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कंबोडियाई सैनिकों की गोलीबारी में 12 थाई लोगों की मौत:थाईलैंड ने कंबोडिया के सैन्य ठिकानों पर हमले किए, F-16 तैनात किया

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बैंकॉक / नोम पेन्ह,एजेंसी। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच आज सुबह सीमा पर गोलाबारी हुई है। कंबोडियाई सैनिकों की गोलीबारी में 12 थाई लोगों की मौत हो गई है। वहीं,14 घायल हैं।

थाईलैंड ने जवाब में कंबोडिया के सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। दोनों देशों ने एक दूसरे पर पहले हमला करने का आरोप लगाया है।

कंबोडिया के विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि थाई सैनिकों ने सुबह गोलीबारी की, जबकि थाई सेना ने कहा कि कंबोडिया ने पहले ड्रोन से हमला किया और फिर तोप और लंबी दूरी के BM21 रॉकेटों से हमला किया।

हमले को देखते हुए थाईलैंड ने बॉर्डर पर F-16 लड़ाकू विमान तैनात किया है। इस साल 28 मई को बॉर्डर पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच भिड़ंत हुई थी, जिसमें एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हो गई थी।

इसके बाद से दोनों देशों के बीच विवाद जारी है। इसी विवाद की वजह से इंडोनेशिया की पीएम पाइतोंग्तार्न शिनवात्रा को भी पद से हटाया गया था।

थाईलैंड-कंबोडिया के बीच हमले की फुटेज

थाई एयर फोर्स के F-16 विमानों ने कंबोडियाई ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में कंबोडिया ने थाई सीमावर्ती कस्बों पर कई BM21 रॉकेट दागे।

थाई एयर फोर्स के F-16 विमानों ने कंबोडियाई ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में कंबोडिया ने थाई सीमावर्ती कस्बों पर कई BM21 रॉकेट दागे।

कंबोडिया ने गुरुवार सुबह थाईलैंड के कई इलाकों पर हमले किए हैं।

कंबोडिया ने गुरुवार सुबह थाईलैंड के कई इलाकों पर हमले किए हैं।

थाईलैंड के सुरिन प्रांत में कंबोडिया सैनिकों की गोलीबारी में 8 साल के बच्चे नामखोंग बूंटाएंग की मौत हो गई।

थाईलैंड के सुरिन प्रांत में कंबोडिया सैनिकों की गोलीबारी में 8 साल के बच्चे नामखोंग बूंटाएंग की मौत हो गई।

थाईलैंड के सिसाकेट प्रांत में एक पेट्रोल स्टेशन से जुड़े एक स्टोर से धुआं निकलता हुआ।

थाईलैंड के सिसाकेट प्रांत में एक पेट्रोल स्टेशन से जुड़े एक स्टोर से धुआं निकलता हुआ।

कंबोडियाई BM-21 रॉकेटों ने थाईलैंड सीमा के पास हमला किया।

कंबोडियाई BM-21 रॉकेटों ने थाईलैंड सीमा के पास हमला किया।

प्रीह विहियर प्रांत में कंबोडियाई सैनिक गुरुवार को BM-21 मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर को फिर से लोड करते हुए।

प्रीह विहियर प्रांत में कंबोडियाई सैनिक गुरुवार को BM-21 मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर को फिर से लोड करते हुए।

थाईलैंड ने 40 हजार नागरिकों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया

हमले के बाद थाईलैंड ने सीमा से लगे 86 गांवों से लगभग 40 हजार नागरिकों को सुरक्षित जगहों पर भेज दिया है। वहीं, कंबोडिया में रहने वाले थाई लोगों को भी अपने देश लौटने की अपील की गई है।

कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह स्थित रॉयल थाईलैंड दूतावास ने कहा कि सीमा पर स्थिति बिगड़ती जा रही है और झड़पों के लंबे समय तक जारी रहने की संभावना के कारण, दूतावास ने अपने नागरिकों से जितनी जल्दी हो सके कंबोडिया छोड़ने को कहा है।

कंबोडिया और थाईलैंड के बीच विवाद को जानिए…

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद का इतिहास 118 साल पुराना है, जो प्रीह विहार मंदिर और आसपास के क्षेत्रों को लेकर है।

जब कंबोडिया फ्रांस के अधीन था तभी 1907 में दोनों देशों के बीच 817 किमी की लंबी सीमा खींची गई थी। थाईलैंड ने हमेशा इसका विरोध किया, क्योंकि नक्शे में प्रीह विहियर नाम का ऐतिहासिक मंदिर कंबोडिया के हिस्से में दिखाया गया था।

इस पर दोनों देशों में विवाद चलता रहा। 1959 में कंबोडिया यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले गया और 1962 में अदालत ने फैसला दिया कि मंदिर कंबोडिया का है। थाईलैंड ने इसे स्वीकार किया लेकिन आसपास की जमीन को लेकर विवाद जारी रखा।

प्रीह विहियर मंदिर और इसके आस-पास की जगह को लेकर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच विवाद जारी है।

प्रीह विहियर मंदिर और इसके आस-पास की जगह को लेकर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच विवाद जारी है।

मंदिर को हेरिटेज साइट में शामिल कराने पर झड़पें शुरू हुई

2008 में यह विवाद तब और बढ़ गया जब कंबोडिया ने इस मंदिर को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कराने की कोशिश की। मंदिर को मान्यता मिलने के बाद दोनों देशों की सेनाओं में फिर झड़पें शुरू हो गईं और 2011 में तो हालात इतने बिगड़ गए कि हजारों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो गए।

2011 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने दोनों देशों को विवादित क्षेत्र से सैनिक हटाने का आदेश दिया, और 2013 में फिर से पुष्टि की कि मंदिर और उसके आसपास का क्षेत्र कंबोडिया का है। लेकिन सीमा का मुद्दा अब तक पूरी तरह हल नहीं हो पाया है।

इस विवाद के बावजूद थाईलैंड और कंबोडिया दुनिया के सबसे अच्छे पड़ोसी देशों में से माने जाते थे। कुछ साल पहले तक दोनों देशों के नेताओं का मानना था कि उनकी दोस्ती कभी नहीं टूटेगी, क्योंकि वे एक लंबी सीमा साझा करते हैं और मिलकर आगे बढ़ना उनके लिए जरूरी है।

लेकिन हाल के समय में हालात बदल गए और उनके बीच तनाव काफी बढ़ गया है। 28 मई को एमराल्ड ट्रायंगल पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच भिड़ंत हुई, जिसमें एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हो गई थी। यह वो जगह है थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस की सीमाएं मिलती हैं। थाईलैंड और कंबोडिया दोनों ही इस इलाके पर दावा करते हैं।

थाईलैंड-कंबोडिया ने एक-दूसरे पर बैन लगाए

सैनिक की मौत से नाराज होकर कंबोडिया के नेता हुन सेन ने सीमा पर और सैनिक और हथियार भेजने का आदेश दिया, उन्होंने कहा कि वे युद्ध नहीं चाहते, लेकिन हमला होने पर जवाब देना पड़ेगा। थाई पीएम ने इसके जवाब में कहा कि थाईलैंड ऐसी किसी धमकी को बर्दाश्त नहीं करेगा।

इसके बाद कंबोडिया ने धमकी दी कि वह इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय अदालत में ले जाएगा, लेकिन थाईलैंड ने यह कहकर इनकार कर दिया कि वह अदालत के अधिकार को नहीं मानता।

इसके बाद थाईलैंड ने कंबोडिया की बिजली और इंटरनेट सेवा रोकने की धमकी दी, तो कंबोडिया ने थाई टीवी और फिल्मों पर बैन लगा दिया और थाई प्रोडक्ट्स के आयात पर रोक लगा दी। थाईलैंड ने भी कंबोडिया जाने वाले अपने मजदूरों को सीमा पार करने से रोक दिया।

विवाद सुलझाने में गई PM की कुर्सी

पीएम पद से हटने के बाद मीडिया के सवालों का जवाब देती हुई पाइतोंग्तार्न शिनवात्रा। तस्वीर 1 जुलाई 2025 की है।

पीएम पद से हटने के बाद मीडिया के सवालों का जवाब देती हुई पाइतोंग्तार्न शिनवात्रा। तस्वीर 1 जुलाई 2025 की है।

दोनों देशों के बीच विवाद बढ़ने के बाद 15 जून को थाईलैंड की पीएम पाइतोंग्तार्न शिनावात्रा ने कंबोडिया के नेता हुन सेन से फोन पर बातचीत की थी। इस बातचीत में उन्होंने थाई सेना के कमांडर की आलोचना की थी। इसे थाईलैंड में गंभीर मामला माना जाता है क्योंकि सेना का वहां काफी प्रभाव है।

इस बातचीत के लीक होने के बाद देशभर में गुस्सा फैल गया था। इसके बाद कोर्ट ने पीएम को पद से हटा दिया। हालांकि पाइतोंग्तार्न ने माफी मांगते हुए कहा था कि उनकी टिप्पणी सिर्फ विवाद सुलझाने के लिए थी, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

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भारत-नेपाल के बीच अब चाय बनी दरार, सख्ती के बाद शुरू हो गया नया विवाद

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नई दिल्ली/काठमांडू, एजेंसी। भारत-नेपाल   के बीच इन दिनों चाय को लेकर नया विवाद बढ़ता दिखाई दे रहा है। नेपाल का आरोप है कि भारत लगातार नेपाली चाय के आयात पर सख्ती बढ़ा रहा है, जबकि भारत का कहना है कि दार्जिलिंग चाय के नाम और गुणवत्ता की सुरक्षा जरूरी है। अब इस पूरे विवाद को दोनों देशों के बीच “चाय की जंग” कहा जाने लगा है।

क्या है पूरा मामला?
नेपाल बड़ी मात्रा में ऑर्थोडॉक्स चाय भारत को निर्यात करता है। नेपाल की बड़ी चाय मंडियां झापा और इलाम क्षेत्रों में हैं। नेपाल का दावा है कि उसकी करीब 80 प्रतिशत चाय भारतीय बाजार में बिकती है। हर साल लगभग 10 मिलियन किलोग्राम चाय भारत भेजी जाती है।  लेकिन भारत ने हाल के वर्षों में नेपाली चाय पर कई नियम और टेस्टिंग सख्त कर दिए हैं। अप्रैल 2024 में भारतीय अधिकारियों ने नेपाली चाय की 100 प्रतिशत सैंपल टेस्टिंग अनिवार्य कर दी। यानि हर खेप की जांच के बाद ही उसे भारतीय बाजार में प्रवेश मिल सकता है। इसके बाद मई 2026 से कुछ नए प्रतिबंध भी लागू किए गए। ममता बैनर्जी Mamata Banerjee ने भी कहा था कि नेपाल से बिना शुल्क आने वाली चाय दार्जिलिंग ब्रांड को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से नेपाली चाय को दी गई कर छूट वापस लेने की मांग की थी।

दार्जिलिंग चाय क्यों बनी विवाद ?
Darjeeling tea दुनिया की सबसे प्रसिद्ध चायों में गिनी जाती है। इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और ब्रांड वैल्यू बहुत बड़ी है। भारतीय पक्ष का आरोप है कि कुछ व्यापारी नेपाली चाय को दार्जिलिंग चाय के नाम से बेचते हैं, जिससे असली दार्जिलिंग ब्रांड की पहचान कमजोर होती है। इसी वजह से भारत गुणवत्ता और ब्रांड सुरक्षा के नाम पर सख्ती कर रहा है। नेपाल के चाय कारोबारी और अधिकारी भारत के कदमों को “व्यापारिक दबाव” बता रहे हैं। उनका कहना है कि भारत जानबूझकर देरी करता है। बार-बार टेस्टिंग से व्यापार प्रभावित होता है और यह नेपाल-भारत व्यापार संधि की भावना के खिलाफ है। नेपाल के कारोबारी उदय चपागाईं का कहना है कि अगर भारत को वास्तव में गुणवत्ता की चिंता होती, तो वह सीमा पर आधुनिक लैब बना सकता था। उनके अनुसार भारत का असली मकसद नेपाली चाय की प्रतिस्पर्धा को रोकना है।

असली विवाद बाजार हिस्सेदारी
नेपाल टी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के नेताओं का मानना है कि असली विवाद बाजार हिस्सेदारी का है। विशेषज्ञों के अनुसार दार्जिलिंग चाय का उत्पादन सीमित है और वैश्विक मांग बहुत ज्यादा है। नेपाली ऑर्थोडॉक्स चाय सस्ती और ज्यादा उपलब्ध है। ऐसे में नेपाली चाय अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से जगह बना रही है।नेपाल का मानना है कि भारत को डर है कि नेपाली चाय की अलग पहचान बनने से दार्जिलिंग चाय का बाजार कमजोर पड़ सकता है।

नेपाल की भारत पर बड़ी निर्भरता
नेपाल की चाय इंडस्ट्री काफी हद तक भारत पर निर्भर है। नेपाल के नेशनल टी एंड कॉफी डेवलपमेंट बोर्ड के अनुसार नेपाल हर साल 27.5 मिलियन किलोग्राम चाय पैदा करता है जिससे करीब 60,000 लोगों को रोजगार मिलता है। 20,000 हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती होती है। नेपाल के लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है, इसलिए भारतीय प्रतिबंध वहां के किसानों और निर्यातकों के लिए बड़ी चिंता बन गए हैं।

बढ़ सकता तनाव 
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह विवाद बढ़ता है तो दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। नेपाली किसानों को बड़ा नुकसान हो सकता है। दार्जिलिंग और नेपाली चाय के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। हालांकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा और गहरे आर्थिक संबंधों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाएगा। 

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पाकिस्तान का ट्रंप को करारा जवाबः अब्राहम समझौते से किया साफ इंकार, कहा-इजराइल से दोस्ती कभी नहीं

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इस्लामाबाद,एजेंसी। पाकिस्तान ने अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप की अपील को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ  ने अब्राहम समझौते में शामिल होकर इजराइल से रिश्ते सामान्य करने से इनकार करते हुए कहा कि यह पाकिस्तान की “मूल विचारधारा” के खिलाफ है। फिलिस्तीन मुद्दे पर अपना पुराना रुख दोहराते हुए पाकिस्तान ने साफ संकेत दिया कि वह इजराइल से दोस्ती के लिए फिलहाल तैयार नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि वह इस्लामाबाद के अब्राहम समझौते में शामिल होकर इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के पक्ष में नहीं हैं।

उनकी यह टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ शांति वार्ता में शामिल देशों से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने को कहा था। यह समझौता इजराइल और अरब देशों के बीच कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित करने को लेकर है। सोमवार रात ‘समा टीवी’ पर एक साक्षात्कार के दौरान आसिफ ने कहा, ”व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि हमें किसी ऐसे समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी मूल विचारधारा के खिलाफ हो।” वार्ताकारों में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन पहले से ही इस समझौते के सदस्य हैं, और ट्रंप को सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र और जॉर्डन के भी इस पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि उनका देश लंबे समय से इस रुख पर कायम है कि 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना होने तक वह इज़राइल को मान्यता नहीं देगा।

उन्होंने कहा, ”हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि यह हमें स्वीकार नहीं है।” मंत्री ने विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा, ”आप उन लोगों के साथ कैसे बैठेंगे जिनके शब्द पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं किया जा सकता?” उन्होंने पाकिस्तान के पासपोर्ट का भी जिक्र किया, जिस पर लिखा है कि यह इजराइल की यात्रा के लिए वैध नहीं है। आसिफ उन नेताओं में शामिल रहे हैं जो इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के किसी भी विचार का कड़ा विरोध करते हैं। पिछले माह उन्होंने इजराइल को ”मानवता के लिए अभिशाप” बताया था और उस पर क्षेत्र में नरसंहार करने का आरोप लगाया था। 

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बातचीत से पहले इजराइल का लेबनान पर बड़ा हमला; 12 लोगों की मौत, नेतन्याहू बोले- अभी और तेज होंगे हमले

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यरूशलम/बेका घाटी, एजेंसी। पूर्वी लेबनान के एक गांव पर इजराइल के हवाई हमले में 12 लोगों की मौत हो गई। लेबनान की सरकारी ‘नेशनल न्यूज एजेंसी’ ने मंगलवार को यह जानकारी दी। लेबनान के बेका घाटी क्षेत्र में सोमवार देर रात किए गए इस हमले से पहले इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था कि उन्होंने लेबनान में हिजबुल्ला आतंकवादी समूह को निशाना बनाकर और अधिक तीव्र हमले करने का फैसला किया है। इजराइली सेना ने इस विशेष हमले पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन उसने सोमवार को कहा था कि वह पूर्वी लेबनान में हिजबुल्ला के बुनियादी ढांचे को निशाना बना रही है।

बचावकर्मियों ने बताया कि दक्षिणी और पूर्वी लेबनान के बड़े हिस्सों को निशाना बनाकर रातभर किए गए भीषण हमलों के बाद मलबे से 12 शव निकाले गए। लेबनान और इजराइल के सैन्य प्रतिनिधिमंडलों की वाशिंगटन में होने वाली सीधी बातचीत से तीन दिन पहले ये हमले किए गए। हिजबुल्ला दक्षिणी लेबनान में इजराइली सैनिकों और उत्तरी इजराइल के कस्बों पर हमले कर रहा है।

उसने कहा है कि जब तक इजराइल अपने दैनिक हवाई हमले बंद नहीं करता और देश से अपने सैनिक नहीं हटाता, तब तक वह लड़ाई जारी रखेगा। लेबनान सरकार को उम्मीद है कि हिजबुल्ला के विरोध के बावजूद इजराइल के साथ सीधी बातचीत से संघर्षविराम का रास्ता निकलेगा। इस युद्ध में लेबनान में 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। यह युद्ध दो मार्च को ईरान के समर्थन में हिजबुल्ला द्वारा उत्तरी इजराइल पर रॉकेट दागे जाने के बाद शुरू हुआ था। 

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