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₹0 से 1 करोड़ रुपए के पार पहुंचा बिटकॉइन:किसने बनाया कोई नहीं जानता, इसे बनाने वाले ने खुद को क्यों छिपाया

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मुंबई,एजेंसी। बिटकॉइन की कीमत पहली बार रू1.08 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2009 में इसकी वैल्यू शून्य के करीब थी। इस करेंसी से कई दिलचस्प किस्से भी जुड़े हैं।

जैसे जिस व्यक्ति ने इसे बनाया है उसे कोई नहीं जानता। उसने अपने आप को गुमनाम रखा है। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो।

इसी तरह 2010 में खरीदा गया वो पिज्जा भी कोई नहीं भूल सकता, जिसे 10,000 बिटकॉइन देकर खरीदा गया था। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने इसे खरीदा था।

अगर वो इंजीनियर उस समय ये पिज्जा नहीं खरीदता और ये बिटकॉइन अपने पास रखता तो इन बिटकॉइन्स की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होती।

यानी, अगर एक पिज्जा में 6 स्लाइस हैं तो दो पिज्जा के हिसाब से एक स्लाइस की कीमत 833 करोड़ पड़ी। यहां हम 5 चैप्टर में बिटकॉइन की दिलचस्प कहानी बता रहे हैं…

साल 2008 का समय था, दुनियाभर में आर्थिक संकट अपने चरम पर था। उस वक्त बैंकों और सरकारों पर लोगों का भरोसा डगमगा रहा था। लोग बैंकों और सेंट्रल बैंकों के फैसलों और व्यवस्था से नाराज थे। बैंकों की गलत नीतियों की वजह से कई लोग अपनी जमा-पूंजी खो बैठे।

इसी माहौल में खुद को सतोशी नाकामोतो कहने वाले एक गुमनाम शख्स ने एक नई तरह की डिजिटल करेंसी का कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया। इसमें उन्होंने डिटेल में बताया था कि कैसे एक ऐसी करेंसी बनाई जा सकती है जो बिना किसी बैंक और सरकार के दखल के काम करे।

फिर 3 जनवरी 2009 को बिटकॉइन का पहला ब्लॉक ‘जेनिसिस ब्लॉक’ बनाया गया। यहीं से बिटकॉइन की शुरुआत हुई। बिटकॉइन का मकसद एक ऐसी करेंसी देना था जो ‘डिसेंट्रलाइज्ड’ हो, यानी जिस पर किसी एक संस्था का कंट्रोल न हो।

2008 का क्राइसिस अमेरिका के हाउसिंग बबल से शुरू हुआ था। बैंकों ने बिना सोचे-समझे होम लोन बांटे, जो लोग चुकाने में सक्षम नहीं थे। ये तस्वीर 13 अक्टूबर 2008 की है। न्यूयॉर्क शहर में लोग न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

2008 का क्राइसिस अमेरिका के हाउसिंग बबल से शुरू हुआ था। बैंकों ने बिना सोचे-समझे होम लोन बांटे, जो लोग चुकाने में सक्षम नहीं थे। ये तस्वीर 13 अक्टूबर 2008 की है। न्यूयॉर्क शहर में लोग न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

चैप्टर-2

पहला ट्रांजैक्शन

बात 22 मई, 2010 की है। लास्जलो हैन्येज नाम के फ्लोरिडा बेस्ड एक प्रोग्रामर ने बिटकॉइन फोरम पर एक पोस्ट डाली। इसमें लिखा, ‘मैं 10,000 बिटकॉइन देकर दो पिज्जा खरीदना चाहता हूं।’ उस वक्त बिटकॉइन की कीमत इतनी कम थी कि 10,000 की वैल्यू महज 41 डॉलर थी।

लास्जलो की पोस्ट पर जेरेमी स्टर्डिवेंट नाम के एक शख्स ने जवाब दिया। जेरेमी ने पापा जॉन्स से दो पिज्जा ऑर्डर किए और लास्जलो के पते पर डिलीवर करवाए। बदले में लास्जलो ने जेरेमी को 10,000 बिटकॉइन भेजे। ये बिटकॉइन का पहला रियल-वर्ल्ड ट्रांजैक्शन था।

इसे ‘बिटकॉइन पिज्जा डे’ के नाम से जाना जाता है। उस वक्त किसी को नहीं पता था कि बिटकॉइन की कीमत भविष्य में आसमान छूएगी। आज एक बिटकॉइन की कीमत 1.08 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है।

क्यों खास है ये ट्रांजैक्शन?

  • ये पहला मौका था जब बिटकॉइन को किसी फिजिकल आइटम, यानी पिज्जा के लिए इस्तेमाल किया गया।
  • ऐसे में सबसे पहले पता चला कि बिटकॉइन सिर्फ डिजिटल कोड नहीं, बल्कि असल में पैसे की तरह काम कर सकता है।
  • आज के हिसाब से 10,000 बिटकॉइन की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है। लोग मजाक में कहते हैं कि ये ‘दुनिया के सबसे महंगे पिज्जा’ थे।

चैप्टर-3

गुमनाम फाउंडर

बिटकॉइन का फाउंडर कौन है किसी को नहीं पता। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो। कोई नहीं जानता कि ये शख्स था, कोई ग्रुप था, या बस एक नाम।

2008 में सतोशी ने एक ऑनलाइन क्रिप्टोग्राफी मेलिंग लिस्ट पर एक व्हाइटपेपर पोस्ट किया था, जिसका टाइटल था- ‘बिटकॉइन: अ पीयरॉ-टू-पीयर इलेक्ट्रॉनिक कैश सिस्टम।’ ये वो पहला मौका था जब किसी ने सतोशी नाम सुना।

जनवरी 2009 में, सतोशी ने बिटकॉइन का पहला सॉफ्टवेयर रिलीज किया और नेटवर्क शुरू किया। उन्होंने खुद पहला बिटकॉइन ब्लॉक माइन किया। सतोशी फोरम्स पर एक्टिव रहे, डेवलपर्स के साथ बातचीत करते, बिटकॉइन को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देते।

लेकिन फिर, 2011 में वो अचानक गायब हो गए। एक आखिरी ईमेल में उन्होंने लिखा, ‘मैं अब दूसरी चीजों पर काम कर रहा हूं। बिटकॉइन अच्छे हाथों में है।’ आज तक कोई नहीं जानता कि सतोशी नाकामोतो कौन थे।

कुछ का मानना है कि वो एक जापानी प्रोग्रामर थे, तो कुछ कहते हैं कि ये कई लोगों का ग्रुप था। उनके वॉलेट में करीब 10 लाख बिटकॉइन्स हैं, जो आज अरबों डॉलर के हैं, लेकिन वो कभी छुए नहीं गए।

हंगरी में बुडापेस्ट के ग्राफिसॉफ्ट पार्क में सतोशी नाकामोतो की एक मूर्ति लगी है। ये मूर्ति उस अनजान शख्स को सम्मान देने के लिए है, जिसने बिटकॉइन और इसके पीछे की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बनाई।

हंगरी में बुडापेस्ट के ग्राफिसॉफ्ट पार्क में सतोशी नाकामोतो की एक मूर्ति लगी है। ये मूर्ति उस अनजान शख्स को सम्मान देने के लिए है, जिसने बिटकॉइन और इसके पीछे की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बनाई।

सतोशी की गुमनामी ने बिटकॉइन को और भी रहस्यमयी बना दिया, लेकिन उनकी बनाई ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी ने दुनिया बदल दी। उनकी गुमनामी की 3 बड़ी वजह हो सकती है:

1. सिक्योरिटी की चिंता:

सतोशी ने बिटकॉइन को एक ऐसी करेंसी के तौर पर बनाया जो सरकारों और बैंकों के कंट्रोल से बाहर है। ये सिस्टम दुनिया की फाइनेंशियल व्यवस्था को चुनौती देने वाला है। अगर सतोशी अपनी असली पहचान बताते, तो…

  • कई देशों की सरकारें और सेंट्रल बैंक सतोशी के पीछे पड़ सकते थे। सब उन्हें मारने या गिरफ्तार कर लेने की कोशिश करते।
  • माना जाता है सतोशी के पास करीब 10 लाख बिटकॉइन हैं। अगर उनकी पहचान सामने आती तो अपराधी उन्हें निशाना बना सकते थे।

2. डिसेंट्रलाइजेशन की मंशा:

एक थ्योरी ये भी है कि सतोशी बिटकॉइन को डिसेंट्रलाइज्ड रखना चाहते थे। यानी सरकार, बैंक और यहां तक कि खुद के कंट्रोल से भी बाहर। अगर वो अपनी पहचान बताते और बिटकॉइन का ‘फेस’ बन जाते।

ऐसे में लोग बिटकॉइन को उनके नाम से जोड़ने लगते। उनकी हर बात को बिटकॉइन की दिशा तय करने वाली माना जाता, जो उसके मूल विचार के खिलाफ था। सतोशी चाहते थे कि बिटकॉइन कम्युनिटी खुद इसे आगे बढ़ाए।

3. साजिशों और अटकलों से बचना: अगर सतोशी अपनी पहचान बताते, तो लोग उनके इरादों पर सवाल उठाते। क्या वो बिटकॉइन को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या वो किसी सरकार या बड़ी कंपनी के लिए काम कर रहे हैं?

गुमनाम रहकर उन्होंने ऐसी सारी अटकलों से बचने की कोशिश की। इससे बिटकॉइन का फोकस उनकी पहचान की बजाय टेक्नोलॉजी और इसके मकसद पर रहा।

चैप्टर-4

टेक्नोलॉजी

बिटकॉइन एक डिजिटल कोड है जो आपके डिजिटल वॉलेट में रहता है। जैसे आप व्हाट्सएप पर मैसेज भेजते हैं, उसी तरह बिटकॉइन को आप इंटरनेट के जरिए दुनिया में कहीं भी भेज सकते हैं। इसकी कुल संख्या 21 मिलियन है। इससे ज्यादा बिटकॉइन कभी नहीं बनेंगे।

  • यह ब्लॉकचेन तकनीक पर काम करता है। कल्पना करें कि एक बहीखाता है, जिसमें दुनिया भर के बिटकॉइन लेनदेन लिखे जाते हैं। इस बहीखाते को ब्लॉकचेन कहते हैं और यह हजारों कंप्यूटरों पर एक साथ मौजूद होता है।
  • ब्लॉकचेन एक डिजिटल कॉपी की तरह है जो जानकारी, जैसे लेनदेन को रिकॉर्ड करती है। इसे हर कोई देख सकता है, लेकिन कोई बदल या मिटा नहीं सकता। यह कई कंप्यूटरों पर साझा होती है, इसलिए यह सुरक्षित और भरोसेमंद है।
  • जब आप किसी को बिटकॉइन भेजते हैं, यह लेनदेन ब्लॉकचेन में दर्ज होता है। इसे जांचने और सुरक्षित करने का काम “माइनर्स” करते हैं, जो अपने कंप्यूटरों की ताकत से गणितीय समस्याएं हल करते हैं। बदले में, उन्हें नए बिटकॉइन मिलते हैं।
  • माइनिंग को एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक ताला है और उसकी लाखों चाबियां है। अब इस ताले को खोलने के लिए सभी चाबियों को एक-एक कर लगाकर देखना होगा। जो ताले को सबसे पहले खोलेगा उसे बिटकॉइन मिलेगा।

ब्लॉकचेन कैसे काम करती है?

ब्लॉकचेन को ब्लॉकों की एक श्रृंखला के रूप में सोचें। प्रत्येक ब्लॉक कॉपी का एक पेज है जिसमें लेनदेन की सूची होती है (जैसे, आदित्य ने विक्रम को 100 रुपए भेजे)।

जब ब्लॉक भर जाता है, तो उसे लॉक कर दिया जाता है और पिछले ब्लॉक से जोड़ दिया जाता है। नोड्स नामक कंप्यूटर इस जानकारी को जांचते और स्टोर करते हैं, यह सुनिश्चित करके कि यह सही और सुरक्षित है।

ब्लॉकचेन बहुत सुरक्षित भी है, क्योंकि यह डेटा को बचाने के लिए गणित और कोड का उपयोग करता है। चूंकि कई कंप्यूटर ब्लॉकचेन की कॉपी रखते हैं, इसे हैक करना मुश्किल है।

चैप्टर-5

सबसे ज्यादा बिटकॉइन

कहते हैं सतोशी ने शुरुआती दिनों में करीब 11 लाख बिटकॉइन माइन किए। उनके 22,000 वॉलेट्स में ये कॉइन आज भी रखे हुए हैं। इसकी कीमत अब 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है।

ब्लूमबर्ग की दिसंबर 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब इतने ही बिटकॉइन अमेरिकी स्पॉट ETFs के पास हैं। हालांकि, इन दोनों में से ज्यादा कॉइन किसके पास है इसका सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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नेपाल सीमा से गिरफ्तार हुए TMC के पूर्व विधायक जहांगीर खान, STF की बड़ी कार्रवाई

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कोलकाता, एजेंसी। तृणमूल कांग्रेस के नेता जहांगीर खान को ‘जबरन वसूली’ के आरोप में सोमवार को उत्तर बंगाल में भारत-नेपाल सीमा के पास से गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने यह जानकारी दी। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने खान को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम सुरक्षा 26 मई को वापस ले ली थी। खान के खिलाफ दक्षिण 24 परगना जिले के फाल्टा थाने में सात प्राथमिकी दर्ज हैं।
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, ”खान को उत्तर बंगाल में भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया।” हालांकि पुलिस ने गिरफ्तारी के संबंध में विस्तृत जानकारी नहीं दी है। खान 21 मई को फाल्टा विधानसभा उपचुनाव में चौथे स्थान पर रहे थे। हालांकि, उन्होंने चुनाव से कुछ दिन पहले अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की घोषणा की थी, लेकिन नाम वापस लेने की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसीलिए उनका नाम ईवीएम में दर्ज रहा।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने खान को मिली अंतरिम सुरक्षा वापस ली
इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने खान के खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों में पुलिस की किसी भी सख्त कार्रवाई से उन्हें मिली अंतरिम सुरक्षा वापस ले ली थी। कोर्ट ने 18 मई को खान को सख्त कार्रवाई से राहत दी थी, लेकिन बाद में इसे रद्द कर दिया गया। जजों ने कहा कि राज्य में राजनीतिक स्थिति में बदलाव और याचिकाकर्ता द्वारा राजनीतिक बदले की भावना के दावों के कारण ऐसी सुरक्षा जारी रखना उचित नहीं होगा।

खान के वकील किशोर दत्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि 4 मई को विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद उनके मुवक्किल के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि ये मामले राजनीतिक बदले की भावना का नतीजा थे और कहा कि सुरक्षा न केवल चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी थी, बल्कि खान को कथित उत्पीड़न से बचाने के लिए भी थी। दूसरी ओर, अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने सुरक्षा बढ़ाने की मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पहले दी गई सुरक्षा केवल खान को 21 मई को फाल्टा में हुए दोबारा मतदान (रीपोल) में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए थी, जिसके नतीजे 24 मई को घोषित किए गए थे।

 पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव (रीपोल) के बीच एक बड़ी राजनीतिक घटनाक्रम में, जहांगीर खान ने अपना नामांकन वापस ले लिया, जो पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा झटका था। उन्होंने कहा कि दौड़ से हटने का फैसला फाल्टा के लोगों की भलाई के लिए लिया गया था। खान ने कहा, “मैं फाल्टा का बेटा हूं और चाहता हूं कि फाल्टा शांतिपूर्ण रहे और तरक्की करे। हमारे मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी फाल्टा के विकास के लिए एक विशेष पैकेज दे रहे हैं, इसलिए मैंने निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान प्रक्रिया से दूर रहने का फैसला किया है।”

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भाजपा की फूट डालने की पुरानी चाल कामयाब नहीं होगी, क्रॉस वोटिंग की आशंका पर दिग्विजय सिंह का तीखा हमला

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भोपाल, एजेंसी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस से राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन ने अपना नामाकंन दाखिल किया। उनका मुकाबले में भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतारा है। ऐसे में मुकाबला बेहद रोचक हो गया है। वहीं कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ गया है। हालांकि कांग्रेस ने इसे भाजपा की गलतफहमी बताया है।

कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह का कहना है, “बीजेपी को गलतफहमी है कि वे पार्टी में फूट डाल सकते हैं। कांग्रेस पूरी तरह से संगठित और एकजुट है; सभी कांग्रेस विधायक पार्टी की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को मजबूती से अपना पूरा समर्थन देंगे और बीजेपी की फूट डालने की पुरानी चाल कामयाब नहीं होगी। मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की उम्मीदवार हैं और हम कांग्रेस में एकजुट हैं।”

बता दें कि 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में प्रभावी वोट संख्या 228 है। इनमें से BJP के पास 164 और कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं। बीना की विधायक निर्मला सप्रे के वोट की स्थिति साफ न होने (जो BJP की तरफ झुकती दिख रही है) और विजयपुर के विधायक मुकेश मल्होत्रा ​​के वोटिंग पर रोक के कारण, कांग्रेस की प्रभावी संख्या घटकर 62 रह गई है।

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए हर उम्मीदवार को 58 वोटों की ज़रूरत होती है। इस तरह, BJP को दो सीटें जीतने के लिए 116 वोटों की ज़रूरत है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कुल 164 वोटों में से 116 वोट डालने के बाद BJP के पास 48 वोट बचेंगे, जबकि तीसरी सीट पक्की करने के लिए उसे 10 और वोटों की ज़रूरत होगी। कांग्रेस के पास एक सीट जीतने के लिए ज़रूरी संख्या तो है, लेकिन BJP द्वारा तीसरे उम्मीदवार के ऐलान ने उसकी चिंताएं बढ़ा दी हैं और नटराजन के चुनाव जीतने की राह मुश्किल कर दी है।

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क्या शिवसेना की तहर दो गुटों में बंट जाएगी TMC?, सांसद के इस्तीफे से बंगल में गरमाई सियासत

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कोलकाता, एजेंसी। बंगाल चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत की पूरे देश में चर्चा है तो वहीं तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के बीच अंदरूनी कलह भी सामने आने लगी है इसे लेकर अब पार्टी के भविष्य की रणनीति पर लोग चर्चा कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में अब इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या तृणमूल कांग्रेस में भी Shiv Sena की तरह अंदरूनी खींचतान बढ़ेगी या पार्टी नेतृत्व समय रहते हालात संभाल लेगा। विपक्ष लगातार TMC में असंतोष और गुटबाजी के आरोप लगा रहा है, जबकि पार्टी नेतृत्व इसे सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम बता रहा है।

अगल गुट बनाने को लेकर चर्चा तेज इस्तीफा 
दरअसल, अंदरूनी कलह के बीच पार्टी के सांसदों के एक समूह ने भविष्य की रणनीति और पार्टी से अलग होकर एक नया गुट बनाने की संभावना पर चर्चा करने के लिए सोमवार को यहां बैठक की। बैठक में हिस्सा लेने वाले नेताओं में सुखेंदु शेखर राय भी शामिल थे, जिन्होंने सोमवार को ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राज्यसभा की सदस्यता भी छोड़ दी थी। उनके अलावा तृणमूल के लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, जगदीश चंद्र बसुनिया, कालीपद सरन खेरवाल और अरूप चक्रवर्ती भी बैठक में मौजूद थे। 

ममता बनर्जी को व्हाट्सऐप पर भेजा 
मीडिया से बातचीत में राय ने कहा कि उन्होंने राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन से मुलाकात कर उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया है। राय ने कहा, ”मैंने पार्टी से इस्तीफा देने के अपने फैसले से ममता बनर्जी को व्हाट्सऐप और ईमेल के जरिये अवगत करा दिया है। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल के 60 विधायकों द्वारा एक अलग गुट बनाने के बाद सामने आया है, जहां रिताब्रता बनर्जी ने ममता बनर्जी के नामित उम्मीदवार के बजाय नेता प्रतिपक्ष का कार्यभार संभाल लिया है।

इस्तीफे को लेकर दिया ये बयान 
राय ने कहा, “विधानसभा में जो कुछ भी हुआ, क्या कोई यह बता सकता है कि राज्यसभा या लोकसभा में वैसी ही स्थिति पैदा नहीं होगी?” हालांकि, राय ने स्पष्ट किया कि राज्यसभा और पार्टी से उनका इस्तीफा राज्य विधानसभा में हुए घटनाक्रम से अलग है, क्योंकि वहां के विधायकों ने इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने कहा, ”उनके कदम और मेरे कदम के बीच कोई संबंध नहीं है। यह पूरी तरह से अलग है। मैंने पार्टी से इस्तीफा दिया है, उन्होंने नहीं। राज्यसभा में मेरा कार्यकाल 2029 में समाप्त होना था, लेकिन मैंने सैद्धांतिक तौर पर इस्तीफा दे दिया, क्योंकि मेरे लिए (पार्टी में) बने रहना मुश्किल हो गया था।”

‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में शामिल हुए अभिषेक बनर्जी
यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे एवं पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी यहां ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में भाग ले रहे हैं। इस बैठक में गठबंधन के भीतर एकजुटता पर जोर दिया गया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने तथा जनता की आजीविका से जुड़े मुद्दों को उठाने की आवश्यकता बताई गई।

तृणमूल के इन दोनों नेताओं के अलावा बैठक में कांग्रेस की सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के तेजस्वी यादव, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती के साथ-साथ वामपंथी नेता भी मौजूद थे। हालांकि ममता से नाराज विधायकों ने अभी तक अलग पार्टी बनाए जाने को लेकर कोई भी अधिकारिक ऐलान नहीं किया। 

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