विदेश
Gen-Z प्रदर्शनकारियों ने नेपाली पीएम सुशीला कार्की का इस्तीफा मांगा:कहा- हमने कुर्सी पर बैठाया, हटाने में वक्त नहीं लगेगा, बिना सलाह के मंत्री चुनने का आरोप
काठमांडू,एजेंसी। नेपाल में Gen-Z प्रदर्शनकारियों ने अंतरिम पीएम सुशीला कार्की का इस्तीफा मांगा है। वे कैबिनेट विस्तार को लेकर नाराज हैं। प्रदर्शनकारियों ने रविवार रात पीएम आवास के बाहर प्रदर्शन और नारेबाजी की।
उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरिम सरकार प्रदर्शनकारियों की राय लिए बिना मंत्रियों को चुन रही है। इसका नेतृत्व सुदान गुरुंग कर रहे थे। गुरुंग ने धमकी देते हुए कहा,
अगर हम फिर सड़क पर उतरे तो कोई हमें रोक नहीं पाएगा। जिस कुर्सी पर बैठाया है, वहीं से निकाल फेंकेंगे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सीनियर वकील ओमप्रकाश आर्यल सरकार में दखलअंदाजी कर रहे हैं। गुरुंग का आरोप है कि आर्यल ने खुद को गृहमंत्री बनाने का फैसला किया है। ओमप्रकाश आर्यल काठमांडू के मेयर बालेन शाह के करीबी माने जाते हैं।
पीएम कार्की ने ओमप्रकाश आर्यल को गृह और कानून मंत्री, रामेश्वर खनाल को वित्त मंत्री और कुलमान घिसिंग को ऊर्जा मंत्री नियुक्त किया है।

कार्की ने तीन दिन पहले 12 सितंबर को अंतरिम पीएम की शपथ ली थी। इस दौरान गुरुंग ने माथा टेकते हुए कार्की के पैर छुए थे।
गुरुंग ने नेपाल में Gen-Z आंदोलन का ऐलान किया था
36 साल के गुरुंग ने 8 सितंबर को काठमांडू में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया था। वे हामी नेपाल नाम के NGO के संस्थापक हैं।
2015 में बना यह संगठन आपदाओं के दौरान राहत पहुंचाने के लिए जाना जाता है। भूकंप और बाढ़ जैसी आपात स्थितियों में इसके सदस्य बचाव, भोजन और पानी की व्यवस्था करते रहे हैं।
संगठन ने समय-समय पर छात्रों और प्रवासी नेपाली नागरिकों से जुड़े मुद्दे भी उठाए हैं। इसी साल भुवनेश्वर में एक नेपाली छात्रा की आत्महत्या के मामले में भी ‘हामी नेपाल’ ने खुलकर आवाज उठाई थी और सोशल मीडिया पर लगातार अपडेट साझा किए थे।
दिलचस्प यह है कि यह संगठन आमतौर पर राजनीतिक विवादों से दूरी बनाए रखता है। इसके इंस्टाग्राम पेज पर ज्यादातर मानवीय गतिविधियों की ही झलक मिलती है। ऐसे में काठमांडू विरोध का ऐलान गुरुंग के रुख में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
गुरुंग का नाम पहली बार राजनीतिक विवाद में तब आया था, जब उन्होंने शिक्षक भर्ती घोटाले पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि योग्य उम्मीदवारों को नजरअंदाज कर पैसे और राजनीतिक दबाव के जरिए भर्तियां की जा रही हैं। इसी प्रकरण के बाद उन पर जानलेवा हमला भी हुआ था।

Gen-Z आंदोलन के बाद नेपाल की पार्टियों पर संकट
नेपाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की नियुक्ति और संसद के भंग होने के बाद अब सियासी पार्टियों के भीतर ही असंतोष तेज हो गया है।
बड़े दलों के दिग्गज नेता अपनी-अपनी पार्टियों में घिर गए हैं और इस्तीफे का दबाव बढ़ रहा है। नेपाली कांग्रेस, CPN-UML और माओवादी केंद्र सहित 8 प्रमुख दलों ने संसद भंग करने को असंवैधानिक करार दिया है।
शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस, केपी शर्मा ओली की CPN-UML और पुष्प कमल दहल प्रचंड की CPN (माओवादी सेंटर) के युवा नेताओं ने अपने शीर्ष नेताओं से पद छोड़ने की मांग शुरू कर दी है।
नेताओं पर इस्तीफा देने का दबाव
नेपाली कांग्रेस के भीतर गगन थापा और बिश्व प्रकाश शर्मा खुलकर शेर बहादुर देउबा से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। वहीं, UML में शंकर पौडेल और योगेश भट्टराई सुधार की मांग उठाकर पार्टी अध्यक्ष पर दबाव बना रहे हैं।
माओवादी केंद्र में जनार्दन शर्मा ने कहा, प्रचंड अब नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपें। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नेता कार्की को सीधे निशाना बनाने से बच रहे हैं, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं के दबाव के चलते उन्हें अपनी ही पार्टी में जवाब देना पड़ रहा है।
कार्की मंत्रिमंडल के लिए 3 नाम फाइनल हुए
नेपाल में पहली बार मंत्री चुनने का तरीका भी बिल्कुल अलग होगा। अंतरिम पीएम सुशीला कार्की की तरह उनके कैबिनेट में मंत्री भी सोशल मीडिया पोलिंग के जरिए चुने जाएंगे।
सूत्रों के मुताबिक कार्की मंत्रिमंडल के लिए 3 नाम फाइनल हो गए हैं। पूर्व वित्त सचिव रमेशोर खनाल को वित्त मंत्री, वकील ओम प्रकाश आर्यल को गृह मंत्री और नेपाल विद्युत प्राधिकरण के पूर्व प्रमुख कुलमान घीसिंग को ऊर्जा एवं सिंचाई मंत्री के रूप में चुना है।
घीसिंग को दो अन्य मंत्रालयों – भौतिक अवसंरचना एवं परिवहन, और शहरी विकास – की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये तीनों नेता सोमवार को शपथ ले सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक बाकी बचे मंत्रिस्तरीय पदों पर चर्चा बाद में होगी।
सविता भंडारी नेपाल की पहली महिला अटॉर्नी जनरल बनीं
नेपाल में पहली बार किसी महिला को अटॉर्नी जनरल बनाया गया है। सीनियर एडवोकेट सविता भंडारी बराल को प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सिफारिश पर राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने नियुक्त किया।
इससे पहले राष्ट्रपति ने अटॉर्नी जनरल रमेश बदाल का इस्तीफा मंजूर किया था।

सीनियर एडवोकेट सविता भंडारी बराल।
PM कार्की बोली- नेपाल में पहली बार 27 घंटे आंदोलन हुआ
नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कार्यभार संभालने के बाद रविवार को कहा था कि Gen-Z आंदोलन में मारे गए लोगों को शहीद घोषित किया जाएगा।
साथ ही पीड़ितों के परिजनों को 10-10 लाख नेपाली रुपए का मुआवजा भी दिया जाएगा। नेपाल हिंसा में मरने वालों की संख्या 72 हो गई है, इनमें 1 भारतीय महिला भी शामिल है।
कार्की ने भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी संकल्प लिया। उन्होंने कहा था, ‘नेपाल में पहली बार 27 घंटे तक लगातार आंदोलन हुआ।’ 12 सितंबर को PM पद संभालने के बाद कार्की को नेपाल में 5 मार्च 2026 को आम चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई थी।
Gen-Z नेता बोले थे- सरकार में शामिल नहीं होंगे, लेकिन निगरानी करेंगे
शुक्रवार को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संसद भंग करने का भी ऐलान किया था। पूर्व पीएम केपी ओली की कम्युनिस्ट पार्टी (UML) ने इस फैसला का विरोध किया है।
UML महासचिव शंकर पोखरेल ने पार्टी कार्यकर्ताओं से इसके खिलाफ सड़कों पर उतरने की अपील की है।
वहीं, Gen-Z नेताओं ने इस सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था। उनका कहना है कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे, लेकिन सरकार के कामकाज की निगरानी करेंगे।
नेपाल में सामान्य हो रहे हालात
6 दिनों की हिंसा के बाद काठमांडू के कई इलाकों से कर्फ्यू हटा दिया गया है। नेपाल में अब हालात सामान्य हो रहे हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट कल से शुरू किया गया। साथ ही भारत-नेपाल सीमा पर भी आवाजाही शुरू की गई।
हालांकि, काठमांडू के 6 जगहों पर अब भी कर्फ्यू जारी है। यहां 5 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने, भूख हड़ताल, धरना, घेराव, जुलूस और सभा करने पर रोक लगा दी गई है। नोटिस में कहा गया है कि यह आदेश दो महीने तक लागू रहेगा।

नेपाल में 6 दिन की हिंसा के बाद शनिवार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट शुरू किया गया।
विदेश
जेलेंस्की का बड़ा ऐलान: भारत देगा यूक्रेन का साथ, डिफेंस डील फाइनल स्टेज में!
कीव,एजेंसी। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि भारत (India) के साथ सुरक्षा सहयोग को लेकर एक समझौता तय हो चुका है। इस समझौते से जुड़े जरूरी दस्तावेज अभी तैयार किए जा रहे हैं। जेलेंस्की के अनुसार, यूक्रेन अपनी सुरक्षा को मजबूत करने पर लगातार ध्यान दे रहा है। उन्होंने कहा कि एयर डिफेंस, सेना को समर्थन और देश की रक्षा क्षमता बढ़ाना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है, और इसी दिशा में भारत के साथ यह सहयोग अहम माना जा रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन के रक्षा मंत्री Rustem Umierov अन्य देशों के साथ भी ऐसे ही सुरक्षा समझौतों पर काम कर रहे हैं, ताकि यूक्रेन को ज्यादा सैन्य और रणनीतिक मदद मिल सके। साथ ही, यूक्रेन अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ भी बातचीत कर रहा है, ताकि पहले से स्वीकृत सहायता पैकेज को जल्द लागू किया जा सके, जो अभी तक पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है। कुल मिलाकर, भारत और यूक्रेन के बीच यह समझौता दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करेगा और यूक्रेन की सुरक्षा क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है।
विदेश
मिडल ईस्ट जंग में ट्रंप को सबसे बड़ा झटका, UAE ने दिखा दिया ठेंगा ! बोला-‘हमें अमेरिका की जरूरत नहीं’
दुबई,एजेंसी। मिडिल ईस्ट जंग के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और संयुक्त राज्य अमेरिका(USA) के बीच संबंधों को दरार बहुत गहरी हो गई है। यह खुलासा तब प्रमुख एमिराती विश्लेषक अब्दुल खालिक अब्दुल्ला के बयान से हुआ है। उन्होंने कहा कि UAE को अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, देश में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब सुरक्षा के बजाय एक “बोझ” बन सकते हैं।

हालांकि यह उनका व्यक्तिगत मत है और UAE सरकार की आधिकारिक नीति नहीं मानी जा रही है। विश्लेषक का तर्क है कि हाल के हमलों और खतरों के बीच UAE ने अपनी रक्षा क्षमता मजबूत की है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की ओर से आए ड्रोन और मिसाइल खतरों को रोककर UAE ने दिखाया है कि वह अपनी सुरक्षा खुद संभाल सकता है। इसी कारण कुछ लोग अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर पुनर्विचार की बात कर रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ा मुद्दा सामने आया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर युद्ध या संकट की वजह से डॉलर की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो UAE तेल व्यापार के लिए अन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है। इसमें चीन की मुद्रा युआन का नाम सामने आया है। दशकों से खाड़ी देशों और अमेरिका के बीच एक समझ बनी हुई थी, जिसमें अमेरिका सुरक्षा देता था और बदले में तेल का व्यापार डॉलर में होता था। अब अगर इस व्यवस्था में बदलाव आता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों पर पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में चीन का नाम भी सामने आ रहा है। अगर भविष्य में युआन में तेल व्यापार बढ़ता है, तो इससे चीन की वैश्विक भूमिका और मजबूत हो सकती है।
विदेश
होर्मुज में फायरिंग पर भड़के ट्रंपः बोले- “No More Mr Nice Guy, अब ईरान ने बात न मानी तो…”
वाशिंगठन, एजेंसी। जलमार्ग होर्मुज में हुई कथित गोलीबारी ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान (Iran) ने इस क्षेत्र में फायरिंग की, जिसमें एक फ्रांसीसी जहाज और एक ब्रिटेन का मालवाहक जहाज निशाने पर आए। इस घटना को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन माना जा रहा है।इस मामले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने अमेरिका का प्रस्तावित समझौता नहीं माना, तो अमेरिका उसके पावर प्लांट और पुलों को निशाना बना सकता है। ट्रंप ने साफ कहा कि अब अमेरिका सख्ती से कार्रवाई करेगा और पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने ईरान को “आखिरी मौका” देते हुए कहा है कि वह समझौता स्वीकार करे, वरना कड़ी कार्रवाई होगी। अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर पाकिस्तान जाकर वार्ता करेंगे।

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर यहां तनाव बढ़ता है या रास्ता बंद होता है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ईरान को भी इससे भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी बीच अमेरिका ने अपनी टीम को Islamabad भेजने का फैसला किया है, जहां अगले दौर की बातचीत होगी। ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका के विशेष दूत Steve Witkoff और Jared Kushner सोमवार को Islamabad पहुंचेंगे। वहां वे ईरान के साथ युद्धविराम (ceasefire) को लेकर अहम बातचीत करेंगे। ट्रंप के अनुसार, यह कूटनीति का “आखिरी प्रयास” है।उन्होंने कहा कि इस डील के अधिकांश बिंदु पहले ही तय हो चुके हैं और ईरान को परमाणु हथियार नहीं रखने होंगे। अब केवल औपचारिक सहमति बाकी है।

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान को हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलना होगा, जो वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले हफ्ते भी J. D. Vance के नेतृत्व में इस्लामाबाद में बातचीत हुई थी, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अब एक बार फिर से कोशिश की जा रही है कि 22 अप्रैल को खत्म हो रहे सीज़फायर से पहले कोई समझौता हो जाए। हालांकि, अभी तक ईरान की ओर से इन नई वार्ताओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। अगर यह बातचीत भी असफल रही, तो अमेरिका और ईरान के बीच बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
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