छत्तीसगढ़
नार्को-पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए सहमति जरूरी:याचिकाकर्ताओं को 18 दिनों तक थाने बुलाकर प्रताड़ित किया, हाईकोर्ट बोला-किसी को भी मजबूर करना गलत, पुलिस को हिदायत
बिलासपुर, एजेंसी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसे नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ या अन्य वैज्ञानिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

रायगढ़ जिले के एक हत्या के मामले में पुलिस प्रताड़ना की शिकायत पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए उनके नार्को, पॉलीग्राफ, ब्रेन मैपिंग और अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों पर रोक लगा दी।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने पुलिस को इस तरह सख्ती नहीं बरतने की हिदायत दी है।

जानिए क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने हत्या और सबूत मिटाने के आरोप में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) और 238(A) के तहत मामला दर्ज किया था।
जांच के दौरान पुलिस ने संदेह के आधार पर ग्राम बेहरापाली निवासी किसान लक्ष्मीनारायण पटेल और ग्राम महापल्ली निवासी अर्धना भगत को पूछताछ के लिए थाने बुलाया। दोनों का आरोप है कि पुलिस उन्हें लगातार कई दिनों तक थाने बुलाकर प्रताड़ित करती रही। इससे परेशान होकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
18 दिनों तक लगातार थाने बुलाने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि उनका नाम FIR में नहीं है और न ही उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत है। 16 जून 2026 की जांच रिपोर्ट में भी उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक तथ्य सामने नहीं आया।
इसके बावजूद पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत कोई विधिवत नोटिस जारी किए बिना उन्हें 18 दिनों तक लगातार थाने बुलाया, लंबे समय तक हिरासत में रखा और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस ने दबाव डालकर सुपुर्दनामा पर दस्तखत कराए और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए उनका मोबाइल भी जब्त कर लिया।

ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट के लिए भी दबाव
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने बिना न्यायिक अनुमति और उनकी सहमति के ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट कराने के लिए 20 जून को नोटिस जारी किया। नोटिस में उन्हें 22 और 23 जून 2026 को रायपुर में पेश होने के लिए कहा गया।
हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक जांच पर लगाई रोक
मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी याचिकाकर्ताओं को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ परीक्षा, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट या किसी अन्य समान वैज्ञानिक जांच तकनीक से गुजरने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे किसी परीक्षण की आवश्यकता हो, तो वह केवल संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र, स्पष्ट और पूरी जानकारी के साथ दी गई सहमति के आधार पर ही कराया जा सकता है।
कोरबा
सीएसईबी चौक पर भारी वाहन की टक्कर:कोरबा में एक्टिवा सवार की मौत, वाहन छोड़कर भागा ड्राइवर, ट्रैफिक व्यवस्था पर उठे सवाल
कोरबा। कोरबा जिले में सड़क हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। शुक्रवार (3 जुलाई) को सीएसईबी चौकी के सामने एक तेज रफ्तार भारी वाहन ने एक्टिवा सवार को टक्कर मार दी। हादसे में युवक की मौके पर ही मौत हो गई। दुर्घटना के बाद चालक वाहन छोड़कर फरार हो गया।

घटना सीएसईबी चौक पर हुई, जहां आमतौर पर ट्रैफिक सिग्नल और पुलिसकर्मी तैनात रहते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, तेज रफ्तार भारी वाहन ने अचानक एक्टिवा को अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी जोरदार थी कि एक्टिवा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।

मृतक की हुई पहचान
मृतक की पहचान खरमोर निवासी व्यास राम के रूप में हुई है। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। क्षतिग्रस्त एक्टिवा को भी मौके से हटाया गया। पुलिस ने मृतक के आधार कार्ड के जरिए परिजनों को घटना की सूचना दी।

ट्रैफिक व्यवस्था पर उठे सवाल
घटना के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि लक्ष्मण श्रीवास ने ट्रैफिक व्यवस्था पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि सीएसईबी चौक शहर के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक है, जहां हमेशा पुलिस और ट्रैफिक सिग्नल मौजूद रहते हैं। इसके बावजूद भारी वाहन का शहर के भीतर प्रवेश कर हादसा करना गंभीर लापरवाही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि शहर में ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। सोनालिया चौक, पवन टॉकीज और शारदा विहार फाटक जैसे इलाकों में भी भारी वाहनों और रेत से भरे ट्रैक्टरों की आवाजाही से लगातार हादसे हो रहे हैं।

सख्त कार्रवाई की मांग
लक्ष्मण श्रीवास ने प्रशासन से सवाल किया कि नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों और मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही। उन्होंने शहर में भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही पर रोक लगाने और जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
कोरबा
कोरबा में नशेड़ी ट्रेलर चालकों का तांडव:एक रात में 3 हादसे, बीच सड़क ट्रेलर छोड़कर भागा, मकान में गाड़ी और नाले में पलटा ट्रेलर
कोरबा। कोरबा जिले में गुरुवार देर रात नशे में धुत ट्रेलर चालकों ने एक के बाद एक तीन हादसे कर दिए। अलग-अलग जगह हुई इन घटनाओं में कई लोगों की जान बाल-बाल बच गई। गुस्साए लोगों ने कुछ चालकों की पिटाई कर उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया।

ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक, इस साल जनवरी से अब तक शराब पीकर वाहन चलाने के 1014 मामलों में 1 करोड़ 10 लाख 40 हजार रुपये से ज्यादा का जुर्माना वसूला जा चुका है।

बीच सड़क ट्रेलर छोड़कर भागा चालक
पहली घटना मानिकपुर चौकी क्षेत्र के शारदा विहार पेट्रोल पंप के पास हुई। यहां नशे में धुत ट्रेलर चालक वाहन को बीच सड़क पर खड़ा कर चाबी लगी हालत में छोड़कर चला गया। इससे सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लग गई और घंटों जाम लगा रहा।
नाराज लोगों ने चालक को पकड़कर उसकी पिटाई की और पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची मानिकपुर पुलिस ने ट्रेलर हटवाकर यातायात बहाल कराया।

कोयला लदी ट्रेलर मकान में घुसी
दूसरी घटना रामनगर बाईपास मार्ग पर हुई। शराब के नशे में चालक और हेल्पर तेज रफ्तार कोयला लदी ट्रेलर पर नियंत्रण खो बैठे। ट्रेलर सड़क किनारे बने एक मकान में जा घुसी और आंगन में लगे पेड़ से टकराकर रुकी। राहत की बात यह रही कि हादसे के समय घर में मौजूद लोग सुरक्षित बच गए।
20 फीट गहरे नाले में गिरी ट्रेलर
तीसरी घटना कोतवाली थाना क्षेत्र के मानिकपुर बाईपास मार्ग पर हुई। यहां एक तेज रफ्तार ट्रेलर अनियंत्रित होकर करीब 20 फीट गहरे नाले में जा गिरी। हादसे में चालक को मामूली चोटें आईं। पुलिस का कहना है कि नाले की गहराई को देखते हुए यह बड़ा हादसा हो सकता था।

1014 मामलों में 1.10 करोड़ से ज्यादा जुर्माना
ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। जनवरी से अब तक ऐसे 1014 मामलों में कार्रवाई करते हुए 1 करोड़ 10 लाख 40 हजार रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया है।
अधिकारियों का कहना है कि नशे में वाहन चलाना सड़क हादसों की बड़ी वजह बना हुआ है, इसलिए आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट बोला- जनहित में है शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण:शासन के आदेश पर मुहर, छत्तीसगढ़ विद्यालयीन कर्मचारी संघ समेत 24 से ज्यादा शिक्षकों की याचिकाएं खारिज
बिलासपुर, एजेंसी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस बीडी गुरु ने प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण (रैशनलाइजेशन) की नीति को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का यह फैसला जनहित में लिया गया है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ विद्यालयीन शिक्षक कर्मचारी संघ समेत प्रदेशभर के शिक्षकों की ओर से दायर 24 से ज्यादा याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्कूलों में शिक्षकों के असमान वितरण को दूर करने के लिए सरकार का यह कदम बड़े जनहित में है। ट्रांसफर और पोस्टिंग पूरी तरह सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा हैं। किसी भी सरकारी कर्मचारी को एक ही स्थान पर बने रहने का कोई संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है।

युक्तियुक्तकरण नीति को दी गई थी चुनौती
राज्य सरकार ने 2 अगस्त 2024 को स्कूलों और शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद अप्रैल 2025 में इसके क्रियान्वयन के आदेश जारी किए गए। इस नीति के तहत अतिशेष (सरप्लस) शिक्षकों को शिक्षकविहीन और एकल-शिक्षकीय स्कूलों में पदस्थ करने का प्रावधान किया गया।
इस नीति के खिलाफ दुर्ग, कोंडागांव, कांकेर, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, रायपुर, कोरबा, बिलासपुर और महासमुंद समेत कई जिलों के शिक्षकों और शिक्षक संगठनों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं।
नियमों की अनदेखी का लगाया आरोप
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह नीति शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा-25 के खिलाफ है, जिसमें स्कूलवार छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने का प्रावधान है। उनका आरोप था कि अतिशेष शिक्षकों की पहचान करते समय वरिष्ठता की अनदेखी की गई और ‘लास्ट इन, फर्स्ट आउट’ नियम को यांत्रिक तरीके से लागू किया गया।
राज्यपाल के नाम से आदेश जारी नहीं होने का भी उठाया मुद्दा
शिक्षकों की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद-166 के तहत राज्यपाल के नाम से विधिवत जारी नहीं किया गया, इसलिए इसे वैध नीति नहीं माना जा सकता।
सरकार ने रखा अपना पक्ष
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि युक्तियुक्तकरण का प्रस्ताव 9 जुलाई 2024 को मंत्रिपरिषद की बैठक में मंजूर किया गया था। इसके बाद 16 जुलाई 2024 को राज्यपाल के नाम से विभागीय आदेश जारी किया गया।
सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता कोई ऐसा स्कूलवार आंकड़ा प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि छात्र-शिक्षक अनुपात का उल्लंघन हुआ है।
हाईकोर्ट ने कहा- आदेश पूरी तरह वैध
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार का 16 जुलाई 2024 का आदेश कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्यपाल के नाम से जारी किया गया था। इसलिए अदालत ने अनुच्छेद 166 के उल्लंघन की दलील को खारिज कर दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ऐसे कोई ठोस आंकड़े या डेटा पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि इस नीति से किसी स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात प्रभावित हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई सरकारी नीति पूरी तरह अवैध, मनमानी या दुर्भावनापूर्ण न हो, तब तक उसमें न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
16 हजार से ज्यादा शिक्षकों और प्राचार्यों का हुआ युक्तियुक्तकरण
प्रदेश के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। कई स्कूल ऐसे हैं जहां या तो कोई शिक्षक नहीं है या केवल एक ही शिक्षक के भरोसे पढ़ाई चल रही है। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वहीं, शहरी क्षेत्रों के कई स्कूलों में जरूरत से अधिक शिक्षक पदस्थ हैं।
इसी असमानता को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने अतिशेष शिक्षकों को शिक्षकविहीन और एकल-शिक्षकीय स्कूलों में पदस्थ करने का फैसला लिया था। हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य का संवैधानिक दायित्व है और इस उद्देश्य से उठाए गए उचित कदमों में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
बता दें कि युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के तहत प्रदेश में 16,165 शिक्षकों और प्राचार्यों का स्थानांतरण किया गया है। इसके अंतर्गत राज्य की कुल 10,463 शालाओं का युक्तियुक्तकरण किया गया, जिनमें 10,297 ऐसे स्कूल शामिल हैं जो एक ही परिसर में संचालित हो रहे हैं।
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