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छत्तीसगढ़

आवारा कुत्तों ने ली 15 हिरणों की जान:अंबिकापुर संजय पार्क में आधी रात घुसे, दौड़ा-दौड़ाकर काटा, डिप्टी रेंजर समेत 4 कर्मचारी सस्पेंड

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सरगुजा,एजेंसी। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले में स्थित संजय पार्क में आवारा कुत्तों के हमले से 15 हिरणों की मौत हो गई। शुक्रवार (20 मार्च) रात पार्क के पास लगे जंगल से कुछ आवारा कुत्ते परिसर में घुस गए और दौड़ा दौड़ाकर हिरणों को नोंच कर काट डाला। कुत्तों ने सांभर और उनकी कोठरियों को भी नुकसान पहुंचाया।

बताया जा रहा है एक जगह से बाड़े का तार टूट गया था, कुत्ते वहीं से अंदर घुसे थे। 14 हिरणों की मौत घटना के अगले दिन हो गई थी। जबकि एक घायल हिरण ने रविवार को दम तोड़ दिया। घटना के बाद पार्क को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। मामले में लापरवाही सामने आने के बाद डिप्टी रेंजर समेत 4 कर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है।

संजय पार्क में आवारा कुत्तों के हमले से 15 हिरणों की मौत हो गई।

संजय पार्क में आवारा कुत्तों के हमले से 15 हिरणों की मौत हो गई।

एक घायल हिरण ने रविवार को दम तोड़ दिया।

एक घायल हिरण ने रविवार को दम तोड़ दिया।

पोस्टमॉर्टम के बाद विधिवत अंतिम संस्कार किया गया।

पोस्टमॉर्टम के बाद विधिवत अंतिम संस्कार किया गया।

पीएम के बाद हुआ अंतिम संस्कार

जब घटना हुई रात के अंधेरे में कोई मौजूद नहीं था। अगले दिन 21 मार्च की सुबह घटना की जानकारी मिलते ही पार्क कर्मचारियों में हड़कंप मच गया। वन विभाग ने वेटनरी डॉक्टरों को बुलाकर सभी मृत हिरणों का पोस्टमॉर्टम कराया। इसके बाद अंतिम संस्कार किया गया।

बाउंड्री का तार टूटा, वहीं से घुसे कुत्ते

अंबिकापुर जिले से 15 किलोमीटर दूर संजय पार्क स्थित है। पार्क काफी पुराना है। सरकार ने साल 1980 में इसे विकसित किया था। वर्तमान में यहां 31 हिरण, 1 नीलगाय, पक्षी और बहुत सारे मोर है। जिन्हें सुरक्षा के घेरे में रखा गया है। लेकिन पार्क के पीछे वाले इलाके में एक जगह बाड़े का तार टूटा था, कुत्ते वहीं से अंदर घुस आए।

सरगुजा डीएफओ अभिषेक जोगावत ने घटना की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि 15 हिरणों की मौत हुई है। इनमें 5 मादा चीतल, 1 नर चीतल, 5 मादा कोटरा, 1 नर कोटरा, 3 नर चौसिंघा शामिल है।

ये कर्मचारी हुए सस्पेंड

मामले में लापरवाही सामने आने पर सीसीएफ दिलराज प्रभाकर ने डिप्टी रेंजर सहित 4 कर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। पार्क में इन्हीं की ड्यूटी लगी थी। आरोप है कि बाउंड्री का तार टूटा रहा लेकिन इसकी जानकारी नहीं दी गई।

  1. अशोक सिन्हा, डिप्टी रेंजर
  2. ममता परते, वनपाल
  3. प्रतीमा लकड़ा, वनपाल
  4. बिंदू सिंह, वनपाल

रेंजर से मांगा गया जवाब

इसके अलावा अंबिकापुर के रेंजर अक्षपलक ऋषि को नोटिस जारी कर 5 दिनों के अंदर जवाब मांगा गया है, संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर कार्रवाई की जाएगी।

बाड़े में घुसकर कुत्तों ने हिरणों को काटा था।

बाड़े में घुसकर कुत्तों ने हिरणों को काटा था।

जांच के आदेश, 24 घंटे में मांगी रिपोर्ट

DFO अभिषेक जोगावत ने बताया कि घटना की जांच के लिए अंबिकापुर एसडीओ फॉरेस्ट के नेतृत्व में टीम गठित की गई है। 24 घंटे में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पार्क में अब बचे 16 हिरण, सुरक्षा बढ़ाने की तैयारी

डीएफओ ने बताया कि करीब 5 साल पहले संजय पार्क में 75 से अधिक हिरण थे। इनमें से 60 हिरणों को रमकोला क्षेत्र के नेशनल पार्क में छोड़ा गया था। इसके बाद संख्या बढ़कर 31 तक पहुंच गई थी। अब 15 हिरणों के मारे जाने के बाद यहां सिर्फ 16 हिरण बाकी हैं।

पूरे पार्क को सैनेटाइज किया जाएगा और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी है। पार्क में हिरणों के अलावा मोर सहित अन्य पक्षी और जानवर भी हैं।

जांच के लिए संजय पार्क पहुंचे अधिकारी।

जांच के लिए संजय पार्क पहुंचे अधिकारी।

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छत्तीसगढ़

रायपुर : विशेष लेख : मियावकी वन तकनीक से हरित छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ते कदम

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’कम समय में घने जंगल तैयार कर पर्यावरण संरक्षण को मिल रही नई दिशा’

  •   धनंजय राठौर ,  संयुक्त संचालक 
  •  अशोक कुमार चंद्रवंशी,  सहायक जनसंपर्क अधिकारी 
मियावकी वन तकनीक से हरित छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ते कदम

वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावाकी तकनीक एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय विधि बन गई है। जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक केवल 2-3 वर्षों में बंजर भूमि को घने, आत्मनिर्भर सूक्ष्म वनों में बदल देती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में यह विधि 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घने जंगल बनाती है, जो शहरी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।
         छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। राज्य में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जा रही है। मियावकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे मात्र 3 से 5 वर्षों में घना जंगल तैयार हो जाता है।

’राज्य में तेजी से बढ़ रहा सघन वनीकरण’
       छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से मियावकी पद्धति के तहत लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है। वर्ष 2022 में कोटा मण्डल में एनटीपीसी लिमिटेड के सहयोग से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 23 हजार पौधे तथा 0.3 हेक्टेयर में 7 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2023 में कोटा के भिल्मी क्षेत्र में 6.4 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधों का रोपण किया गया। वहीं गेवरा क्षेत्र में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2024 में कोटा के उच्चभट्टी क्षेत्र में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे लगाए गए। इसके अलावा रायगढ़ मण्डल के तिलईपाली और छाल क्षेत्रों में कुल 3.75 हेक्टेयर भूमि पर 37 हजार 500 पौधों का सफल रोपण किया गया।
’वर्ष 2025 में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जारी’
         वर्तमान में राज्य के कई क्षेत्रों में वृक्षारोपण कार्य तेजी से जारी है। बारनवापारा मण्डल में ‘हरियर छत्तीसगढ़’ योजना के तहत 6 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। कोरबा और रायगढ़ क्षेत्रों में साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के सहयोग से 4 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों का रोपण किया जा रहा है। वहीं विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत महानदीकोलफील्ड लिमिटेड द्वारा 1.9 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है।

’पर्यावरण संरक्षण में मिल रहे बहुआयामी लाभ’
         विशेषज्ञों के अनुसार मियावकी वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह तकनीक वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, भू-जल स्तर सुधारने और मिट्टी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन वनों की शुरुआती वर्षों में देखभाल की जाती है, जिसके बाद ये जंगल स्वतः विकसित होने लगते हैं। इससे रखरखाव की लागत कम होती है और लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ मिलता है। 
’बंजर डंप क्षेत्र से हरित जंगल बनने की ओर गेवरा की प्रेरक पहल’
          छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण किया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है।

’जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां तैयार हो रहा जंगल’
        कोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष तथा अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों का उगना बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक पद्धति और सतत प्रयासों से इस बंजर भूमि को अब हरियाली में बदला जा रहा है।
’वैज्ञानिक तरीके से किया गया पौधारोपण’
         डंप क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए तथा 3 से 4 फीट ऊंचाई वाले स्वस्थ पौधों का रोपण किया गया। इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इससे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त आवास बन सकेगा।
निरंतर देखभाल से मिल रही सफलता
        शुरुआती 2-3 वर्षों की देखभाल के बाद, यह वन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाता है और इसे किसी उर्वरक या पानी की आवश्यकता नहीं होती है। रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, खाद, निंदाई-गुड़ाई, घास कटाई और सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्ष 2025 से 2029 तक पांच वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड गेवरा को सौंपा जाएगा।
’हरित भविष्य की ओर मजबूत पहल’
       कम जगह में घने जंगल बनाकर शहरों में प्रदूषण (धूल और ध्वनि) को कम करने में सहायक होते हैं। ये वन पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। गेवरा की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर प्रयासों से बंजर और पत्थरीली भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर मानव निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।

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कोरबा

उद्यमिता विकास प्रशिक्षण हेतु 12 आवेदकों का चयन

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कोरबा। रायपुर में आयोजित होने वाले उद्यमिता विकास संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए 23 अप्रैल 2026 तक इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित किए गए थे। प्राप्त आवेदनों का परीक्षण एवं सारणीकरण किया गया, जिसके आधार पर कुल 12 आवेदकों का चयन किया गया है।

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 15 मई 2026 से प्रारम्भ होना सुनिश्चित है।चयनित आवेदकों की सूची इस प्रकार है-विकास कुमार, कौशलेंद्र सिंह, योगिता धाकड़े, विष्णु सिंह राठिया, आशुतोष मार्वल, अजय डहरिया, गौरव अग्रवाल, अमित कुमार चैहान, स्वप्निल पाटिल, राजकुमारी, वीरेंद्र कुमार तरुण, वंशिका सिंह सेंगर।

प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबंधित आगे की जानकारी चयनित अभ्यर्थियों को समय-समय पर उपलब्ध कराई जाएगी।

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कोरबा

सुरक्षित भविष्य कि ओर एक कदम – अपनी बेटी को दें सुरक्षा का उपहार

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कोरबा। बेटियों के उज्जवल भविष्य और स्वस्थ जीवन में कैंसर जैसी गंभीर बिमारी से बचाव के लिए एचपीवी टीकाकरण अत्यंत आवश्यक है। यह टीका विशेष रूप से सर्वाइकल कैंसर (बच्चेदानी के मुँह का कैंसर)  से सुरक्षा प्रदान करने में सहायक है।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.एस.एन.केशरी ने जिले के सभी पात्र बालिकाओं, अभिभावकों एवं नागरिकों से अपील किया है कि वे पात्र बालिकाओं (जिन किशोरियों ने 14 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो, लेकिन 15 वर्ष का जन्मदिन न मनाया हो ) का एचपीवी का टीकाकरण करावं। यह टीका पूरी तरह सुरक्षित और डॉक्टर द्वारा प्रमाणित है। एचपीवी टीका राष्ट्रीय टीकाकरण के अंतर्गत मेडिकल कालेज संबद्ध जिला चिकित्सालय, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में  निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है।

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