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₹0 से 1 करोड़ रुपए के पार पहुंचा बिटकॉइन:किसने बनाया कोई नहीं जानता, इसे बनाने वाले ने खुद को क्यों छिपाया

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मुंबई,एजेंसी। बिटकॉइन की कीमत पहली बार रू1.08 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2009 में इसकी वैल्यू शून्य के करीब थी। इस करेंसी से कई दिलचस्प किस्से भी जुड़े हैं।

जैसे जिस व्यक्ति ने इसे बनाया है उसे कोई नहीं जानता। उसने अपने आप को गुमनाम रखा है। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो।

इसी तरह 2010 में खरीदा गया वो पिज्जा भी कोई नहीं भूल सकता, जिसे 10,000 बिटकॉइन देकर खरीदा गया था। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने इसे खरीदा था।

अगर वो इंजीनियर उस समय ये पिज्जा नहीं खरीदता और ये बिटकॉइन अपने पास रखता तो इन बिटकॉइन्स की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होती।

यानी, अगर एक पिज्जा में 6 स्लाइस हैं तो दो पिज्जा के हिसाब से एक स्लाइस की कीमत 833 करोड़ पड़ी। यहां हम 5 चैप्टर में बिटकॉइन की दिलचस्प कहानी बता रहे हैं…

साल 2008 का समय था, दुनियाभर में आर्थिक संकट अपने चरम पर था। उस वक्त बैंकों और सरकारों पर लोगों का भरोसा डगमगा रहा था। लोग बैंकों और सेंट्रल बैंकों के फैसलों और व्यवस्था से नाराज थे। बैंकों की गलत नीतियों की वजह से कई लोग अपनी जमा-पूंजी खो बैठे।

इसी माहौल में खुद को सतोशी नाकामोतो कहने वाले एक गुमनाम शख्स ने एक नई तरह की डिजिटल करेंसी का कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया। इसमें उन्होंने डिटेल में बताया था कि कैसे एक ऐसी करेंसी बनाई जा सकती है जो बिना किसी बैंक और सरकार के दखल के काम करे।

फिर 3 जनवरी 2009 को बिटकॉइन का पहला ब्लॉक ‘जेनिसिस ब्लॉक’ बनाया गया। यहीं से बिटकॉइन की शुरुआत हुई। बिटकॉइन का मकसद एक ऐसी करेंसी देना था जो ‘डिसेंट्रलाइज्ड’ हो, यानी जिस पर किसी एक संस्था का कंट्रोल न हो।

2008 का क्राइसिस अमेरिका के हाउसिंग बबल से शुरू हुआ था। बैंकों ने बिना सोचे-समझे होम लोन बांटे, जो लोग चुकाने में सक्षम नहीं थे। ये तस्वीर 13 अक्टूबर 2008 की है। न्यूयॉर्क शहर में लोग न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

2008 का क्राइसिस अमेरिका के हाउसिंग बबल से शुरू हुआ था। बैंकों ने बिना सोचे-समझे होम लोन बांटे, जो लोग चुकाने में सक्षम नहीं थे। ये तस्वीर 13 अक्टूबर 2008 की है। न्यूयॉर्क शहर में लोग न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

चैप्टर-2

पहला ट्रांजैक्शन

बात 22 मई, 2010 की है। लास्जलो हैन्येज नाम के फ्लोरिडा बेस्ड एक प्रोग्रामर ने बिटकॉइन फोरम पर एक पोस्ट डाली। इसमें लिखा, ‘मैं 10,000 बिटकॉइन देकर दो पिज्जा खरीदना चाहता हूं।’ उस वक्त बिटकॉइन की कीमत इतनी कम थी कि 10,000 की वैल्यू महज 41 डॉलर थी।

लास्जलो की पोस्ट पर जेरेमी स्टर्डिवेंट नाम के एक शख्स ने जवाब दिया। जेरेमी ने पापा जॉन्स से दो पिज्जा ऑर्डर किए और लास्जलो के पते पर डिलीवर करवाए। बदले में लास्जलो ने जेरेमी को 10,000 बिटकॉइन भेजे। ये बिटकॉइन का पहला रियल-वर्ल्ड ट्रांजैक्शन था।

इसे ‘बिटकॉइन पिज्जा डे’ के नाम से जाना जाता है। उस वक्त किसी को नहीं पता था कि बिटकॉइन की कीमत भविष्य में आसमान छूएगी। आज एक बिटकॉइन की कीमत 1.08 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है।

क्यों खास है ये ट्रांजैक्शन?

  • ये पहला मौका था जब बिटकॉइन को किसी फिजिकल आइटम, यानी पिज्जा के लिए इस्तेमाल किया गया।
  • ऐसे में सबसे पहले पता चला कि बिटकॉइन सिर्फ डिजिटल कोड नहीं, बल्कि असल में पैसे की तरह काम कर सकता है।
  • आज के हिसाब से 10,000 बिटकॉइन की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है। लोग मजाक में कहते हैं कि ये ‘दुनिया के सबसे महंगे पिज्जा’ थे।

चैप्टर-3

गुमनाम फाउंडर

बिटकॉइन का फाउंडर कौन है किसी को नहीं पता। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो। कोई नहीं जानता कि ये शख्स था, कोई ग्रुप था, या बस एक नाम।

2008 में सतोशी ने एक ऑनलाइन क्रिप्टोग्राफी मेलिंग लिस्ट पर एक व्हाइटपेपर पोस्ट किया था, जिसका टाइटल था- ‘बिटकॉइन: अ पीयरॉ-टू-पीयर इलेक्ट्रॉनिक कैश सिस्टम।’ ये वो पहला मौका था जब किसी ने सतोशी नाम सुना।

जनवरी 2009 में, सतोशी ने बिटकॉइन का पहला सॉफ्टवेयर रिलीज किया और नेटवर्क शुरू किया। उन्होंने खुद पहला बिटकॉइन ब्लॉक माइन किया। सतोशी फोरम्स पर एक्टिव रहे, डेवलपर्स के साथ बातचीत करते, बिटकॉइन को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देते।

लेकिन फिर, 2011 में वो अचानक गायब हो गए। एक आखिरी ईमेल में उन्होंने लिखा, ‘मैं अब दूसरी चीजों पर काम कर रहा हूं। बिटकॉइन अच्छे हाथों में है।’ आज तक कोई नहीं जानता कि सतोशी नाकामोतो कौन थे।

कुछ का मानना है कि वो एक जापानी प्रोग्रामर थे, तो कुछ कहते हैं कि ये कई लोगों का ग्रुप था। उनके वॉलेट में करीब 10 लाख बिटकॉइन्स हैं, जो आज अरबों डॉलर के हैं, लेकिन वो कभी छुए नहीं गए।

हंगरी में बुडापेस्ट के ग्राफिसॉफ्ट पार्क में सतोशी नाकामोतो की एक मूर्ति लगी है। ये मूर्ति उस अनजान शख्स को सम्मान देने के लिए है, जिसने बिटकॉइन और इसके पीछे की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बनाई।

हंगरी में बुडापेस्ट के ग्राफिसॉफ्ट पार्क में सतोशी नाकामोतो की एक मूर्ति लगी है। ये मूर्ति उस अनजान शख्स को सम्मान देने के लिए है, जिसने बिटकॉइन और इसके पीछे की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बनाई।

सतोशी की गुमनामी ने बिटकॉइन को और भी रहस्यमयी बना दिया, लेकिन उनकी बनाई ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी ने दुनिया बदल दी। उनकी गुमनामी की 3 बड़ी वजह हो सकती है:

1. सिक्योरिटी की चिंता:

सतोशी ने बिटकॉइन को एक ऐसी करेंसी के तौर पर बनाया जो सरकारों और बैंकों के कंट्रोल से बाहर है। ये सिस्टम दुनिया की फाइनेंशियल व्यवस्था को चुनौती देने वाला है। अगर सतोशी अपनी असली पहचान बताते, तो…

  • कई देशों की सरकारें और सेंट्रल बैंक सतोशी के पीछे पड़ सकते थे। सब उन्हें मारने या गिरफ्तार कर लेने की कोशिश करते।
  • माना जाता है सतोशी के पास करीब 10 लाख बिटकॉइन हैं। अगर उनकी पहचान सामने आती तो अपराधी उन्हें निशाना बना सकते थे।

2. डिसेंट्रलाइजेशन की मंशा:

एक थ्योरी ये भी है कि सतोशी बिटकॉइन को डिसेंट्रलाइज्ड रखना चाहते थे। यानी सरकार, बैंक और यहां तक कि खुद के कंट्रोल से भी बाहर। अगर वो अपनी पहचान बताते और बिटकॉइन का ‘फेस’ बन जाते।

ऐसे में लोग बिटकॉइन को उनके नाम से जोड़ने लगते। उनकी हर बात को बिटकॉइन की दिशा तय करने वाली माना जाता, जो उसके मूल विचार के खिलाफ था। सतोशी चाहते थे कि बिटकॉइन कम्युनिटी खुद इसे आगे बढ़ाए।

3. साजिशों और अटकलों से बचना: अगर सतोशी अपनी पहचान बताते, तो लोग उनके इरादों पर सवाल उठाते। क्या वो बिटकॉइन को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या वो किसी सरकार या बड़ी कंपनी के लिए काम कर रहे हैं?

गुमनाम रहकर उन्होंने ऐसी सारी अटकलों से बचने की कोशिश की। इससे बिटकॉइन का फोकस उनकी पहचान की बजाय टेक्नोलॉजी और इसके मकसद पर रहा।

चैप्टर-4

टेक्नोलॉजी

बिटकॉइन एक डिजिटल कोड है जो आपके डिजिटल वॉलेट में रहता है। जैसे आप व्हाट्सएप पर मैसेज भेजते हैं, उसी तरह बिटकॉइन को आप इंटरनेट के जरिए दुनिया में कहीं भी भेज सकते हैं। इसकी कुल संख्या 21 मिलियन है। इससे ज्यादा बिटकॉइन कभी नहीं बनेंगे।

  • यह ब्लॉकचेन तकनीक पर काम करता है। कल्पना करें कि एक बहीखाता है, जिसमें दुनिया भर के बिटकॉइन लेनदेन लिखे जाते हैं। इस बहीखाते को ब्लॉकचेन कहते हैं और यह हजारों कंप्यूटरों पर एक साथ मौजूद होता है।
  • ब्लॉकचेन एक डिजिटल कॉपी की तरह है जो जानकारी, जैसे लेनदेन को रिकॉर्ड करती है। इसे हर कोई देख सकता है, लेकिन कोई बदल या मिटा नहीं सकता। यह कई कंप्यूटरों पर साझा होती है, इसलिए यह सुरक्षित और भरोसेमंद है।
  • जब आप किसी को बिटकॉइन भेजते हैं, यह लेनदेन ब्लॉकचेन में दर्ज होता है। इसे जांचने और सुरक्षित करने का काम “माइनर्स” करते हैं, जो अपने कंप्यूटरों की ताकत से गणितीय समस्याएं हल करते हैं। बदले में, उन्हें नए बिटकॉइन मिलते हैं।
  • माइनिंग को एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक ताला है और उसकी लाखों चाबियां है। अब इस ताले को खोलने के लिए सभी चाबियों को एक-एक कर लगाकर देखना होगा। जो ताले को सबसे पहले खोलेगा उसे बिटकॉइन मिलेगा।

ब्लॉकचेन कैसे काम करती है?

ब्लॉकचेन को ब्लॉकों की एक श्रृंखला के रूप में सोचें। प्रत्येक ब्लॉक कॉपी का एक पेज है जिसमें लेनदेन की सूची होती है (जैसे, आदित्य ने विक्रम को 100 रुपए भेजे)।

जब ब्लॉक भर जाता है, तो उसे लॉक कर दिया जाता है और पिछले ब्लॉक से जोड़ दिया जाता है। नोड्स नामक कंप्यूटर इस जानकारी को जांचते और स्टोर करते हैं, यह सुनिश्चित करके कि यह सही और सुरक्षित है।

ब्लॉकचेन बहुत सुरक्षित भी है, क्योंकि यह डेटा को बचाने के लिए गणित और कोड का उपयोग करता है। चूंकि कई कंप्यूटर ब्लॉकचेन की कॉपी रखते हैं, इसे हैक करना मुश्किल है।

चैप्टर-5

सबसे ज्यादा बिटकॉइन

कहते हैं सतोशी ने शुरुआती दिनों में करीब 11 लाख बिटकॉइन माइन किए। उनके 22,000 वॉलेट्स में ये कॉइन आज भी रखे हुए हैं। इसकी कीमत अब 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है।

ब्लूमबर्ग की दिसंबर 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब इतने ही बिटकॉइन अमेरिकी स्पॉट ETFs के पास हैं। हालांकि, इन दोनों में से ज्यादा कॉइन किसके पास है इसका सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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पूर्व विधान परिषद सदस्य जयप्रकाश चतुर्वेदी का निधन, भाजपा नेताओं में शोक की लहर

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former legislative council member jaiprakash chaturvedi passes away wave of mou

लखनऊ, एजेंसी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) जयप्रकाश चतुर्वेदी का देर रात निधन हो गया। उन्होंने लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में उपचार के दौरान अंतिम सांस ली। उनके निधन भाजपा के वरिष्ट नेता कलराज मिश्र ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कहा कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, कुशल संगठनकर्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, पूर्व संगठन मंत्री एवं पूर्व विधान परिषद सदस्य आदरणीय जयप्रकाश चतुर्वेदी  के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। उनका निधन मेरे लिए एक अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति है।

चतुर्वेदी का संगठन के प्रति समर्पण, कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता और राष्ट्रसेवा का उनका संपूर्ण जीवन सदैव स्मरणीय एवं प्रेरणादायी रहेगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों एवं उनके असंख्य शुभचिंतकों को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। इसी कड़ी उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त कर विनम्र श्रद्धांजलि दी।

आप को बता दें कि जयप्रकाश चतुर्वेदी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के कोन क्षेत्र के ग्राम चांची, पोस्ट चाची कलां के निवासी थे। वे राजवंशी देवी इंटर कॉलेज के प्रबंधक भी थे। लंबे समय तक उन्होंने सामाजिक, शैक्षिक और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई और क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके निधन पर भाजपा नेताओं के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं। जयप्रकाश चतुर्वेदी के निधन को क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक जीवन की बड़ी क्षति माना जा रहा है।

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रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे भारतीय: ओडेसा पोर्ट पर इंडियन क्रू वाले जहाज पर हमला, 2 हिंदुस्तानी नागरिक लापता

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odesa port strike hits vessel with four indians two safe and two untraced

कीव, एजेंसी। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच काला सागर क्षेत्र एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ गया है। यूक्रेन के प्रमुख ओडेसा बंदरगाह पर एक व्यापारिक जहाज पर हुए हमले में चार भारतीय नागरिक भी सवार थे। यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास ने पुष्टि की है कि दो भारतीय सुरक्षित हैं, जबकि दो अन्य की तलाश जारी है। दूतावास संबंधित अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में है और बचाव अभियान पर नजर बनाए हुए है। एमवी एजीएन रैग्नर (MV AGN Ragnar) ओडेसा बंदरगाह पर हमले की चपेट में आ गया। ओडेसा काला सागर क्षेत्र में यूक्रेन का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह है और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह कई बार हमलों का निशाना बन चुका है।

यूक्रेन में भारतीय दूतावास के अनुसार, घटना के समय जहाज पर चार भारतीय नागरिक मौजूद थे। अब तक मिली जानकारी के अनुसार दो भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं। दो अन्य भारतीयों के बारे में अभी कोई पुष्टि नहीं हुई है। उनकी तलाश के लिए सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। भारतीय दूतावास ने जारी बयान में कहा कि वह इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रखे हुए है। दूतावास संबंधित यूक्रेनी अधिकारियों के संपर्क में है ताकि लापता भारतीयों का जल्द पता लगाया जा सके और उन्हें हरसंभव सहायता उपलब्ध कराई जा सके। फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि जहाज पर हमला किसने किया और किन परिस्थितियों में यह घटना हुई। जहाज पर कुल कितने चालक दल के सदस्य थे, इसकी भी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

अधिकारियों ने अभी तक चारों भारतीयों की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। साथ ही जहाज पर उनकी जिम्मेदारियों और पदों के बारे में भी कोई आधिकारिक जानकारी जारी नहीं की गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते काला सागर क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही लगातार जोखिम भरी बनी हुई है। हाल के महीनों में कई व्यापारी जहाज मिसाइल और ड्रोन हमलों की चपेट में आए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।

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IDFC बैंक घोटाला: मामले में गिरफ्तार पूर्व IAS पंकज अग्रवाल ने कहा- न रिश्वत मांगी, न ली, सिर्फ प्रशासनिक मंजूरी दी

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idfc bank scam former ias officer pankaj agarwal arrested in the case stated

चंडीगढ़, एजेंसी। रू. 657 करोड़ के चर्चित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक घोटाला मामले में गिरफ्तार हरियाणा के पूर्व आईएएस अधिकारी पंकज अग्रवाल ने सीबीआई की विशेष अदालत में दायर अपनी नियमित जमानत याचिका में सभी आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में न कभी किसी से रिश्वत मांगी और न ही कोई रिश्वत स्वीकार की। उनकी भूमिका केवल अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा भेजे गए प्रस्तावों को प्रशासनिक स्वीकृति देने तक सीमित थी।

पंकज अग्रवाल को सीबीआई ने 22 जून को गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ दर्ज रू. 657 करोड़ के बैंक घोटाले के मामले में नियमित जमानत याचिका पर पंचकूला स्थित सीबीआई की विशेष अदालत 30 जुलाई को सुनवाई करेगी।

जमानत याचिका में अग्रवाल ने कहा है कि जांच एजेंसी अब तक ऐसा कोई प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी है, जिससे यह साबित हो कि उनका कथित बैंक धोखाधड़ी या किसी आपराधिक षड्यंत्र से कोई संबंध था। उन्होंने दावा किया कि हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद का आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में खाता खोलने संबंधी प्रस्ताव विभागीय अधिकारियों की संस्तुति पर स्वीकृत किया गया था और संबंधित खाता खोलने के प्रपत्रों पर उनके हस्ताक्षर भी नहीं हैं।

सीबीआई ने अपनी जांच में आरोप लगाया था कि पंकज अग्रवाल ने हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद और हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड के बैंक खाते आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में खुलवाने में सहायता की तथा उन्हें लगभग रू. 60.54 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन की जानकारी थी।
हालांकि, अग्रवाल ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि बैंक खाते खोलने के समय उन्हें किसी प्रकार की अनियमितता या बाद में खातों से कथित धोखाधड़ी के जरिए धन निकासी की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रारंभिक स्तर पर तय की गई रू. 50 करोड़ की सीमा बाद में हटा दी गई थी, जिससे यह आरोप भी कमजोर पड़ जाता है कि प्रशासनिक निर्णय स्वयं अवैध था।

जमानत अर्जी में यह भी तर्क दिया गया है कि सीबीआई ने एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय को आपराधिक षड्यंत्र का रूप देने का प्रयास किया है। याचिका में कहा गया है कि केवल इस आधार पर किसी अधिकारी को आपराधिक साजिश का आरोपी नहीं ठहराया जा सकता कि उसके प्रशासनिक निर्णय का बाद में किसी तीसरे पक्ष ने कथित रूप से अनुचित लाभ उठा लिया।

अब इस मामले में सभी की निगाहें 30 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत पंकज अग्रवाल की नियमित जमानत याचिका पर फैसला सुनाएगी।

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