छत्तीसगढ़
रायपुर : विशेष लेख : मिट्टी की सौंधी महक, परंपराओं की खुशबू और लोकजीवन की मिठास
छत्तीसगढ़ जहां हर परंपरा में बसती है संस्कृति की आत्मा
- दीपक कुमार यादव, पीआरओ पर्यटन एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन

आज आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में भी छत्तीसगढ़ अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजकर आगे बढ़ रहा है। राज्य सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय लोककला, लोकनृत्य और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से प्रदेश की कला और संस्कृति को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की जीवंत चेतना है। यहां की लोक परंपराएं लोगों को प्रकृति से जुड़ना, सामूहिक जीवन जीना और अपनी जड़ों से जुड़े रहना सिखाती हैं। लोकगीतों की मधुर धुन, मांदर की गूंज, त्योहारों की जीवंतता और लोगों की सहज आत्मीयता मिलकर छत्तीसगढ़ को भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय और गौरवशाली पहचान प्रदान करती है।

छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कला और जीवंत लोकजीवन के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यहां की संस्कृति मिट्टी की सोंधी खुशबू, लोकगीतों की मधुरता, जनजातीय परंपराओं की आत्मीयता और सामाजिक समरसता से परिपूर्ण है। यह प्रदेश विविधताओं से भरा हुआ ऐसा सांस्कृतिक क्षेत्र है, जहां आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद लोकपरंपराएं आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं। गांवों की चौपालों से लेकर जनजातीय अंचलों तक यहां की संस्कृति हर पल जीवंत दिखाई देती है।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रही है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था। रामायण काल से जुड़े अनेक प्रसंग यहां की धरती से संबंधित माने जाते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने वनवास का लंबा समय इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। यही कारण है कि यहां की लोक आस्था, धार्मिक परंपराओं और लोकगीतों में रामकथा का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। समय के साथ यहां आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण जीवन और विभिन्न समुदायों की परंपराओं ने मिलकर एक अनूठी सांस्कृतिक पहचान का निर्माण किया है।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का सबसे सशक्त पक्ष यहां की लोकभाषा और लोकगीत हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास और सहजता लोगों के व्यवहार में स्पष्ट रूप से झलकती है। यहां बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं और लोक जीवन की अभिव्यक्ति है। इसके अलावा सरगुजिहा, हल्बी, गोंडी, कुड़ुख और अन्य जनजातीय बोलियां भी प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी ददरिया, सुआ गीत, करमा गीत और पंथी गीतों की गूंज सुनाई देती है। इन गीतों में प्रेम, प्रकृति, श्रम, सामाजिक संबंध और लोक आस्था का सुंदर चित्रण मिलता है।
प्रदेश के लोकनृत्य यहां की सांस्कृतिक पहचान को विशेष रूप से दर्शाते हैं। लोकनृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, सामाजिक उत्सव और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। पंथी नृत्य सतनामी समाज की धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें संत गुरु घासीदास जी की शिक्षाओं और आध्यात्मिक भावनाओं का प्रभाव दिखाई देता है। राउत नाचा दीपावली के अवसर पर किया जाने वाला प्रसिद्ध लोकनृत्य है। इसी प्रकार करमा नृत्य आदिवासी समाज में प्रकृति और फसल उत्सव से जुड़ा हुआ है। मांदर और ढोल की थाप पर सामूहिक रूप से किया जाने वाला यह नृत्य जनजातीय जीवन की ऊर्जा और उत्साह को अभिव्यक्त करता है। महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सुआ नृत्य भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बस्तर अंचल की जनजातीय संस्कृति छत्तीसगढ़ की आत्मा मानी जाती है। यहां रहने वाले गोंड, मुरिया, हल्बा, भतरा, माड़िया, भतरा और अन्य जनजातीय समुदाय आज भी अपनी पारंपरिक जीवनशैली, वेशभूषा और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए हुए हैं। जनजातीय समाज प्रकृति को जीवन का आधार मानता है। जंगल, नदी, पहाड़ और भूमि यहां केवल संसाधन नहीं, बल्कि आस्था और जीवन के प्रतीक हैं। बस्तर के हाट-बाजार केवल व्यापारिक केंद्र नहीं होते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल के जीवंत मंच भी होते हैं। यहां लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्ययंत्र और हस्तशिल्प एक साथ दिखाई देते हैं।
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प भी देशभर में विशेष पहचान रखते हैं। बस्तर की ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है। धातु से बनी पारंपरिक मूर्तियां और कलात्मक वस्तुएं यहां की अद्भुत शिल्पकला का उदाहरण हैं। इसी प्रकार लकड़ी और बांस से निर्मित हस्तशिल्प ग्रामीण और जनजातीय कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाते हैं। मिट्टी के बर्तन, लोक चित्रकला, पारंपरिक आभूषण और गोदना कला भी प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गोदना केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विश्वासों का प्रतीक माना जाता है।
छत्तीसगढ़ के त्योहार यहां की लोक संस्कृति को और अधिक जीवंत बनाते हैं। यहां के अधिकांश पर्व कृषि, प्रकृति और लोक आस्था से जुड़े हुए हैं। हरेली किसानों का प्रमुख त्योहार है, जिसमें कृषि उपकरणों की पूजा की जाती है। पोला पर्व बैलों और कृषि संस्कृति के सम्मान का प्रतीक है। तीजा महिलाओं का प्रमुख पर्व है, जो परिवार की सुख-समृद्धि और दांपत्य-जीवन की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है। छेरछेरा त्योहार सामाजिक समरसता और अन्नदान की परंपरा को दर्शाता है। इन पर्वों के दौरान लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं का सबसे भव्य उदाहरण माना जाता है। यह देश का सबसे लंबा चलने वाला दशहरा उत्सव है, जो लगभग 75 दिनों तक मनाया जाता है। यह पर्व शक्ति की आराधना, जनजातीय परंपराओं और सामाजिक सहभागिता का अनूठा संगम है। मां दंतेश्वरी की पूजा के साथ निकलने वाली विशाल रथयात्रा यहां की सांस्कृतिक आस्था का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है।
छत्तीसगढ़ का खान-पान भी यहां की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। चावल यहां का प्रमुख भोजन है। फरा, चीला, अंगाकर रोटी, ठेठरी-खुरमी, देहरौरी और बोरे बासी जैसे पारंपरिक व्यंजन प्रदेश की विशेष पहचान हैं। बोरे बासी को श्रमशील जीवनशैली और ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। प्राकृतिक और सादगीपूर्ण भोजन यहां के लोगों के स्वास्थ्य और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रदेश में स्थित प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक स्थल और प्राकृतिक धरोहरें भी इसकी सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करती हैं। बम्लेश्वरी मंदिर, सिरपुर, बत्तीसा मंदिर और चित्रकोट जलप्रपात जैसे स्थल प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।
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92 टन गैस चोरी, फूड ऑफिसर को मिले 50 लाख:एजेंसी संचालक ने 20 लाख लिए, तीनों आरोपियों की मुलाकात का CCTV फुटेज भी मिला
महासमुंद, एजेंसी। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में 1.5 करोड़ के बहुचर्चित LPG घोटाले की पुलिस जांच तेज हो गई है। मामले के मुख्य आरोपी और जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को 3 दिन की रिमांड पर लिया गया है। पुलिस उससे पूछताछ कर रही है।
अजय यादव पर शासकीय संपत्ति के गबन की साजिश रचने, कूट रचित दस्तावेज तैयार करने और शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप है। पुलिस के अनुसार, चोरी कर बेची गई लगभग 92 टन गैस के एवज में करीब 80 लाख रुपए का लेन-देन हुआ था।

जांच में सामने आया है कि इस रकम में से लगभग 50 लाख अजय यादव, 20 लाख एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर और व्यापारी मनीष चौधरी को 10 लाख मिले थे। हालांकि, पुलिस अब तक इन दोनों आरोपियों से बड़ी रकम बरामद नहीं कर पाई है।
वहीं अजय यादव की गिरफ्तारी के 3 दिन बाद भी राज्य शासन ने उस पर कार्रवाई को लेकर कोई आदेश जारी नहीं किया है। जांच में तीनों आरोपियों की मुलाकात का CCTV फुटेज बरामद किया गया है।
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“चैंपियन ऑफ द वर्ल्ड” बने दिव्यांशु देवांगन, 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग में वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ जीता स्वर्ण पदक
स्वर्ण पदक के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर वतन लौटे रायगढ़ के लाडले दिव्यांशु, प्रेस कॉन्फ्रेंस में साझा किया जीत का सफर
लक्ष्य पर सटीक निशाना: वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए रायगढ़ के दिव्यांशु
रायगढ़। रायगढ़ शहर के लिए आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। शहर के उभरते हुए निशानेबाज दिव्यांशु देवांगन ने काहिरा (मिस्र) में आयोजित ISSF जूनियर वर्ल्ड कप 2026 में अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।ऐतिहासिक स्कोर: दिव्यांशु और उनकी साथी शाम्भवी क्षीरसागर ने मिक्स्ड टीम इवेंट के फाइनल में 499.9 का स्कोर बनाकर एक नया जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया।

क्वालिफिकेशन में भी दबदबा

फाइनल से पहले क्वालिफिकेशन राउंड में भी इस जोड़ी ने 632.0 का स्कोर कर शीर्ष स्थान प्राप्त किया था।
कड़ भारतीय टीम ने चीनी ताइपे (498.3) और फ्रांस जैसी दिग्गज टीमों को पछाड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की।
आज रायगढ़ में उनके निवास चक्रधर कला एवं संगीत महाविद्यालय के कैंपस में स्थानीय पत्रकारों से भेंट करके प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिव्यांशु ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता (शैलेंद्र देवांगन एवं श्रीमती यामिनी देवांगन), अपने कोच और रायगढ़ की मिट्टी को दिया। उन्होंने कहा”यह पदक केवल मेरा नहीं, बल्कि पूरे देश और मेरे शहर रायगढ़ का है। वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना एक सपना था, जो आज मेहनत और आप सबके आशीर्वाद से पूरा हुआ है। मेरा लक्ष्य अब ओलंपिक में तिरंगा लहराना है।”
दिव्यांशु की इस वैश्विक उपलब्धि से रायगढ़ सहित पूरे छत्तीसगढ़ में जश्न का माहौल है। छत्तीसगढ़ सर्व समाज संगठन और खेल प्रेमियों ने इसे क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक गौरव बताया है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद रायगढ़ आगमन पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए दिव्यांशु और उनके परिवार ने अपनी खुशी साझा की।प्रेस वार्ता के दौरान भावुक होते हुए दिव्यांशु के माता-पिता (श्रीमती यामिनी देवांगन एवं शैलेंद्र देवांगन) ने कहा, “हमें अपने बेटे की मेहनत पर अटूट विश्वास था। वह घंटों अभ्यास में बिताता था और आज उसकी तपस्या सफल हुई है। एक माता-पिता के लिए इससे बड़ा गर्व का दिन नहीं हो सकता कि उनका बेटा तिरंगे का मान विश्व स्तर पर बढ़ा रहा है।
दिव्यांशु के नाना ने अपने नाती को आशीर्वाद देते हुए कहा, “दिव्यांशु ने बचपन से ही लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना सीखा था। उसकी यह सफलता आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। हमें पूर्ण विश्वास है कि वह ओलंपिक में भी स्वर्ण जीतकर देश का मस्तक ऊंचा करेगा।”
स्वर्ण पदक और विश्व कीर्तिमान

दिव्यांशु ने अपनी साथी खिलाड़ी के साथ मिलकर फाइनल राउंड में 499.9 का स्कोर खड़ा किया, जो एक नया जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड है। उन्होंने कड़ी प्रतिस्पर्धा में चीन और फ्रांस जैसे देशों के निशानेबाजों को पीछे छोड़ते हुए यह मुकाम हासिल किया।
पत्रकारों से बात करते हुए चैंपियन ऑफ द वर्ल्ड दिव्यांशु देवांगन ने कहा, “यह जीत मेरे माता-पिता के त्याग और नाना जी के आशीर्वाद का प्रतिफल है। रायगढ़ के पत्रकारों और शहरवासियों ने हमेशा मेरा उत्साहवर्धन किया है। मेरा अगला लक्ष्य आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए और अधिक पदक जीतना है।”
वर्ल्ड रिकॉर्डधारी दिव्यांशु देवांगन का रायगढ़ आगमन: जीत का गर्व और व्यवस्थाओं पर सवाल

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की तिरंगे को शान से लहराने वाले रायगढ़ के उभरते सितारे दिव्यांशू देवांगन का शहर वापसी पर भव्य स्वागत किया गया। 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग स्पर्धा में न केवल स्वर्ण पदक जीतकर, बल्कि वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम कर उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है।
अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद पत्रकारों से चर्चा करते हुए दिव्यांशु ने अपनी यात्रा, संघर्ष और भविष्य के लक्ष्यों पर विस्तार से बात की। उनके शब्दों में इस जीत की खुशी के साथ-साथ राज्य की खेल नीति को लेकर एक टीस भी साफ दिखाई दी।
अपनी सफलता पर मीडिया से चर्चा करते हुए दिव्यांशु ने कहा विश्व स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना और वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना मेरे लिए एक सपने जैसा है। जब विदेशी धरती पर भारत का राष्ट्रगान बजता है, तो वह गर्व शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यह जीत मेरी वर्षों की कड़ी मेहनत और मेरे परिवार के अटूट विश्वास का परिणाम है।”
शासन और खेल विभाग की बेरुखी पर सवाल

अपनी उपलब्धि के साथ ही दिव्यांशु ने छत्तीसगढ़ शासन और खेल विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा दुर्भाग्य की बात है कि इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा की तैयारी और भागीदारी के दौरान मुझे शासन या खेल विभाग से कोई सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। एक खिलाड़ी जब वैश्विक मंच पर जाता है, तो उसे आर्थिक और मानसिक संबल की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ मुझे अपने दम पर ही आगे बढ़ना पड़ा।
संसाधनों का अभाव: “रायगढ़ जैसे शहर में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की अभ्यास सुविधाएं शून्य हैं। मुझे अभ्यास के लिए दूसरे राज्यों या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।”
रायगढ़ में शूटिंग एकेडमी की मांग
दिव्यांशू ने प्रशासन और सरकार के सामने एक अहम प्रस्ताव रखा: एकेडमी की पहल: उन्होंने मांग की कि शासन को रायगढ़ में एयर राइफल शूटिंग एकेडमी की शुरुआत करनी चाहिए।
भविष्य की प्रतिभाएं: “अगर रायगढ़ में ही वर्ल्ड क्लास ट्रेनिंग सेंटर और आधुनिक उपकरण उपलब्ध हों, तो यहाँ से मेरे जैसे कई और खिलाड़ी निकल सकते हैं जो ओलंपिक में भारत का नाम रोशन करेंगे। शासन को केवल जीत के बाद बधाई देने के बजाय, तैयारी के दौर में खिलाड़ियों का हाथ थामना चाहिए।”
परिवार का संघर्ष और संदेश

दिव्यांशू के परिवार ने भी इस अवसर पर अपनी खुशी साझा की, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बिना सरकारी मदद के अंतरराष्ट्रीय स्तर का खेल खर्च उठाना कितना चुनौतीपूर्ण है। परिवार का मानना है कि यदि प्रशासन समय पर सहयोग करे, तो छत्तीसगढ़ के युवा खेल जगत में क्रांति ला सकते हैं।
दिव्यांशु देवांगन की यह उपलब्धि रायगढ़ के लिए गौरव का विषय है, लेकिन उनका ‘वर्शन’ राज्य की खेल व्यवस्था के लिए एक आईना भी है। अब देखना यह है कि क्या शासन दिव्यांशु की मांग पर ध्यान देकर रायगढ़ में शूटिंग के भविष्य को संवारने के लिए कदम उठाता है, या खिलाड़ी इसी तरह अपने संघर्षों के बल पर पदक लाते रहेंगे।
कोरबा
नेशनल लोक अदालत का आयोजन: दुर्गेश को ट्राईसायकिल मिलते ही खिला चेहरा
कई मामलों का किया गया निराकरण
कोरबा। संतोष शर्मा, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोरबा, अविनाश तिवारी श्रम न्यायाधीश कोरबा, गरिमा शर्मा, प्रथम जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा, ममता भोजवानी द्वितीय जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश कोरबा, सीमा प्रताप चंद्र, जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एफ. टी. सी.) कोरबा, कु. मयूरा, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोरबा, कु. डाली ध्रुव द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी कोरबा, सोनी तिवारी प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी कोरबा, कु. कुमुदिनी गर्ग, प्रथम व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ श्रेणी कोरबा, कु. डिंपल सचिव, शिशुपाल सिंह सहायक ग्रेड दो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोरबा द्वारा रामसागरपारा वार्ड क्रमांक 1 में रहने वाले दुर्गेश कंवर जिसे बचपन से ही विकलांग होने की वजह से चलने में दिक्कत होती थी, को ट्राई साइकिल प्रदान किया गया।
दुर्गेश कंवर का आवागमन अब आसान होगा। ट्राईसायकिल मिलने पर दुर्गेश कंवर के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई और अतिथियों का आभार जताया।


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