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बिज़नस

टेक वॉर तेज: चीन का Meta को बड़ा झटका, 2 अरब डॉलर AI डील पर लगाई रोक

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वाशिंगठन/बीजिंग, एजेंसी। चीन ने एक बड़े फैसले में अमेरिकी टेक कंपनी Meta की 2 अरब डॉलर की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डील को रोक दिया है। यह डील AI स्टार्टअप Manus के अधिग्रहण से जुड़ी थी, जिसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के चलते रद्द कर दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के प्रमुख आर्थिक नियामक NDRC ने 2021 में लागू विदेशी निवेश सुरक्षा नियमों के तहत इस सौदे को वापस लेने का आदेश दिया। यह फैसला दिखाता है कि चीन अब अपनी तकनीक, डेटा और टैलेंट को विदेश जाने से रोकने के लिए और सख्त रुख अपना रहा है।

हालांकि Manus ने बाद में अपना बेस विदेश में शिफ्ट कर लिया था और उसे अमेरिकी निवेश भी मिला था, लेकिन चीनी अधिकारियों ने माना कि कंपनी के तकनीकी संसाधन, डेटा और रिसर्च अभी भी चीन से जुड़े हुए हैं। इसी वजह से इस डील को संवेदनशील माना गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस फैसले के तहत अब Meta और Manus के बीच हुए निवेश, शेयर ट्रांसफर और बौद्धिक संपत्ति (Intellectual Property) को वापस करना होगा। AI जैसे सेक्टर में यह प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सिर्फ एक डील तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संकेत है कि चीन अब AI जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों, खासकर अमेरिकी कंपनियों, को लेकर ज्यादा सतर्क हो गया है। इस फैसले का असर वैश्विक निवेशकों पर भी पड़ सकता है। अब क्रॉस-बॉर्डर टेक डील्स में जोखिम बढ़ेगा और कंपनियां भविष्य में अपने ऑपरेशन, डेटा और रिसर्च को अलग-अलग रखने की कोशिश कर सकती हैं, ताकि ऐसे नियमों से बचा जा सके। कुल मिलाकर, यह मामला दिखाता है कि दुनिया में टेक्नोलॉजी और डेटा को लेकर प्रतिस्पर्धा और तनाव लगातार बढ़ रहा है, और AI इस संघर्ष का सबसे अहम केंद्र बन चुका है।

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देश

Baleno-Swift को पीछे छोड़ बनी ये सस्ती कार नंबर 1, जानें कीमत और फीचर्स के बारे में

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मुंबई, एजेंसी। भारत में भले ही SUV गाड़ियों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही हो, लेकिन छोटी कारों यानी हैचबैक सेगमेंट की मांग अभी भी बनी हुई है। मार्च 2026 के बिक्री आंकड़े बताते हैं कि इस सेगमेंट में कुल 87,702 यूनिट्स की बिक्री हुई, जो मार्च 2025 की 86,591 यूनिट्स के मुकाबले केवल 1.28% अधिक है। इसका मतलब है कि इस सेगमेंट की ग्रोथ लगभग स्थिर बनी हुई है। इसके बावजूद, बाजार में Maruti Suzuki का दबदबा साफ नजर आता है।

मार्च 2026 में Maruti WagonR सबसे ज्यादा बिकने वाली कार रही। इसकी 17,025 यूनिट्स बिकीं, हालांकि पिछले साल के मुकाबले इसमें 0.87% की हल्की गिरावट दर्ज की गई। इसकी शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत करीब 4.99 लाख रुपये है। दूसरे स्थान पर Maruti Baleno रही, जिसकी 16,392 यूनिट्स की बिक्री हुई और इसमें 32.65% की मजबूत बढ़त देखने को मिली। वहीं Maruti Swift की 14,545 यूनिट्स बिकीं, लेकिन इसमें 18.04% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

एंट्री लेवल कारों में भी दिखा दम
Maruti Alto ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 11515 यूनिट बिक्री के साथ अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। इस कार में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली जो यह दिखाता है कि कम बजट वाली कारों की डिमांड अभी भी बरकरार है। वहीं Tata Tiago की बिक्री में गिरावट देखने को मिली जिससे यह साफ होता है कि इस सेगमेंट में मुकाबला काफी कड़ा हो गया है।

Altroz और छोटे मॉडल्स का प्रदर्शन
अन्य मॉडलों की बात करें तो Tata Altroz ने 2,344 यूनिट्स की बिक्री के साथ 41.38% की तेज ग्रोथ हासिल की, जो इस सेगमेंट में सुधार का संकेत है। वहीं Maruti Celerio और Maruti Ignis की बिक्री में बड़ी गिरावट आई। Celerio की बिक्री 40.34% घटकर 1,353 यूनिट्स और Ignis की 34.21% गिरकर 1,250 यूनिट्स रह गई। Maruti S-Presso की स्थिति सबसे कमजोर रही, जिसकी बिक्री 87.36% गिरकर सिर्फ 226 यूनिट्स रह गई। वहीं Renault Kwid की बिक्री भी 15.60% घटकर 449 यूनिट्स रही।

छोटी कारों और EV में मिला मिला जुला असर
कुछ छोटे मॉडल्स जैसे Celerio Ignis और S Presso की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गई जिससे साफ है कि इन कारों की मांग घट रही है। दूसरी तरफ MG Comet EV और Citroen C3 जैसे नए मॉडल्स में तेजी से ग्रोथ देखी गई जो आने वाले समय में नए ट्रेंड का संकेत देती है।

कुल मिलाकर, हैचबैक सेगमेंट में ग्रोथ सीमित बनी हुई है। Maruti Baleno, Maruti Alto और Tata Altroz जैसे मॉडल्स ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन Maruti Swift और अन्य छोटे मॉडलों की गिरावट ने कुल ग्रोथ को संतुलित कर दिया। SUV की बढ़ती मांग का असर साफ तौर पर हैचबैक कारों की बिक्री पर दिखाई दे रहा है, फिर भी बाजार में Maruti Suzuki की पकड़ मजबूत बनी हुई है।

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देश

वेदांता का मार्च तिमाही में शुद्ध लाभ 89% बढ़कर 9,352 करोड़ रुपए पर

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नई दिल्ली, एजेंसी। खनन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी वेदांता लिमिटेड का जनवरी-मार्च तिमाही में एकीकृत शुद्ध लाभ 89 प्रतिशत उछलकर 9,352 करोड़ रुपए हो गया। वैश्विक धातु कीमतों में तेजी, बिक्री मात्रा में वृद्धि और रुपए की कमजोरी से यह लाभ बढ़ा है। पिछले वर्ष की समान तिमाही में कंपनी ने 4,961 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ अर्जित किया था। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी की परिचालन आय 29 प्रतिशत बढ़कर 51,524 करोड़ रुपए हो गई, जो एक साल पहले की समान तिमाही में 39,789 करोड़ रुपए थी।

वेदांता ने एक बयान में कहा कि राजस्व में वृद्धि का कारण लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) कीमतों में मजबूती, उच्च बिक्री, प्रीमियम और विदेशी मुद्रा में लाभ रहा। आलोच्य तिमाही के दौरान कंपनी का कुल खर्च बढ़कर 19,119 करोड़ रुपए हो गया, जो एक साल पहले 13,702 करोड़ रुपए था। वेदांता के कार्यकारी निदेशक अरुण मिश्रा ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 कंपनी के लिए ‘मजबूत निष्पादन’ का साल रहा, जिसमें विभिन्न व्यवसाय खंडों में रिकॉर्ड परिचालन प्रदर्शन दर्ज किया गया।

कंपनी ने वित्त वर्ष के दौरान 14,918 करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय किया। वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक कंपनी का सकल कर्ज 81,740 करोड़ रुपए और शुद्ध कर्ज 53,254 करोड़ रुपए था। वेदांता ने बताया कि उसके विभिन्न व्यवसायों के विभाजन की प्रक्रिया एक मई 2026 से प्रभावी हो जाएगी। इसके तहत एल्युमिनियम, बिजली, तेल एवं गैस और लौह अयस्क कारोबार को अलग-अलग सूचीबद्ध इकाइयों में विभाजित किया जाएगा।

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बिज़नस

ईरान की मुद्रा रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर

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तेहरान, एजेंसी। ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा रियाल बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लुढ़क कर 18 लाख प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अमेरिका और इजराइल के साथ संघर्ष के बाद लागू युद्धविराम अभी भी बना हुआ है। 28 फरवरी से शुरू युद्ध के दौरान रियाल कई हफ्तों तक अपेक्षाकृत स्थिर रहा, क्योंकि देश में कारोबार और आयात गतिविधियां काफी सीमित थीं। हालांकि, दो दिन पहले रियाल में गिरावट शुरू हुई और बुधवार को यह रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि रियाल में यह गिरावट महंगाई को और बढ़ा सकती है, क्योंकि खाद्य पदार्थों, दवाइयों, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल जैसे कई आयातित उत्पाद डॉलर की दर से प्रभावित होते हैं। फिलहाल युद्धविराम जारी है, लेकिन अमेरिका की नाकाबंदी ईरान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रही है। तेल निर्यात पर रोक या उसमें बाधा से सरकार की आय और विदेशी मुद्रा के प्रमुख स्रोत पर असर पड़ा है। 

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