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8th Pay Commission: कर्मचारियों की बड़ी मांगें, सैलरी और इंक्रीमेंट में हो सकता है बड़ा बदलाव

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नई दिल्ली, एजेंसी। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 8th Central Pay Commission को लेकर चर्चाएं अब और तेज हो गई हैं। सरकार इस समय अलग-अलग कर्मचारी संगठनों से सुझाव और राय ले रही है। इसी बीच कर्मचारी संगठनों ने कुछ अहम मांगें सरकार के सामने रखी हैं, जिन पर अगर सहमति बनती है तो वेतन ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कर्मचारी संगठनों की सबसे प्रमुख मांग यह है कि वेतन संशोधन की प्रक्रिया हर 10 साल की जगह हर 5 साल में की जाए। उनका कहना है कि महंगाई तेजी से बढ़ रही है, इसलिए सैलरी रिवीजन में देरी नहीं होनी चाहिए और इसे समय-समय पर अपडेट किया जाना जरूरी है।

Annual Increment को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 6 प्रतिशत करने का प्रस्ताव
इसके साथ ही संगठनों ने Annual Increment को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 6 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा है। उनका मानना है कि मौजूदा इंक्रीमेंट दर बढ़ती महंगाई के मुकाबले काफी कम है, जिससे कर्मचारियों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। एक और बड़ी मांग वेतन संरचना को सरल बनाने को लेकर है। कर्मचारियों ने सुझाव दिया है कि अलग-अलग pay levels को मिलाकर एक आसान और Transparent System बनाया जाए ताकि वेतन व्यवस्था अधिक समझने योग्य और प्रभावी हो सके।

लेवल-1 कर्मचारियों का शुरुआती मासिक वेतन करीब 69,000 रुपए
minimum wage को लेकर भी संगठनों ने बड़ा प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि लेवल-1 कर्मचारियों का शुरुआती मासिक वेतन करीब 69,000 रुपए किया जाना चाहिए, ताकि कर्मचारियों को बेहतर जीवन स्तर मिल सके और सरकारी नौकरियों में योग्य उम्मीदवारों को आकर्षित किया जा सके। कर्मचारी संगठनों का यह भी तर्क है कि वेतन पर होने वाला खर्च सरकार के लिए बोझ नहीं बल्कि एक निवेश है। उनका मानना है कि जब कर्मचारियों की आय बढ़ती है, तो उनकी खरीद क्षमता भी बढ़ती है, जिससे बाजार में मांग बढ़ती है और अंततः सरकार को Tax के रूप में अधिक Revenue मिलता है।

वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि New Pay Commission लागू होने पर सरकार के खर्चों में बढ़ोतरी तय है, क्योंकि वर्तमान में सरकार अपने बजट का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा वेतन, भत्तों और पेंशन पर खर्च करती है। सूत्रों के अनुसार, 8th Pay Commission को अपनी रिपोर्ट तैयार करने और सिफारिशें देने में लगभग 18 महीने का समय लग सकता है। इसके बाद ही नई वेतन संरचना पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। 

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NDA की राज्यसभा में एक सीट घट सकती है:विपक्ष को 3 सीटों का फायदा दिख रहा, 18 जून को 12 राज्यों की 26 सीटों पर चुनाव

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नई दिल्ली, एजेंसी। 12 राज्यों की 26 राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव होगा। चुनाव आयोग (EC) ने शुक्रवार को यह ऐलान किया। इस चुनाव में NDA को राज्यसभा की एक सीट गंवानी पड़ सकती है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष को तीन सीटों का फायदा होने की उम्मीद है।

जिन कुल 26 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें से NDA के पास अभी 18 और कांग्रेस के पास चार सीटें हैं, जबकि एक सीट JMM के पास और तीन सीटें YSRCP के पास हैं।

इन चुनावों में NDA को 17 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि कांग्रेस को पांच, JMM को दो और TVK को एक सीट मिलेगी। 244 सदस्यों वाले उच्च सदन में NDA के पास अभी 149 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 78 और गैर-गठबंधन वाले क्षेत्रीय दलों के पास 17 सांसद हैं।

अब राज्यवार जानिए NDA और विपक्ष को कितना फायदा-नुकसान…

  • महाराष्ट्र और तमिलनाडु में उपचुनाव, NDA की एक सीट कम होगी: महाराष्ट्र में NCP की सुनेत्रा पवार और तमिलनाडु में AIADMK के सीवी षणमुगम के इस्तीफे से खाली हुई सीटों पर उपचुनाव होंगे। महाराष्ट्र की सीट एनडीए के खाते में आ सकती है। वहीं तमिलनाडु की AIADMK की सीट सत्ताधारी पार्टी TVK को मिल सकती है। TVK को कांग्रेस का समर्थन है।
  • आंध्र प्रदेश में 4 सीटें, चारों NDA को: आंध्र प्रदेश की चारों सीटें TDP के पास हैं, वह चारों सीटें फिर जीत सकती है। यानी NDA को कोई नुकसान नहीं होगा।
  • गुजरात में 4 सीटें, चारों NDA को: गुजरात में BJP चारों सीटें भाजपा के पास हैं, जिन्हें वह फिर अपने नाम करेगी। यानी NDA को यहां भी कोई नुकसान नहीं होगा।
  • झारखंड में 2 सीटें, दोनों INDIA को: झारखंड में दो सीटें हैं। दोनों सीटें JMM के पास है। JMM-कांग्रेस गठबंधन को यह सीटें फिर मिलने की संभावना है। लेकिन BJP के पास 21 विधायक हैं। चार विपक्षी सदस्यों की क्रॉस वोटिंग अगर हो गई तो वह एक सीट जीत सकती है।
  • मध्य प्रदेश में 3 सीटें, दो BJP, एक कांग्रेस को: मध्यप्रदेश में तीन सीटें हैं। जिसमें से दो भाजपा और एक कांग्रेस के पास हैं। यहां रिजल्ट फिर ऐसा ही हो सकता है।
  • राजस्थान में 3 सीटें, दो BJP, एक कांग्रेस को: राजस्थान में भी तीन सीटें हैं। जिसमें से दो भाजपा और एक कांग्रेस के पास है। मध्य प्रदेश की तरह यहां भी रिजल्ट ऐसा ही आ सकता है।
  • कर्नाटक में 4 सीटें, कांग्रेस को तीन, बीजेपी को एक: कर्नाटक में अभी कांग्रेस और एनडीए के पास दो-दो सीटे हैं। चुनाव में कांग्रेस तीन सीटें जीत सकती है। वहीं NDA को केवल एक सीट मिलेगी।
  • मणिपुर-अरुणाचल में भाजपा के खाते में दो सीटें: मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में एक-एक सीट खाली हो रही हैं। दोनों भाजपा के पास हैं, पार्टी फिर इन्हें हासिल कर सकती है। मिजोरम में अभी मिजो नेशनल फ्रंट के पास एक सीट है, जो जोरम पीपल्स मूवमेंट जीत सकती है। मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी अपनी सीट बचाने में कामयाब हो सकती है।

खड़गे, देवगौड़ा समेत 24 सांसद रिटायर हो रहे

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का राज्यसभा का मौजूदा कार्यकाल 25 जून 2026 तक है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का राज्यसभा का मौजूदा कार्यकाल 25 जून 2026 तक है।

रिटायर हो रहे सदस्यों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सीनियर लीडर दिग्विजय सिंह, पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा समेत 24 सांसद शामिल हैं। इन सभी सीटों से मौजूदा सदस्य 21 जून से 19 जुलाई के बीच रिटायर हो रहे हैं।

इनके अलावा, दो रिक्त सीट पर भी उपचुनाव होगा। ये सीटें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के नेता सीवी षणमुगम के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं।

16 मार्च: राज्यसभा की 11 सीटों में से 9 पर कैंडिडेट्स या NDA समर्थित कैंडिडेट्स जीते

हरियाणा, बिहार और ओडिशा की 11 राज्यसभा सीटों पर 16 मार्च को चुनाव हुए थे। इनमें 9 सीटों पर NDA कैंडिडेट्स या NDA समर्थित कैंडिडेट्स ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस और बीजू जनता दल (BJD) ने एक-एक सीट पर जीत हासिल की थी।

राज्यवार सीटों की बात करें तो बिहार की सभी पांचों सीटों पर NDA प्रत्याशी विजयी रहे थे। ओडिशा की 4 सीटों में से 3 NDA और 1 बीजद उम्मीदवार ने जीती। हरियाणा की दो सीटों में से एक पर भाजपा और एक पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी।

ऐसे होता है राज्यसभा चुनाव

राज्यसभा सांसदों के लिए चुनाव की प्रक्रिया दूसरे चुनावों से काफी अलग है। राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं यानी जनता नहीं बल्कि विधायक इन्हें चुनते हैं। चुनाव हर दो साल में होते हैं, क्योंकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर होते हैं।

राज्यसभा सीटों की कुल संख्या 245 हैं। इनमें से 233 सीटों पर अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं।

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कितने वोटों की जरूरत होती है, ये पहले से ही तय होता है। वोटों की संख्या का कैलकुलेशन कुल विधायकों की संख्या और राज्यसभा सीटों की संख्या के आधार पर होता है। इसमें एक विधायक की वोट की वैल्यू 100 होती है।

महाराष्ट्र की 7 सीटों के उदाहरण से फॉर्मूला समझते हैं

राज्यसभा चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए एक निश्चित संख्या में मतों की आवश्यकता होती है, जिसे जीतने का कोटा (Quota) कहा जाता है। महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 विधायक हैं। खाली हो रही सीटें 7 हैं।

कुल विधायकों की संख्या x 100/ (राज्यसभा की सीटें+1) = +1 288X100/(7+1)= +1 28800/8= +1 3600= +1 3601 चूंकि एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है। इसलिए महाराष्ट्र में अभी एक राज्यसभा सीट पर जीत के लिए कम से कम 36 विधायकों की जरूरत होगी।

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शुभेंदु बोले- अवैध बांग्लादेशियों को सीधे BSF को सौंपेंगे:कोर्ट में पेशी नहीं होगी, अवैध प्रवासियों को CAA से नागरिकता का हक नहीं

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कोलकाता, एजेंसी। पश्चिम बंगाल सरकार अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को कोर्ट की बजाय सीधे सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपेगी। यह जानकारी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गुरुवार को दी। नया नियम 20 मई से लागू हो गया है।

शुभेंदु ने कहा कि इस बारे में पुलिस कमिश्नर और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को निर्देश जारी कर दिए गए हैं। नए नियम के मुताबिक, जो लोग अवैध प्रवासी पाए जाएंगे और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत नागरिकता पाने के हकदार नहीं होंगे।

BSF को जमीन देने के लिए कोलकाता में बुधवार को बैठक हुई।

BSF को जमीन देने के लिए कोलकाता में बुधवार को बैठक हुई।

CAA क्या है, इसकी 3 बड़ी बातें…

CAA को हिंदी में नागरिकता संशोधन कानून कहा जाता है। इससे पाकिस्तान, बांग्लादेश अफगानिस्तान से आए गैर- मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता मिलने का रास्ता साफ होता है।

1. किसे मिलेगी नागरिकता: 31 दिसंबर 2024 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होकर भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जाएगी। इन तीन देशों के लोग ही नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे।

2. भारतीय नागरिकों पर क्या असर: भारतीय नागरिकों से CAA का कोई सरोकार नहीं है। संविधान के तहत भारतीयों को नागरिकता का अधिकार है। CAA या कोई कानून इसे नहीं छीन सकता।

3. आवेदन कैसे कर सकेंगे: आवेदन ऑनलाइन करना होगा। आवेदक को बताना होगा कि वे भारत कब आए। पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेज न होने पर भी आवेदन कर पाएंगे। इसके तहत भारत में रहने की अवधि 5 साल से अधिक रखी गई है। बाकी विदेशियों (मुस्लिम) के लिए यह अवधि 11 साल से अधिक है।

बंगाल में CAA की प्रक्रिया शुरू

  • CM शुभेंदु ने बुधवार को कहा था, ‘आज हमने कानूनी प्रक्रिया शुरू की है। CAA के तहत आने वाले 7 समुदायों और 31 दिसंबर 2024 तक भारत आए लोगों को नागरिकता कानून का लाभ मिलेगा। पुलिस उन्हें हिरासत में नहीं ले सकेगी।
  • जो लोग CAA के दायरे में नहीं आते, वे अवैध घुसपैठिए हैं। राज्य पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर BSF को सौंपेगी। इसके साथ ही उन्होंने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर की 27 किलोमीटर जमीन BSF को सौंपी। इस पर फेंसिंग लगाने और सुरक्षा स्ट्रक्चर बनाया जाएगा।
  • कोलकाता में BSF को जमीन देने के लिए हुई बैठक में कहा- यह सिर्फ शुरुआत है। जमीन सौंपने की प्रक्रिया 2 हफ्तों में पूरी हो जाएगी। आगे जहां भी सीमा सुरक्षा के लिए जमीन की जरूरत होगी, राज्य सरकार उसे BSF को उपलब्ध कराएगी।

600 किलोमीटर सीमा अब भी बिना फेंसिंग के

अधिकारी ने कहा कि राज्य की 2200 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा में से करीब 1600 किलोमीटर हिस्से में फेंसिंग हो चुकी है, जबकि लगभग 600 किलोमीटर सीमा अब भी बिना फेंसिंग के है।

भारत बांग्लादेश की सीमा 4,097 किलोमीटर लंबी

भारत, बांग्लादेश के साथ 4,097 किलोमीटर लंबी बॉर्डर शेयर करता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार लगभग 3,240 किलोमीटर की सीमा पर बाड़ लगाई जा चुकी है और लगभग 850 किलोमीटर, जिसमें 175 किलोमीटर का दुर्गम भूभाग भी शामिल है, इस पर बाड़बंदी होनी बाकी है।

CM अधिकारी ने दावा किया कि प्रस्तावित 127 किलोमीटर के खंड में से केवल लगभग 8 किलोमीटर के हिस्से को ही ममता बनर्जी की सरकार के कार्यकाल में फेंसिंग की गई थी।

पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश के साथ लगभग 2,216 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा लगती है। यह भारत-बांग्लादेश की सबसे लंबी स्टेट बॉर्डर है।

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सुप्रीम कोर्ट बोला- माता-पिता IAS तो बच्चों को आरक्षण क्यों:क्रीमी लेयर के बच्चे रिजर्वेशन लेते रहे तो इससे कभी नहीं निकल पाएंगे

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नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सरकारी नौकरी में क्रीमी लेयर के कैंडिडेट के आरक्षण लेने पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा- अगर माता-पिता दोनों IAS अफसर हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?

शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में अगर संपन्न बच्चों के लिए फिर से आरक्षण मांगा जाए, तो हम कभी भी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने ये कमेंट तब किया। जब वे कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया था, क्योंकि उसके माता-पिता दोनों ही राज्य सरकार के कर्मचारी हैं।

कैंडिडेट कर्नाटक के कुरुबा समुदाय का, माता-पिता सरकारी नौकरी में

यह मामला कर्नाटक में ‘कुरुबा’ समुदाय से जुड़े एक कैंडिडेट का है। कर्नाटक के पिछड़े वर्गों की सूची में इस समुदाय को ‘श्रेणी II(A)’ के तहत रखा गया है।

उम्मीदवार यानी याचिकाकर्ता का ‘कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ में ‘सहायक इंजीनियर’ के पद पर सिलेक्शन हुआ था। उसकी आरक्षित कोटे के तहत नियुक्ति की गई थी।

हालांकि, ‘जिला जाति और आय सत्यापन समिति’ ने उम्मीदवार को ‘जाति प्रमाण पत्र’ देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में आता है।

उम्मीदवार के परिवार की सालाना आमदनी लगभग रू.19.48 लाख आंकी गई थी। अधिकारियों ने पाया कि उसके माता-पिता दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी कुल आमदनी, ‘क्रीमी लेयर’ के लिए तय की गई सीमा से ज्यादा है।

नियमों के अनुसार OBC आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की मौजूदा आय सीमा सालाना 8 लाख रुपए है। यानी अगर किसी OBC परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपए से ज्यादा है, तो आमतौर पर उनके बच्चों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।

सुप्रीम कोर्ट की 3 टिप्पणी; आरक्षण में संतुलन जरूरी

  • जिन परिवारों ने सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की कर ली है, उन्हें भी आरक्षण के फायदे मिलते जा रहे हैं।
  • उच्च शिक्षा और बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ-साथ सामाजिक रुतबे में भी सुधार आता है।
  • सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण ठीक लेकिन सबको नहीं। इसमें कुछ संतुलन चाहिए।

याचिकाकर्ता के 3 तर्क; कहा- वेतन से क्रीमी लेयर तय न हो

  • याचिकाकर्ता के वकील शशांक रत्नू ने तर्क दिया कि सरकारी कर्मचारियों के बीच ‘क्रीमी लेयर’ की पहचान करने के लिए वेतन से होने वाली आय ही एकमात्र निर्णायक मापदंड नहीं है
  • उन्होंने दलील दी कि क्रीमी लेयर से बाहर रखने का आधार माता-पिता की स्थिति होती है। जैसे कि वे ‘ग्रुप A’ या ‘ग्रुप B’ सेवाओं से संबंधित हैं या नहीं, न कि केवल उनकी वेतन से होने वाली आय।
  • यदि वेतन को ही एकमात्र मापदंड मान लिया जाए। तो ड्राइवर, चपरासी, क्लर्क और अन्य निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारियों को भी आरक्षण के लाभों से वंचित किया जा सकता है।

कर्नाटक हाईकोर्ट में दो बार फैसला बदला गया

सुप्रीम कोर्ट से पहले यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के पास था। पहले हाईकोर्ट के सिंगल जज ने उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया था। सिंगल जज ने कहा था कि क्रीमी लेयर तय करते समय उम्मीदवार के माता-पिता की सैलरी को आय में नहीं जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही जाति वैधता प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था।

लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार का 8 सितंबर 1993 वाला आदेश, जिसमें सैलरी आय को क्रीमी लेयर से बाहर रखने की बात कही गई है। वह सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों और आरक्षण पर लागू होता है। डिवीजन बेंच ने कहा कि कर्नाटक में लागू आरक्षण व्यवस्था पर यह नियम सीधे लागू नहीं होगा।

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