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अगले महीने व्यापार वार्ता के लिए भारत आ सकता है अमेरिकी दल : गोयल
नई दिल्ली, एजेंसी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बृहस्पतिवार को कहा कि व्यापार वार्ता के लिए अमेरिकी दल अगले महीने भारत आ सकता है। अंतरिम समझौते के विवरण को अंतिम रूप देने और व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के तहत वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए भारतीय पक्ष ने अप्रैल में वॉशिंगटन डीसी में अमेरिकी समकक्षों के साथ आमने-सामने बैठक की थी। यह पूछे जाने पर कि क्या बीटीए के लिए अमेरिका के मुख्य वार्ताकार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ आएंगे तो गोयल ने कहा, ”वह उनके साथ नहीं आ रहे हैं लेकिन उनके अगले महीने आने की योजना है।”

रुबियो 23 मई से भारत की चार दिवसीय यात्रा पर आएंगे जिसका उद्देश्य व्यापार, रक्षा एवं ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाना है। यह उनकी भारत की पहली यात्रा होगी। भारत और अमेरिका ने सात फरवरी को एक संयुक्त बयान जारी कर अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा को अंतिम रूप दिया था। हालांकि, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने सभी जवाबी शुल्कों को निरस्त कर दिया जिसे अमेरिकी प्रशासन साझेदार देशों के साथ व्यापार समझौते करने के लिए एक साधन के तौर पर इस्तेमाल कर रहा था।
इसके बाद अमेरिका ने इस वर्ष 24 फरवरी से 150 दिन के लिए व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी आयात पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगा दिया। साथ ही, उसने धारा 301 के तहत प्रमुख निर्यातकों के खिलाफ उनकी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता एवं श्रम मानकों को लेकर दो जांच भी शुरू कीं। धारा 122 के तहत अधिकतम 150 दिन के लिए 15 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जा सकता है। वहीं धारा 301 के तहत जांच में यदि यह पाया जाता है कि व्यापारिक साझेदारों के कदम अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो शुल्क पर कोई सीमा नहीं होती। भारत ने दोनों जांच पर अपना जवाब दे दिया है और दोनों पक्षों के बीच परामर्श जारी है।
गोयल ने एक कार्यक्रम में कहा कि कई बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने भारत में निवेश की घोषणा की है क्योंकि देश, दुनिया के लिए एक पसंदीदा निवेश गंतव्य बना हुआ है। उन्होंने कहा, ” पिछले छह महीनों में अगर मैं अमेरिकी उद्योग से मिली विभिन्न निवेश प्रतिबद्धताओं को देखूं, तो यह आंकड़ा संभवतः 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होगा। अमेजन के डेटा केंद्र निवेश और गूगल के डेटा केंद्र निवेश को देखें। मेरी समझ यह है कि अमेरिका और भारत स्वाभाविक साझेदार की तरह काम कर रहे हैं। हम एक-दूसरे के पूरक हैं।” उन्होंने कहा कि भारत को प्रौद्योगिकी, नवाचार, उच्च-सटीक रक्षा, डिजिटल डेटा केंद्र, क्वांटम कंप्यूटिंग उपकरण और चिकित्सा उपकरण जैसे क्षेत्रों में अमेरिका के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ”हम 1.4 अरब आकांक्षी भारतीयों की आकांक्षाओं, बढ़ते मध्यम वर्ग, बढ़ती आय और बढ़ती अर्थव्यवस्था के माध्यम से अमेरिकी नवाचार को विस्तार दे सकते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वैश्विक संकट के बीच जब यूक्रेन युद्ध पहले से चल रहा है और पश्चिम एशिया संकट भी है, दुनिया उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।” मंत्री ने कहा कि मौजूदा स्थिति भारत और अमेरिका के लिए साथ मिलकर काम करने और अधिक विश्वसनीय तथा मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने का उपयुक्त अवसर है।
परीक्षण सुविधाओं पर उन्होंने कहा कि भारतीय मानक ब्यूरो, निर्यात निरीक्षण एजेंसी और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी उद्योग को आधुनिक एवं श्रेष्ठ उपकरणों से युक्त सुविधाएं स्थापित करने में सहयोग देने को तैयार हैं। सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को बढ़ावा देने के तरीकों पर उन्होंने सुझाव दिया कि भारत में कार्यरत अमेरिकी कंपनियां वस्तुओं की स्वीकृति के सात दिन के भीतर इन इकाइयों को भुगतान करने पर विचार करें, जिससे नकदी प्रवाह तेज होगा। उन्होंने कहा कि इससे एमएसएमई अपने व्यवसाय पर ध्यान दे सकेंगे और समय से पहले भुगतान के बदले छूट भी दे सकते हैं जिससे उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
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पुतिन के “गुरु” की भविष्यवाणीः अमेरिका की बादशाहत हो रही खत्म ! रूस-चीन के साथ भारत बन सकता गेम चेंजर
मॉस्को, एजेंसी। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) के करीबी माने जाने वाले रूसी रणनीतिक विचारक अलेक्जेंडर डुगिन (Alexander Dugin) ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अमेरिका की बादशाहत खत्म सकती है और रूस-चीन के साथ भारत गेम चेंजर बन सकता है। उन्होंने कहा कि एक समय पश्चिमी देश पूरी दुनिया के नियम तय करते थे, लेकिन अब रूस (Russia) और चीन (China) उस प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं। डुगिन के मुताबिक अगर भारत (India) भी इस धुरी में सक्रिय रूप से शामिल होता है, तो दुनिया “चार ध्रुवों” वाली व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है।

क्या है RIC थ्योरी?
RIC यानी रूस-भारत-चीन की अवधारणा नई नहीं है, लेकिन मौजूदा वैश्विक तनावों के बीच इसे फिर से चर्चा में लाया जा रहा है। समर्थकों का मानना है कि अगर ये तीन बड़े एशियाई देश रणनीतिक रूप से साथ आते हैं तो अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दी जा सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत, रूस और चीन के हित पूरी तरह समान नहीं हैं। खासकर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अविश्वास बड़ी बाधाएं हैं।
पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती क्यों?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक संस्थाओं और आर्थिक व्यवस्था पर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव रहा है। डॉलर की वैश्विक ताकत, NATO विस्तार, International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाओं का प्रभाव, सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता ने दशकों तक अमेरिका को वैश्विक “नियम निर्माता” बनाए रखा। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और चीन के उभार ने इस व्यवस्था को चुनौती दी है।
रूस और चीन की नई रणनीति
रूस का कहना है कि NATO का विस्तार उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है। वहीं शी जिनपिंग (Xi Jinping) के नेतृत्व में चीन आर्थिक और तकनीकी ताकत के दम पर अमेरिका को चुनौती दे रहा है। चीन Belt and Road Initiative, BRICS का विस्तार, वैकल्पिक वित्तीय संस्थाएं और AI, 5G और सेमीकंडक्टर में बढ़ती भूमिका के जरिए पश्चिमी व्यवस्था का विकल्प तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
भारत की भूमिका सबसे अहम क्यों?
भारत की स्थिति सबसे दिलचस्प मानी जा रही है। भारत के अमेरिका के साथ भी मजबूत संबंध हैं और रूस के साथ भी पुराने रणनीतिक रिश्ते कायम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की विदेश नीति को “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति माना जाता है। भारत क्वाड (QUAD) का हिस्सा होते हुए भी उसे औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं मानता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत पूरी तरह किसी ब्लॉक में शामिल होने के बजाय खुद को एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है।
क्या अमेरिका सचमुच कमजोर पड़ रहा है?
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की “अजेय महाशक्ति” वाली छवि को हाल के संघर्षों और वैश्विक तनावों से झटका लगा है। लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि पश्चिम का प्रभाव खत्म हो गया है। आज भी अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और डॉलर वैश्विक वित्त व्यवस्था का केंद्र है। तकनीक, विश्वविद्यालय और मीडिया में पश्चिम का दबदबा कायम है। हालांकि इतना जरूर है कि अब दुनिया पूरी तरह “एकध्रुवीय” नहीं रही।
भारत के सामने चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर भारत को चौथे वैश्विक ध्रुव के रूप में उभरना है, तो उसे सैन्य क्षमता मजबूत करनी होगी, उत्पादन और विनिर्माण बढ़ाना होगा, ऊर्जा निर्भरता कम करनी होगी तथा तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। भारत फिलहाल संतुलन की नीति अपनाकर अमेरिका, रूस और वैश्विक दक्षिण तीनों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। दुनिया तेजी से बदल रही है। अमेरिका का प्रभाव चुनौती झेल रहा है, चीन नई महाशक्ति के रूप में उभर चुका है और रूस पश्चिमी व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहा है। लेकिन भारत अभी किसी “RIC गुट” में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अपनी अलग पहचान और स्वतंत्र शक्ति केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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मोदी ने रोम और काशी को बताया कभी न खत्म होने वाले शहर, जानें क्या है भगवान शिव की नगरी वाराणसी का इतिहास
रोम, एजेंसी। प्रधानमंत्री मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ रोम में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रोम और काशी को इटर्नल सिटी यानी कभी न खत्म होने वाले शहर कहा। यह तुलना केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक भी है। वाराणसी को दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित नगरों में माना जाता है, जहां हजारों वर्षों से धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं लगातार चलती आ रही हैं। जानें, क्या है भगवान शिव की नगरी वाराणसी का इतिहास-

काशी नाम का अर्थ और महत्त्व
स्कंदपुराण में आया है कि ‘श्म’ का अर्थ है ‘शव’ और ‘शान’ का है सोना (शयन) या पृथ्वी पर पड़ जाना। जब प्रलय आती है तो महान तत्व शवों के समान यहां पड़ जाते हैं, अत: यह स्थान ‘श्मशान’ कहलाता है।

जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सब को दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है। पुराणों में ऐसा आया है कि काशी के पद-पद पर तीर्थ हैं, एक तिल भी स्थल ऐसा नहीं है, जहां शिव नहीं हों। काशी की महिमा विभिन्न धर्म ग्रंथों में गाई गई है।

वाराणसी नाम कैसे पड़ा?
काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहांत होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
विश्वनाथ जी की अति-श्रेष्ठ नगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोड़ने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ कहते हैं – ‘इदं मम प्रियंक्षेत्रं पंचकोशीपरीमितम्’ यानी पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है।
मत्स्यपुराण (185/68-69) के अनुसार काशी में विश्वनाथ के अलावा 5 प्रमुख तीर्थ हैं : दशाश्वमेध, लोलार्क (काशी में कई सूर्य-तीर्थ हैं, जिनमें एक लोलार्क भी है), केशव, बिन्दुमाधव एवं मणिकर्णिका।
आधुनिक काल के प्रमुख पंचतीर्थ हैं असि एवं गंगा का संगम, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका, पंचगंगा घाट तथा वरणा एवं गंगा का संगम। मणिकर्णिका को मुक्तिक्षेत्र भी कहा जाता है। यह बनारस के धार्मिक जीवन का केंद्र है और वहां के सभी तीर्थों में इसे सर्वोच्च माना जाता है। एक बार शिव जी का कर्णाभूषण यहां गिर पड़ा और इसी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।
ऐसे ही पंचगंगा घाट का नाम इसलिए विख्यात हुआ कि यहां 5 नदियों के मिलने की कथा है। यथा – किरणा, धूतपापा, गंगा, यमुना एवं सरस्वती, जिनमें चार गुप्त हैं।

काशी का प्राचीन इतिहास
काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए पुराने समय में पंचक्रोशी (पंचकोसी) मार्ग का निर्माण किया गया था। जिस वर्ष अधिमास (अधिक मास) लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशी यात्रा की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा करके भक्तगण भगवान शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमास कहा जाता है। जो इन दिनों चल रहा है। 17 मई से आरंभ हुआ ये माह 15 जून 2026 तक रहने वाला है।
पौराणिक एवं शास्त्रीय मान्यता है की हरिवंश पुराण के अनुसार काशी को बसाने वाले भरतवंशी राजा ‘काश’ थे। स्कंदपुराण के मत से भगवान शंकर ने काशी को सबसे पहले आनंद वन कहा और फिर अविमुक्त कहा। काशी शब्द ‘काश’ (चमकना) से बना है। काशी इसलिए प्रसिद्ध हुई कि यह निर्वाण के मार्ग में प्रकाश फैंकती है। वाराणसी शब्द की व्युत्पत्ति कुछ पुराणों ने इस प्रकार की है कि यह ‘वरणा’ एवं ‘असि’ नामक दो धाराओं के बीच में है, जो क्रम से इसकी उत्तरी एवं दक्षिणी सीमाएं बनाती हैं।
पुराणों में बहुधा वाराणसी एवं अविमुक्त नाम आते हैं। बहुत-से पुराणों के मतानुसार इस पवित्र स्थल का नाम अविमुक्त इसलिए पड़ा कि शिव ने इसे कभी नहीं छोड़ा। स्कंदपुराण अनुसार यह पवित्र स्थल आनंदकानन है क्योंकि यद्यपि शिव पर्वत चले गए पर उन्होंने इसे पूर्णतया छोड़ा नहीं बल्कि अपने प्रतीक के रूप में विश्वनाथ शिवलिंग यहां छोड़ गए।
कुछ विद्वानों के मत में काशी वैदिक काल से भी पूर्व की नगरी है। शिव की उपासना का प्राचीनतम केंद्र होने के कारण ही इस धारणा का जन्म हुआ जान पड़ता है क्योंकि सामान्य रूप से शिवोपासना को पूर्व वैदिककालीन माना जाता है। वैसे, काशी जनपद के निवासियों का सर्वप्रथम उल्लेख हमें अथर्ववेद की पैप्पलादसंहिता में (5,22,14) मिलता है। शुक्लयजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण में (135, 4, 19) काशिराज धृतराष्ट्र का उल्लेख है, जिसे शतानीक सत्राजित् ने पराजित किया था।
बृहदारण्यकोपनिषद् में (2,1,1,3,8,2) काशिराज अजात शत्रु का भी उल्लेख है। कौषीतकी उपनिषद् (4,1) और बौधायन श्रौतसूत्र में काशी और विदेह तथा गोपथ ब्राह्मण में काशी और कोसल जनपदों का साथ-साथ वर्णन है।
इसी प्रकार काशी, कोसल और विदेह के सामान्य पुरोहित जलजातूकण्र्य का नाम शांखायन श्रौतसूत्र में प्राप्य है। काशी जनपद की प्राचीनता तथा इसकी स्थिति इन उपर्युक्त उल्लेखों से स्पष्ट हो जाती है।

दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित नगरी
बौद्ध-जैन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है की प्राचीन बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि वाराणसी बुद्ध काल (कम-से-कम पांचवीं ईसा पूर्व शताब्दी) में चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत एवं कौशाम्बी जैसे महान एवं प्रसिद्ध नगरों में गिनी जाती थी। विश्व में ऐसा कोई नगर नहीं है, जो बनारस से बढ़कर प्राचीनता, निरंतरता और मोहक आदर का पात्र हो। 3 हजार वर्ष से यह पवित्रता ग्रहण करता आ रहा है। इस नगर के कई नाम रहे हैं जैसे- वाराणसी, अविमुक्त एवं काशी। अपनी महान जटिलताओं एवं विरोधों के कारण यह नगर सभी युगों में भारतीय जीवन का एक सूक्ष्म स्वरूप रहता आया है। वाराणसी या काशी के विषय में महाकाव्यों एवं पुराणों में हजारों श्लोक कहे गए हैं। उस समय यह नगर आर्यों की लीलाओं का केंद्र बन चुका था। प्राचीन जैन ग्रंथों में भी वाराणसी एवं काशी का उल्लेख हुआ है। अश्वघोष ने अपने ‘बुद्धचरित’ में वाराणसी एवं काशी को एक-सा कहा है। वहां लिखा है कि बुद्ध ने वाराणसी में प्रवेश करके अपने प्रकाश से नगर को प्रकाशित करते हुए काशी के निवासियों के मन में कौतुक भर दिया।

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चिकन नेक’ पर भारत करेगा महाकिलेबंदी ! सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बनाएगा ‘राइनो नेक’, घुटनों पर आएंगे चीन-पाकिस्तान
नई दिल्ली, एजेंसी। सिलीगुड़ी गलियारा (Siliguri Corridor) जिसे लंबे समय से “चिकन नेक” कहा जाता रहा है, अब भारत की नई रणनीतिक तैयारी का केंद्र बन गया है। रक्षा और सुरक्षा हलकों में इसे अब “राइनो नेक” यानी गेंडे जैसी मजबूत ढाल में बदलने की चर्चा तेज है। यह वही संकरा भूभाग है जो मुख्य भारत को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ता है। इसकी चौड़ाई कई जगह सिर्फ 20 से 22 किलोमीटर तक मानी जाती है, इसलिए इसे हमेशा रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना गया।

क्यों अहम है सिलीगुड़ी कॉरिडोर?
यह कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी क्षेत्र में स्थित है । इसके एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ बांग्लादेश और उत्तर में भूटान के पास चीन की रणनीतिक चुम्बी घाटी स्थित है। अगर युद्ध जैसी स्थिति बने, तो इस इलाके पर दबाव डालकर भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को बाकी देश से काटने की आशंका हमेशा जताई जाती रही है।रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं के लिए करीब 120 एकड़ जमीन केंद्र को देने की मंजूरी दी है। इसके बाद इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की प्रक्रिया तेज हो गई है।
इस संवेदनशील इलाके से गुजरने वाले प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों का नियंत्रण और समन्वय मजबूत किया जा रहा है ताकि सेना जरूरत पड़ने पर तेजी से टैंक, मिसाइल और भारी उपकरण सीमा तक पहुंचा सके। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि युद्धकालीन लॉजिस्टिक्स बनाए रखने के लिए भूमिगत सुरंगों और सुरक्षित नेटवर्क पर काम हो रहा है, ताकि दुश्मन की निगरानी और हमलों से सप्लाई लाइन सुरक्षित रहे। पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने के लिए असम, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में अतिरिक्त सैन्य ढांचे और फॉरवर्ड बेस विकसित किए जा रहे हैं।
चीन-पाकिस्तान को क्यों चिंता?
चीन और भारत के बीच 2017 का Doklam standoff इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को पहले ही दुनिया के सामने ला चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत इस कॉरिडोर को सैन्य और लॉजिस्टिक रूप से और मजबूत कर देता है, तो चीन के लिए इस इलाके पर रणनीतिक दबाव बनाना कठिन हो जाएगा।रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Inter-Services Intelligence पूर्वी सीमाओं पर अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि इन दावों पर कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय पुष्टि सामने नहीं आई है। भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से पूर्वोत्तर और सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, तस्करी और सुरक्षा चुनौतियों को लेकर सतर्क रही हैं।
क्या सचमुच “राइनो नेक” बनेगा?
विशेषज्ञों के अनुसार “चिकन नेक” शब्द इस क्षेत्र की कमजोरी का प्रतीक माना जाता था, जबकि “राइनो नेक” का मतलब है मजबूत, आक्रामक और अभेद्य सुरक्षा ढांचा। भारत की कोशिश यही है कि पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी सुरक्षित रहे। युद्ध या संकट में सप्लाई लाइन न टूटे तथा चीन और अन्य संभावित खतरों के खिलाफ तेज सैन्य प्रतिक्रिया संभव हो। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे संवेदनशील बिंदु माना जाता है। बदलते भू-राजनीतिक माहौल और चीन के बढ़ते दबाव के बीच भारत अब इस इलाके को सिर्फ एक संकरी लाइफलाइन नहीं बल्कि मजबूत रणनीतिक किले में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
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