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ATM Cash Shortage: ATM में नकदी संकट गहराया, भारत के कई राज्यों में कैश की कमी से बढ़ी चिंता

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नई दिल्ली, एजेंसी। देश के आम नागरिकों के लिए आने वाले दिन काफी परेशानी भरे हो सकते हैं। भारत के एटीएम (ATM) नेटवर्क पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है, जिससे आने वाले समय में आपको पैसे निकालने के लिए मुशिकल हो सकती है। एटीएम नेटवर्क को संचालित करने वाली मुख्य संस्था ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री’ (CATMI) ने ‘इंडियन बैंक्स एसोसिएशन’ (IBA) को पत्र लिखकर आगाह किया है कि देश में कैश (नकद) की भारी किल्लत हो गई है, जिससे एटीएम सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं।

 संस्था का कहना है कि इस नकदी संकट का सबसे बुरा असर ग्रामीण और अर्ध-शहरी (Semi-urban) क्षेत्रों में देखने को मिलेगा। दरअसल, सरकार द्वारा भेजी जाने वाली आर्थिक मदद (Direct Benefit Transfer) को निकालने के लिए गरीब और जरूरतमंद लोग पूरी तरह स्थानीय एटीएम पर ही निर्भर रहते हैं। कैश न होने से इन लाभार्थियों को अपनी ही रकम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
CATMI ने कहा कि ATM डायरेक्ट-ट्रांसफर बेनिफिशियरी के लिए कैश निकालने की जगह हैं। IBA को लिखे अपने पत्र में, CATMI ने कहा कि उसके सदस्यों को “कई राज्यों में बैंक ब्रांच और करेंसी चेस्ट से ATM में भरने के लिए कैश निकालने में लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है”। मार्च और अप्रैल में, ATM में भरने के लिए ज़रूरी कैश ₹94,000 करोड़ था, लेकिन उपलब्ध राशि क्रमशः ₹61,000 करोड़ और ₹54,000 करोड़ थी। इसका मतलब है कि ज़रूरत पूरी होने का प्रतिशत क्रमशः 64 प्रतिशत और 57 प्रतिशत था। यह जानकारी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के करेंसी मैनेजमेंट डिपार्टमेंट को दी गई है। यह जानकारी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के करेंसी मैनेजमेंट डिपार्टमेंट को दी गई है। संपर्क करने पर, CATMI के डायरेक्टर-जनरल एंटनी कोट्टाकल ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। CATMI उन संस्थाओं का प्रतिनिधि संगठन है जो ATM नेटवर्क को चालू रखती हैं। इनमें ATM बनाने वाली और आउटसोर्सिंग करने वाली कंपनियां, व्हाइट-लेबल कंपनियां शामिल हैं।
मांग और आपूर्ति में भारी अंतर- कैटमी (CATMi) ने बताया है कि रिजर्व बैंक (RBI) के करेंसी चेस्ट और बैंक शाखाओं से एटीएम में डालने के लिए पर्याप्त कैश नहीं मिल पा रहा है। मार्च और अप्रैल के महीनों में यह संकट बेहद गहरा गया:

महीना    जितनी नकदी की जरूरत थी (Indent)    जितनी नकदी असल में मिली (Available)    आपूर्ति का प्रतिशत (Fulfilment %)
मार्च 
                94,000 करोड़                                           61,000 करोड़                                      64%
अप्रैल               94,000 करोड़                                            54,000 करोड़                                      57%
यह डेटा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ‘करेंसी मैनेजमेंट विभाग’ को भी भेज दिया गया है ताकि स्थिति पर तुरंत काबू पाया जा सके।

इन 5 राज्यों में हालात सबसे ज्यादा खराब
कैश की किल्लत से देश के कुछ राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वहां जरूरत के मुकाबले बेहद कम कैश ATM तक पहुंच पा रहा है:
कर्नाटक: केवल 64% कैश मिला।
आंध्र प्रदेश: केवल 61% कैश मिला।
तेलंगाना: केवल 59% कैश मिला।
मिजोरम: केवल 59% कैश मिला।
अरुणाचल प्रदेश: सबसे खराब स्थिति, यहां सिर्फ 52% मांग ही पूरी हो सकी।

क्यों ठप हो रहा है ATM सिस्टम?

इंटरचेंज फीस का कम होना: 
जब आप अपने बैंक के अलावा किसी दूसरे बैंक के एटीएम से पैसे निकालते हैं, तो आपका बैंक उस एटीएम कंपनी को ₹19 ‘इंटरचेंज फीस’ (Interchange Fee) देता है। एटीएम कंपनियों का कहना है कि आज के समय में एटीएम चलाने का खर्च इस फीस से कहीं ज्यादा है।

बढ़ती महंगाई और ईंधन के दाम: मध्य पूर्व (West Asia Crisis) में चल रहे तनाव के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई हैं। कैश वैन (जो एटीएम तक पैसे पहुंचाती हैं) को चलाने का खर्च बहुत बढ़ गया है।

न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी: सरकार के नए ‘वेज कोड’ (Code on Wages) के कारण कई राज्यों में कर्मचारियों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ानी पड़ी है, जिससे एटीएम सुरक्षा और कैश लोडिंग का खर्च भी बढ़ गया है।

क्या है CATMi?
यह उन सभी कंपनियों का एक संगठन है जो देश में एटीएम मशीनें बनाने, उनमें कैश डालने, सुरक्षा देने और उनके सॉफ्टवेयर को चलाने का काम करती हैं। इनमें ‘व्हाइट-लेबल एटीएम’ (White-label ATMs – जो बैंक के नहीं बल्कि निजी कंपनियों के ATM होते हैं) चलाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।

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सस्ता होगा सोना, 20 हजार रुपए तक गिर सकते हैं दाम, एक्सपर्ट्स का अनुमान

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मुंबई, एजेंसी। साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अब सोने की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। जनवरी में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,595 डॉलर प्रति औंस का ऑल-टाइम हाई का लेवल छूने के बाद सोना अब 27 फीसदी तक टूट चुका है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने में 16 फीसदी तक और गिरावट आ सकती है, यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 3,400 से 3,500 डॉलर प्रति औंस के दायरे तक पहुंच सकता है। इसका असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिलेगा, जहां सोने की कीमतों में करीब 20,000 रुपए प्रति 10 ग्राम तक की गिरावट संभव बताई जा रही है।

कमोडिटी बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों में असाधारण तेजी आई थी। ऐसे में मौजूदा गिरावट को तकनीकी करेक्शन के तौर पर देखा जा रहा है। उनका मानना है कि लंबी अवधि में सोने का रुख अब भी सकारात्मक बना हुआ है लेकिन निकट भविष्य में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

क्यों सस्ता होगा सोना?

विशेषज्ञों के अनुसार, सोने पर दबाव बढ़ने की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ा भू-राजनीतिक तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिससे महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ी है। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भी सोने की मांग को प्रभावित किया है। डॉलर मजबूत होने पर अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी खरीदारी घटती है।

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि 4,000 डॉलर प्रति औंस का स्तर सोने के लिए एक अहम सपोर्ट जोन है। हालांकि, यदि वैश्विक बाजारों में बिकवाली का दबाव और बढ़ता है तो कीमतें अस्थायी रूप से 3,500 डॉलर तक भी जा सकती हैं। इसके बावजूद लंबी अवधि के लिए सोने को लेकर विशेषज्ञ आशावादी बने हुए हैं। उनका अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में सोना एक बार फिर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ सकता है।

केंद्रीय बैंक लगातार गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे 

सोने को समर्थन देने वाले प्रमुख कारकों में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी शामिल है। कई देशों के केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं, जिससे बाजार में सोने की मांग बनी हुई है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के हालिया सर्वे के अनुसार, अधिकांश केंद्रीय बैंक अगले 12 महीनों में भी अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करने की योजना बना रहे हैं। पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन 1,000 टन सोना खरीदा है, जो पिछले दशक के औसत से कहीं अधिक है।

निवेशकों के लिए सलाह

का कहना है कि आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक जोखिम और महंगाई की आशंकाओं के बीच सोना अब भी सुरक्षित निवेश विकल्प बना हुआ है। ऐसे में अल्पकालिक गिरावट के बावजूद लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कीमतों में आने वाली कमजोरी को चरणबद्ध खरीदारी के अवसर के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, निवेश से पहले बाजार की स्थिति और अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करना जरूरी रहेगा।

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RBI के लक्ष्य से पार पहुंची महंगाई, जून में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.38%

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मुंबई, एजेंसी। जून 2026 में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) बढ़कर 4.38 फीसदी पर पहुंच गई है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर मानसून की आशंकाओं के चलते महंगाई पर दबाव बना रहा। 6 महीनों में यह पहली बार है जब खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टारगेट 4% के पार निकली है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.93 फीसदी थी, जो जून में बढ़कर 4.38 फीसदी हो गई।

RBI का क्या है महंगाई लक्ष्य?

भारतीय रिजर्व बैंक का लक्ष्य खुदरा महंगाई को 4 फीसदी पर बनाए रखना है। हालांकि, केंद्रीय बैंक को इसे 2 फीसदी से 6 फीसदी के दायरे में रखने की अनुमति है। यह लक्ष्य अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक के लिए निर्धारित की गई है।

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देश का निर्यात जून में 15.5 प्रतिशत बढ़कर 40.41 अरब डॉलर पर, व्यापार घाटा 30.43 अरब डॉलर

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नई दिल्ली, एजेंसी। देश का निर्यात जून महीने में 15.5 प्रतिशत बढ़कर 40.41 अरब डॉलर रहा। इस दौरान व्यापार घाटा बढ़कर 30.43 अरब डॉलर हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आयात जून माह में करीब 31 प्रतिशत बढ़कर 70.84 अरब डॉलर रहा। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में निर्यात 15.92 प्रतिशत बढ़कर 129.32 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 19.89 प्रतिशत बढ़कर 216.18 अरब डॉलर हो गया। 

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सोने का आयात बढ़कर 11.01 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल अप्रैल-जून में 7.49 अरब डॉलर था। 

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि जून में पश्चिम एशियाई देशों को भारत का निर्यात 7.29 प्रतिशत बढ़कर पांच अरब डॉलर हो गया। अग्रवाल ने कहा कि कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कीमती धातुओं के आयात बढ़ने के कारण कुल आयात बढ़ा है।

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