होने से सबसे ज्यादा संकट होटल-रेस्टॉरेंट पर है। वहीं घरेलू रसोई गैस लेने के लिए गैस एजेंसियों के बाहर लंबी लाइनें लगी है।
जिन घरों में शादी है, वे टेंशन में हैं। अकेले भोपाल में ही 20 दिन में एक हजार से ज्यादा शादियां हैं। कैटरर्स का कहना है कि ये इमरजेंसी जैसी स्थिति है।

उत्तर प्रदेश: पुलिस सुरक्षा में बंट रहे सिलेंडर, अयोध्या में राम रसोई बंद
उत्तर प्रदेश में बुकिंग के 4 से 5 दिन बाद भी सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं। गैस एजेंसियों के बाहर लाइनें लगने लगी हैं। गोरखपुर-सिद्धार्थनगर में पुलिस सुरक्षा में सिलेंडर बांटे जा रहे हैं।
एजेंसियों पर तड़के 3 बजे से ही लोग लाइन लगाने पहुंच रहे हैं। घंटों इंतजार कर रहे हैं, लेकिन सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। वजह- सिलेंडर कम हैं और लेने वालों की संख्या ज्यादा।

बिहार: लोग सुबह से ही गैस एजेंसी पहुंच रहे
यहां भी 2 दिन से कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की बुकिंग बंद है। इस वजह से होटल,रेस्टॉरेंट पर असर पड़ा है। घरेलू गैस को लेकर भी राज्य के कई जिलों में लोगों की लंबी कतार दिखी।
गोपालगंज, खगड़िया, औरंगाबाद, पटना समेत कई जिलों में लोग सुबह से ही गैस एजेंसी पहुंचने लगे। कई एजेंसियों में ताला लटका है। कोई कर्मचारी भी यहां मौजूद नहीं हैं।

राजस्थान: 1900 रुपए का सिलेंडर 2500 रुपए में बेचा जा रहा
कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई बिल्कुल बंद हो गई है। ऐसे में अलग-अलग एजेंसी तय दाम से ज्यादा में सिलेंडर की कालाबाजारी कर रही है। जयपुर में 1911 रुपए में मिलने वाला सिलेंडर 2500 रुपए तक में बेचा जा रहा है।

अलवर में एक गैस एजेंसी पर जमकर हंगामा हुआ। यहां ग्राहकों ने एजेंसी पर कालाबाजारी के आरोप लगाए।
पंजाब: घरेलू सिलेंडरों की भी बुकिंग बंद
लुधियाना और फरीदकोट में सर्वर डाउन होने के कारण घरेलू सिलेंडरों की बुकिंग भी नहीं हो पा रही है। इसके अलावा फरीदकोट, होशियारपुर और पटियाला समेत कई जिलों में सोमवार से कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई बंद है।

गुजरात: कॉमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए 2500 से 3000 रुपए तक की मांग
मशहूर फूड ट्रक ‘महेश पौनभाजी’ के मैनेजर शिवचरण अग्रवाल के अनुसार कॉमर्शियल गैस सिलेंडर के लिए फिलहाल 2500 से 3000 रुपए तक की मांग की जा रही है। इस कालाबाजारी के कारण छोटे-मोटे दुकानदार और होटल मालिकों पर आर्थिक संकट आ गया है। घरेलू गैस के लिए भी राज्य के कई जिलों में लोगों की लंबी लाइन लगी हुई हैं।

IRCTC भी अपनी CO कैटरिंग ऑपरेशन ट्रेनों में खाने की सर्विस कुछ समय के लिए रोक सकती है। वहीं उन यात्रियों को रिफंड दे सकती है, जिन्होंने अपने टिकट के साथ खाना पहले से बुक किया था।
IRCTC ने कैटरिंग यूनिट्स से LPG की संभावित कमी से निपटने के लिए माइक्रोवेव और इंडक्शन का इस्तेमाल करने को भी कहा है।
संकट से निपटने सरकार ने 5 जरूरी कदम उठाए
1. हाई-लेवल कमेटी बनाई: संकट को देखते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने तीन तेल कंपनियों के कार्यकारी निदेशकों की एक हाई-लेवल कमेटी बनाई है, जो सप्लाई की समीक्षा करेगी।
2. एसेंशियल कमोडिटी एक्ट लागू: गैस की सप्लाई को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार ने देशभर में ‘एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 1955’ लागू कर दिया है।
3. 25 दिन बाद होगी LPG बुकिंग: घरेलू सिलेंडर की बुकिंग के नियमों में बदलाव किया है। उपभोक्ता एक सिलेंडर डिलीवर होने के बाद दूसरा सिलेंडर 25 दिन बाद ही बुक होगा।
4. OTP और बायोमेट्रिक अनिवार्य: गैस की जमाखोरी रोकने के लिए डिलीवरी एजेंट OTP या बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन का सख्ती से इस्तेमाल कर रहे हैं।
5. LPG उत्पादन बढ़ाने का आदेश: सरकार ने सभी ऑयल रिफाइनरीज को LPG उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया था। सूत्रों का कहना है कि अब उत्पादन 10% बढ़ गया है।
तेल कंपनियां रेस्टोरेंट एसोसिएशनों से बात करेंगी
सूत्रों के मुताबिक सरकार ने रेस्टोरेंट एसोसिएशनों की शिकायतें सुनने के लिए 3 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है। इसमें IOC, HPCL और BPCL के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर शामिल हैं।
यह कमेटी एसोसिएशन की कॉमर्शियल गैस सप्लाई से जुड़ी जायज जरूरतों को पूरा करेगी। जरूरत के हिसाब से सप्लाई की प्राथमिकता भी भी फिर से तय करेगी।
सप्लाई संकट की 2 वजह
1. होर्मुज स्ट्रेट का लगभग बंद होना
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना है। ये करीब 167 किमी लंबा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। ईरान जंग के कारण यह रूट अब सुरक्षित नहीं रहा है। खतरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहां से नहीं गुजर रहा।
दुनिया के कुल पेट्रोलियम का 20% हिस्सा यहीं से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश भी अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। ईरान खुद इसी रूट से एक्सपोर्ट करता है।
2. प्लांट पर ड्रोन हमले से LNG का प्रोडक्शन रुका
पिछले हफ्ते अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर स्ट्राइक की थी। इसके जवाब में ईरान ने UAE, कतर, कुवैत और सऊदी जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है।
ईरान के ड्रोन हमले के बाद भारत को गैस सप्लाई करने वाले सबसे बड़े देश कतर ने अपने LNG प्लांट का प्रोडक्शन रोक दिया है। इससे भारत में गैस की सप्लाई घट गई है। भारत अपनी जरूरत की 40% LNG (करीब 2.7 करोड़ टन सालाना) कतर से ही आयात करता है।
कब तक सुधरेंगे हालात?
इंडियन ऑयल के मुख्य महाप्रबंधक (LPG) के.एम. ठाकुर का कहना है कि ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है और पैनिक बुकिंग न करें। सरकार अब अमेरिका जैसे देशों से वैकल्पिक कार्गो मंगाने पर विचार कर रही है।
वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर G7 देश अपने इमरजेंसी तेल भंडार से सप्लाई जारी करने पर चर्चा कर रहे हैं, ताकि ग्लोबल मार्केट में ऊर्जा संकट को कम किया जा सके। रूस और अल्जीरिया से भी अतिरिक्त कच्चा तेल आने की उम्मीद है।
सरकार ने घरेलू गैस सिलेंडर के दाम रु.60 बढ़ाए
सरकार ने घरेलू गैस सिलेंडर 60 रुपए महंगा कर दिया है। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम की LPG गैस अब 913 रुपए की मिल रही है। पहले यह 853 रुपए की थी। बढ़ी हुई कीमतें 7 मार्च से लागू हो गई हैं।
वहीं 19 किग्रा वाले कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम 1 मार्च को 115 रुपए बढ़ाए गए थे। यह अब 1883 रुपए का मिल रहा है।
देश
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी:13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार
नई दिल्ली,एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं।
देश में इस तरह का यह पहला मामला है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया कि हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। यह प्रोसेस इस तरह से की जानी चाहिए कि मरीज की गरिमा बनी रहे।
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला हरीश की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की इच्छामृत्यु देने की अपील पर सुनाया।

हरीश अपनी मां निर्मला राणा के साथ। परिवार ने बताया कि बेटे के इलाज के लिए अपनी संपत्ति तक बेच दी, लेकिन अब आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। बेटे की तकलीफ भी नहीं देखी जाती।
फैसले पर पिता अशोक ने कहा-
हम इसके लिए लंबे समय से लड़ रहे थे। कौन से माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे। पिछले 3 साल से हम यह मामला लड़ रहे थे। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा। वह पंजाब यूनिवर्सिटी में टॉपर हुआ करता था।
हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे, तब से बिस्तर पर
दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं।
डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है।
यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में शेक्सपीयर का जिक्र किया
जस्टिस पारदीवाला ने फैसला सुनाते वक्त अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों का हवाला देते हुए कहा, ‘ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, उसे जीवन लेना ही पड़ता है।’
उन्होंने विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक हेलमेट की पंक्ति “To be or not to be” का भी जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों को कई बार इसी तरह के प्रश्नों के संदर्भ में “मरने के अधिकार” पर विचार करना पड़ता है।
लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्णय दो आधारों पर होना चाहिए:
- यह हस्तक्षेप चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता हो।
- यह मरीज के सर्वोत्तम हित में हो।
अदालत ने यह भी कहा कि डॉक्टर का कर्तव्य मरीज का इलाज करना है, लेकिन जब मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो यह कर्तव्य उसी रूप में कायम नहीं रहता।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कानून बनाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर कानून बनाने पर विचार करने का भी कहा। फिलहाल भारत में यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आधार पर ही संभव है, जिसमें मरीज की स्थिति पर दो मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी होती है।
इच्छामृत्यु के 2 तरीके होते हैं…
- पैसिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है।
- एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे BNS की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है।
भारत के संविधान में इच्छामृत्यु का क्या कानून है
2005 में कॉमन कॉज नाम की एक NGO ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर 9 मार्च 2018 को CJI दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी।
तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,
अगर किसी मरीज को लाइलाज बीमारी हो या वेजिटेटिव स्टेट में यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा हो, तो प्राकृतिक तरीके से मृत्यु के लिए उसका इलाज बंद किया जा सकता है। इसे इच्छामृत्यु नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार माना जाएगा।
यह अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा है, जिसमें सम्मान से जीने के साथ सम्मान से मरने का अधिकार है।

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो
इच्छामृत्यु को लेकर क्या नियम है
2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 2 तरह के नियम बनाए…
1. जब मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो: जब मरीज ने मेंटली फिट रहते हुए अपनी इच्छा से लिविंग विल लिखी हो। इस लिविंग विल में साफ तौर पर लिखा जाता है कि मरीज की बीमारी अगर लाइलाज हो जाए यानी अगर वह अब कभी ठीक होने लायक न बचे तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए भी कुछ नियम बनाए हैं…
18 साल से ज्यादा उम्र और स्वस्थ व्यक्ति ही लिविंग विल लिख सकता है। मरीज ने 2 गवाहों के सामने लिविंग विल साइन की हो। डॉक्यूमेंट्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने वेरिफाई किया हो।
इलाज करने वाले डॉक्टर, हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई हो। दोनों बोर्डों की मंजूरी मिलने के बाद वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता हो।
इस पूरी प्रक्रिया के बारे में परिवार को जानकारी दी जाती है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
2. जब कोई लिविंग विल न हो: जब मरीज अपने होश में रहते हुए लिविंग विल नहीं बनाता तो उसका परिवार या करीबी ये फैसला ले सकते हैं। हालांकि, ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए इन नियमों का पालन करना होता है…
अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की कंडीशन चेक कर रिपोर्ट बनाता है। कलेक्टर 3-5 एक्सपर्ट्स का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाते हैं, जो ये रिपोर्ट चेक करता है। दोनों बोर्ड के सहमत होने पर इस फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट मरीज से मिलकर आखिरी निर्णय लेते हैं। अगर इसमें किसी तरह की विवाद की स्थिति होती है, तो हाइकोर्ट में अपील की जा सकती है।
क्या इससे पहले ऐसा किसी मामले में हुआ है
हरीश राणा का मामला भारत में पैसिव यूथेनेशिया का ऐसा पहला मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बनाए नियम फॉलो हो रहे हैं। दरअसल, 2018 के कॉमन कॉज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नियम बनाए थे, जो अब तक किसी मामले पर लागू नहीं हुए हैं। हरीश का केस पहला मामला है, जिसमें इन्हें लागू किया जा रहा है।
11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली AIIMS को आदेश दिया है कि वो एक दूसरी मेडिकल बोर्ड बनाए जो हरीश राणा की कंडीशन की जांच करे। इस केस में प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में चल रही है।
हालांकि, 2011 के अरुणा शानबाग केस ने पैसिव यूथेनेशिया को पहली बार लीगल बनाया, जो 2018 के कॉमन कॉज केस का आधार बना।
अरुणा शानबाग केस: 1973 में मुंबई के KEM अस्पताल में 42 साल की नर्स अरुणा शानबाग पर एक वार्ड अटेंडेंट ने हमला किया और फिर रेप किया। हमले में लगी गंभीर दिमागी चोटों की वजह से अरूणा कोमा में चली गईं। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए साल 2009 में एक पत्रकार पिंकी विरानी ने अरुणा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में अरुणा की लाइफ सपोर्ट मशीनें हटाने की मांग की गई, ताकि उनकी प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को कानूनी अधिकार बताया था, लेकिन अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी। क्योंकि वह तब कुछ हद तक बिना मशीनों के सांस ले रही थीं। इसके बाद 2015 में अरुणा शानबाग की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो गई।
देश
शाह बोले-जो नियम से नहीं चलेंगे,उनका माइक बंद होगा:राहुल पर कहा- नियम से बोलना पड़ता है, शशि थरूर इन्हें सिखाते क्यों नहीं
नई दिल्ली,एजेंसी। लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना अफसोसजनक, क्योंकि स्पीकर किसी एक दल के नहीं है, वे सभी के हैं।
उन्होंने कहा कि स्पीकर को नियमों के उल्लघंन पर रोकने और टोकने का अधिकार है। ये सदन मेला नहीं है, जो नियम से नहीं चलेंगे,उनका माइक बंद होगा।
शाह ने कहा, शिष्टाचार यह है कि लोकसभा नियमों के अनुसार चले। अब कोई खड़ा होकर कुछ भी बोलेगा, तो स्पीकर को उसे बैठाना पड़ेगा। मैं स्पीकर के अविश्वास प्रस्ताव पर आज बोल रहा हूं, तो माओवाद पर लेक्चर नहीं दे सकता। बोलूंगा तो स्पीकर मुझे भी बैठा देंगे।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा, अरे भाई यहां नियमों से बोलना पड़ता है, यहां इतने वरिष्ठ सदस्य बैठे हैं, मुझे तो अभी भी नहीं मालूम पड़ता कि शशि थरूर, बालू साहब बैठे हैं, क्यों नहीं सिखाते उन्हें। इतना सीखा दें तो समस्या का वहीं समाधान हो जाए। वे कहते हैं, हमें बोलने नहीं देते हैं।

इससे पहले रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी और विपक्ष पर कई आरोप लगाए। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि हम जब भी बोलने को होते हैं हमे रोका-टोका जाता है। उन्होंने कहा कि यह चर्चा लोकतंत्र और स्पीकर की भूमिका पर है। कई मौकों पर मेरा नाम लिया गया। हर समय हमें बोलने से रोका गया।
राहुल ने कहा कि आखिरी बार बोलते हुए मैंने प्रधानमंत्री की ओर से कॉम्प्रोमाइज का मुद्दा उठाया था। सदन देश का प्रतिनिधित्व करता है। पहली बार विपक्ष के नेता को नहीं बोलने दिया गया। पीएम कॉम्प्रोमाइज्ड हैं।
राहुल के इतना बोलने पर रविशंकर प्रसाद ने कहा- नेवर…नेवर। पीएम मोदी का भारत कभी कॉम्प्रोमाइज्ड नहीं होगा। इनको बेसिक समझदारी भी नहीं है। स्पीकर ने कई बार चेयर घेरी गई, कागज फेंके गए, लेकिन वह मुस्कराते रहे।

लोकसभा की कार्यवाही के दौरान विपक्ष ने चेयर को घेरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
अविश्वास प्रस्ताव पर मंगलवार से चर्चा जारी
स्पीकर ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर मंगलवार को करीब 7 घंटे बहस हो चुकी है। विपक्षी सांसद ओम बिरला पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव लाए थे। 50 से अधिक सांसदों के प्रस्ताव के समर्थन में वोट करने के बाद पीठासीन अधिकारी ने इसे सदन में पेश करने और चर्चा की मंजूरी दी थी।
बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि बजट सत्र के दौरान 20 बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को रोका-टोका गया। उन्हें बार बार रूलिंग बुक दिखाई गई। विपक्ष ने कहा कि स्पीकर सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं।
वहीं संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि ओम बिरला पर लगे आरोप झूठे हैं। वे निष्पक्षता से सदन की कार्यवाही चलाते हैं। 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष केवल 2 बार बोले। जब सेशन चलता है, तो विदेश चले जाते हैं। नेता प्रतिपक्ष अपनी बात बोल के सदन से भाग जाते हैं। किसी और की बात नहीं सुनते हैं। फिर कहते हैं कि मुझे बोलने नहीं दिया जाता है।
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