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Credit Card यूजर्स ध्यान दें, IndusInd Bank ने ग्राहकों को दिया झटका
मुंबई, एजेंसी। अगर आप इंडसइंड बैंक का क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करते हैं तो आपके लिए एक अहम खबर है। बैंक ने अपने क्रेडिट कार्ड से जुड़े कई नियमों में बदलाव करने की घोषणा की है, 15 जून 2026 से लागू होंगे। बैंक ने ब्याज की कैलकुलेशन, फ्यूल खर्च, ट्रांसपोर्ट पेमेंट, विदेशी लेनदेन और लेट पेमेंट शुल्क से जुड़े नियमों में बदलाव किया है।

बैंक के अनुसार, जो ग्राहक हर महीने क्रेडिट कार्ड का पूरा बिल चुकाने के बजाय केवल आंशिक भुगतान करते हैं, उन्हें अतिरिक्त ब्याज का सामना करना पड़ सकता है। अब बकाया राशि पर ब्याज जारी रहने के साथ-साथ नई खरीदारी पर भी ब्याज लागू हो सकता है।
इतना ही नहीं, ब्याज-मुक्त अवधि का लाभ दोबारा पाने के लिए ग्राहकों को लगातार दो स्टेटमेंट साइकल तक पूरा भुगतान समय पर करना होगा। ऐसे में विशेषज्ञ समय पर पूरा बकाया चुकाने की सलाह दे रहे हैं।
फ्यूल और ट्रांसपोर्ट खर्च पर नया चार्ज
बैंक ने फ्यूल ट्रांजेक्शन से जुड़े नियम भी बदले हैं। अब अधिकांश स्टैंडर्ड और मिड-सेगमेंट कार्ड पर एक स्टेटमेंट साइकल (Credit Card Rules 2026) में 30,000 रुपए से अधिक के फ्यूल खर्च पर 1 प्रतिशत चार्ज और उस पर लागू जीएसटी देना होगा। पहले यह लीमिट 50,000 रुपए थी।
वहीं कैब, बस, रेलवे टिकट, टोल या अन्य ट्रांसपोर्ट सर्विसेस पर 40,000 रुपए से अधिक खर्च करने पर अतिरिक्त राशि पर 1 प्रतिशत चार्ज और जीएसटी लगाया जाएगा। हालांकि, हवाई यात्रा पर यह नियम लागू नहीं होगा।
विदेशी लेनदेन हुआ महंगा
विदेशी करेसी में किए जाने वाले ट्रांजेक्शन पर लगने वाला डायनामिक करेंसी कन्वर्जन (DCC) शुल्क भी बढ़ा दिया गया है। अधिकांश स्टैंडर्ड और टाइगर कार्ड पर यह चार्ज अब 2 प्रतिशत प्लस जीएसटी होगा, जबकि पहले यह 1 प्रतिशत था। वहीं, कुछ प्रीमियम कार्डों पर यह शुल्क पहले की तरह 1 प्रतिशत ही रहेगा।
लेट पेमेंट चार्ज
बैंक ने देर से पेमेंट करने पर लगने वाले शुल्क में भी बदलाव किया है। उदाहरण के तौर पर 501 रुपए से 1,000 रुपए तक के बकाया पर 500 रुपए तक का लेट फीस चार्ज लगाया जा सकता है। इसी तरह 5,001 रुपए से 10,000 रुपए तक के बकाया पर 750 रुपए तक का लेट पेमेंट चार्ज देना पड़ सकता है।
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भारत के कपड़ा, इस्पात क्षेत्रों में ‘अतिरिक्त उत्पादन’ क्षमता नहीं : डीजीटीआर
नई दिल्ली, एजेंसी। भारत में कपड़ा और इस्पात क्षेत्रों में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता नहीं है, क्योंकि देश में इन उत्पादों की प्रति व्यक्ति खपत दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को यह बात कही। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) ने मार्च में भारत सहित कई अर्थव्यवस्थाओं की विनिर्माण क्षेत्रों में कथित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता और उससे जुड़े व्यापारिक प्रभाव की जांच शुरू की है। यह जांच अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301(बी) के तहत की जा रही है।

वाणिज्य मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव एवं व्यापार उपचार महानिदेशक (डीजीटीआर) अमिताभ कुमार ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के व्यापार उपचार संबंधी किसी भी कानून में ‘अतिरिक्त क्षमता’ का प्रावधान नहीं है और यह एक नया विमर्श है। उन्होंने कहा, “हम नहीं मानते कि भारत के कपड़ा क्षेत्र में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है। देश में सभी प्रकार के कपड़ा उत्पादों, विशेषकर मानव निर्मित रेशों और तकनीकी वस्त्रों की प्रति व्यक्ति खपत बेहद कम है। भारत की जलवायु गर्म और उष्णकटिबंधीय है, इसलिए यहां मुख्य रूप से सूती कपड़े पहने जाते हैं। ऐसे में अतिरिक्त क्षमता का सवाल ही नहीं पैदा होता।”
कुमार ने कहा कि इस्पात क्षेत्र में भी भारत की प्रति व्यक्ति खपत बहुत कम है। उन्होंने कहा, “भले ही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक हो लेकिन हमारी आबादी, आर्थिक जरूरतों और विकास की जरूरतों की तुलना में प्रति व्यक्ति इस्पात खपत दुनिया में सबसे कम में से है।” उन्होंने बताया कि भारत कपास के अलावा मानव निर्मित रेशों का शुद्ध आयातक है।
भारत ने अपने आधिकारिक जवाब में अमेरिकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यूएसटीआर की अधिसूचना में यह साबित करने के लिए कोई ठोस तर्क या प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं दिया गया है कि भारत के प्रमुख उद्योगों में संरचनात्मक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है, जिससे अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष पैदा हो रहा है। कुमार ने कहा कि व्यापार उपचार उपाय अनुचित व्यापार व्यवहार से निपटने, घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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नुवामा को म्यूचुअल फंड कारोबार शुरू करने के लिए सेबी की मंजूरी
नई दिल्ली, एजेंसी। नुवामा वेल्थ मैनेजमेंट लिमिटेड को बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) से अपनी परिसंपत्ति प्रबंधन इकाई नुवामा एसेट मैनेजमेंट के माध्यम से म्यूचुअल फंड संचालन शुरू करने के लिए अंतिम मंजूरी मिल गई है। यह मंजूरी कंपनी को अपना म्यूचुअल फंड व्यवसाय स्थापित करने और परिसंपत्ति प्रबंधन पेशकशों का विस्तार करने का रास्ता प्रदान करती है। नुवामा ने कहा कि उसकी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी शुरुआत में विशेष निवेश फंड (एसआईएफ) ढांचे के तहत निवेश उत्पाद पेश करने के लिए नियामकीय मंजूरी प्राप्त करेगी। इसके बाद समय के साथ व्यापक म्यूचुअल फंड उत्पादों की श्रृंखला पेश करेगी।

नुवामा समूह के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) आशीष के. ने कहा, ”म्यूचुअल फंड व्यवसाय स्थापित करने के लिए सेबी की मंजूरी नुवामा के एकीकृत संपत्ति एवं परिसंपत्ति प्रबंधन मंच के निर्माण में एक और महत्वपूर्ण कदम है।” उन्होंने कहा कि कंपनी शुरुआत में विशेष निवेश फंड (एसआईएफ) से शुरुआत करेगी, जहां वह सार्वजनिक बाजार रणनीतियों के प्रबंधन में अपने अनुभव का लाभ उठाएगी।
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सोने से दूरी बना रहे निवेशक, एक साल में पहली बार ETF से निकला पैसा
मुंबई, एजेंसी। भारत में गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (Gold ETFs) से मई 2026 के दौरान 6.1 करोड़ डॉलर (करीब 582 करोड़ रुपए) की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के आंकड़ों के अनुसार, यह लगभग 0.4 टन सोने के बराबर है। इसके साथ ही गोल्ड ईटीएफ की कुल होल्डिंग घटकर 116.3 टन रह गई। यह पिछले एक साल में पहली बार था जब गोल्ड ETF से मासिक आधार पर शुद्ध निकासी दर्ज की गई।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाजार में जोखिम लेने की धारणा मजबूत होने और इक्विटी जैसे ग्रोथ-ओरिएंटेड सेक्टर्स में अवसर दिखने के कारण निवेशकों ने डिफेंसिव एसेट्स से पैसा निकालकर इक्विटी जैसे जोखिम वाले निवेश विकल्पों में लगाया।

गोल्ड फंड्स ने पिछले एक साल में 57.1 फीसदी से अधिक का शानदार रिटर्न दिया है। हालांकि पिछले तीन महीनों में इनमें 3.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। सोने की कीमतों में लंबी तेजी के बाद कई निवेशकों ने मुनाफावसूली को भी प्राथमिकता दी, जिससे गोल्ड ईटीएफ से निकासी बढ़ी।
इस बीच, एचडीएफसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी (HDFC AMC) ने अपने HDFC Gold ETF Fund of Fund में निवेश (लंपसम) और स्विच-इन की सीमा तय कर दी है। अब किसी भी पर्मानेंट अकाउंट नंबर (PAN) पर एक कैलेंडर महीने में अधिकतम 10 लाख रुपए तक ही निवेश किया जा सकेगा।
सोने के लिए लॉन्ग टर्म सपोर्ट बरकरार
हालांकि, सोने में लंबी अवधि के निवेश की संभावनाएं अब भी मजबूत बनी हुई हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह दुनिया भर में सरकारों की बढ़ती देनदारियां और लगातार बढ़ता वैश्विक कर्ज है। इसके अलावा, कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं और निवेश को अलग-अलग तरह के एसेट्स में बांट रहे हैं। इस बदलाव से भी लंबे समय में सोने को मजबूती मिलने की उम्मीद है। ऊंची कीमतों के बावजूद दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं, जो इस कीमती धातु के प्रति उनके भरोसे को दर्शाता है।
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