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बिज़नस

इस घड़ी के लिए यूरोप से अमेरिका तक बवालः बेकाबू भीड़ पर पुलिस ने छोड़ी आंसू गैस, सब काम छोड़ 5 दिन से लाइनों में लगे लोग

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वाशिंगठन, एजेंसी। दुनिया में कुछ घड़ियां सिर्फ समय देखने का साधन नहीं होतीं, बल्कि उन्हें स्टेटस सिंबल और निवेश का जरिया माना जाता है। ऐसी ही एक लिमिटेड एडिशन घड़ी ने इस समय यूरोप और अमेरिका में जबरदस्त उन्माद पैदा कर दिया है। मशहूर स्विस ब्रांड Swatch और लग्जरी वॉचमेकर Audemars Piguet की साझेदारी में लॉन्च हुई “Royal Pop” घड़ी को खरीदने के लिए लोग कई-कई दिन तक दुकानों के बाहर लाइन में खड़े रहे। हालात इतने बिगड़ गए कि कई जगह पुलिस बुलानी पड़ी, आंसू गैस छोड़नी पड़ी और कुछ शहरों में स्टोर तक बंद करने पड़े।

घड़ी में क्या है खास?
ऑडेमर्स पिगुएट दुनिया के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित लग्जरी वॉच ब्रांड्स में गिना जाता है। इसकी घड़ियां आमतौर पर लाखों से करोड़ों रुपये तक में बिकती हैं। लेकिन “Royal Pop” मॉडल को अपेक्षाकृत कम कीमत यानी करीब 400 से 420 डॉलर (लगभग 40 हजार रुपए) में लॉन्च किया गया। यही वजह रही कि लोगों को लगा कि इस घड़ी को खरीदकर बाद में कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचा जा सकता है। लिमिटेड स्टॉक और हाई रीसेल वैल्यू की उम्मीद ने इस घड़ी को “कलेक्टर आइटम” बना दिया।

ब्रिटेन में बेकाबू हुई भीड़
ब्रिटेन के मैनचेस्टर, कार्डिफ, बर्मिंघम, लिवरपूल और शेफील्ड में दुकानों के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई। कई खरीदार पूरी रात सड़कों पर बैठे रहे, जबकि कुछ लोग पांच-पांच दिन पहले से लाइन में लग गए थे। बर्मिंघम में पुलिस ने भीड़ हटाने के लिए विशेष आदेश लागू किए। कार्डिफ में 25 वर्षीय युवक को गिरफ्तार कर “सेक्शन 35” नोटिस दिया गया।  लंदन के बैटरसी पावर स्टेशन और वेस्टफील्ड शॉपिंग सेंटर में हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि पुलिस को डॉग स्क्वॉड तैनात करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग सुरक्षा बैरिकेड तोड़कर स्टोर के अंदर घुसते दिखाई दिए। मैनचेस्टर के ट्रैफर्ड सेंटर में खरीदारों के बीच झड़प और धक्का-मुक्की की खबरें भी सामने आईं। स्थिति बिगड़ती देख Swatch ने मैनचेस्टर और लिवरपूल के कुछ स्टोर अस्थायी रूप से बंद कर दिए।

पेरिस में छोड़ी गई आंसू गैस
फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी घड़ी को लेकर भारी अफरा-तफरी देखने को मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक स्वॉच स्टोर के बाहर करीब 300 लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। पुलिस को हालात काबू में करने के लिए आंसू गैस छोड़नी पड़ी। इस दौरान दुकान का मेटल शटर और दो सुरक्षा गेट टूट गए। फ्रांस के अलावा इटली के मिलान में भी स्टोर खुलते ही लोगों के बीच झगड़ा शुरू हो गया।

न्यूयॉर्क में ‘कॉन्सर्ट जैसी भीड़’
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित टाइम्स स्क्वायर स्टोर पर भी हजारों लोग उमड़ पड़े। बुधवार से लाइन में लगे एक खरीदार जॉन मैकिन्टॉश ने कहा कि हालात किसी बड़े म्यूजिक कॉन्सर्ट जैसे थे। उन्होंने बताया कि कई लोग लाइन तोड़कर आगे घुस रहे थे और जो सबसे ज्यादा धक्का दे रहा था, वही आगे पहुंच पा रहा था। एक अन्य खरीदार ने दावा किया कि उसने पांच दिन लाइन में लगने के बाद घड़ी खरीदी और तुरंत उसे 4,000 डॉलर में बेच दिया। यानी करीब दस गुना ज्यादा कीमत।

सोशल मीडिया पर भी बवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल लिमिटेड एडिशन लग्जरी आइटम्स का “रीसेल मार्केट” तेजी से बढ़ रहा है। लोग सिर्फ इस्तेमाल के लिए नहीं, बल्कि निवेश और मुनाफे के लिए ऐसे उत्पाद खरीद रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, इन्फ्लुएंसर्स का प्रचार और कम स्टॉक की रणनीति ने इस घड़ी को “वैश्विक क्रेज” में बदल दिया। TikTok, Instagram और X पर इस घड़ी के वीडियो लाखों बार देखे जा चुके हैं। कई वीडियो में लोग स्टोर के बाहर जमीन पर सोते, धक्का-मुक्की करते और पुलिस से बहस करते दिखाई दिए। कुछ यूजर्स ने इसे “घड़ी नहीं, नया क्रिप्टो क्रेज” बताया, जबकि कई लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर एक घड़ी के लिए लोग अपनी सुरक्षा तक क्यों दांव पर लगा रहे हैं।

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देश

FCI ने एथेनॉल कंपनियों को 40% कम कीमत पर बेचा चावल, सरकार ने राज्यसभा में दी जानकारी

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नई दिल्ली, एजेंसी। देश में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) को लेकर जारी बहस के बीच सरकार ने राज्यसभा में खुलासा किया है कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने एथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों को अपनी खरीद लागत से काफी कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराया। सरकार के मुताबिक यह बिक्री ओपन मार्केट सेल स्कीम (डोमेस्टिक) के तहत तय दरों पर की गई और इसे किसी प्रकार की सब्सिडी नहीं माना गया है।

सरकार ने बताया कि जून 2025 से जून 2026 के बीच एथेनॉल कंपनियों को 2,250 से 2,320 रुपए प्रति क्विंटल की दर से चावल बेचा गया। वहीं, इसी अवधि में FCI की औसत खरीद लागत 3,720 से 3,889 रुपए प्रति क्विंटल रही यानी निगम ने अपनी खरीद लागत से करीब 40 प्रतिशत कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराया।

किसे मिला सबसे ज्यादा फायदा?

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री निमूबेन जयंतीभाई बांभनिया ने राज्यसभा में बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान FCI ने एथेनॉल प्लांट्स को 63.5 लाख टन चावल की आपूर्ति की, जिसकी कुल कीमत 14,596.78 करोड़ रुपए रही।

आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 8.44 लाख टन चावल हरियाणा की एथेनॉल इकाइयों को मिला। इसके बाद उत्तर प्रदेश को 8.39 लाख टन, पंजाब और हिमाचल प्रदेश को संयुक्त रूप से 6.59 लाख टन, पश्चिम बंगाल को 5.85 लाख टन और मध्य प्रदेश को 4.32 लाख टन चावल उपलब्ध कराया गया।

सरकार ने बताया कि ओपन मार्केट सेल स्कीम के तहत जून से अक्टूबर 2025 तक चावल की कीमत 2,250 रुपए प्रति क्विंटल तय थी। नवंबर 2025 से इसे बढ़ाकर 2,320 रुपए प्रति क्विंटल किया गया, जबकि नवंबर 2026 से जून 2027 तक यह दर 2,390 रुपए प्रति क्विंटल रहेगी।

एथेनॉल उत्पादकों को प्रत्यक्ष सब्सिडी नहीं 

मंत्री ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल उत्पादकों को किसी प्रकार की प्रत्यक्ष सब्सिडी नहीं दी जा रही है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब चावल की बिक्री उसकी आर्थिक लागत से कम कीमत पर की जाती है, तो इसे अप्रत्यक्ष सब्सिडी के रूप में देखा जा सकता है।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि 2026-27 के एथेनॉल सप्लाई वर्ष में FCI के भंडार से लगभग 72 लाख टन चावल बेचने की योजना है। इसकी अनुमानित बिक्री कीमत 23,900 रुपए प्रति टन होगी, जबकि आर्थिक लागत करीब 43,100 रुपए प्रति टन बताई गई है। ऐसे में लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर खाद्य सब्सिडी के बोझ को प्रभावित कर सकता है।

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देश

बाजार में जल्द ही नजर आएंगे रू.10 और रू.20 के प्लास्टिक नोट, जानें- कागज़ी नोटों का क्या होगा?

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मुंबई, एजेंसी। भारतीय बाजार में जल्द ही आप प्लास्टिक यानि पॉलीमर करेंसी नोट इस्तेमाल कर सकते हैं। हाल ही में सरकार ने सोमवार को संसद को बताया कि उसने रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) को फ़ील्ड ट्रायल के लिए 2 अरब पॉलीमर बैंकनोट का शुरुआती बैच छापने की मंज़ूरी दे दी है। RBI ने हाल ही में पॉलीमर बैंकनोट के लिए मटीरियल खरीदने के लिए टेंडर जारी किया है, जिससे लगभग दो दशकों से विचाराधीन प्रस्ताव को फिर से शुरू किया गया है।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा को बताया कि RBI 10 रुपये के एक अरब नोट और 20 रुपये के एक अरब नोट छापेगा। इन मूल्यवर्ग के नोटों की अक्सर कमी रहती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कागज़ी मुद्रा को पूरी तरह से पॉलीमर बैंकनोट से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है, और दोनों तरह की मुद्राएँ एक साथ चलन में रहेंगी। अगर इसे लागू किया जाता है, तो यह भारत में पॉलीमर बैंकनोट का पहला इस्तेमाल होगा, जहाँ लगभग एक सदी से विशेष कागज़ पर मुद्रा छापी जा रही है।

RBI के प्लास्टिक नोट: क्यों है ज़रूरी?
पॉलीमर नोट, जो कागज़ के बजाय टिकाऊ प्लास्टिक फ़िल्म का उपयोग करके बनाए जाते हैं, आम तौर पर ज़्यादा समय तक चलते हैं और उन्हें कम बार बदलने की ज़रूरत होती है क्योंकि वे टूट-फूट के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं। पॉलीमर बैंकनोट भारतीय मुद्रा के लिए वर्तमान में उपयोग किए जाने वाले विशेष कागज़ के बजाय एक गैर-रेशेदार, गैर-छिद्रपूर्ण प्लास्टिक सब्सट्रेट पर छापे जाते हैं।

नए नोटों का इस्तेमाल पहले फ़ील्ड ट्रायल के लिए किया जाएगा, उसके बाद ही उन्हें नियमित चलन में लाया जाएगा। इस योजना को देश के मुद्रा छपाई बुनियादी ढाँचे के विस्तार के साथ मंज़ूरी दी गई थी, जो क्षमता की सीमाओं का सामना कर रहा था। चौधरी ने संसद को बताया, “RBI ने सूचित किया है कि अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, पॉलीमर बैंकनोट का जीवनकाल कागज़ी बैंकनोट की तुलना में काफी अधिक है। पॉलीमर बैंकनोट की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।”

अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इसे लागू करने में कई महीने लग सकते हैं, क्योंकि सरकार और RBI दोनों यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सुरक्षा मानकों को पूरी तरह से पूरा किया जाए और उपयोग किए जाने वाले मटीरियल का चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को की जाने वाली आपूर्ति से कोई संबंध न हो।

यह पहल ऐसे समय में की गई है जब RBI का करेंसी छापने का खर्च कम हो गया है। सेंट्रल बैंक की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में नोट छापने का खर्च पिछले साल की तुलना में लगभग एक-चौथाई घटकर 4,875 करोड़ रुपये रह गया, जिसका मुख्य कारण कम नोटों की छपाई थी।

प्रिंटिंग की लागत में यह कमी तब आई है जब मार्च 2026 के आखिर में चलन में मौजूद करेंसी की कुल वैल्यू 12% बढ़कर 41.23 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो एक साल पहले 36.86 लाख करोड़ रुपये थी। इससे पता चलता है कि कैश की मांग लगातार बनी हुई है।

ये देश करते है प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल 
दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद, भारत अभी भी पॉलीमर करेंसी लाने पर विचार कर रहा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया ने लगभग तीन दशक पहले ही प्लास्टिक के नोटों की पूरी सीरीज़ जारी कर दी थी। आज, लगभग 60 देश किसी न किसी रूप में पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल करते हैं। सरकार का हालिया फ़ैसला 2012 में घोषित एक प्रस्ताव को फिर से शुरू करता है। 13 दिसंबर, 2012 को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की एक विज्ञप्ति में कहा गया था कि RBI ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर कई विकल्पों पर विचार किया था, जिसमें नोट छापने के लिए पॉलीमर सब्सट्रेट का इस्तेमाल भी शामिल था। उस समय, पांच शहरों में पायलट आधार पर 10 रुपये के एक अरब पॉलीमर नोट लाने का फ़ैसला किया गया था।

ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा समेत कई देशों ने मज़बूत प्लास्टिक फ़िल्म से बने पॉलीमर नोट अपना लिए हैं। आम कागज़ी नोटों की तुलना में, पॉलीमर करेंसी ज़्यादा समय तक चलती है, टूट-फूट को बेहतर ढंग से झेलती है और समय के साथ बदलने की लागत को कम करने में मदद करती है। ऑस्ट्रेलिया 1988 में पॉलीमर नोट लाने वाला पहला देश बना। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, UK, कनाडा और न्यूज़ीलैंड ने पॉलीमर नोट अपनाए हैं। एशिया में, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देश भी पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल करते हैं, हालांकि ज़रूरी नहीं कि सभी मूल्यवर्ग (डिनोमिनेशन) के लिए ऐसा हो। बैंक ऑफ़ कनाडा ने कागज़ी और प्लास्टिक नोटों के उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के बाद 2011 में पॉलीमर करेंसी की ओर बढ़ना शुरू किया।

RBI के टेंडर नियम
भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने योग्य निर्माताओं से 18 अगस्त तक बोलियां जमा करने को कहा है। इस टेंडर का मकसद ऐसे सप्लायर की पहचान करना है जो नोटों के लिए ज़रूरी सुरक्षा सुविधाओं वाली ओपेसिफ़ाइड पॉलीमर सब्सट्रेट शीट बना सकें।

टेंडर में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सख़्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं। संभावित सप्लायर्स को सरकार से सिक्योरिटी क्लीयरेंस लेना होगा, चीन या पाकिस्तान में चल रहे अपने किसी भी काम को भारत के कॉन्ट्रैक्ट से अलग रखना होगा, यह पक्का करना होगा कि भारत के लिए पॉलीमर बैंकनोट सब्सट्रेट बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल इन देशों से न आए, और यह वादा करना होगा कि भारत के लिए खास तौर पर बनाया गया सब्सट्रेट किसी तीसरे देश को सप्लाई नहीं किया जाएगा। इसके लिए योग्य होने के लिए, बोली लगाने वालों ने पिछले कम से कम तीन सालों में सेंट्रल बैंकों या बैंकनोट छापने वाली संस्थाओं को सिक्योरिटी फीचर्स वाले पॉलीमर बैंकनोट सब्सट्रेट की सप्लाई की हो।

सप्लायर्स को यह भी साबित करना होगा कि वे कम से कम 20,400 रीम सप्लाई कर सकते हैं, जो अनुमानित ज़रूरत का 30% है। BRBNMPL ने शुरुआती ज़रूरत 68,000 रीम बताई है, जो दो अलग-अलग मूल्यवर्ग (डिनॉमिनेशन) के लिए लगभग 34,000 रीम है। लेकिन, उन्होंने साफ़ किया कि यह ज़रूरत सिर्फ़ पहले चरण के लिए है, और सफल फ़ील्ड ट्रायल के बाद बड़े ऑर्डर मिलने की संभावना है।

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देश

मिनिमम बैलेंस के नाम पर बैंकों ने वसूले 7000 करोड़ से ज्यादा, HDFC और Axis सबसे आगे

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मुंबई, एजेंसी। सरकारी और प्राइवेट बैंकों ने अपने ग्राहकों से मिनिमम बैलेंस के नाम पर 7,086.63 करोड़ रुपए पेनल्टी के तौर पर वसूल डाले। सरकार ने संसद में दी जानकारी में बताया कि वित्तवर्ष 2025-26 में प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने मिनिमम बैलेंस मेंटेन न होने की वजह से ग्राहकों से 4,948.71 करोड़ रुपए वसूले। यह चार्ज सेविंग और करेंट अकाउंट में पर्याप्त बैलेंस नहीं होने की वजह से लगाया गया है। सरकारी बैंकों ने भी इस दौरान जमकर वसूली की है और अपने ग्राहकों से 2,137.92 करोड़ रुपए वसूले।

चार्ज वसूलने में कौन सा बैंक आगे

राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने आरबाआई के आंकड़ों का हवाल देते हुए कहा कि मिनिमम बैलेंस के नाम पर सबसे ज्यादा वसूली एचडीएफसी बैंक ने की है। एचडीएफसी बैंक ने पिछले वित्तवर्ष (2025-26) में ग्राहकों से कुल 1,798.14 करोड़ रुपए वसूले। दूसरे नंबर एक्सिस बैंक है, जिसने 1,081.33 करोड़ की वसूली की है। इससे पता चलता है कि प्राइवेट सेक्टर के 19 बैंकों ने जो राशि मिनिमम बैलेंस के तहत वसूली है, उसका 58 फीसदी यानी 2,879.47 करोड़ रुपए सिर्फ इन दोनों बैंकों ने वसूल लिए हैं। जनधन खातों से मिनिमम बैलेंस के नाम पर कोई वसूली नहीं गई है।

इसके अलावा ICICI बैंक ने 353.30 करोड़ रुपए, कोटक महिंद्रा बैंक ने 290.65 करोड़ रुपए, Yes बैंक ने रु.195.05 करोड़, IDBI बैंक ने 175.15 करोड़ रुपए की पेनाल्टी वसूली।

सरकारी बैंकों में SBI सबसे ऊपर 

सभी 12 सरकारी बैंकों ने मिलकर कुल 2,137.92 करोड़ रुपए वसूले। इनमें सबसे ज्यादा रकम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने 477.27 करोड़ रुपए। हालांकि सरकार ने साफ किया कि यह राशि करंट अकाउंट्स से संबंधित है, क्योंकि मार्च 2020 से SBI ने सेविंग अकाउंट पर मिनिमम बैलेंस नहीं रखने की पेनाल्टी खत्म कर दी है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने 394.1 करोड़ रुपए और इंडियन बैंक (Indian Bank) ने रु.299.17 करोड़ की पेनाल्टी वसूली। 

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