बिज़नस
भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका:16 बिजनेस पार्टनर्स के खिलाफ जांच शुरू, अनुचित व्यापार के सबूत मिले तो भारी टैक्स लगेगा
वॉशिंगटन,एजेंसी। अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने भारत और चीन समेत अपने 16 प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स के खिलाफ ‘सेक्शन 301’ के तहत नई जांच शुरू कर दी है। ‘सेक्शन 301’ अमेरिका को उन देशों पर एकतरफा टैक्स बढ़ाने की शक्ति देता है, जो उसकी कंपनियों को नुकसान पहुंच रहे हो।
पिछले महीने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ को अवैध बताने के बाद, प्रशासन अब नए कानूनी रास्तों से टैरिफ का दबाव वापस बनाने की तैयारी में है।
यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) जेमिसन ग्रीर के मुताबिक, इस जांच के कारण इस साल गर्मियों तक भारत, चीन, यूरोपीय संघ और मैक्सिको जैसे देशों पर नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
देश
Petrol Diesel Price Hike : पेट्रोल 18 रुपए, डीजल 35… चुनावों के बाद बढ़ सकते हैं दाम! रिपोर्ट में हुआ खुलासा
मुंबई, एजेंसी। मिडिल ईस्ट जंग के बीच भारत में भी पेट्रोल-डीजल, LPG पर गहरा असर पड़ रहा है। पिछले दिनों LPG को लेकर सभी कपंनियों ने कई तरह के बदलाव कर दिए। इसी के साथ पेट्रोल-डीजल की कपंनियां भी घाटे में जा रही है, लेकिन रिटेल के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। कंपनियों के अनुसार इस समय पेट्रोल 18 रुपए, डीजल 35 रुपए प्रति लीटर का नुकसान झेलना पड़ रहा है। जिसकी वजह से कंपनियों द्वारा तेल की रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है।
भारतीय तेल कंपनियों ने 2022 से लेकर अब तक कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बाजार की आधारित व्य्वस्था के अनुसार तय की जाती है। मिडिल ईस्ट जंग के बीच साल की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई थी, लेकिन अब फिर कच्चे तेल की 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई है।

तेल कंपनियो को नुकसान
जंग के बाद से तेल की कंपनियों को लगातार भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कंपनियों द्वारा पेट्रोल-डीजल के रिटेल दामों में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई। जानकारी के अनुसार पिछले महीने सरकारी तेल को रोजाना 2400 करोड़ का घाटा पड़ा। हालांकि अब 1600 करोड़ रुपए प्रतिदन के आसपास पहुंच गया है।
इस रिपोर्ट में हुआ खुलासा
Macquarie Group की रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल-डीजलों के दाम बढ़ाए जा सकते है, कंपनी का कहना है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे अहम राज्यों में चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जा सकते है।

देश
भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद तेल संकट के प्रभाव को कम करने में होगी मददगार: एसएंडपी
मुंबई, एजेंसी। भारत की मजबूत वृहद आर्थिक और वित्तीय बुनियाद कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने में मददगार हो सकती है। हालांकि, अगर 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो आर्थिक वृद्धि दर में 0.80 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।

इस परिदृश्य के तहत, वित्त वर्ष 2026-27 में कंपनियों की ब्याज, कर, मूल्यह्रास और ट्रेडमार्क, पेंटेंट तथा अन्य संपत्ति की समय बढ़ने के साथ लागत में कमी के आकलन से पहले की आय (ईबीआईटीडीए) में 15-25 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। इससे कर्ज में 0.5 गुना से एक गुना तक बढ़ने का अनुमान है। वहीं बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्ति की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है, जिससे एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) लगभग 3.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
आर्थिक गतिविधियां होंगी प्रभावित
एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने एक रिपोर्ट में कहा, ”पश्चिम एशिया में युद्ध से उत्पन्न झटकों से भारत अछूता नहीं है। ऊर्जा की ऊंची कीमतों और आपूर्ति में रुकावट की समस्या कई महीनों तक बनी रह सकती है, जिससे सभी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होंगी।” हालांकि, कंपनियों का मजबूत बही-खाता, बैंकों में अच्छी पूंजी और मजबूत बाह्य स्थिति इस प्रभाव से बचाव प्रदान करेंगे।
एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने तनावपूर्ण स्थिति में ब्रेंट क्रूड की कीमत 2026 में 130 डॉलर और 2027 में 100 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है, जबकि तुलनात्मक आधार पर यह कीमत क्रमशः 85 डॉलर और 70 डॉलर है। एजेंसी को भारत की रेटिंग पर तत्काल किसी प्रभाव की उम्मीद नहीं है।
तेल की ऊंची कीमतों से बढ़ सकता है चालू खाता घाटा
हालांकि, राजकोषीय मोर्चे पर मजबूत प्रयासों को अस्थायी रूप से झटका लग सकता है। तेल की ऊंची कीमतों से चालू खाते घाटा बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार, 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से यह घाटा जीडीपी के लगभग 0.4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। जोखिम से बचने की धारणा और बढ़ते आयात बिल के कारण रुपए की विनिमय दर का दबाव भी पड़ सकता है।
एजेंसी ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट का असर कच्चे माल की ऊंची लागत, घटते कॉरपोरेट मार्जिन, बढ़ती उपभोक्ता कीमतों और यदि सरकार सब्सिडी के मामले में हस्तक्षेप करती है तो बढ़ते राजकोषीय दबाव के रूप में सामने आएगा। ईंधन और पेट्रोरसायन को प्रभावित करने वाली संभावित आपूर्ति बाधाओं से भी वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इन जोखिमों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था ने 2026 में मजबूत वृद्धि, अच्छी घरेलू मांग और कम मुद्रास्फीति के साथ कदम रखा है। इससे निकट भविष्य में आने वाले झटकों को झेलने में मदद मिलनी चाहिए।

देश
नोएडा में प्रदर्शन तो अमेरिका में चांदी! जानें USA के वर्कर्स को हर घंटे कितने हजार मिलते हैं? देखें चौंकाने वाला अंतर
नोएडा,एजेंसी। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए उग्र प्रदर्शन ने सरकार को हिलाकर रख दिया है। 13 अप्रैल को हुई आगजनी और हिंसा के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़ा कदम उठाते हुए मजदूरों की नई वेतन दरों को मंजूरी दे दी है। इस घटना ने जहाँ भारत में मजदूरों की सुरक्षा और हक पर सवाल उठाए हैं वहीं दुनिया के सबसे अमीर देश अमेरिका के साथ भारत के ‘वेतन अंतर’ (Wage Gap) पर भी एक नई चर्चा शुरू कर दी है।

नोएडा संग्राम: क्यों भड़की हिंसा?
सोमवार को नोएडा और गाजियाबाद की सड़कों पर हजारों मजदूर उतर आए। महंगाई की मार झेल रहे इन श्रमिकों का आरोप था कि लंबे समय से उनकी न्यूनतम मजदूरी में कोई सम्मानजनक बढ़ोतरी नहीं हुई है। प्रदर्शन के दौरान कई गाड़ियों को जला दिया गया और फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ हुई जिसके बाद पूरे एनसीआर में हाई अलर्ट जारी करना पड़ा।
योगी सरकार की नई दरें (गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद)
हालात बिगड़ते देख सीएम योगी ने तुरंत हाई-पावर कमेटी बनाई और सोमवार रात ही अंतरिम वेतन वृद्धि का ऐलान कर दिया। ये दरें 1 अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएंगी:
| श्रेणी | पुराना वेतन (लगभग) | नया वेतन (प्रति माह) |
| अकुशल (Unskilled) | ₹11,313 | ₹13,690 |
| अर्धकुशल (Semi-skilled) | – | ₹15,059 |
| कुशल (Skilled) | – | ₹16,868 |
उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में अकुशल मजदूरों के लिए न्यूनतम रू.12,356 तय किए गए हैं।
नोएडा के इस विवाद ने वैश्विक स्तर पर मजदूरी की तुलना को जन्म दिया है। जब हम अमेरिका के आंकड़ों को देखते हैं तो तस्वीर पूरी तरह अलग दिखती है:
- प्रति घंटा कमाई: अमेरिका में वेतन महीने के हिसाब से नहीं बल्कि प्रति घंटे के आधार पर मिलता है। वहां फेडरल न्यूनतम मजदूरी $7.25 प्रति घंटा है जबकि न्यूयॉर्क जैसे राज्यों में यह $15 से $17 (करीब रू.1400) तक है।
- सालाना आय: अमेरिका में एक फैक्ट्री वर्कर साल भर में $32,000 से $37,500 (करीब 27 से 31 लाख रुपये) कमा लेता है।
- कंस्ट्रक्शन सेक्टर: वहां एक मजदूर को औसतन $23.69 प्रति घंटा (लगभग रू.2000) मिलते हैं। अनुभव बढ़ने पर यह रू.3000 प्रति घंटा तक जा सकता है।

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