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सोनिया बोलीं-खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी से हैरानी:यह न्यूट्रल रहना नहीं, जिम्मेदारी से पीछे हटना, यह पीएम की ईरान पर हमले की अनदेखी

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नई दिल्ली,एजेंसी। कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- दिल्ली की चुप्पी हैरान करने वाली है, यह तटस्थता (न्यूट्रल) नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है।

मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस में पब्लिश आर्टिकल में उन्होंने लिखा- 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजराइल के टारगेटेड अटैक में हत्या कर दी गई। जब दो देशों की डिप्लोमैट लेवल की बातचीत चल रही हो, तब एक मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार को दिखाती है।

सोनिया ने लिखा कि भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। मोदी ने अमेरिका-इजराइल के हमले को अनदेखा किया, केवल यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की निंदा की। बाद में पीएम ने ‘गहरी चिंता’ और ‘बातचीत व कूटनीति’ की बात कही। जबकि हमला उस समय हुआ, जब दो देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया जारी थी।

सोनिया गांधी के आर्टिकल की बड़ी बातें…

1. बिना युद्ध घोषणा के हत्या

यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा और उस समय की गई, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की सीमाओं या उसकी राजनीतिक आजादी के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी देना गलत है। किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेट किलिंग इन नियमों के खिलाफ है। अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी इस पर आवाज नहीं उठाता तो अंतरराष्ट्रीय नियम कमजोर पड़ सकते हैं।

2. प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा

हत्या से सिर्फ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के समर्थन की बात दोहराई। यह उस समय हुआ, जब गाजा संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिक, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं, मारे जाने पर दुनियाभर में नाराजगी है।

3. ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स देशों का रुख

ग्लोबल साउथ के कई देशों और ब्रिक्स के साझेदार रूस व चीन ने इस मामले में दूरी बनाए रखी है। ऐसे समय में भारत का खुला समर्थन, बिना साफ नैतिक रुख के, गलत संदेश दे सकता है। सोनिया गांधी के अनुसार, इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में दिखेगा।

4. बमबारी और टारगेट किलिंग की निंदा

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ईरान की जमीन पर हुई बमबारी और टारगेट किलिंग की साफ निंदा करती है। ये क्षेत्र और दुनिया के लिए खतरनाक कदम है। पार्टी की ईरान की जनता और दुनिया भर के शिया समुदाय के प्रति संवेदनाएं हैं।

5. संविधान का हवाला

भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि देशों के बीच विवाद बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए, सभी देशों की बराबरी का सम्मान होना चाहिए और किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। ये सिद्धांत लंबे समय से भारत की विदेश नीति का आधार रहे हैं। मौजूदा चुप्पी इन सिद्धांतों से मेल नहीं खाती।

सोनिया ने किया- भारत और ईरान के संबंधों का जिक्र

सोनिया गांधी ने कहा कि 1994 में OIC के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी। उस समय ईरान ने अहम भूमिका निभाकर उसे रुकवाया, जिससे कश्मीर मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच सका।

ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत को कूटनीतिक मौजूदगी की अनुमति दी, जो ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तेहरान दौरे में दोनों देशों के गहरे संबंधों को दोहराया था।

सोनिया का इजराइल-भारत के संबंध और विश्वसनीयता का सवाल

सोनिया ने लिखा कि हाल के सालों भारत-इजराइल संबंध रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़े हैं। भारत के तेहरान और तेल अवीव दोनों से संबंध हैं, इसलिए वह संयम की अपील कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी विश्वसनीयता बनी रहे और वह सिद्धांत आधारित रुख अपनाए।

सोनिया गांधी ने कहा कि खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। गल्फ वॉर यमन, इराक और सीरिया जैसे संकटों में भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा इसलिए कर सका, क्योंकि उसे स्वतंत्र और निष्पक्ष देश माना जाता था, न कि किसी शक्ति का प्रतिनिधि।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित रही जो निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता थी। मौजूदा स्थिति उस रुख के कमजोर पड़ने का संकेत देती है। यदि ईरान के मामले में संप्रभुता की अनदेखी पर भारत स्पष्ट नहीं बोलता, तो छोटे देश भविष्य में उस पर कैसे भरोसा करेंगे?

सोनिया ने संसद में बहस की मांग की

सोनिया गांधी ने कहा कि संसद की अगली बैठक में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेट किलिंग, उस पर भारत सरकार की चुप्पी और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता के सिद्धांतों का कमजोर होने के मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का विनाश और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के रणनीतिक और नैतिक हितों से जुड़ी है।

उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करता रहा है, जो केवल औपचारिक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद की प्रतिबद्धता है। ऐसे समय में जब नियम-आधारित व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है।

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मोदी बोले-श्रीराम कॉलेज के पूर्व छात्र जेन–जी लैंग्वेज में OG:ये धुरंधर न हों, लेकिन दुनियाभर में इन्होंने धूम मचाई

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नई दिल्ली, एजेंसी। पीएम मोदी 13 साल बाद शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) पहुंचे। वे मेट्रो का सफर करके कॉलेज पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मेट्रो में बैठे बच्चों और लोगों से भी बातचीत की।

कॉलेज के 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। इसी दौरान पीएम जेन-Z को संबोधित कर रहे हैं।

उन्होंने कहा- यहां के एलुमिनाई OG हैं, यानी ओरिजनल गैंगस्टर हैं। यहां के एलुमिनाई स्टूडेंट्स ने हर क्षेत्र में धूम मचाई है। वे धुरंधर भले न हों, पर धूम तो मचाई है।

समारोह की शुरुआत में पीएम ने 100 रुपए का सिक्का जारी किया। इसी साल अप्रैल में वे डाक टिकट भी जारी कर चुके हैं।

पीएम इससे पहले 2013 में श्रीराम कॉलेज का दौरा कर चुके हैं। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।

पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।

मोदी ने 13 साल पहले दी स्पीच की खास बातें दोहराईं

संबोधन के दौरान पीएम ने 2013 में दी गई अपनी स्पीच की खास बातें दोहराईं। उन्होंने कहा- “उस समय आप सब स्कूल में रहे होंगे। पर आज इंटरनेट पर जाकर उस समय की खबरें पढ़ेंगे तब आपको पता चलेगा उस समय देश में क्या हालत थी। मैं चाहूंगा कि आप इंटरनेट पर पढ़ें। मैं उस वक्त की हेडलाइन की कुछ झलक दिखाना चाहता हूं। LOC पर भारतीय सैनिकों की हत्या। वर्ल्ड बैंक ने GDP का नंबर घटाया। महंगाई दर 10% के करीब। हेलिकॉप्टर में घूसखोरी और हैदराबाद में ब्लास्ट ये उस समय की हेडलाइंस थीं।”

मोदी बोले- देश के लिए जीने का जज्बा मेरे अंदर भावविष्ट

स्पीच के दौरान पीएम ने कहा- “देश के लिए जी जान से जुटना। देश के लिए जीने का जज्बा, जो मेरे अंदर भावविष्ट है। वो 2013 में यहीं से शब्दों की माला में गढ़ता गया। मैं काफी देर बोला था। मैंने उस दिन पानी के ग्लास का एक उदाहरण दिया था। मैंने कहा था कि पानी के आधे भरे ग्लास को देखने के तीन नजरिए क्या होते हैं। एक जिनको ग्लास आधा खाली दिखता है। दूसरा जिन्हें ग्लास आधा भरा दिखता है। और तीसरा जिन्हें ग्लास पूरा भरा दिखता है। आधा हवा से आधा पानी से।”

पीएम बोले- कुछ दिन इस आयोजन की खूब चर्चा है

पीएम मोदी ने कहा- “कुछ दिनों से इस कार्यक्रम की खूब चर्चा है। लोग मेरे 2013 के संबोधन को याद कर रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसे रिविजिट किया है। आज भी 13-14 साल बाद भी उस सभा और संबोधन का प्रभाव बरकरार है। साथियों तब आपकी जगह आपके सीनियर थे। मैं तब सीएम तो था पर मैं विपक्षी पार्टी में था। लोग उम्मीद कर रहे थे कि मैं उस वक्त तब की केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दूंगा। पर मैंने इस मंच का वो उपयोग नहीं किया। मैंने एक विजन रखा था। मैंने तब जो कहा था वो मेरा कनविक्शन था।”

पीएम बोले- यहां के एलुमिनाई जेन जी की भाषा में OG और धुरंधर

  • इस कॉलेज की यात्रा दरियागंज के एक छोटे से स्थान से शुरू हुई थी। और वही छोटा कॉलेज एक विशाल वृक्ष बन चुका है। इसने कई लोगों को छांव और शीतलता दी है।
  • आज भी जब कोई पूछता है कि DU में कौन सा कॉलेज, तो SRCC कहना ही अपने आप में फ्लैक्स होता है। आपकी भाषा में कहूं तो यहां के एल्युमनाई OG हैं।
  • जिन्होंने SRCC का नाम पूरी दुनिया में पहुंचाया। हमारे अरुण जेटली जी यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि हमारी ऐसी कोई मुलाकात नहीं हुई जहां उन्होंने SRCC की बात न की हो। कभी-कभी तो मैं तंग आ जाता था।
  • लोग मेरे 2013 के संबोधन को याद कर रहे हैं। नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसे रिविजिट

पीएम मोदी का संबोधन शुरू, बोले- मैं छठा खिलाड़ी हूं

पीएम मोदी ने संबोधन की शुरुआत में एलुमिनाई स्टूडेंट्स के नाम लिए और फिर बोले- मैं छठा खिलाड़ी हूं। आज का ये अवसर बहुत ऐतिहासिक है। ये देश के शिक्षा जगत के लिए भी अहम है। यहां SRCC का हिस्सा रही अनेक पीढ़ियां जुड़ी हैं।

मोदी ने कहा- मैं कॉलेज के संस्थापक सर श्री राम जी का भी धन्यवाद करता हूं। जब कोई इंसान 100 साल जीता है तो उसके अनुभवों का सागर माना जाता है। और जब कोई संस्थान ऐसा करता है तो वो उपलब्धियों का महासागर हो जाता है।

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पीएम दिल्ली के श्रीराम कॉलेज के शताब्दी समारोह में पहुंचे:मेट्रो में बैठे, बच्चों से बातचीत की

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नई दिल्ली, एजेंसी। पीएम मोदी 13 साल बाद शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) पहुंचे। वे मेट्रो का सफर करके कॉलेज पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मेट्रो में बैठे बच्चों और लोगों से भी बातचीत की।

कॉलेज के 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। इसी दौरान पीएम जेन-Z को संबोधित करेंगे।

समारोह की शुरुआत में पीएम ने 100 रुपए का सिक्का जारी किया। इसी साल अप्रैल में वे डाक टिकट भी जारी कर चुके हैं।

पीएम इससे पहले 2013 में श्रीराम कॉलेज का दौरा कर चुके हैं। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।

पीएम मोदी 2013 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के समारोह में शामिल हो चुके हैं।

दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान पीएम मोदी की तस्वीरें…

मोदी ने लिखा- SRCC ने लीडर्स की पीढ़ियां तैयार कीं

इवेंट के लिए रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने X पर एक पोस्ट में लिखा- इस कॉलेज ने एकेडमिक एक्सीलेंस, संस्थान बनाने और बिजनेस, पब्लिक लाइफ और समाज में लीडर्स की पीढ़ियों को तैयार करने के मामले में सालों में अपनी अलग पहचान बनाई है।

अप्रैल में डाक टिकट जारी किया गया था

इस साल अप्रैल में पीएम ने संस्थान के 100 साल पूरे होने के मौके पर एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था।

इस साल अप्रैल में पीएम ने संस्थान के 100 साल पूरे होने के मौके पर एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था।

1926 में हुई थी श्रीराम कॉलेज की स्थापना

दिल्ली यूनिवर्सिटी का श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स भारत के प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक है और कॉमर्स, इकोनॉमिक्स और मैनेजमेंट के क्षेत्रों में सीखने का एक प्रतिष्ठित केंद्र है।

मशहूर उद्योगपति और समाजसेवी सर श्री राम ने 1926 में स्थापित इस कॉलेज ने एक सदी के दौरान विद्वानों, पेशेवरों, प्रशासकों, उद्यमियों, नीति-निर्माताओं और राष्ट्र-निर्माताओं की पीढ़ियों को तैयार किया है।

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UN ने बदला दुनिया का नक्शा, अमेरिका ने विरोध किया:नए मैप में अफ्रीका बड़ा, यूरोप-US छोटे, भारत पर इसका क्या असर

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नई दिल्ली, एजेंसी। दुनिया का नक्शा अब कुछ बदला नजर आएगा। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है। भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाला अकेला देश रहा।

इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बस इनका आकार पहले से थोड़ा छोटा या बड़ा दिख सकता है।

अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए मर्केटर वर्ल्ड मैप का उपयोग किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था।

नए नक्शे का नाम इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है। इसमें अफ्रीका पहले से काफी बड़ा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे नजर आएंगे। एशिया के कुछ हिस्सों का आकार भी पहले से छोटा दिखेगा।

भारत: क्षेत्रफल वही, आकार बड़ा दिख सकता है

भारत की वास्तविक जमीन, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं या क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं होगा। यह बदलाव देशों की सीमाएं बदलने वाला नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है।

भारत का नक्शा देखने में भी थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन भारत के मामले में बदलाव बहुत बड़ा नहीं होगा।

नया नक्शा क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखाता है। पुराने नक्शे में भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके अपने आकार से छोटे और ध्रुवों के पास के इलाके बड़े दिखते हैं।

भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए पुराने नक्शे में भी उसका आकार कुछ हद तक छोटा दिखता है।

भारत के लिए इसका मतलब

  • क्षेत्रफल: बिल्कुल वही रहेगा।
  • सीमाएं: नहीं बदलेंगी।
  • भारत की आकृति: थोड़ी बदली हुई/कम खिंची हुई दिखाई दे सकती है।
  • दूसरे देशों की तुलना में आकार: भारत कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है, खासकर जब उसकी तुलना यूरोप, रूस, कनाडा जैसे ज्यादा उत्तरी देशों से की जाए।
  • अफ्रीका पर असर: सबसे ज्यादा नजर आएगा, क्योंकि उसका वास्तविक आकार पुराने मर्केटर नक्शे की तुलना में बहुत बड़ा दिखाई देगा।

अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका ने इस पहल की कड़ी आलोचना की। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की असली समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहस पर।

उन्होंने इसे एक वैचारिक एजेंडा बताया और कहा कि ऐसी बहसों की वजह से संयुक्त राष्ट्र अपनी विश्वसनीयता खो रहा है।

वहीं, अफ्रीकी संघ ने इस फैसले का स्वागत किया। उसने दुनिया के नए नक्शे को ज्यादा सटीक और बराबरी वाला बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।

मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या थी?

दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था।

इसका मकसद समुद्र में जहाजों के रास्ते और दिशा को समझना आसान बनाना था। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है।

जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं।

मर्केटर प्रोजेक्शन में पृथ्वी का नक्शा। (फोटो: NASA)

मर्केटर प्रोजेक्शन में पृथ्वी का नक्शा। (फोटो: NASA)

ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है।

ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।

फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है।

अफ्रीकी देश नक्शा बदलने की मांग क्यों कर रहे थे?

अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं।

UN के सामने रखे गए प्रस्ताव में कहा गया था कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है।

प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है।

अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा कि नक्शे सिर्फ भूगोल समझने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा और लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। यह प्रस्ताव टोगो ने पेश किया था और इसे अफ्रीकी संघ का समर्थन मिला।

फ्रांस भी मर्केटर मैप छोड़ने की तैयारी में

UN में मतदान से पहले फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो ने कहा कि उनका देश मर्केटर मैप की जगह ऐसे नक्शों का इस्तेमाल करेगा, जिनमें देशों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही तरीके से दिखाई दे।

फ्रांस अब एकर्ट IV प्रोजेक्शन का इस्तेमाल करेगा। एकर्ट IV नक्शा 1906 में जर्मन कार्टोग्राफर मैक्स एकर्ट-ग्राइफेंडॉर्फ ने बनाया था। उन्होंने दुनिया के नक्शे के छह अलग-अलग डिजाइन तैयार किए थे। इनमें चौथा नक्शा यानी एकर्ट IV क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे सटीक माना गया।

एकर्ट IV और इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन दोनों ऐसे नक्शे हैं, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखता है।

फिर 2018 में इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन की जरूरत क्यों पड़ी?

एकर्ट IV में क्षेत्रफल तो सही दिखाया गया है, लेकिन कई जगह देशों और महाद्वीपों के आकार में ज्यादा विकृति नजर आती है। इसी समस्या को कम करने के लिए इक्वल अर्थ बनाया गया,

इक्वल अर्थ बनाने का मकसद सिर्फ देशों और महाद्वीपों का सही क्षेत्रफल दिखाना नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया को ऐसे रूप में दिखाना था, जो देखने में भी ज्यादा संतुलित लगे।

क्या UN का फैसला सभी पर लागू होगा?

नहीं। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। यानी यह देशों, स्कूलों, किताबों के प्रकाशकों या टेक कंपनियों को मर्केटर नक्शा हटाने के लिए मजबूर नहीं करता।

लेकिन इससे नक्शे बनाने और पढ़ाने में ऐसे तरीकों को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का वास्तविक क्षेत्रफल ज्यादा सही दिखाई दे।

मर्केटर नक्शे को पूरी तरह खत्म करने की भी बात नहीं कही गई है। समुद्री और हवाई नेविगेशन में इसका इस्तेमाल जारी रह सकता है, क्योंकि इसमें दिशाओं को सही रखने की खासियत है।

  • मैप: यह अंग्रेजी का शब्द है। माना जाता है कि यह लैटिन के माप्पा से आया। जिसका अर्थ कपड़ा या चादर है, जिस पर नक्शा बनाया जाता था। बाद में इसका अर्थ मानचित्र हो गया।
  • नक्शा: यह अरबी मूल का शब्द है। अरबी में नक्श का अर्थ है चित्र या नक्काशी। इसी से नक्शा बना और हिंदी-उर्दू में किसी जगह का चित्र/मानचित्र बताने के लिए इस्तेमाल होने लगा।
  • मानचित्र: संस्कृत मूल का शब्द है। मान + चित्र, यानी किसी स्थान को माप या अनुपात के साथ चित्र के रूप में दिखाना।

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