तेहरान/तेल अवीव, एजेंसी। इजराइल ने शुक्रवार सुबह ईरान के 4 एटमी और 2 सैन्य ठिकानों पर 200 फाइटर जेट से मिसाइलें दागीं। हमले में ईरान के सेना प्रमुख, स्पेशल फोर्स के चीफ, 2 बड़े परमाणु वैज्ञानिक समेत 5 बड़े अफसर मारे गए।
हमले के बाद इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कहा कि ईरान परमाणु बम तैयार करने वाला था, इसलिए उस पर हमला किया गया। इजराइली सेना का दावा है कि ईरान के पास 15 परमाणु बम बनाने लायक यूरेनियम है।
इजराइल ने इसीलिए टारगेट भी 4 बड़े न्यूक्लियर प्लांट्स को किया। वहीं हथियार बनाने की क्षमता रखने वाली एक फैक्ट्री और बड़े मिलिट्री अफसरों के रेसिडेंशियल कॉम्प्लेक्स को भी तबाह कर दिया।
अब उन 6 जगहों के बारे में जानिए जहां हमला हुआ…
1. नतांज- एटॉमिक फैसिलिटी सेंटर
तेहरान से लगभग 250 किलोमीटर दक्षिण में मौजूद इस सेंटर की सैटेलाइट तस्वीरें पहली बार 2002 में सामने आई थीं। कई रिपोर्ट्स में अनुमान लगाया गया है कि इस साइट पर 9 परमाणु बम बनाने जितना यूरेनियम मौजूद है।
हमला क्यों हुआ- यहां एडवांस सेंट्रीफ्यूज लगे हैं। इस मशीन की मदद से यूरेनियम-235 की सफाई होती है जिसका इस्तेमाल हथियार बनाने में किया जाता है। IAEA की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान 60% संवर्धन तक पहुंच चुका है, जो हथियार-ग्रेड यूरेनियम के करीब है। इजराइली पीएम नेतन्याहू ने इसे ‘ईरान का सबसे बड़ा परमाणु खतरा’ बता चुके हैं।
IAEA रिपोर्ट- अंडरग्राउंड साइट को 7.6 मीटर मोटी कॉन्क्रीट की दीवार से ढंका गया था, लेकिन फिर भी हमले में मुख्य ट्रांसफॉर्मर को नुकसान पहुंचा।
हमले के बाद नतांज न्यूक्लियर फैसिलिटी साइट्स की सैटेलाइट इमेज।
2. तेहरान- एटॉमिक एनर्जी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ ईरान
राजधानी में तेहरान न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर (TNRC) है। इसकी स्थापना 1967 में अमेरिका की मदद से हुई थी। TNRC में 600 ग्राम तक प्लूटोनियम उत्पादन करने में सक्षम है, जो परमाणु हथियारों के लिए संवेदनशील माना जाता है।
इसके साथ ही तेहरान ईरान की राजधानी है। यहां पर संसद के अलावा सरकार के सभी अहम ऑफिस है। ईरान के सुप्रीम लीडर का अयातुल्ला खामेनेई भी यही रहते हैं। इसके अलावा तेहरान में कई अहम मिलिट्री ठिकाने और एयरपोर्ट्स हैं।
तेहरान के आसपास इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कई ट्रेनिंग सेंटर और हथियार डिपो हैं।
IRGC कमांडर हुसैन सलामी, सेनाध्यक्ष मोहम्मद बघेरी और सभी परमाण वैज्ञानिकों की मौत तेहरान पर हुए हमले में ही हुई है।
हमला क्यों हुआ- इजराइल ने नेतृत्व पर सीधा हमला कर यह जताया कि वो ईरान के सबसे सुरक्षित केंद्रों तक पहुंच सकता है।
3. इस्फहान-परमाणु टेक्नोलॉजी सेंटर
इस शहर में यूरेनियम कन्वर्जन फैसिलिटी है, जहां कच्चे यूरेनियम को गैस में बदला जाता है।
यहां न्यूक्लियर फैसिलिटी की शुरुआत साल 1999 में हुई।
इस शहर में ईरान का एक बड़ा एयरबेस भी है, यहां पुराने अमेरिकी F-14 टॉमकैट फाइटर जेट रखे गए हैं, जो ईरान ने 1979 की क्रांति से पहले खरीदे थे।
माना जा रहा है कि इस बार के हमले में एयरबेस पर स्थित एक रडार केंद्र को निशाना बनाया गया था।
इस्फहान में हथियार बनाने वाली फैक्ट्रियां भी हैं, जिनमें से एक पर पिछले साल भी इजराइल ने हमला किया था।
इस बार 3 ड्रोन से यहां हमला हुआ। ईरानी अधिकारियों ने कहा कि दो ड्रोन मार गिराए गए और एक ने फैक्ट्री की छत को थोड़ा नुकसान पहुंचाया।
हमला क्यों हुआ- ईरान की वायुसेना और रक्षा सिस्टम को कमजोर करना और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को हथियार मिलने से रोकना।
इस्फहान में यूरेनियम कन्वर्जन फैसिलिटी है। यह जगह तेहरान से 410 किमी दूर है।
4. अराक- हैवी वाटर रिएक्टर
अराक में हैवी वाटर रिएक्टर है। इससे प्लूटोनियम बन सकता है। यह परमाणु हथियार बनाने का एक और तरीका है। जिसे आधिकारिक तौर पर IR-40 रिएक्टर के रूप में जाना जाता है।
यह ईरान के परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा है और इसे मुख्य रूप से अनुसंधान और रेडियो आइसोटोप उत्पादन के लिए डिजाइन किया गया था।
अराक रिएक्टर ईरान के परमाणु कार्यक्रम के सबसे विवादास्पद हिस्सों में से एक रहा है। पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका और इजराइल, ने चिंता जताई थी कि इस रिएक्टर का उपयोग हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम के उत्पादन के लिए हो सकता है।
हमला क्यों हुआ- ईरान के एटमी प्रोग्राम के दूसरे रास्ते को भी रोकना।
अराक में हैवी वाटर रिएक्टर है। यह तेहरान से लगभग 280 किमी दूर है।
5. तबरीज- मिलिट्री बेस और एक बड़ा तेल रिफाइनरी
तबरीज ईरान के अजरबैजान प्रांत की राजधानी है। यहां कोई परमाणु ठिकाना नहीं है। यह तुर्की और आर्मेनिया की सीमा के करीब है। यहां कई मिलिट्री वेयरहाउस, मिसाइल प्रोडक्शन यूनिट और IRGC से जुड़े ठिकाने हैं, जो बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों का उत्पादन करते हैं।
इजराइल ने 2023 में भी यहां पर एक ड्रोन फैक्ट्री पर हमला किया था। तबरीज में तेल रिफाइनरी भी है। यहां हमला करने का मकसद ईरान के तेल क्षमता को कमजोर करना है।
हमला क्यों हुआ- सैन्य और आर्थिक ढांचे को कमजोर करना।
6.करमनशाह- इराक की राजधानी बगदाद के पास
ईरान के मिसाइल बेस और औद्योगिक कॉम्प्लेक्स इराक सीमा के पास हैं। करमनशाह शहर इराक के दियाला प्रांत और सुलेमानिया जैसे क्षेत्रों के पास है। यह इराक की राजधानी बगदाद से बस 150-200 किलोमीटर दूर है।
करमनशाह में कई महत्वपूर्ण सीमा क्रॉसिंग पॉइंट हैं, जैसे खोस्रवी सीमा चौकी, जो ईरान और इराक के बीच व्यापार और तीर्थयात्रा (विशेष रूप से शिया तीर्थयात्रियों के लिए, जो इराक में करबला और नजफ जाते हैं) के लिए उपयोग होती है।
हमला क्यों हुआ- अक्टूबर 2024 के ईरानी मिसाइल हमलों के बाद, करमनशाह से संभावित जवाबी हमलों को रोकना।
यह तेहरान से लगभग 525 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में और इराक की सीमा के करीब है।
नेतन्याहू बोले- ईरान हमारे लिए खतरा इजराइल सेना ने कहा कि यह ‘प्री-एम्पटिव स्ट्राइक’ थी। यानी खतरे को भांपकर इजराइल ने हमला किया, ताकि ईरान कोई बड़ी कार्रवाई न कर सके। इजराइली सेना ने यह भी कहा कि आगे और भी ऐसे कई हमले हो सकते हैं।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान चोरी-छिपे परमाणु हथियार बना रहा था। यह हमारे देश के लिए खतरा था। इसलिए हमारी सेना ने नतांज जैसे अहम परमाणु ठिकानों और ईरान के कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों पर हमला किया।
नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए ये कदम उठा रहा है। ईरान आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और पूरी दुनिया को अस्थिर करना चाहता है। आज का दिन इतिहास में उस दिन के रूप में याद किया जाएगा जब अच्छाई ने बुराई पर और रोशनी ने अंधकार पर जीत की दिशा में कदम बढ़ाया।
ईरान पर इजराइली हमले के बाद की 5 तस्वीरें…
तेहरान में शुक्रवार तड़के इजराइली हमले का निशाना बने एक स्थान से धुआं उठता हुआ दिखाई दिया।
ईरान की राजधानी तेहरान में इजराइली हमलों के बाद लोग एक क्षतिग्रस्त इमारत को देखते हुए।
तेहरान मे इमारत में हुए विस्फोट की जगह पर दमकलकर्मी काम कर रहे हैं।
इजराइली हमलों के बाद तेहरान में दमकलकर्मी साफ-सफाई करते हुए।
इजराइली हमलों के बाद सड़क किनारे बैठा एक घायल शख्स।
IAEA ने ईरान के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था
इससे पहले अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने गुरुवार को ईरान के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया था। एजेंसी ने कहा था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो नियम तय हैं, उनका पालन नहीं कर रहा है।
IAEA के मुताबिक, ईरान के पास इतनी अधिक मात्रा में संवर्धित यूरेनियम है कि वह एक साल से भी कम समय में 10 परमाणु बम बना सकता है। एजेंसी ने आरोप लगाया कि ईरान कई जगहों पर परमाणु गतिविधियों की जानकारी देने से लगातार इनकार कर रहा है और वह जांच में सहयोग नहीं कर रहा।
यह बीते 20 साल में पहली बार हुआ जब संयुक्त राष्ट्र की इस निगरानी संस्था ने ईरान को लेकर इतनी सख्त कार्रवाई की है।
IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) के डायरेक्टर राफाएल मारियानो ग्रोसी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में। तस्वीर 11 जून की है।
IAEA के 35 देशों के बोर्ड में से 19 देशों ने इस ईरान के खिलाफ प्रस्ताव में वोटिंग की। इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी शामिल थे। वहीं रूस और चीन ने इसके खिलाफ वोट दिया और बाकी देशों ने या तो हिस्सा नहीं लिया या वोटिंग से दूर रहे।
ईरान ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की और कहा कि यह पूरी तरह से राजनीतिक है। ईरानी विदेश मंत्रालय और देश की परमाणु एजेंसी ने संयुक्त बयान में कहा कि इस तरह के फैसलों से अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
हालांकि ईरान बार-बार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक इस्तेमाल के लिए है, जैसे बिजली बनाना या दवा तैयार करना, न कि हथियार बनाने के लिए।
ईरान-इजराइल के बीच टकराव बढ़ा
ईरान लंबे समय से इजराइल को खत्म करने की बात करता आया है और उन क्षेत्रीय लड़ाकों का समर्थन करता है जो इजराइल के खिलाफ हैं। दूसरी तरफ इजराइल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। उसका मकसद ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना है।
पिछले कुछ सालों में यह टकराव लगातार बढ़ा है। 2019 में इजराइल ने सीरिया, लेबनान और इराक में उन ठिकानों पर हमले किए जहां से ईरान अपने सहयोगियों को हथियार भेजता था। साल 2020 में इजराइल ने ईरान के एक बड़े परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की हत्या कर थी।
फखरीजादेह अपनी कार में थे। इस दौरान एक रिमोट मशीन गन से लैस एक गाड़ी ने उन पर हमला कर दिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह हथियार सैटेलाइट से कंट्रोल होता था। इसमें AI का इस्तेमाल किया गया था ताकि सटीक निशाना लगाया जा सके।
काठमांडू/नई दिल्ली, एजेंसी। नेपाल में आई बाढ़ के 13 दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान जारी है। रेस्क्यू टीम अलग-अलग 7 हाईड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स की सुरंगों में फंसे कर्मचारियों की तलाश कर रही हैं।
अब तक 13 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है, जबकि 4894 लोग अब भी लापता हैं। इनमें 587 विदेशी नागरिक शामिल हैं। पहाड़ी इलाकों, टूटे रास्तों और भारी मलबे के कारण बचाव अभियान में कई मुश्किलें आ रही हैं।
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन से 1,356 लोगों की मौत हुई है। वहीं तिब्बत में 43 लोगों की मौत हुई है और 519 लापता हैं।
नेपाल रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़ी तस्वीर
चिलिमे सुरंग में बचाव कार्य जारी है। यहां कई लोगों के फंसे होने की आशंका है। तस्वीर सोमवार की है।
चिलिमे टनल में नेपाल की टीम के साथ भारत की रेस्क्यू टीम भी ऑपरेशन में लगी है।
बाढ़ और भूस्खलन के बाद नेपाल के बागमती में मशीनरी से कीचड़ हटाया जा रहा है।
5 हजार लापता लोगों की रेस्क्यू की उम्मीदें कम
नेपाल हादसे को 14 दिन हो गए हैं। अभी भी लगभग 5 हजार लोग लापता हैं। जैसे ही दिन बढ़ रहे हैं, उनके रेस्क्यू की उम्मीदें भी खत्म होती जा रही है।
नेपाल ने दुनिया से जरूरी उपकरण और सामान मांगे
नेपाल सरकार ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में खोज और बचाव अभियान के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जरूरी उपकरण और सामान मांगे हैं।
नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, सरकार ने खास तौर पर ऐसे उपकरण मांगे हैं, जिनकी मदद से बाढ़, भूस्खलन, कीचड़ और बंद या क्षतिग्रस्त सुरंगों जैसी मुश्किल जगहों पर बचाव अभियान चलाया जा सके।
नेपाल में मौत का आंकड़ा 1357 हुआ
नेपाल में मंगलवार दोपहर 1 बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या बढ़कर 1357 हो गई है। इनमें से 102 शवों को परिजनों को सौंपे जा चुके हैं।
चिलिमे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में 6 लोग फंसे
नेपाल के चिलिमे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में 6 लोग फंसे हैं। इन्हें बचाने के लिए भारतीय सेना की 35 सदस्यीय टीम, नेपाल सेना और अन्य रेस्क्यू टीमें अभियान चला रही हैं।
करीब 250 मीटर लंबी टनल में टीम 130 मीटर तक पहुंच चुकी है। प्रोजेक्ट में मौजूद 71 लोग सुरक्षित निकल चुके हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने में अभी 3-4 दिन लग सकते हैं।
नेपाल ने 2 करोड़ डॉलर का मुआवजा मांगा
नेपाल ने बाढ़ से हुए नुकसान के लिए 2 करोड़ डॉलर (लगभग 189 करोड़ रुपए) का मुआवजा मांगा है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने ब्रिटिश अखबार द गार्डियन को दिए इंटरव्यू में कहा कि, जिन देशों के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है, उन्हें अब मदद के लिए आगे आना चाहिए।
नेपाल का कहना है कि वह दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1% से भी कम योगदान करता है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन का असर उस पर काफी ज्यादा पड़ रहा है। यहां तापमान दुनिया के औसत तापमान से करीब 50% ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 साल में नेपाल के पहाड़ों ने करीब एक-तिहाई बर्फ खो दी है।
लापता भारतीयों के परिजनों से DNA सैंपल मांगे गए
तिब्बत-नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद कुछ भारतीय नागरिक अभी भी लापता हैं। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने इन लापता लोगों के परिवारों से DNA सैंपल जमा करने को कहा है, ताकि चीनी अधिकारी बरामद शवों की पहचान कर सकें।
7 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में रेस्क्यू ऑपरेशन जारी
लांगटांग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट – सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी।
चिलिमे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट (22 MW) – नेपाली और भारतीय सेना की टीम करीब 115 मीटर अंदर सुरंग में पहुंची।
अपर त्रिशूली-1 (216 MW) – सुरंग में करीब 400 मीटर अंदर तक तलाशी ली गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।
मेलुंग खोला (5 MW) – करीब 1 किमी के दायरे में ड्रोन से तलाशी ली गई।
त्रिशूली-3A (60 MW) – सुरंग और पावर हाउस में तलाश जारी।
त्रिशूली-3B (37 MW) – ड्रोन और थर्मल कैमरों से ऑफिस और आवासीय परिसर के आसपास तलाशी जारी है।
नई दिल्ली/मॉस्को, एजेंसी। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन BRICS समिट में शामिल होने के लिए भारत आएंगे। 11 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS नेताओं की बैठक से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन की द्विपक्षीय बैठक होगी।
रूस के राष्ट्रपति ऑफिस क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इस मुलाकात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि भारत को रूस अपना रणनीतिक साझेदार मानता है और दोनों देशों के रिश्ते उसके लिए बेहद अहम हैं।
उन्होंने बताया कि भारत और रूस के बीच ज्यादातर भुगतान अब दोनों देशों की अपनी-अपनी करेंसी में हो रहा है। इससे पहले पुतिन 4 दिसंबर 2025 को भारत आए थे।
व्यापार से यूक्रेन युद्ध तक, इन मुद्दों पर होगी बात
मोदी-पुतिन की बैठक में व्यापार, आर्थिक सहयोग और परिवहन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों देश आपसी कारोबार बढ़ाने और अपनी कंपनियों के लिए नए मौके तलाशने पर भी बात कर सकते हैं।
भारतीय कंपनियां रूस के बाजार में विस्तार करना चाहती हैं, जबकि रूस भारत में अपने कारोबार और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने में रुचि रखता है।
बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध और फारस की खाड़ी में जारी तनाव भी चर्चा का हिस्सा हो सकता है। दोनों नेता युद्ध की मौजूदा स्थिति और उसके असर पर बात कर सकते हैं। रूस के मुताबिक, खाड़ी में जारी घटनाओं का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
भारत को Su-57 लड़ाकू विमान बेचना रूस के एजेंडे में शामिल
रूस भारत को अपना Su-57 लड़ाकू विमान बेचने की तैयारी कर रहा है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि भारत को Su-57 की बिक्री का मुद्दा रूस के एजेंडे में शामिल है।
Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है। इसे स्टील्थ तकनीक के साथ बनाया गया है, यानी इसे दुश्मन के रडार पर पकड़ना मुश्किल होता है।
यह हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमला करने वाले आधुनिक हथियारों से लैस हो सकता है। विमान में आधुनिक रडार, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम भी लगाए गए हैं।
पुतिन पिछले साल दिसंबर में भारत आए थे
पुतिन की यह 9 महीने में दूसरी भारत यात्रा है। इससे पहले वे 4 दिसंबर 2025 को आए थे। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा था।
पुतिन के दिल्ली पहुंचने पर पीएम मोदी ने एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया। इसके बाद दोनों नेता एक ही कार से PM आवास पहुंचे, जहां मोदी ने उनके सम्मान में प्राइवेट डिनर रखा था।
मोदी ने पुतिन को रूसी भाषा में लिखी भगवद्गीता भी गिफ्ट की थी। अगले दिन दोनों नेताओं के बीच वार्षिक शिखर बैठक हुई थी, जिसमें रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और आर्थिक सहयोग पर चर्चा हुई थी।
पीएम मोदी राष्ट्रपति पुतिन को रूसी भाषा में लिखी भगवद्गीता गिफ्ट करते हुए।
भारत-रूस की दोस्ती कितनी पुरानी, यूक्रेन युद्ध के बाद कैसे बदले रिश्ते?
रूस और भारत की दोस्ती 55 साल पुरानी
भारत-रूस की दोस्ती की मजबूत नींव सोवियत संघ के दौर में पड़ी। 9 अगस्त 1971 को दोनों देशों ने शांति, मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद रक्षा, उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा। सोवियत संघ ने भारत के इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट में भी मदद की। भिलाई स्टील प्लांट इसका उदाहरण है। भारत ने सोवियत संघ और बाद में रूस से लड़ाकू विमान, टैंक, पनडुब्बियां और मिसाइल सिस्टम खरीदे।
यूक्रेन युद्ध के बाद रिश्ते कैसे बदले?
2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए। इसके बावजूद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। रॉयटर्स के मुताबिक, 2024 में दोनों देशों का व्यापार करीब 70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। जुलाई 2026 में रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 50.83% हिस्सा था। भारत ने उस महीने रूस से करीब 24.7 लाख बैरल तेल रोजाना खरीदा। यानी यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के लिए रूस बड़ा तेल सप्लायर बना।
क्या व्यापार डॉलर से दूर हो रहा है?
पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत और रूस ने रुपए-रूबल में कारोबार बढ़ाया। रूस के मुताबिक, दोनों देशों के व्यापार का करीब 96% हिस्सा अब अपनी करेंसी में हो रहा है। इसमें 22 रूसी और 17 भारतीय बैंक शामिल हैं। हालांकि, 8 सितंबर 2026 को क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस डॉलर को खत्म नहीं करना चाहता, बल्कि भुगतान के दूसरे विकल्प बढ़ाना चाहता है।
चीन और अमेरिका कहां खड़े हैं?
रूस के साथ भारत पुराने रिश्ते बनाए हुए है, लेकिन अमेरिका के साथ भी रणनीतिक और रक्षा संबंध मजबूत कर रहा है। वहीं, रूस के चीन के साथ रिश्ते गहरे हुए हैं, क्यों रूस के लिए भारत और चीन दोनों सबसे बड़े खरीदार हैं।
रॉयटर्स के मुताबिक, दोनों देश मिलकर रूस से करीब 90% समुद्री तेल खरीदते हैं। इसलिए भारत एक साथ तीन बड़े समीकरण संभाल रहा है- रूस के साथ साझेदारी, अमेरिका के साथ सहयोग और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा।
BRICS क्या है?
BRICS 11 प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का एक समूह है। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं।
इसका मकसद इन देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देना है। इसमें शुरुआत में 4 देश थे, जिसे BRIC कहा जाता था। यह नाम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने दिया था।
भारत 2026 में BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है। 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने जा रही है।
14 साल बाद भारत में BRICS समिट
भारत 14 साल बाद BRICS समिट की मेजबानी कर रहा है। इससे पहले 2012 में नई दिल्ली में सम्मेलन हुआ था। इस बार BRICS देशों के नेताओं की बैठक दिल्ली में होगी।
समिट को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा और ट्रैफिक के खास इंतजाम किए गए हैं। नेताओं की आवाजाही के दौरान कई प्रमुख रास्तों पर ट्रैफिक नियंत्रित किया जाएगा।
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने एडवाइजरी जारी कर कई रास्तों पर डायवर्जन और यातायात प्रतिबंध की जानकारी दी है। एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन जाने वालों के लिए वैकल्पिक रास्ते भी बताए गए हैं।
पुलिस ने लोगों से यात्रा से पहले ट्रैफिक अपडेट देखने और जरूरी हो तो अतिरिक्त समय लेकर निकलने की अपील की है।
काठमांडू/नई दिल्ली, एजेंसी। नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ से प्रभावित इलाके में पहली बार इंटरनेशनल मीडिया को जाने की इजाजत दी गई है।
चीन के विदेश मंत्रालय ने रविवार को रॉयटर्स समेत कई विदेशी मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग का दौरा कराया।
यह इलाका 26 अगस्त को पानी, कीचड़ और मलबे की तेज लहर की चपेट में आया था। चीन और नेपाल को मिलाकर इस आपदा में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, जबकि 5,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं।
तिब्बत-नेपाल हादसे से जुड़े फोटोज
तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट पर बाढ़ और मलबे से हुई तबाही की जानकारी देते चीनी अधिकारी।
तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट पर आपदा की जानकारी देते चीनी वैज्ञानिक सु पेंगचेंग, साथ में चीन-नेपाल सीमा का नक्शा।
तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट पर चीनी झंडे के पास मलबे में लोगों की तलाश करते बचावकर्मी।
तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके में मलबे की तलाश करते बचावकर्मी।
चीन-नेपाल सीमा पर बाढ़ में बह गई इमिग्रेशन बिल्डिंग की जगह पर मलबा हटाते बचावकर्मी।
चीन ने पहली बार विदेशी मीडिया को दिखाई तबाही
दौरे के दौरान पत्रकारों ने प्रभावित इलाके में चल रहे बचाव अभियान को देखा। नारंगी रंग की वर्दी पहने बचावकर्मी खुदाई मशीनों, फावड़ों और जमीन के नीचे तलाश करने वाले रडार की मदद से लोगों और शवों को खोज रहे हैं।
आपदा से पहले यहां चीन की पांच मंजिला कस्टम्स बिल्डिंग थी, लेकिन अब उसका कोई निशान नहीं बचा है। करीब 20 मीटर ऊंचा बॉर्डर गेट भी मलबे में दब गया है। वहां सिर्फ पास के पानी के टावर का एक हिस्सा दिखाई दे रहा है।
जहां पहले बॉर्डर गेट था, वहां चीन का झंडा लगाया गया है। आसपास का पूरा इलाका भूरे-काले मलबे से ढका हुआ है। बचावकर्मी चेतावनी वाले बोर्ड के पीछे लगातार खुदाई कर रहे हैं।
तिब्बत-नेपाल सीमा पर बनाए गए ग्यिरोंग पोर्ट पर 26 अगस्त को आई बाढ़ के मलबे में कई लोग दब गए थे।
नेपाल आर्मी बोली- सुरंगों में बड़ी सफलता मिलने तक रेस्क्यू जारी
नेपाल आर्मी ने कहा है कि बाढ़ से खराब हुई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में सर्च और रेस्क्यू का काम तब तक जारी रहेगा, जब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिलती।
मेजर जनरल सुभाष जंग थापा ने सोमवार को कहा कि सुरंगों के अंदर तेजी से तलाशी और बचाव का काम चल रहा है। सरकार के रोकने का फैसला लेने तक जवान अपना काम जारी रखेंगे।
नेपाल आर्मी के अनुमान के मुताबिक, बाढ़ प्रभावित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में करीब 121 लोग फंसे हो सकते हैं।
भारत-नेपाल की टीमें चिलिमे सुरंग में बचाव अभियान जारी रखे हुए हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री ने RSP चीफ से बातचीत की
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के चीफ रवि लामिछाने को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फोन कर भोटेकोशी बाढ़ से हुए जान-माल के नुकसान पर दुख जताया।
रुबियो ने बाढ़ में जान गंवाने वालों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस मुश्किल समय में नेपाली जनता और नेपाल सरकार के साथ खड़ा है।
लामिछाने ने रुबियो को बताया कि भोटेकोशी बाढ़ के बाद राहत, बचाव और लापता लोगों की तलाश के लिए नेपाल सरकार अपने सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर रही है।
चीन का दावा- नेपाल की तरफ ग्लेशियर टूटने से शुरू हुई तबाही
26 अगस्त को नेपाल की तरफ ग्लेशियर टूटने के बाद पानी, मिट्टी और मलबे की तेज लहर चीन की सीमा तक पहुंची। इसने ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग को पूरी तरह तबाह कर दिया।
हादसे के वीडियो में पानी, मिट्टी और मलबे की काली लहर तेजी से बॉर्डर क्रॉसिंग की ओर बढ़ती दिखाई देती है। लोगों को संभलने और सुरक्षित जगह पहुंचने का ज्यादा समय नहीं मिला।
चीन का कहना है कि हादसे की शुरुआत नेपाल की तरफ ग्लेशियर टूटने से हुई थी। इसके बाद चीन ने प्रभावित इलाके में बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान शुरू किया।
शवों की पहचान के लिए फिंगरप्रिंट-टैटू का रिकॉर्ड
मलबे से मिले शवों की पहचान के लिए बचाव दल फिंगरप्रिंट और टैटू जैसे पहचान वाले निशानों का रिकॉर्ड तैयार कर रहा है। मौके से अब तक 993 निजी सामान भी मिले हैं, जिनसे लापता लोगों की पहचान में मदद मिल सकती है।
हालांकि, लापता विदेशी नागरिकों के परिवार और उनके देशों के राजनयिक चीन से ज्यादा जानकारी साझा करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें अपने नागरिकों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिल रही।
रॉयटर्स से बातचीत में चार देशों के प्रतिनिधियों ने कहा कि चीन ने अभी यह साफ नहीं किया है कि बरामद शवों की DNA जांच कैसे होगी। उन्होंने यह भी पूछा कि बॉर्डर की CCTV और चेहरे पहचानने वाली फुटेज से शवों की पहचान की जाएगी या नहीं और क्या यह जानकारी परिवारों को दी जाएगी।
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बाढ़ को लेकर दी गई जानकारी पारदर्शी और समय पर है। मंत्रालय ने दूसरे देशों और एजेंसियों के साथ काम करने की तैयारी भी जताई है।
नेपाल-तिब्बत के बीच कारोबार और कैलाश यात्रा का अहम रास्ता
ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग चीन के तिब्बत और नेपाल के बीच कारोबार और आवाजाही का अहम रास्ता है।
2015 के भूकंप में पूर्व की तरफ मौजूद दूसरे रास्ते को नुकसान पहुंचने के बाद ग्यिरोंग नेपाल और तिब्बत के बीच कारोबार और लोगों की आवाजाही का मुख्य रास्ता बन गया था।
इस रास्ते से चीन से नेपाल की ओर इलेक्ट्रिक वाहनों समेत कई तरह का सामान भेजा जाता था। नेपाल के रास्ते तिब्बत में माउंट कैलाश जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भी यह अहम रास्ता है।
चीन अब इस बॉर्डर क्रॉसिंग को दोबारा बनाने पर विचार कर रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, इसे फिर से बनाया गया तो डिजाइन में बदलाव किया जा सकता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
तबाही से पहले ग्योरोंग पोर्ट दिखने में ऐसा था।
पहले भी ग्लेशियर की बाढ़ से बंद हुआ था बॉर्डर
ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग इससे पहले भी पिछले साल जुलाई से जनवरी तक बंद रहा था। उस समय ग्लेशियर से आई बाढ़ के कारण रास्ता बंद करना पड़ा था।
इस घटना के बाद ग्लेशियर और उनसे बनने वाली झीलों की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ गई है।
जुलाई 2025 में नेपाल-चीन सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट में भूस्खलन के बाद का दृश्य। यह आपदा ग्लेशियर की झील का पानी बाहर निकलने से आई बाढ़ के कारण हुई थी।
चीनी वैज्ञानिकों के मुताबिक, तिब्बत और आसपास के इलाकों में 3,000 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हैं। इनमें से 187 को ज्यादा जोखिम वाली झीलों के तौर पर चिन्हित किया गया है। इनकी निगरानी जमीन पर और दूर से सेंसर की मदद से की जाती है।
चीन के आपातकालीन बचाव मुख्यालय के उप प्रमुख नोरबू त्सेरिंग ने कहा कि ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पर भी जोर दिया।
चीन में 43 की मौत, 519 लोग अब भी लापता
चीनी अधिकारियों के मुताबिक, शनिवार तक चीन की तरफ 43 लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी, जबकि 519 लोग लापता थे। इनमें 23 देशों के 261 विदेशी नागरिक शामिल हैं। लापता लोगों में 49 भारतीय भी हैं।
लापता विदेशी नागरिकों में कई तीर्थयात्री हैं, जो नेपाल के रास्ते तिब्बत में माउंट कैलाश की यात्रा पर गए थे।