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विदेश

वेनेज़ुएला में आए दोहरे भूकंप से मरने वालों की संख्या बढ़कर हुई 589, लगभग 3,000 घायल

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काराकस, एजेंसी। वेनेज़ुएला में बुधवार को विनाशकारी भूकंप से मरने वालों की संख्या बढ़कर 589 हो गई है। इस बात की जानकारी अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने शुक्रवार को दी। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में आए भूकंप में मरने वालों की संख्या बढ़कर 589 हो गई है, जबकि 3000 लोग घायल हुए हैं।

वहीं स्वास्थ्य मंत्री कार्लोस अल्वाराडो ने एक टीवी चैनल वीटीवी पर कहा, ‘आज शाम 7:00 बजे तक, हमने 4,300 से ज़्यादा घायल लोगों की मदद की है। उनमें से ज़्यादातर को मामूली चोटें आईं, लेकिन कुछ मरीज़ों की हालत मध्यम से गंभीर है और कई लोगों को सर्जरी की ज़रूरत पड़ी।’ उन्होंने कहा कि लगभग 235 लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जो ‘पहले से ही मृत थे या मेडिकल सुविधाओं तक पहुंचने के तुरंत बाद उनकी मौत हो गई।

मंत्री ने कहा कि सबसे गंभीर स्थिति ला गुएरा राज्य में है, जहां सबसे ज़्यादा मौतें और घायल होने के मामले दर्ज किए गए हैं। अल्वाराडो ने कहा कि भूकंप के तुरंत बाद, पूरे देश में राज्य आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को सक्रिय कर दिया गया और सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाकों में मदद के लिए 5,000 से ज़्यादा मेडिकल कर्मचारियों (जिनमें 1,200 से ज़्यादा डॉक्टर शामिल हैं) को तैनात किया गया। उन्होंने कहा कि न केवल सरकारी बल्कि निजी क्लीनिक भी इस प्रयास में शामिल हुए हैं। 150 से ज़्यादा मरीज़ों का इलाज निजी मेडिकल सुविधाओं में किया जा रहा है, और मामूली चोट वाले कई घायल लोगों को पहले ही छुट्टी दे दी गई है।

गौरतबल है कि वेनेज़ुएला में 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो ज़बरदस्त भूकंप आए। इनके बाद 30 आफ्टरशॉक (भूकंप के बाद के झटके) महसूस किए गए। कई घर तबाह हो गए, बुनियादी ढाँचे और अस्पतालों को नुकसान पहुंचा और देश का मुख्य हवाई अड्डा बंद कर दिया गया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विनाशकारी भूकंप के दुखद नतीजों पर संवेदना व्यक्त की। मॉस्को ने काराकास की मदद करने की अपनी तत्परता ज़ाहिर की।

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देश

Volkswagen का 4 फैक्ट्रियां बंद करने का प्लान, 1,00,000 लोग होंगे बेरोगजार

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बर्लिन, एजेंसी। यूरोप की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनी फॉक्सवैगन AG कुछ फैक्ट्रियां बंद कर सकती है और कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती पर विचार कर रही हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में हुई बोर्ड बैठक में कंपनी के CEO ओलिवर ब्लूम ने एक नई रणनीति पेश की। प्रस्तावित योजना के तहत कर्मचारियों की छंटनी का आंकड़ा बढ़ाकर करीब 1 लाख तक किया जा सकता है। फिलहाल Volkswagen Group में लगभग 6.57 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। समूह के तहत Volkswagen के अलावा Porsche और Audi जैसे प्रीमियम ब्रांड भी शामिल हैं।

जर्मनी में 4 प्लांट बंद हो सकते हैं

रिपोर्ट के अनुसार, रणनीति में इस दशक के अंत तक जनरल ओवरहेड कॉस्ट में 11 अरब यूरो (12.5 अरब डॉलर) तक की कटौती करना और मीडियम टर्म में जर्मनी में 4 फैक्ट्रियां बंद करना भी शामिल है। इनमें नेकरसल्म में Audi के प्लांट के साथ-साथ हनोवर, ज्विकौ और एमडेन में फॉक्सवैगन के प्लांट शामिल हैं।

इसके अलावा कंपनी Volkswagen ब्रांड और उसके कंपोनेंट बिजनेस को अलग करने के विकल्प पर भी विचार कर रही है। लंबे समय से कम मुनाफे से जूझ रहे Volkswagen ब्रांड को अधिक लाभदायक और कुशल बनाने की दिशा में यह कदम अहम माना जा रहा है।

क्यों उठाने पड़ रहे हैं ये कदम?

फॉक्सवैगन इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है। अमेरिका के आयात शुल्क (टैरिफ), चीन में कमजोर मांग और यूरोप में BYD तथा Stellantis जैसी कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कंपनी पर दबाव बढ़ा दिया है। इसी वजह से लागत घटाने और कारोबार को अधिक प्रभावी बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है।

पहले से जारी है कर्मचारियों की संख्या घटाने का अभियान

रिपोर्ट के अनुसार, करीब 28,000 कर्मचारी पहले ही स्वैच्छिक रूप से कंपनी छोड़ने पर सहमत हो चुके हैं। यह 2030 तक पूरे Volkswagen Group में 50,000 कर्मचारियों की संख्या कम करने की पहले घोषित योजना का हिस्सा है।

हालांकि, नई प्रस्तावित छंटनी योजना को कर्मचारी संगठनों का विरोध झेलना पड़ सकता है। Volkswagen के सुपरवाइजरी बोर्ड में आधी सीटें कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के पास हैं, जबकि जर्मनी का लोअर सैक्सनी राज्य भी बोर्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और आमतौर पर कर्मचारी यूनियनों का समर्थन करता है। ऐसे में कंपनी के लिए इस योजना को लागू करना आसान नहीं होगा।

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बिज़नस

कौन है दुनिया की सबसे ऊंची इमारत ‘Burj Khalifa’ का असली मालिक? जानिए हर साल कितनी होती है कमाई?

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दुबई, एजेंसी। दुनिया की सबसे ऊंची और आलीशान इमारत ‘बुर्ज खलीफा’ का नाम किसने नहीं सुना होगा? आसमान को छूती इस गगनचुंबी इमारत को देखने के लिए दुनिया भर से लोग दुबई पहुंचते हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिरकार इस विशाल इमारत का असली मालिक कौन है? इसे बनाने में कितने पैसे खर्च हुए थे और यह हर साल कितनी कमाई करती है? आइए जानते हैं…

किसके पास है बुर्ज खलीफा का मालिकाना हक? 

बुर्ज खलीफा का मुख्य मालिकाना हक दुबई की सबसे बड़ी और मशहूर रियल एस्टेट कंपनी Emaar Properties के पास है। इस कंपनी की शुरुआत साल 1997 में हुई थी और इसके चेयरमैन मोहम्मद अलब्बार (Mohamed Alabbar) हैं। हालांकि पूरी इमारत का मूल ढांचा इमार प्रॉपर्टीज का है लेकिन इसके अंदर बने कई लग्जरी अपार्टमेंट्स और कमर्शियल ऑफिस स्पेस को दुनिया भर के बड़े बिजनेसमैन और अमीर लोगों ने खरीद रखा है। इसलिए वे अपने-अपने हिस्से के व्यक्तिगत मालिक हैं।

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शुरुआत में क्या था इस टावर का नाम?

शुरुआत में इस टावर का नाम ‘बुर्ज दुबई’ रखा गया था लेकिन साल 2010 में इसके उद्घाटन के समय इसका नाम बदलकर ‘बुर्ज खलीफा’ कर दिया गया। यह नाम संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के तत्कालीन राष्ट्रपति शेख खलीफा बिन जायद अल नाहयान के सम्मान में रखा गया था।

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सिर्फ 6 साल में बनकर हुई तैयार

आजकल जहां एक आम 20 मंजिला इमारत बनने में 7 से 8 साल लग जाते हैं, वहीं 828 मीटर ऊंचे और 163 मंजिलों वाले बुर्ज खलीफा को महज 6 साल में बनाकर खड़ा कर दिया गया था। इसका निर्माण कार्य साल 2004 में शुरू हुआ था और 2010 में इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया। इसे बनाने में लगभग 1.5 अरब डॉलर (यानी 1.5 Billion Dollars) की भारी-भरकम लागत आई थी।

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ध्यान रहे इसमें सिर्फ टावर बनाने का खर्च शामिल है आसपास की जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर की कीमत अलग है। इसके निर्माण में एक साथ करीब 12,000 मजदूरों ने दिन-रात काम किया था। इसे सैमसंग Samsung C&T, एराबटेक Arabtec और बेसिक्स Besix जैसी कंपनियों ने मिलकर बनाया जबकि इसका शानदार डिजाइन आर्किटेक्ट एड्रियन स्मिथ ने तैयार किया था।

ऐसे होती है अरबों की कमाई

बुर्ज खलीफा की सबसे ज्यादा कमाई इसके ऑब्जर्वेशन डेक से होती है जहां से लोग खड़े होकर पूरे दुबई का खूबसूरत नजारा देखते हैं। यहां हर साल करीब 1.7 करोड़ पर्यटक (Tourists) आते हैं। यहां एंट्री की न्यूनतम टिकट लगभग 37 डॉलर है। केवल इस टिकट की बिक्री से ही सालाना करीब 62.1 करोड़ डॉलर की कमाई हो जाती है।

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इसके अलावा इमारत के अंदर मौजूद मशहूर ‘अरमानी होटल’ (Armani Hotel), आलीशान फ्लैटों से मिलने वाला किराया और वीआईपी कॉर्पोरेट ऑफिसों से भी करोड़ों डॉलर की इनकम होती है। टिकट बिक्री के अलावा अन्य माध्यमों से यह टावर हर साल करीब 15 करोड़ से 40 करोड़ डॉलर तक कमा लेता है।

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देश

गोल्ड क्रैश का असर, चीन के बड़े बैंकों ने ट्रेडिंग सर्विस की बंद

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बीजिंग/मुंबई, एजेंसी। कुछ महीने पहले तक लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा था सोना अब तेज गिरावट के दौर से गुजर रहा है। इस गिरावट के बीच चीन के बड़े बैंकों ने आम निवेशकों के लिए गोल्ड और अन्य प्रीशियस मेटल्स की ट्रेडिंग सेवाएं सीमित या बंद करना शुरू कर दिया है। 

इस साल की शुरुआत में सोने की कीमत 5,600 अमेरिकी डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी जो अब गिरकर 4000 डॉलर से नीचे आ गई हैं। भारतीय मूल्य में लगभग 1.97 लाख रुपए से गिरकर 1.41 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम तक आ गई है यानी कुछ ही महीनों में लगभग 56,000 रुपए प्रति 10 ग्राम (करीब 29%) की गिरावट दर्ज की गई है।

चीन ने क्या लिया फैसला

चीन के सबसे बड़े बैंक इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना (ICBC) ने घोषणा की है कि वह 24 जुलाई के बाद से शंघाई गोल्ड एक्सचेंज से जुड़े प्रीशियस मेटल्स ट्रेडिंग प्रोडक्ट्स में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए इंटरमीडियरी सेवाएं बंद कर देगा।

इसका मतलब है कि आम निवेशक बैंक के जरिए गोल्ड और सिल्वर की डायरेक्ट ट्रेडिंग नहीं कर पाएंगे। ग्राहकों को 24 जुलाई से पहले अपनी ओपन पोजीशन बंद करने के लिए कहा गया है। इसी तरह चाइना गुआंगफा बैंक ने भी ग्राहकों को तय समय सीमा के भीतर अपनी पोजीशन बंद करने का निर्देश दिया है, अन्यथा महीने के अंत तक उन्हें जबरन क्लोज किया जाएगा।

निवेश पर पूरी रोक नहीं

बैंकों ने साफ किया है कि पूरी तरह निवेश बंद नहीं किया जा रहा है। ग्राहक अब भी गोल्ड ETF और गोल्ड अक्यूम्युलेशन प्लान जैसे विकल्पों में निवेश कर सकते हैं। केवल हाई-रिस्क ट्रेडिंग और डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स पर रोक लगाई जा रही है।

बैंक क्यों ले रहे हैं यह कदम?

विशेषज्ञों के अनुसार सोने की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण जोखिम बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान तनाव, ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी और वैश्विक महंगाई की चिंताओं ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। इसी वजह से बैंकों ने जोखिम कम करने के लिए यह कदम उठाया है ताकि आम निवेशकों को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे फैसले

यह पहली बार नहीं है जब चीन में इस तरह की सख्ती की गई हो। इससे पहले भी कई चीनी बैंक रिटेल निवेशकों के लिए प्रीशियस मेटल्स ट्रेडिंग पर प्रतिबंध या सीमाएं लगा चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में चीन का फोकस धीरे-धीरे संस्थागत निवेश की ओर बढ़ा है।

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