ट्रम्प दुनिया की बड़ी ऑयल कंपनियों के अफसरों से मिले, रिलायंस भी तेल खरीद सकती है
वॉशिंगटन डीसी,एजेंसी। अमेरिका, भारत को वेनेजुएला से तेल खरीदने की इजाजत दे सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प प्रशासन के एक सीनियर अधिकारी ने इसकी जानकारी दी है।
अधिकारी के मुताबिक यह सब अमेरिका की निगरानी और शर्तों के साथ होगा। हालांकि इससे जुड़ी शर्तें क्या हैं, इसकी जानकारी अभी नहीं मिल पाई है।
इसका मतलब यह है कि अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से जो व्यापार रुका हुआ था, वह अब फिर से शुरू हो सकता है।
वहीं, रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस भी चाहती है कि अमेरिका उसे वेनेजुएला का तेल खरीदने की इजाजत दे दे।
दूसरी ओर ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट में दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। यहां उन्होंने वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में करीब 9 लाख करोड़ रुपए के निवेश की बात कही।
अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने तेल खरीदना बंद किया था
वेनेजुएला पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) का सदस्य है। उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन वह वैश्विक सप्लाई का सिर्फ करीब 1% ही देता है।
अमेरिका ने 2019 में वेनेजुएला पर बहुत कड़े आर्थिक प्रतिबंध (सेंक्शंस) लगा दिए थे, अमेरिका ने सेकेंडरी सेंक्शंस भी लगा दिए, यानी जो भी देश या कंपनी वेनेजुएला से तेल खरीदती है, उसे अमेरिकी बाजार में व्यापार करने या बैंकिंग सुविधाओं से रोक दिया जा सकता था।
इस वजह से कई देशों ने वेनेजुएला का तेल खरीदना बंद कर दिया। भारत भी वेनेजुएला से बहुत ज्यादा तेल खरीदता था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि तब भारत अपने कुल तेल आयात का लगभग 6% वेनेजुएला से लेता था।
अगर भारत को फिर से वेनेजुएला का तेल खरीदने की अनुमति मिल जाती है, तो उसे अलग-अलग देशों से तेल मंगाने का एक और विकल्प मिलेगा। इससे भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।
ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट में दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता
अमेरिका ने कुछ समय के लिए (2023-2024 में) वेनेजुएला पर आंशिक रूप से सेंक्शंस ढीले किए, जिससे भारत ने फिर से वेनेजुएला से तेल खरीदा।
2024 में भारत का आयात औसतन 63,000 से 1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इसके बाद 2025 में वेनेजुएला से भारत का तेल आयात बढ़कर करीब 1.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
लेकिन मई 2025 में अमेरिका ने एक बार फिर से वेनेजुएला के तेल पर सख्ती बढ़ा दी। इसके बाद 2026 की शुरुआत में वेनेजुएला से भारत का क्रूड आयात सिर्फ 0.3% रह गया।
वेनेजुएला से तेल खरीदने की कोशिश में रिलायंस
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने वेनेजुएला से फिर से कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिका से मंजूरी लेने की कोशिश शुरू कर दी है। इस मामले से जुड़े दो सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि पश्चिमी देश भारत पर रूस से तेल आयात कम करने का दबाव बना रहे हैं और रिलायंस अपने लिए वैकल्पिक तेल सप्लाई सुरक्षित करना चाहती है।
सूत्रों के मुताबिक, रिलायंस के प्रतिनिधि इस मंजूरी के लिए अमेरिका के यूएस स्टेट डिपार्टमेंट और यूएस ट्रेजरी डिपार्टमेंट से बातचीत कर रहे हैं। इस पूरे मामले पर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रॉयटर्स की ओर से भेजे गए ईमेल का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।
गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज का रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स।
पिछले साल रोजाना 63,000 बैरल तेल खरीदती थी रिलायंस
रिलायंस ने पहले भी अमेरिका से लाइसेंस लेकर वेनेजुएला से तेल खरीदा था। कंपनी के पास दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स है। यह गुजरात में स्थित है और इसकी कुल क्षमता लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन है।
2025 के पहले चार महीनों में वेनेजुएला की कंपनी PDVSA ने रिलायंस को चार जहाजों से तेल भेजा था, जो रोजाना करीब 63,000 बैरल के बराबर था।
लेकिन मार्च-अप्रैल 2025 में अमेरिका ने ज्यादातर लाइसेंस सस्पेंड कर दिए और वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ की धमकी दी, जिसके बाद मई 2025 में रिलायंस का आखिरी वेनेजुएलन तेल का जहाज भारत पहुंचा था।
रिलायंस ने गुरुवार को कहा था कि अगर अमेरिकी नियमों के तहत गैर-अमेरिकी खरीदारों को वेनेजुएला से तेल बेचने की इजाजत मिलती है, तो वह दोबारा खरीद पर विचार करेगी।
अमेरिका तय करेगा कौन सी कंपनियां वेनेजुएला जाएंगी
ट्रम्प ने एक्सॉन मोबिल, कोनोकोफिलिप्स, शेवरॉन जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक की। उन्होंने कहा कि अमेरिका तय करेगा कि कौन सी कंपनियां वेनेजुएला में जाएंगी और निवेश करेंगी।
शेवरॉन के वाइस चेयरमैन मार्क नेल्सन ने कहा कि उनकी कंपनी वेनेजुएला में निवेश के लिए प्रतिबद्ध है और वह अभी भी वहां काम कर रही है। कई छोटी कंपनियां और निवेशक भी बैठक में शामिल हुए, जिन्होंने ट्रम्प की नीतियों की सराहना की और निवेश की इच्छा जताई।
ट्रम्प बोले- तेल मुनाफे को वेनेजुएला, अमेरिका और कंपनियों के बीच बांटा जाएगा
ट्रम्प ने कहा, ‘कंपनियों को निवेश करना होगा और उनका पैसा जल्दी वापस भी मिलना चाहिए, फिर लाभ को वेनेजुएला, अमेरिका और कंपनियों के बीच बांटा जाएगा। मुझे लगता है यह आसान है। मुझे लगता है इसका फॉर्मूला मेरे पास है।’ इस योजना पर अभी बातचीत जारी है।
वहीं, एक्सॉन मोबिल के CEO डैरेन वुड्स ने बैठक में कहा कि फिलहाल वेनेजुएला “निवेश के लायक नहीं” है क्योंकि कंपनी के वहां के एसेट दो बार जब्त किए गए थे। उन्होंने कहा कि ट्रम्प प्रशासन और वेनेजुएला सरकार के साथ मिलकर बड़े बदलाव लाने से कंपनी वापस आ सकती है।
ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट में दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों के अधिकारियों को वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में करीब 9 लाख करोड़ रुपए के निवेश करने को कहा।
अमेरिका को 3 से 5 करोड़ बैरल तेल देगा वेनेजुएला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में कहा था कि वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति अमेरिका को 3 से 5 करोड़ बैरल तेल सौंपेगी। ट्रम्प ने बताया कि यह तेल बाजार भाव पर बेचा जाएगा। इससे मिलने वाली रकम पर ट्रम्प का कंट्रोल रहेगा।
5 करोड़ बैरल कच्चे तेल की कीमत वर्तमान में करीब 25 हजार करोड़ रुपए है। अमेरिकी राष्ट्रपति के मुताबिक इसका इस्तेमाल वेनेजुएला और अमेरिका के लोगों के हित में किया जाएगा।
ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि उन्होंने ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को इस योजना को तुरंत लागू करने के निर्देश दिए हैं। तेल को स्टोरेज जहाजों के जरिए सीधे अमेरिका के बंदरगाहों तक लाया जाएगा।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे।
इसके बदले में अमेरिका यमन में हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य मदद नहीं करेगा।
अमेरिकी अधिकारियों और हूती नेताओं के बीच यह बातचीत पिछले हफ्ते ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को पुष्टि की कि अमेरिका हूतियों के सीधे संपर्क में है।
सऊदी के जहाजों को अब भी निशाना बनाएंगे हूती
हूतियों ने कहा है कि लाल सागर में सऊदी के जहाजों और सऊदी का तेल ले जाने वाले जहाजों को वे अब भी टारगेट करेंगे।
हूतियों की दलील है कि यमन पर सऊदी अरब की नाकेबंदी और सैन्य कार्रवाई के चलते उसके जहाजों को निशाना बनाना उनका अधिकार है। मामले से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, 2025 में अमेरिका और हूतियों के बीच हुआ सीजफायर कायम है।
हूतियों से सऊदी को अकेले लड़ना पड़ सकता है
पिछले हफ्ते हूतियों ने यमन के पश्चिमी हिस्से में लाल सागर के किनारे का बड़ा इलाका अपने कब्जे में ले लिया।
सऊदी अरब को उम्मीद थी कि अमेरिका उसके साथ खड़ा होगा। लेकिन अमेरिका ने अब तक हूतियों के खिलाफ सऊदी के समर्थन में कोई सीधी सैन्य कार्रवाई नहीं की है।
अमेरिका ने जरूर कहा है कि हूतियों की गतिविधियां बाब अल-मंदब स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही के लिए खतरा हैं।
अमेरिका पहले से ईरान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है। ईरान हूतियों का समर्थन करता है। ऐसे में अगर अमेरिका यमन में सीधे उतरता है तो उस पर एक और सैन्य मोर्चे का दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी का आरोप- हूतियों ने मक्का पर ड्रोन से हमला किया
सऊदी अरब ने आरोप लगाया है कि हूतियों ने मक्का की तरफ ड्रोन भेजकर हमला करने की कोशिश की। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह उसके लिए ‘रेड लाइन’ है। सऊदी डिफेंस फोर्सेस ने ड्रोन नष्ट करने का दावा किया है।
सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्किये अल-मलिकी के मुताबिक, ड्रोन को स्थानीय समयानुसार मंगलवार शाम करीब 6:50 बजे मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के पास रोका गया।
यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और 57 देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने भी कथित हमले की निंदा की है।
जेद्दा पर हूती हमले के बाद मिसाइलों को मार गिराने की कोशिश करती सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है।
हूतियों ने सऊदी के आरोप को ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताया
हूतियों ने मक्का पर ड्रोन हमले के आरोप को खारिज किया है। हूती लीडरशिप ने इसे ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताया और कहा कि सऊदी अरब पहले भी ऐसे दावे करता रहा है।
हूती उप विदेश मंत्री अब्दुल वहीद अबू रास ने पलटवार करते हुए सऊदी अरब पर ही मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों की गरिमा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।
हूतियों ने सऊदी F-15 गिराने का भी दावा किया
हूतियों ने दावा किया कि उन्होंने मारिब के पास सऊदी अरब का F-15 लड़ाकू विमान गिराया है। साथ ही लाल सागर के बंदरगाह शहर यानबू में सऊदी तेल कंपनी अरामको के एक संयंत्र पर हमला करने का दावा किया।
हूती वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद अब्दुल सलाम ने कहा कि F-15 गिराने की बात इसलिए बताई गई है, ताकि पश्चिमी देश सऊदी की बातों में न आएं।
हूतियों ने यह फुटेज जारी करते हुए सऊदी के F-15 को निशाना बनाने का दावा किया।
हूती नेता बोले- पाकिस्तान-तुर्किये से मदद मांग रहा सऊदी
हूती पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-फराह ने कहा कि सऊदी अरब यमन में मुश्किल स्थिति में फंस गया है। उनके मुताबिक, युद्ध और नाकेबंदी के बावजूद सऊदी अरब अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया।
अल-फराह ने कहा कि अब सऊदी अरब पाकिस्तान, तुर्किये, अमेरिका, इजराइल और मिस्र से मदद मांग रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मक्का पर हमले का मुद्दा उठाकर सऊदी अरब मुस्लिम देशों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है
अमेरिका-इजराइल और अरब देशों ने भी सीक्रेट बैठक की
इजराइली अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका, इजराइल और कई अरब देशों के सैन्य प्रमुखों ने पिछले हफ्ते जर्मनी में सीक्रेट बैठक की। यह बैठक अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने बुलाई थी।
एक्सियोस के पत्रकार बराक रैविड के मुताबिक, बैठक में इजराइल, सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के सैन्य प्रमुख शामिल हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद यह इस तरह की पहली बैठक थी।
इजराइल पहले हूती हमलों का निशाना रहा है। अब वह सऊदी अरब की मदद के लिए यमन में हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करने की पेशकश कर रहा है।
यमन में 500 से ज्यादा सरकारी लड़ाके मारे गए
यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पिछले चार हफ्तों में सरकार समर्थित 500 से ज्यादा लड़ाके मारे गए हैं। सरकार के समर्थन में लड़ने वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स ने यह दावा किया है।
संगठन के मुताबिक, इसी दौरान होदेदा और ताइज प्रांतों में 1,000 से ज्यादा हूती लड़ाके भी मारे गए। हूतियों ने इस पर प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इस बीच यमन सरकार ने लाल सागर के तट पर और सैनिक भेजने का फैसला किया है। सरकार के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते की हार को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी बल फिर से इलाके में लौटेंगे।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका में भारतीयों की बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले 20 साल में 50 से ज्यादा इलाकों में भारतीयों की बड़ी आबादी बस चुकी है। इन्हें ‘मिनी इंडिया’ कहा जा रहा है। अनुमान है कि अगले 5 साल में ऐसे इलाकों की संख्या 75 तक पहुंच सकती है।
ट्रम्प की वीजा और ग्रीन कार्ड पर सख्ती के बावजूद भारतीयों का अमेरिका जाना और वहां बसना जारी है। टेक, हेल्थकेयर और फार्मा जैसे सेक्टर में नौकरियों के मौके इसकी बड़ी वजह हैं। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा करीब 9.3 लाख भारतवंशी रहते हैं।
भारतीय परिवारों की आय अमेरिकी परिवारों से ज्यादा
‘मिनी इंडिया’ में रहने वाले भारतीय परिवारों की औसत सालाना आय करीब 1.54 करोड़ रुपए है। अमेरिकी परिवारों की औसत आय करीब 80 लाख रुपए है। अमेरिकन कम्युनिटी सर्वे और प्यू रिसर्च सेंटर रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है।
अमेरिका में सबसे ज्यादा भारतीय मूल के लोग कैलिफोर्निया में रहते हैं। दूसरे नंबर पर टेक्सास है, जहां करीब 5.4 लाख भारतवंशी रहते हैं।
फ्रिस्को में 19% लोग भारतीय मूल के हैं
टेक्सास का फ्रिस्को शहर 25 साल पहले तक ज्यादातर खेतों वाला इलाका था। आज यहां की आबादी 2.5 लाख से ज्यादा है। इनमें करीब 19% लोग भारतीय मूल के हैं।
आसपास के प्लेनो और एलन शहरों में भी भारतीय मंदिर, रेस्तरां और दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के
कैलिफोर्निया के डबलिन और सैन रेमन इलाके में भारतीय आबादी करीब 18% है। डबलिन के स्कूलों में 41% छात्र भारतीय मूल के हैं।
यहां भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। नई पीढ़ी दिवाली भी मनाती है और वीकेंड पर क्रिकेट भी खेलती है। भारतीय खाने की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि कई जगह ड्राइव-थ्रू भारतीय फूड आउटलेट भी खुल गए हैं।
सिलिकॉन वैली में भारतीयों का असर बढ़ेगा
भास्कर एक्सपर्ट विलियम फ्रे के मुताबिक, सिलिकॉन वैली में भारतीयों की भूमिका आने वाले समय में और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि भारतीयों का यह सफर करीब 25 साल पहले शुरू हुआ था और अब इसकी रफ्तार और बढ़ रही है। आज सिलिकॉन वैली के लगभग 35% स्टार्टअप्स में कम से कम एक भारतीय मूल का सह-संस्थापक है।
विलियम का मानना है कि आईटी सेक्टर में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी के कारण अमेरिका के दूसरे राज्यों में भी नए ‘मिनी इंडिया’ विकसित होंगे। भारतीय समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहा है और किसी भी अन्य प्रवासी समुदाय की तुलना में उसकी भूमिका ज्यादा मजबूत दिखाई देती है।
ट्रम्प के आने के बाद सख्त हुए नियम
H-1B पर 1 लाख डॉलर का भुगतान
ट्रम्प सरकार ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत हर वीजा पर 1,03,265 डॉलर (करीब 98 लाख रुपए) की अतिरिक्त फीस लगेगी।
पहले यह फीस करीब 2,000-5,000 डॉलर थी। रॉयटर्स के मुताबिक, यह नियम साल के आखिर तक लागू किया जा सकता है।
H-1B और H-4 आवेदकों की सोशल मीडिया जांच
दिसंबर 2025 से H-1B और उनके H-4 डिपेंडेंट्स की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच बढ़ाई गई। आवेदकों को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल सार्वजनिक रखने को कहा गया।
वीजा इंटरव्यू के नियम सख्त
अक्टूबर 2025 से ज्यादातर नॉन-इमिग्रेंट वीजा आवेदकों के लिए इंटरव्यू भी जरूरी कर दिया गया। पहले 14 साल से कम और 79 साल से ज्यादा उम्र के आवेदकों को मिलने वाली छूट भी हटा दी गई, हालांकि कुछ मामलों में छूट जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था।
अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है।
अमेरिका के खुलासे से उलटा नुकसान भी संभव
अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं।
सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं।
ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं। वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं।
विशेषज्ञों को डर है कि अमेरिका के इस खुलासे के बाद रूस और चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकते हैं। वे अमेरिकी कदम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताकर नई तकनीक और हथियार विकसित करने की वजह बता सकते हैं।
इस तरह एक देश की सैन्य तैयारी दूसरे देश को भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और तेज होने का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका के कोलोराडो में पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का यूएस स्पेस कमांड जॉइंट ऑपरेशंस सेंटर।
अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा
अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके।
अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत
अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है।
इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है।
अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा
अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है तो उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है।
मौसम का पता लगाने, प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने, रास्ता खोजने और दूर-दूर तक संपर्क बनाए रखने जैसे कई काम सैटेलाइट की मदद से होते हैं।
GPS जैसी सेवाओं से विमान, जहाज और ट्रक अपना रास्ता तय करते हैं। बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी सटीक समय और कम्युनिकेशन के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब हो जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है तो मोबाइल और दूसरे कम्युनिकेशन नेटवर्क, नेविगेशन, मौसम की जानकारी और कई जरूरी सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है। अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है।
1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक
अमेरिका के अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के खुलासे के बाद करीब 60 साल पुरानी आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है।
इस संधि की शुरुआत 1966 में हुई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव रखा था। इसी दौरान सोवियत संघ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सामने अपना प्रस्ताव रखा। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बातचीत शुरू हुई और दोनों देशों के मसौदों को मिलाकर संधि तैयार की गई।
27 जनवरी 1967 को अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने वॉशिंगटन, मॉस्को और लंदन में इस संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई।
इसका मुख्य मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और दूसरे सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या ऐसे दूसरे हथियार रखने पर रोक लगाई गई है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि संधि हर तरह के हथियारों को अंतरिक्ष में रखने पर रोक नहीं लगाती। इसमें पारंपरिक हथियारों पर वैसी साफ पाबंदी नहीं है, जैसी परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियारों पर है।
अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने 27 जनवरी 1967 को आउटर स्पेस ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे।
ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस
ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा अहम बना दिया है।
ट्रम्प अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी का हिस्सा है।
इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों के हमले से बचाना है। इसके लिए जमीन के साथ-साथ अंतरिक्ष में मौजूद तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मई 2025 में गोल्डन डोम प्रोजेक्ट की घोषणा की थी।
मिंक ने सोमवार को बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम बनाने पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोक सके।
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया है।
हालांकि, मिंक ने यह नहीं बताया कि यह सिस्टम कैसे काम करेगा और इसकी पूरी क्षमता क्या होगी।