मुंबई,एजेंसी। बिटकॉइन की कीमत पहली बार रू1.08 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2009 में इसकी वैल्यू शून्य के करीब थी। इस करेंसी से कई दिलचस्प किस्से भी जुड़े हैं।
जैसे जिस व्यक्ति ने इसे बनाया है उसे कोई नहीं जानता। उसने अपने आप को गुमनाम रखा है। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो।
इसी तरह 2010 में खरीदा गया वो पिज्जा भी कोई नहीं भूल सकता, जिसे 10,000 बिटकॉइन देकर खरीदा गया था। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने इसे खरीदा था।
अगर वो इंजीनियर उस समय ये पिज्जा नहीं खरीदता और ये बिटकॉइन अपने पास रखता तो इन बिटकॉइन्स की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होती।
यानी, अगर एक पिज्जा में 6 स्लाइस हैं तो दो पिज्जा के हिसाब से एक स्लाइस की कीमत 833 करोड़ पड़ी। यहां हम 5 चैप्टर में बिटकॉइन की दिलचस्प कहानी बता रहे हैं…
साल 2008 का समय था, दुनियाभर में आर्थिक संकट अपने चरम पर था। उस वक्त बैंकों और सरकारों पर लोगों का भरोसा डगमगा रहा था। लोग बैंकों और सेंट्रल बैंकों के फैसलों और व्यवस्था से नाराज थे। बैंकों की गलत नीतियों की वजह से कई लोग अपनी जमा-पूंजी खो बैठे।
इसी माहौल में खुद को सतोशी नाकामोतो कहने वाले एक गुमनाम शख्स ने एक नई तरह की डिजिटल करेंसी का कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया। इसमें उन्होंने डिटेल में बताया था कि कैसे एक ऐसी करेंसी बनाई जा सकती है जो बिना किसी बैंक और सरकार के दखल के काम करे।
फिर 3 जनवरी 2009 को बिटकॉइन का पहला ब्लॉक ‘जेनिसिस ब्लॉक’ बनाया गया। यहीं से बिटकॉइन की शुरुआत हुई। बिटकॉइन का मकसद एक ऐसी करेंसी देना था जो ‘डिसेंट्रलाइज्ड’ हो, यानी जिस पर किसी एक संस्था का कंट्रोल न हो।
2008 का क्राइसिस अमेरिका के हाउसिंग बबल से शुरू हुआ था। बैंकों ने बिना सोचे-समझे होम लोन बांटे, जो लोग चुकाने में सक्षम नहीं थे। ये तस्वीर 13 अक्टूबर 2008 की है। न्यूयॉर्क शहर में लोग न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
चैप्टर-2
पहला ट्रांजैक्शन
बात 22 मई, 2010 की है। लास्जलो हैन्येज नाम के फ्लोरिडा बेस्ड एक प्रोग्रामर ने बिटकॉइन फोरम पर एक पोस्ट डाली। इसमें लिखा, ‘मैं 10,000 बिटकॉइन देकर दो पिज्जा खरीदना चाहता हूं।’ उस वक्त बिटकॉइन की कीमत इतनी कम थी कि 10,000 की वैल्यू महज 41 डॉलर थी।
लास्जलो की पोस्ट पर जेरेमी स्टर्डिवेंट नाम के एक शख्स ने जवाब दिया। जेरेमी ने पापा जॉन्स से दो पिज्जा ऑर्डर किए और लास्जलो के पते पर डिलीवर करवाए। बदले में लास्जलो ने जेरेमी को 10,000 बिटकॉइन भेजे। ये बिटकॉइन का पहला रियल-वर्ल्ड ट्रांजैक्शन था।
इसे ‘बिटकॉइन पिज्जा डे’ के नाम से जाना जाता है। उस वक्त किसी को नहीं पता था कि बिटकॉइन की कीमत भविष्य में आसमान छूएगी। आज एक बिटकॉइन की कीमत 1.08 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है।
क्यों खास है ये ट्रांजैक्शन?
ये पहला मौका था जब बिटकॉइन को किसी फिजिकल आइटम, यानी पिज्जा के लिए इस्तेमाल किया गया।
ऐसे में सबसे पहले पता चला कि बिटकॉइन सिर्फ डिजिटल कोड नहीं, बल्कि असल में पैसे की तरह काम कर सकता है।
आज के हिसाब से 10,000 बिटकॉइन की कीमत 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है। लोग मजाक में कहते हैं कि ये ‘दुनिया के सबसे महंगे पिज्जा’ थे।
चैप्टर-3
गुमनाम फाउंडर
बिटकॉइन का फाउंडर कौन है किसी को नहीं पता। बस एक रहस्यमयी नाम सामने आया- सतोशी नाकामोतो। कोई नहीं जानता कि ये शख्स था, कोई ग्रुप था, या बस एक नाम।
2008 में सतोशी ने एक ऑनलाइन क्रिप्टोग्राफी मेलिंग लिस्ट पर एक व्हाइटपेपर पोस्ट किया था, जिसका टाइटल था- ‘बिटकॉइन: अ पीयरॉ-टू-पीयर इलेक्ट्रॉनिक कैश सिस्टम।’ ये वो पहला मौका था जब किसी ने सतोशी नाम सुना।
जनवरी 2009 में, सतोशी ने बिटकॉइन का पहला सॉफ्टवेयर रिलीज किया और नेटवर्क शुरू किया। उन्होंने खुद पहला बिटकॉइन ब्लॉक माइन किया। सतोशी फोरम्स पर एक्टिव रहे, डेवलपर्स के साथ बातचीत करते, बिटकॉइन को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देते।
लेकिन फिर, 2011 में वो अचानक गायब हो गए। एक आखिरी ईमेल में उन्होंने लिखा, ‘मैं अब दूसरी चीजों पर काम कर रहा हूं। बिटकॉइन अच्छे हाथों में है।’ आज तक कोई नहीं जानता कि सतोशी नाकामोतो कौन थे।
कुछ का मानना है कि वो एक जापानी प्रोग्रामर थे, तो कुछ कहते हैं कि ये कई लोगों का ग्रुप था। उनके वॉलेट में करीब 10 लाख बिटकॉइन्स हैं, जो आज अरबों डॉलर के हैं, लेकिन वो कभी छुए नहीं गए।
हंगरी में बुडापेस्ट के ग्राफिसॉफ्ट पार्क में सतोशी नाकामोतो की एक मूर्ति लगी है। ये मूर्ति उस अनजान शख्स को सम्मान देने के लिए है, जिसने बिटकॉइन और इसके पीछे की ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी बनाई।
सतोशी की गुमनामी ने बिटकॉइन को और भी रहस्यमयी बना दिया, लेकिन उनकी बनाई ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी ने दुनिया बदल दी। उनकी गुमनामी की 3 बड़ी वजह हो सकती है:
1. सिक्योरिटी की चिंता:
सतोशी ने बिटकॉइन को एक ऐसी करेंसी के तौर पर बनाया जो सरकारों और बैंकों के कंट्रोल से बाहर है। ये सिस्टम दुनिया की फाइनेंशियल व्यवस्था को चुनौती देने वाला है। अगर सतोशी अपनी असली पहचान बताते, तो…
कई देशों की सरकारें और सेंट्रल बैंक सतोशी के पीछे पड़ सकते थे। सब उन्हें मारने या गिरफ्तार कर लेने की कोशिश करते।
माना जाता है सतोशी के पास करीब 10 लाख बिटकॉइन हैं। अगर उनकी पहचान सामने आती तो अपराधी उन्हें निशाना बना सकते थे।
2. डिसेंट्रलाइजेशन की मंशा:
एक थ्योरी ये भी है कि सतोशी बिटकॉइन को डिसेंट्रलाइज्ड रखना चाहते थे। यानी सरकार, बैंक और यहां तक कि खुद के कंट्रोल से भी बाहर। अगर वो अपनी पहचान बताते और बिटकॉइन का ‘फेस’ बन जाते।
ऐसे में लोग बिटकॉइन को उनके नाम से जोड़ने लगते। उनकी हर बात को बिटकॉइन की दिशा तय करने वाली माना जाता, जो उसके मूल विचार के खिलाफ था। सतोशी चाहते थे कि बिटकॉइन कम्युनिटी खुद इसे आगे बढ़ाए।
3. साजिशों और अटकलों से बचना: अगर सतोशी अपनी पहचान बताते, तो लोग उनके इरादों पर सवाल उठाते। क्या वो बिटकॉइन को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या वो किसी सरकार या बड़ी कंपनी के लिए काम कर रहे हैं?
गुमनाम रहकर उन्होंने ऐसी सारी अटकलों से बचने की कोशिश की। इससे बिटकॉइन का फोकस उनकी पहचान की बजाय टेक्नोलॉजी और इसके मकसद पर रहा।
चैप्टर-4
टेक्नोलॉजी
बिटकॉइन एक डिजिटल कोड है जो आपके डिजिटल वॉलेट में रहता है। जैसे आप व्हाट्सएप पर मैसेज भेजते हैं, उसी तरह बिटकॉइन को आप इंटरनेट के जरिए दुनिया में कहीं भी भेज सकते हैं। इसकी कुल संख्या 21 मिलियन है। इससे ज्यादा बिटकॉइन कभी नहीं बनेंगे।
यह ब्लॉकचेन तकनीक पर काम करता है। कल्पना करें कि एक बहीखाता है, जिसमें दुनिया भर के बिटकॉइन लेनदेन लिखे जाते हैं। इस बहीखाते को ब्लॉकचेन कहते हैं और यह हजारों कंप्यूटरों पर एक साथ मौजूद होता है।
ब्लॉकचेन एक डिजिटल कॉपी की तरह है जो जानकारी, जैसे लेनदेन को रिकॉर्ड करती है। इसे हर कोई देख सकता है, लेकिन कोई बदल या मिटा नहीं सकता। यह कई कंप्यूटरों पर साझा होती है, इसलिए यह सुरक्षित और भरोसेमंद है।
जब आप किसी को बिटकॉइन भेजते हैं, यह लेनदेन ब्लॉकचेन में दर्ज होता है। इसे जांचने और सुरक्षित करने का काम “माइनर्स” करते हैं, जो अपने कंप्यूटरों की ताकत से गणितीय समस्याएं हल करते हैं। बदले में, उन्हें नए बिटकॉइन मिलते हैं।
माइनिंग को एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक ताला है और उसकी लाखों चाबियां है। अब इस ताले को खोलने के लिए सभी चाबियों को एक-एक कर लगाकर देखना होगा। जो ताले को सबसे पहले खोलेगा उसे बिटकॉइन मिलेगा।
ब्लॉकचेन कैसे काम करती है?
ब्लॉकचेन को ब्लॉकों की एक श्रृंखला के रूप में सोचें। प्रत्येक ब्लॉक कॉपी का एक पेज है जिसमें लेनदेन की सूची होती है (जैसे, आदित्य ने विक्रम को 100 रुपए भेजे)।
जब ब्लॉक भर जाता है, तो उसे लॉक कर दिया जाता है और पिछले ब्लॉक से जोड़ दिया जाता है। नोड्स नामक कंप्यूटर इस जानकारी को जांचते और स्टोर करते हैं, यह सुनिश्चित करके कि यह सही और सुरक्षित है।
ब्लॉकचेन बहुत सुरक्षित भी है, क्योंकि यह डेटा को बचाने के लिए गणित और कोड का उपयोग करता है। चूंकि कई कंप्यूटर ब्लॉकचेन की कॉपी रखते हैं, इसे हैक करना मुश्किल है।
चैप्टर-5
सबसे ज्यादा बिटकॉइन
कहते हैं सतोशी ने शुरुआती दिनों में करीब 11 लाख बिटकॉइन माइन किए। उनके 22,000 वॉलेट्स में ये कॉइन आज भी रखे हुए हैं। इसकी कीमत अब 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है।
ब्लूमबर्ग की दिसंबर 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब इतने ही बिटकॉइन अमेरिकी स्पॉट ETFs के पास हैं। हालांकि, इन दोनों में से ज्यादा कॉइन किसके पास है इसका सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल है।
लंदन/नई दिल्ली, एजेंसी। लंदन में रह रहे कारोबारी विजय माल्या ने बुधवार देर रात फिर भारत सरकार पर अन्याय करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण वे भारत नहीं लौट पा रहे हैं।
माल्या ने दावा किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में माना है कि उनकी रू.14,000 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति से बैंकों को वसूली हुई है। यह रकम उन बैंकों को लौटाई गई, जिनका पैसा किंगफिशर एयरलाइंस के कर्ज के रूप में बकाया था।
विजय माल्या पर किंगफिशर एयरलाइंस के लिए SBI समेत कई बैंकों से करीब रू.9,000 करोड़ का कर्ज लेने और उसे नहीं चुकाने का आरोप है।
बैंकों का कर्ज नहीं चुकाने और CBI-ED की जांच के बीच 2 मार्च 2016 यानी 10 साल 6 महीने पहले पहले वे माल्या भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए। बाद में उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया गया था।
माल्या का दावा- ED ने बैंकों को 14 हजार करोड़ लौटाए
माल्या ने बुधवार देर रात भी X पर कई पोस्ट किए। इनमें उन्होंने हाल के कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों का जिक्र किया और कहा कि उनके साथ अब भी अन्याय हो रहा है।
विजय ने एक पोस्ट में यह भी कहा, “मेरे साथ हो रहे अन्याय को देखते हुए मुझे लगता है कि मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए। शायद कॉकरोच बनकर बेहतर जिंदगी जी सकूं। मैं भगोड़ा नहीं हूं। ब्रिटेन की कानूनी प्रक्रिया ने मुझे भारत लौटने से रोक रखा है।”
माल्या ने ED की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल बताए गए हलफनामे का एक हिस्सा साझा किया। उन्होंने दावा किया कि उसमें उनसे 14,131.60 करोड़ रुपए की वसूली का जिक्र है।
उन्होंने लिखा, “बॉम्बे हाईकोर्ट में ED की ओर से दाखिल हलफनामा। पैराग्राफ 7 में तय कर्ज है और पैराग्राफ 17 में 2021 में वसूल किए गए 14,131.60 करोड़ रुपए दिखाए गए हैं।”
माल्या ने कहा, “पांच साल बाद भी मुझे ऐसा व्यक्ति बताया जा रहा है, जिसने बैंकों को धोखा दिया। मुझे गलत तरीके से भगोड़ा बताया गया है।” उन्होंने वसूली का लेखा-जोखा दिखाने वाली एक टेबल भी शेयर की।
उन्होंने लिखा, “जो लोग निष्पक्ष और सही हिसाब-किताब पर भरोसा करते हैं, वे यह तालिका देखें। क्या मीडिया की ओर से मुझे इस तरह निशाना बनाया जाना और किसी पत्रकार की स्क्रिप्ट की शुरुआत में ही मुझे धोखेबाज कहना सही है? यह पूछना शुरू क्यों नहीं किया जाता कि मुझे मेरा रिफंड कब मिलेगा।”
मार्च 2016 में देश छोड़कर गए थे, 2019 में भगोड़ा घोषित
माल्या मार्च 2016 में यूके चले गए थे। इसके बाद साल 2019 में अधिकारियों ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (FEOA) के तहत उन्हें भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया था।
इस कानून के तहत प्राधिकारियों को संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार मिला है। भारत सरकार लगातार यूके से उनके प्रत्यर्पण की कोशिश कर रही है।
क्या है भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (FEOA) कानून उन आर्थिक अपराधियों पर नकेल कसने के लिए बनाया गया है जो भारतीय अदालतों की कार्रवाई और गिरफ्तारी से बचने के लिए देश छोड़कर भाग जाते हैं।
इस कानून के तहत अदालतों को मामले की सुनवाई पूरी होने से पहले ही आरोपी की देश और विदेश में मौजूद संपत्तियों को अटैच यानी जब्त करने और उन्हें नीलाम/बेचकर बैंकों का बकाया वसूलने का अधिकार मिलता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फरवरी में दी थी अंतिम मोहलत
इस साल फरवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट ने विजय माल्या को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि जानबूझकर अदालती कार्यवाही से बचने वाला व्यक्ति न्यायसंगत राहत की मांग नहीं कर सकता।
कोर्ट ने माल्या से कहा था कि यह आखिरी मौका है, वे बताएं कि भारत लौटना चाहते हैं या नहीं। माल्या ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून और उन्हें भगोड़ा घोषित किए जाने को चुनौती दी है।
काठमांडू/नई दिल्ली, एजेंसी। नेपाल में भीषण बाढ़ के बाद भारत ने 35 टन राहत और बचाव सामग्री की 8वीं खेप भेजी। भारतीय वायुसेना का विमान बुधवार को काठमांडू पहुंचा। इसके साथ भारत अब तक 130 टन से ज्यादा राहत सामग्री भेज चुका है।
खेप में टेंट, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप, दवाएं और रेस्क्यू उपकरण शामिल हैं। भारत ने राहत अभियान 26 अगस्त को शुरू किया था।
नेपाल पुलिस के मुताबिक, बाढ़ प्रभावित इलाकों से अब तक 1367 शव बरामद हुए हैं। 102 शवों की पहचान हो चुकी है। पहचान के लिए DNA सैंपल जुटाए जा रहे हैं और भारत समेत कई देशों के फोरेंसिक विशेषज्ञ मदद कर रहे हैं।
नेपाल त्रासदी से जुड़ी तस्वीरें…
नेपाल के नुवाकोट जिले के देवीघाट में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन के बाद कीचड़ से दबे मकान।
हादसे में जान गंवाने वाले रिश्तेदार की फोटो देखते परिजन। ये तस्वीरें मार्चुरी के बाहर लगाई गई हैं।
चिलिमे टनल में 105 मीटर तक पहुंची नेपाली-भारतीय सेना की टीम
रसुवा जिले के चिलिमे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में नेपाली और भारतीय सेना की टीम मिलकर सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है। टीम अब तक सर्विस टनल के अंदर करीब 105 मीटर तक पहुंच गई है।
प्रोजेक्ट तक जाने वाली सड़क से मलबा हटाने का काम भी चल रहा है। प्रभावित इलाके के दोनों तरफ आने-जाने के लिए रोप लाइन लगा दी गई है।
बाढ़ आने के दिन ही नेपाली सेना की टीम मौके पर पहुंच गई थी। टीम ने पहले इलाके का जायजा लिया और फिर टनल के मुहाने से मिट्टी और मलबा हटाकर अंदर गई। यहां से दो लोगों के शव बरामद किए गए।
रेस्क्यू ऑपरेशन को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए मौके पर मौजूद एक्सकेवेटर के साथ बॉबकैट एक्सकेवेटर भी लगातार मलबा हटाने और खुदाई में लगाया गया है।
नेपाल में रेस्क्यू से जुड़ी तस्वीरें…
नेपाल बाढ़ में AI से शवों की पहचान की कोशिश
नेपाल में भोटेकोशी नदी की बाढ़ के बाद लापता लोगों और अज्ञात शवों की पहचान के लिए FaceTagr AI तकनीक की मदद ली जा रही है। यह तस्वीरों और वीडियो में चेहरों का मिलान कर लापता लोगों से संभावित मैच तलाशती है।
FaceTagr हजारों रिकॉर्ड में से 5-10 संभावित मैच सामने लाता है। परिवार इन मैचों को देख सकते हैं, जबकि अंतिम पहचान नेपाल पुलिस या संबंधित सरकारी एजेंसियां करती हैं।
FaceTagr से जुड़े समीर पंथी के मुताबिक, अब तक करीब 500 लापता लोगों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। सिस्टम ने करीब 90 शवों की पहचान में मदद की है। हालांकि, यह नेपाल पुलिस के कुल आधिकारिक पहचान आंकड़े से अलग है।
रेस्क्यू और फोरेंसिक मदद के लिए 54 विशेषज्ञ नेपाल भेजे
भारत ने राहत सामग्री के साथ 54 विशेषज्ञों को भी नेपाल भेजा है। इनमें टनल रेस्क्यू और फोरेंसिक विशेषज्ञ शामिल हैं।
विशेष रेस्क्यू टीम नेपाली सेना के साथ चिलिमे और लांगटांग में अभियान चला रही है, जबकि फोरेंसिक विशेषज्ञ काठमांडू की दो लैब में DNA जांच में मदद कर रहे हैं।
भारत ने इसके लिए DNA किट, रिऐजेंट और प्रोफाइलिंग उपकरण भी उपलब्ध कराए हैं।
पणजी, एजेंसी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, ‘मुझे मुंबई-गोवा हाईवे के चौड़ीकरण में हो रही देरी को लेकर शर्मिंदगी महसूस होती है। ये काम 2016 तक पूरा होना था, लेकिन 15 साल में सिर्फ 94% ही पूरा हुआ है।’
गडकरी ने यह बात बुधवार को पणजी में छह लेन वाले एलिवेटेड रोड कॉरिडोर के उद्घाटन समारोह में कही। उन्होंने कहा, ‘हाईवे का काम पूरा होने के बाद मैं इसके उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊंगा। मैं ऐसे ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने का रिकॉर्ड बनाना चाहता हूं।’
गडकरी ने इस साल 22 जुलाई को राज्यसभा में बताया था कि पिछले 3 साल में नेशनल हाईवे निर्माण में खराब गुणवत्ता वाले काम के लिए 103 ठेकेदार और कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया और उन पर जुर्माना लगाया गया।
मुंबई-गोवा हाईवे: 15 साल से काम चल रहा, कई जगह गड्ढे
मुंबई-गोवा हाईवे का चौड़ीकरण का काम 2011 में शुरू हुआ था। इसके बाद भी यह अब तक पूरा नहीं हुआ है। 440 किलोमीटर लंबे इस हिस्से में काम पूरा होने के बावजूद कई जगह सड़क पर गड्ढे, पानी भरने, मरम्मत और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
हाईवे पर मई में खारपाड़ा टोल प्लाजा पर टोल लेना शुरू किया गया था। इसके बावजूद परियोजना के कुछ हिस्सों में काम और सुधार जारी है। हाईवे पर बंदरों के लिए 2021 में बनाया गया एक ओवरपास भी ढह चुका है, जिससे सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं।
हाईवे का काम 2016 तक पूरा होना था
मुंबई-गोवा हाईवे का काम पहले 2016 तक पूरा किया जाना था। जमीन अधिग्रहण, निर्माण से पहले की मंजूरियों और ठेकेदारों से जुड़ी समस्याओं के कारण काम में लगातार देरी हुई।
2024 में केंद्र सरकार ने भी संसद में बताया था कि जमीन अधिग्रहण और कुछ ठेकेदारों की आर्थिक दिक्कतों के कारण परियोजना में देरी हुई।
यह हाईवे मुंबई को कोंकण के रास्ते गोवा से जोड़ता है। इसका महाराष्ट्र वाला हिस्सा करीब 460 किलोमीटर है। परियोजना का यह मार्ग पर्यटन और स्थानीय कारोबार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।